स्त्री-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में आलोचक शिवकुमार मिश्र का चिंतन

डॉ. सितारे हिन्द

- सितारे हिन्द

सहायक प्रोफ़ेसर (अतिथि), हिन्दी विभाग, तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर, तमिलनाडु
चलभाष: +91 897 823 8235; ईमेल: sitareeflu@gmail.com


जिस प्रकार रचनाकार अपनी रचनाओं को अपने समकालीन प्रश्नों से ओझल करके नहीं रख सकता उसी प्रकार आलोचक भी आलोचना को सामजिक एवं साहित्यिक मुद्दों से जोड़कर रखता है। समकालीन मुद्दों से जुड़कर रचना एवं आलोचना दोनों धार पाती है। रचना एवं आलोचना दोनों की जीवंतता की यह बुनियादी शर्त है कि वह समकालीन मुद्दों से जुड़ी रहे। आलोचक अपनी आलोचना के माध्यम से रचनाकार, समय एवं पाठक-समाज से संवाद करता है। एक कुशल आलोचक की यह विशेषता होती है कि वह आलोचना को रचनात्मक प्रश्नों के साथ-साथ सामाजिक प्रश्नों को भी जोड़ते हुए चलता है। इस कसौटी पर शिवकुमार मिश्र पहली पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं। एक आलोचक के रूप में शिवकुमार मिश्र के लेखन का समय 1955-2011 के बीच ठहरता है। इस दौरान मिश्र जी से लगभग 28 पुस्तकें एवं कई आलेख लिखे। मुख्य रूप से इन्होंने भक्ति आन्दोलन, मार्क्सवाद, अस्मितामूलक चिंतन आदि पर सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक आलोचना लिखी है।

शिवकुमार मिश्र ने अपनी आलोचना के जरिए बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में आए अस्मितावादी विमर्श पर काफी कुछ लिखा है। इनके इस लेखन के दायरे में विशेषकर दलित एवं स्त्री विमर्श रहे हैं। अपने लेखन के दौरान इन्होंने स्त्री-रचनाकारों की कृतियों की समीक्षाएँ की हैं एवं एक अलग से निबंध ‘नारी अस्मिता के संघर्ष का यथार्थ:अतीत से आज तक’ में अपनी बातें रखी। उक्त निबंधों में इन्होंने दिखाया है कि भारतीय समाज में शुरूआत से ही पुरुषों का वर्चस्व रहा है। इन्होंने वाल्मीकि रामायण, युद्ध कांड, पंचशाधिक श्लोक सप्तम (116-118)* को उद्धृत किया है। इसमें राम कहते हैं-
“प्रख्यातस्यात्म वंशस्य न्यंगं चपरिमार्जना
प्राप्त चरित्र संदेहा मम प्रतिमुखे स्थिता
दीपो नेत्रातुरस्येव प्रतिकूलासि में हठा
तद्ग्च्छत्वानु जारेद्ययथेष्ट जनकात्मजे
एता दशदिशो भद्रेकार्यमास्ती न मे त्वया
कः पुंमास्तु कुले जातः स्त्रीयं परगृहोषिताम्। 
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सम्पादकीय नोट: उल्लिखित अंश वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के अष्टदशोत्तरशततम् सर्ग (16-18) में राम द्वारा रावण को हराने के बाद समस्त वानर-भालुओं, यक्ष-रक्ष, और देवों की उपस्थिति में सीता की एकनिष्ठा की घोषणा करके उन्हें स्वीकार करने से ठीक पहले का है जो निम्न श्लोक के साथ सम्पन्न होता है:

इतीदमुक्त्वा विजयी महाबलः
प्रशस्यमानः स्वकृतेन कर्मणा
समेत्य रामः प्रियया महायशाःसुखं सुखार्होऽनुवभूव 

अर्थ: विजयी, महाबली, यशस्वी और अपने कर्मों से लोकपालों द्वारा प्रशंसित राम अपनी प्रिया को अपने निकट बिठाकर अत्यंत हर्षित हुए। (एकविंशत्युत्तरशतम् सर्गः - 22) 

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अर्थात - अपने अपवाद मिटाने तथा कुल की कीर्ति रखने के लिए भी - मैंने रावण को मारा है। रावण के यहाँ बहुत दिन रहने से मुझमें तुम्हारे आचार के बारे में संदेह है। इससे, जैसे नेत्रों में पीड़ा वाले को दीपक नहीं अच्छा लगता है, वैसे ही तुम मुझको अच्छी नहीं लगती। इससे हे सीते, जहाँ चाहो वहाँ चली जाओ। तुमसे मेरा कोई संबंध नहीं है, क्योंकि ऐसा कौन होगा जो उच्च कुल में उत्पन्न होकर अन्य के घर में रही हुई स्त्री को फिर से ग्रहण का ले।”1 यहाँ एक आलोचक की हैसियत से मिश्र जी ने इशारा किया है कि स्त्री-मुक्ति के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यौनिकता (Sexua।ity) से मुक्ति का है। पितृसत्तात्मक समाज में लैंगिकता या यौनिकता पर पूर्ण नियंत्रण पुरुष समाज का रहता है। यही वह कारण है कि कोई स्त्री अगर खुद की मर्जी से भी अपना जीवन साथी चुनती है या एक ऐसे पुरुष के साथ रहती है जो उसके मूल,गोत्र,जाति या धर्म का नहीं हो तो उसे समाज का विरोध झेलना पड़ता है। भारत के कई प्रदेश आज भी ‘ऑनर कीलिंग’ की समस्या से जूझ रहे हैं। शिवकुमार मिश्र ने मिथकों के माध्यम से इस समस्या की जड़ तक पहुँचने की कोशिश की है।

स्त्री शोषण का दूसरा कारण है स्त्रियों का वस्तुकरण कर दिया जाना। यहाँ स्त्रियों के वस्तुकरण का अर्थ है बिना उसके व्यक्तित्व या गरिमा की परवाह किए उसके साथ वस्तु जैसा व्यवहार करना। मिश्र जी ने महाभारत के द्रोपदी-प्रसंग का उदाहरण देते हुए इसे स्पष्ट करने की सफल कोशिश की है। द्रोपदी के विवाह से लेकर उसके अर्जुन सहित सभी पांडवों के साथ घर तक आने और आने के बाद तक वह क्या करेगी, किसके साथ रहेगी आदि तमाम चीजें दूसरे व्यक्ति के हाथ में है न कि द्रोपदी के हाथ में। स्वयंवर में द्रोपदी को जीतने के बाद जब पांडव घर आते हैं और अपनी माँ कुंती से बोलते हैं कि “माँ आज यह भिक्षा मिली है। कुंती तब कुटी के भीतर थी। कुछ न देखकर ही पुत्रों से बोली, “भुङ्क्तेति समेत्य सर्वे।’ तुम सब मिलकर भोगो।”2 इसके पश्चात द्रोपदी पाँचों भाईयों की पत्नी के रूप में रहती है। द्रोपदी से यह पूछा भी नहीं जाता है कि वह क्या चाहती है? द्रोपदी को यह सब धर्म के रक्षार्थ करना पड़ता है। मिश्र जी कहते हैं कि “द्रोपदी, जिसके मन पर अबतक केवल अर्जुन का बिंब था, इस व्यवस्था को धर्म की रक्षा के नाते स्वीकार करने को विवश होती है। आजीवन वह पाँच पतियों के साथ अपने पत्नी धर्म का निर्वाह करती है।”3 यानि कि स्त्रियाँ क्या करे इसका निर्धारण या तो पुरुष समाज करता है या फिर पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रस्त महिलाएँ। अतः स्त्री मुक्ति के लिए स्त्रियों के वस्तुकरण किए जाने की प्रवृत्ति से भी मुक्ति चाहिए। स्त्री मुक्ति की राह में एक बहुत बड़ा संकट धर्म का स्त्रियों के खिलाफ होना है। शुरूआत से ही लड़कियों को यह सिखाया जाता है कि उनमें लज्जा होनी चाहिए, पतिव्रत धर्म का पालन करना चाहिए। जो स्त्री इस प्रकार के नियमों का अनुपालन करती है उसे यश मिलाता है। भारतीय वांग्मय में ऐसे उदहारण दिखाकर इसे सत्य ठहराया जाता है। महाभारत की गांधारी अपने पति के अंधेपन के कारण आजीवन खुद के आँख पर भी पट्टी बांधे रहती है। धर्म न सिर्फ उसके इस कार्य की प्रशंसा करता है, बल्कि इस कार्य के लिए उसे अपार यश भी मिलता है। मिश्र जी लिखते हैं कि “स्त्री के इन सारे त्रासद प्रसंगों के केंद्र में पुरुष ही है या फिर उसके द्वारा रचे गए धर्मशास्त्र हैं।”4 शिवकुमार मिश्र ने लिखा है कि बुद्ध की भी धारणा स्त्रियों के पक्ष में सही नहीं थी। वो लिखते है “महात्मा कहे जाने वाले बुद्ध संघ में स्त्रियों के प्रवेश के पक्ष में नहीं थे। अपने प्रिय शिष्य आनंद के अतिशय आग्रह के चलते उन्होंने बड़ी अनिच्छा से संघ में स्त्रियों के प्रवेश को अनुमति दी। किंतु उन्होंने आनंद से कहा “आनंद, संघ निःसंदेह सहस्त्र वर्ष जीवित रहता किंतु नारी के प्रवेश से उसकी आयु क्षीण हो जाएगी। अब यह केवल पाँच सौ वर्षों तक जीवित रहेगा। इसके उपरांत बुद्ध ने भिक्षुणियों के लिए जो आठ गुरू धर्म निर्धारित किए ... उनमें से कुछ इस प्रकार हैं - “सौ वर्षों से भी संघ में दीक्षित भिक्षुणी को भी आज ही संघ में दीक्षित भिक्षु के चरण अपने मस्तक से स्पर्श करने होगें। भोजन, आवास, वस्त्रादि पर पहला अधिकार भिक्षु का होगा। क्या सत्य है, क्या असत्य है। इन सवालों पर भिक्षुणियों का भिक्षुओं से बात करना वर्जित है।”5 भारतीय समाज में सारे कठोर नियम स्त्रियों के लिए ही बनाए गए हैं। एक पुरुष अगर कई स्त्रियों के संपर्क में रहे तो समाज को कुछ भी फर्क नहीं पड़ता। लेकिन वहीं अगर कोई स्त्री ऐसा करे तो उसे वेश्या, कुलटा आदि न जाने क्या-क्या नाम दिए जाते हैं! मिश्र जी लिखते हैं कि “वैवाहिक जीवन को निष्कलंक बनाए रखने और पतिव्रत पर कायम रहने की शर्त महज स्त्री के लिए है। एक पति, वह कैसा भी हो, मनवचन और कर्म से उसके प्रति संपूर्ण समर्पण ही नारी का धर्म है, इसी में उसकी गति है। इस पथ से विपथित नारी को धर्म शास्त्रों में कठोर शब्दों में याद किया गया है। उसे भयानक दुष्फल भोगने की चेतावनी भी दी गई है।”6 मिश्र जी ने इसका विरोध किया है कि पतिव्रत पर कायम रहने की शर्त सिर्फ स्त्रियों के लिए है। भारतीय नवजागरण के दौर में स्त्री मुक्ति का प्रश्न बहुत ही मुखर होकर उभरा लेकिन उसमें स्त्रियों की भागीदारी बहुत ही कम थी। स्त्री-मुक्ति का प्रश्न पुरुष उठा रहे थे। ऐसे में स्त्री-मुक्ति का वास्तविक प्रश्न एवं उनकी वास्तविक पीड़ा पर एक पर्दा जरूर चढ़ा हुआ था। मिश्र जी लिखते हैं कि “नवजागरण से शुरू हुए हिंदी साहित्य पर निगाह डालें तो भारतेंदु से लेकर मैथलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला यहाँ तक कि प्रेमचंद तक में नारी प्रधानतः करुणा को ही पा सकी है। अपवाद हैं तो महादेवी वर्मा जिनके गद्य में नारी एक बार फिर अपने वजूद से जुड़े हुए दहकते-सुलगते सवाल उठाती हैं, किंतु पुरुष प्रभुता वाले समाज में पुरुष के स्वरों के आगे नारी का अपना स्वर दबा ही रहा है।”7 महादेवी के संदर्भ में मिश्र जी ने यह बात सही ही लिखी है। स्त्री विमर्श के क्षेत्र में महादेवी वर्मा का लेखन बहुत ही महत्व का है। इसका कारण यह है कि इनका लेखन सिमोन द बोउवार से पहले ही स्त्री विमर्श के क्षेत्र में पदार्पण कर चुका था। फ्रेंच लेखिका सिमोन दबोउवार की पुस्तक ‘The Second sex’ जिसका प्रकाशन सन् 1949 में हुआ था और स्त्री विमर्श की शुरूआती सैद्धांतिक पुस्तकों में इसका शुमार है। महादेवी वर्मा ने सिमोन से छह वर्ष पूर्व ही सन् 1942 में ‘शृंखला की कड़ियाँ’ लिखी थी। हालाँकि यह पुस्तक भारतीय स्त्रियों के संदर्भ में लिखी गयी थी। लेकिन अपने व्यापक संदर्भ में यह संपूर्ण स्त्री जाति से जुड़ती है। महादेवी वर्मा यह चाहती हैं कि स्त्रियाँ यह समझे कि उनका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। यह समझकर ही वह अपनी मुक्ति का रास्ता ढूंढ़ सकती है। महादेवी वर्मा लिखती हैं कि“इस समय हमारे समाज में केवल दो प्रकार की स्त्रियाँ मिलेंगी-एक वे जिन्हें इसका ज्ञान ही नहीं है कि वे भी एक विस्तृत मानव समुदाय की सदस्य हैं और उनका भी एक ऐसा स्वतंत्र व्यक्तित्व है जिसके विकास से समाज का उत्कर्ष और संकीर्णता से अपकर्ष संभव है, दूसरी वे जो पुरुषों की समता करने के लिए उन्हीं के दृष्टिकोण से संसार देखने में, उन्हीं के गुणावगुणों का अनुकरण करने में जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति समझती हैं।”8 उपर्लिखित उद्धरण से यह स्पष्ट परिलक्षित है कि महादेवी वर्मा ने यह माना है कि स्त्रियाँ इससे अनिभिज्ञ हैं कि वह गुलाम हैं। वह यह समझ ही नहीं पाती हैं कि उनका भी स्वतंत्र अस्तित्व है। अतः स्त्री-मुक्ति के लिए पहली शर्त यह है कि उन्हें अपने अस्तित्व का बोध हो। डॉ.बाबा साहेब अंबेडकर ने भी लिखा है कि “गुलाम को गुलामी का एहसास करा दो तो वह क्रांति कर देगा।”9 महादेवी वर्मा ने यह भी माना है कि स्त्रियाँ पुरुषों के गुणावगुणों का अनुकरण करने को, जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति समझती हैं। इसी संदर्भ में लेखिका प्रभा खेतान ने जब Simone de Beauvoir की पुस्तक ‘The Second Sex’ का हिंदी अनुवाद ‘स्त्री उपेक्षिता’ के नाम से किया और उसकी भूमिका में उन्होंने लिखा कि “अपने आपको पुरुष के रूप में स्वीकारना चाहने वाली और पौरूषीय उपलब्धियों तथा सम्मान का दावा करने वाली स्त्रियाँ दरअसल पुरुष जैसा होना चाहती हैं। वे पुरुष की नकल करती हैं।”10 कहने का निहितार्थ यह कि अगर कोई स्त्री, पुरुषों की नकल कर, उसके जैसा हाव-भाव दिखाकर यह सोचती है कि वह पुरुषों की बराबरी में आ गयी तो यह गलत है, क्योंकि नकल या अनुकरण उसी का किया जाता है जिसका व्यक्ति सम्मान करता है। महादेवी के इतने प्रासंगिक एवं क्रांतिकारी विचारों को निश्चित ही दबा दिया गया था।

आज के बाजारवाद के दौर में स्त्रियों का शोषण अत्यधिक बढ़ गया है। यह शोषण शारीरिक, आर्थिक एवं मानसिक आदि रूपों में होता है। बाजार स्त्रियों की मानसिकता तैयार करता है एवं उसमें हीन भावना पैदा कर अपना माल बेचता है। मिश्र जी मानते हैं कि “सौंदर्य-प्रसाधन, वेशभूषा, अलंकार, अपनी देह को सजाए सँवारे रहने की प्रवृत्ति के मूल में भी स्त्री की पुरुष को रिझाने की ही मानसिकता है। अपनी कामेषणा के चलते पुरुष बराबर इन बातों में नारी को उकसाता तथा इस्तेमाल करता है।”11 आज बाजार न सिर्फ उत्पाद बेचता है, बल्कि वह ग्राहकों की जरूरतें भी पैदा करने लगा है। अपने लुभावने विज्ञापन के द्वारा वह सर्वप्रथम लोगों में हीन भावनाएँ पैदा करता है फिर अपना सौदा बेचता है। प्रभा खेतान कहती हैं कि “स्त्री को कैसा होना चाहिए, इसके निर्देशन और प्रदर्शित करने और नियंत्रित करने का सबसे सशक्त माध्यम मीडिया बन गया है। सौंदर्य प्रसाधन एवं रख-रखाव की जो अपेक्षा महारानियों या राज-नर्तकियों से की जाती थी, वह अपेक्षा अब एक साधारण कामकाजी घरेलू स्त्री से की जाती है। स्त्री स्वयं इस उपभोक्ता संस्कृति की गुलाम होती जा रही है। अपने इस आत्मदास्त्व में वह जकड़ी हुई है। उसका यह आत्म-निग्रह पुरुष सत्ता की चाकरी है। वह अंततः महज देह है, दूसरे को लुभाने-फुसलाने वाली।”12 खेतान ने सही ही लिखा है। आज की यह वास्तविकता है कि विज्ञापन के द्वारा मीडिया ने यह प्रचार किया है या कर रहा है कि अमुक कसौटी के अंदर आयी हुई स्त्री ही आज फिट बैठेगी, शेष का कोई स्थान नहीं है। इस संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय का मानना हैकि “हाशिए पर खड़ी स्त्री पराधीनता का शिकंजा उपभोक्तावादी संस्कृति के हमले से और अधिक कस गया है। वैसे तो उपभोक्तावाद के लिए मनुष्य मात्र एक बाजारू वस्तु है, लेकिन इसके भीतर मौजूद पुरुष प्रभुत्व की मानसिकता पर विचार करने की जरूरत है जिसका दुरुपयोग स्त्री के प्रसंग में होता है। यदि हम सिर्फ विज्ञापनों का ही उदहारण लें तो इसमे स्त्री केवल वस्तु ही नहीं, वस्तु को बेचने का साधन भी बनती है। विज्ञापन में मानवीय संबंधों तक का बाजारीकरण हो जाता है जिसके तहत दो आत्मीयता से करीब आते होंठ सिर्फ इसलिए नहीं मिल पाते कि इस आत्मीयता को कोलगेट का सुरक्षाचक्र उपलब्ध नहीं है। या स्त्री-पुरुष के बीच मात्र एक खास आफ्टर शेव लोशन की मध्यस्थता ही है कि स्त्री पुरुष की गुलाम हो जाती है। दूसरी ओर विज्ञापन स्त्री की एक ऐसी छवि का निर्माण करता है जिसमे उसके स्त्रीत्व का सार किसी मानवीय गुण में निहित न होकर उस खास क्रीम या ‘हेयर डाय’ में निहित होता है जिसके बिना वह स्त्री, स्त्री नहीं है। सौंदर्य और स्त्रीत्व के इस उपभोक्तावादी निर्माण में स्त्री की पराधीनता को उसके ‘सद्यः से प्राप्त आत्मविश्वास’ में लपेट कर प्रस्तुत किया जाता है। पुरुषवादी वर्चस्व की इस विचारधारा में निहित स्त्री की साधन वाली दशा की सहज सामाजिक स्वीकृति का विज्ञापन एक उपभोग मात्र करता है।”13 विज्ञापनों एवं टीवी सीरियलों में खाते-पीते एवं मेकअप से सजी स्त्रियाँ साधारण और सामान्य घरेलू स्त्रियों को असामान्य तो लगती हैं, लेकिन एक ऐसा माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती कि वह भी वास्तविकता के ऊपर अवास्तविकता का आवरण ओढ़े! प्रभा खेतान मानती हैं कि इससे स्त्रियाँ आत्मविश्वास खोती हैं। वो कहती हैं कि “स्त्री ने हमेशा मेकअप किया है। पर मेकअप के पीछे कुछ छुपाने की भावना ज्यादा है और सुंदर लगने की भावना कम। कोई स्त्री इसलिए छुपाना चाहती है क्योंकि बिना रंग-रोगन के वह अपने-आपको ख़ारिज मानती है सौंदर्य प्रसाधनों के जितने भी विज्ञापन आते हैं, उनका अघोषित संदेश है कि आपकी देह स्थूल है इसे और अधिक दुबला बनाईए, त्वचा साँवली है, खुरदुरी है, इसे गोरा एवं चिकना बनाइए, बाल घने और काले होने चाहिए। रात-दिन टीवी चैनलों पर दिखाई जाने वाली स्त्री और साधारण स्त्री में बेहद फर्क है। टीवी विज्ञापनों में इस सजी-संवरी स्त्रियों को देखकर एक सामान्य स्त्री अपना आत्मविश्वास खोती अधिक है, पाती कम है।”14 निष्कर्षतः बात यह है कि आदिकाल से आज तक के दौर तक स्त्रियों का शोषण होता रहा है। समय के साथ-साथ इसके रूप जरूर बदले हैं लेकिन यह वर्त्तमान में भी जारी है। आज भी स्थिति यह है कि शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक स्तर पर स्त्रियाँ गुलाम हैं। हिंदी कवियित्री अनामिका मानती हैं कि “कोई तो बात होगी कि दुनिया भर की औरतें पुरुषों के मुकाबले तीन गुणा अधिक काम करती हैं, तिगुने हैं उनके काम के घंटे और आमदनी नगण्य! दुनियाभर की संपत्ति का मात्र 2.2% हिस्सा स्त्रियों के नाम है।”15 जाहिर सी बात है कि आर्थिक हैसियत कमजोर होने पर सामाजिक हैसियत भी कमजोर होगी। अतः स्त्री-विमर्शकारों ने स्त्रियों की आर्थिक मुक्ति की बात प्रमुख रूप से उठाई है। वर्तमान समय में नारीवादी आंदोलन एवं विमर्श चल तो रहे हैं लेकिन इनकी अपनी मुश्किलें हैं। मिश्र जी लिखते हैं कि “नारी की अस्मिता अलमारी में रखा कोई समान नहीं है कि जरा से प्रयास से हाथ बढ़ा कर उसे पा लिया जाए। जैसा परिदृश्य आज है उसे देखते हुए नारी अस्मिता की बहाली का संघर्ष कठिन तो है ही, वह पेचीदा भी है। इस संघर्ष की फलश्रुति यदि सफलता में होती है, जो होनी भी चाहिए, इस लड़ाई को यदि जीता जाना है, तो संघर्ष धर्यपूर्वक, वस्तुस्थिति की सही समझ के साथ चलना चाहिए। यह इकहरी लड़ाई नहीं, दुहरी लड़ाई है। प्रतिपक्ष में सिर्फ पुरुष ही नहीं स्त्री भी हैं। बाहर के अलावा, पुरुष प्रभुता वाले समाज के अन्याय और अमानवीयता के अलावा इस लड़ाई को स्त्री को अपने भीतर भी लड़ना है। सदियों के संस्कारों की जमी परतें एकदम से नहीं हट सकतीं। उन्हें तिल-तिल काटना होगा।”16 मिश्र जी भी यह मानते हैं और बात भी सही है कि स्त्री-मुक्ति के जो संघर्ष चल रहे हैं उसमें पितृसत्ता से ग्रस्त पुरुषों से तो मुक्ति पायी जा सकती है लेकिन समाजीकरण के द्वारा इस बीमारी से जो स्त्रियाँ ग्रस्त हैं उनसे निजात पाना काफी मुश्किल है। स्त्रियों को खुद के भीतर जड़ जमा कर बैठे पितृसत्ता वाले संस्कार को अलग करना होगा तभी मुक्ति की वास्तविक लड़ाई लड़ी एवं जीती जा सकती है। 

संदर्भ सूची
1.शिवकुमार मिश्र, मार्क्सवाद देवमूर्तियाँ नहीं गढ़ता, पृष्ठ संख्या 146-47
2.वही, पृष्ठ संख्या - 148
3.वही 
4.वही, पृष्ठ संख्या - 149
5.वही, पृष्ठ संख्या - 149-150
6.वही, पृष्ठ संख्या - 151
7.वही, पृष्ठ संख्या - 153
8.महादेवी वर्मा, श्रृंखला की कड़ियाँ, पृष्ठ संख्या - 14
9.यादव,राजेंद्र."साहित्य-सरोवरका ‘हंस’." आखरमाला (2013): n. pag.Web. 24Ju।y2017.<https://omprakashkashyap.wordpress.com/tag/%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%95/>. (उद्धृत)
10.सीमोन बोउवार, प्रभा खेतान (अनुवादक), स्त्री उपेक्षिता, पृष्ठ संख्या-22
11.शिवकुमार मिश्र, मार्क्सवाद देवमूर्तियाँ नहीं गढ़ता, पृष्ठ संख्या-156
12.प्रभा खेतान, उपनिवेश में स्त्री, पृष्ठ संख्या-144
13.मैनेजर पाण्डेय, आलोचना की सामाजिकता, पृष्ठ संख्या-148
14.प्रभा खेतान, उपनिवेश में स्त्री, पृष्ठ संख्या-142-143
15.अनामिका, स्त्री विमर्श का लोकपक्ष, पृष्ठ संख्या-7
16.शिवकुमार मिश्र, मार्क्सवाद देवमूर्तियाँ नहीं गढ़ता, पृष्ठ संख्या-159
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शिवकुमार मिश्र का परिचय
शिवकुमार मिश्र, हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना के प्रमुख आधार स्तम्भों में से एक हैं। इनका जन्म 3 सितंबर 1930 ईसवी को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के महोत्री गाँव में हुआ था। इनकी शुरुआती पढ़ाई कानपुर में पूरी हुई। इन्होंने ‘हर सहाय जगदंबा सहाय’ हाई स्कूल से मैट्रिक, डी.ए.वी. कॉलेज, कानपुर से ग्यारहवीं, बी.ए. तथा 1952 में इसी कॉलेज से हिन्दी साहित्य से एम.ए. की परीक्षा पास की। इसके पश्चात शिवकुमार मिश्र जी ने सागर विश्वविद्यालय से आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी के निर्देशन में ‘छायावाद के पश्चात् हिन्दी कविता की विविध विकास दिशाएँ’ विषय पर 1956 से 1959 के मध्य अपनी पी.एचडी. पूरी की। इसके बाद ये कुछ वर्षों तक सागर विश्वविद्यालय में तथा 1977 से 1991 में अवकाश ग्रहण करने तक सरदार पटेल विश्वविद्यालय, वल्लभ विद्यानगर, गुजरात में हिन्दी के प्राध्यापक रहे। शिवकुमार मिश्र ने प्रगतिशील आलोचक की हैसियत से हिन्दी आलोचना को काफी समृद्ध बनाया। इन्होंने सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार की आलोचना की है। मिश्र जी, जीवनपर्यंत साहित्य-सेवा में रत रहे। जिसका प्रमाण हम उनकी रचनाओं में पा सकते हैं। 21 जून 2013 को हिन्दी प्रगतिशील आलोचना के इस सूर्य का अवसान हो गया। शिवकुमार मिश्र की प्रमुख पुस्तकें इस प्रकार हैं –

1. वृंदावन लाल वर्मा उपन्यास और कला - 1956
2. कामायनी और प्रसाद की कविता गंगा -1958
3. नया हिन्दी काव्य -1962
4. प्रगतिवाद -1966
5. भक्तिकाव्य और लोकजीवन -1983
6. आलोचना के प्रगतिशील आयाम - 1987
7. कला, साहित्य और संस्कृति (संपादित) - 1994
8. दर्शन, साहित्य और समाज - 2000
9. मार्क्सवाद और साहित्य(संपादित) - 2001
10. हिन्दी आलोचना की परंपरा और आचार्य रामचंद्र शुक्ल - 2002
11. आजादी की अग्निशिखाएँ (संपादित) - 2003
12. मार्क्सवाद देवमूर्तियाँ नहीं गढ़ता – 2004
13. संतवाणी (संपादित) - 2006
14. प्रेमचंद: विरासत का सवाल - 2008
15. आधुनिक कविता और युग संदर्भ - 2008
16. साहित्य इतिहास और संस्कृति - 2009
17. यथार्थवाद - 2009
18. हिन्दी साहित्य का संक्षिप्त इतिवृत - 2009
19. साहित्य के सामाजिक सरोकार - 2010
20. भक्ति आंदोलन और भक्ति-काव्य - 2010
21. कहानीकार प्रेमचंद:रचना दृष्टि और रचना शिल्प - 2010
22. मार्क्सवादी साहित्य-चिंतन इतिहास तथा सिद्धांत - 2010
23. प्रेमचंद की विरासत और गोदान - 2011
24. साहित्य और सामाजिक संदर्भ - 2012
25. आधुनिक कविता और युग-दृष्टि - 2012
26. आलोचना के प्रगतिशील सरोकार - 2012
27. धूमिल की श्रेष्ठ कविताएँ (संपादित) - 2013 
28. सांप्रदायिकता और हिन्दी उपन्यास - 2015


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