हिंदी साहित्य के शब्द साधक डॉ रमेश पोखरियाल निशंक

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


साहित्य की रचना प्रक्रिया रचनाकार की आत्मा होती है। यदि रचना प्रक्रिया कोई रचनाकार ठीक-ठीक नहीं जानता, चाहे वह कवि हो, लेखक हो या कलाकार। अपनी रचना विधा को ठीक-ठीक नहीं समझता रचनाकार तो वह भटक जाता है और उसका साहित्य पाठक को बाँधने में भी विफल हो जाता है। इसलिए साहित्यकार को साहित्य के साथ साधना करनी होती है। लेकिन जो लेखक इसकी बारीकियां जानता है, समझता है, तो वह पाठक को अपनी ओर आकर्षित कर ही लेता है। डॉ। रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ऐसे ही साहित्य के शब्द साधक हैं, और उनके रचना प्रक्रिया से गुजरते हुए इसीलिए पाठक बिना पूरी रचना पढ़े उससे स्वयं को अलग नहीं कर पाता। उनके उपन्यास, कहानी, कविता और यात्रा-वृतांत को यदि आप पढ़ें, तो यह लगेगा कि जब-जब भारत में साहित्य के नक्षत्रों की बात की जाएगी तब-तब हम उसमें निशंक जी की उपस्थिति मिलेगी। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अपना अमूल्य सर्जनात्मक कार्य उन्होंने संपन्न किया है। भारत के लिए गौरव की बात है कि हमारे देश में एक से बढ़कर एक मूर्धन्य साहित्यकारों ने समय-समय पर अपने रचनात्मक कार्यों के माध्यम से लोगों के मनो-मस्तिष्क पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। डॉ रमेश पोखरियाल निशंक उन्हीं में से एक हैं। अपने लेखन के साथ वे यद्यपि कई महत्त्वपूर्ण कार्य को कर रहे होते हैं, क्योंकि वह सार्वजनिक जीवन भी जीते हैं। उन्होंने भारत के शिक्षा मत्री के रूप में नई शिक्षा नीति के माध्यम से दुनिया भर में लोकप्रियता पायी, वह भी भारत के लिए बहुत ही प्रतिष्ठापूर्ण है।

डॉ रमेश पोखरियाल निशंक
सभ्यता का ऐतिहासिक दौर अपने समय के साहित्यकार को आकर्षित करता है और उससे रचनाकार बहुत ज्यादा प्रभावित होता है। उसी के आसपास कुछ सोचता है और अपनी रचना में उसे प्रतिबिंबित भी करता है। साहित्य की बुनियादी आवश्यकता भी होती है कि रचनाकार अपने समय के सापेक्ष सोचे और उसे लोगों के समक्ष प्रस्तुत करे, निशंक जी ने साहित्य की जो भी साधना की है उसमें ये चीजें उभरकर सामने आती हैं। वह अपने समयकाल और वातावरण को बखूबी साहित्य में जगह देते हैं। बंद कमरे में बैठकर लिखे गए गीत और समाज के सरोकारों से जूझते हुए लिखे गए किस्से समझ में आ जाते हैं। निशंक जी की सबसे अच्छी साहित्यिक परिधि पर अगर चर्चा की जाएगी तो लगेगा कि वह समाज से संवाद करके, स्वयं उसको चिंतन के स्तर पर परखकर सृजित करते हैं इसलिए उनका सृजनात्मक कार्य लोगों के बीच प्रतिष्ठा भी पाया क्योंकि उन्होंने जिनके बीच जिया उनको अपने साहित्य का हिस्सा बनाया। वह कपोलकल्पित चीजों से ज्यादा समय से साक्षात्कार करने में रूचि रखते हैं, आगे हम एक उनकी कथा का ज़िक्र करेंगे। निशंक जी की कविताओं को पढ़ते हुए यह लगता है कि वह सच को आईने से उतारकर काव्यात्मक रौशनी डाल रहे हों। उन्होंने काव्य में अभावों, पीड़ाओं, नकारात्मकता को भावभूमि बनाकर कविता रची तो वहीँ वह बहुत ही सकारात्मक भाव से सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ जाने के लिए प्रेरित करने वाली भी कविताओं से युवाओं को अभिप्रेरित करते हैं। भूख, बेरोजगारी, शोषण तथा अभावग्रस्त जीवन के विविध पक्षों को विस्तार के साथ निशंक जी ने अभिव्यक्त किया है। बुरे को बुरा कहना या अन्याय के विरोध में मुँह खोलने का साहस कितना जरूरी है? अन्यथा दुनिया रहने लायक नहीं रह जाएगी। अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष भी, निशंक की कविताओं की खूबी है। निशंक की कविता सुन्दर बिम्बों की भी कविता है। पहाड़ी जीवन के संघर्ष और उनसे कवि का सघन व आत्मीय परिचय, उनके काव्य-बिम्बों को सहज व प्राणवान बनाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि निशंक जी अपने समय की चुनौतियों को सावधान होकर सम्बोधित करते हैं। यह गंभीरता एक अच्छे कवि की कला होती है।

उनकी कविताओं में उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में नीति के लिए, मानव मूल्यों के लिए, पर्यावरण के लिए, परम्परा के लिए और सहजता के लिए कोई स्थान शेष नहीं है। यह उनकी शब्द-साधना ही है कि वे कविता को सहजभाव से कह जाते हैं और लोगों के भीतर जगह बना लेते हैं। पढ़ने के साथ देखने और समझने की दृष्टि शब्दसाधक ही दे पाता है और वह पाठक को निशंक जी की रचनाएँ पढ़ते हुए देने में सक्षम हैं।

उसी प्रकार अच्छा अध्येता ही रचनाशीलता को रोचक बनाता है क्योंकि वह अपने अध्ययन से अच्छे साहित्य का प्रतिपादन करता है इससे यह प्रकट होता है कि वह लेखक सच्चे मायने में समाज का सच्चा प्रहरी है। निशंक जी ने चाहे उपन्यास लिखी या कहानियाँ, कविताएँ सृजित की या यात्रा वृत्तांत या उनके द्वारा लिखे विभिन्न मुद्दे पर लेख कोई पढ़े तो यह पता चलता है कि निशंक जी सृजन के साथ अध्ययनशील व्यक्ति हैं। वह साहित्य के लालित्य को समझते हैं। वह साहित्य के मर्म को बूझते हैं। वह समाज को भी पढ़ते हैं, तब वे रचते हैं। विभिन्न विधाओं में किया गया रचनाकर्म उनकी सूझबूझ को और उनकी संवेदना को प्रदर्शित करता है। जिस प्रकार हम रुसी उपन्यासकार दोस्तोवस्की के उपन्यासों को अध्ययन करते हुए यह महसूस करते हैं कि दोस्तोवस्की का उपन्यास उस रचना-संसार के करीब है जिसमें वह पीटसबर्ग के सामाजिक जीवन पर अथवा कहा जाए कि रूसी इतिहास में पीटसबर्ग को अपनी रचनाओं का केंद्र बनाता है, उसी प्रकार अगर हम निशंक के उपन्यासों को पढ़ें तो वे भी पहाड़ के रेखाचित्र अपने उपन्यास में उकेरते हैं। वे समाज की सामाजिकी और पारिस्थितिकी दोनों को केंद्र में रखकर किसी समस्या के मनोविज्ञान को समझने का यत्न करते हैं।

निशंक जी ने एक उपन्यास लिखा है बीरा, उसी को हम पढ़ें तो एक मनुष्य के संघर्ष के बीच उठने वाले आम संघर्ष के साथ उसके साथ चलते अपने एकालाप भी देखने को मिलते हैं। उनका पात्र खुद से बातें करने लगता है- “चलो, अपना अपना नसीब होता है। हर एक इन्सान को कुछ न कुछ दुःख दर्द तो होता है ही। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है इस संसार में, जो पूर्णरूपेण सुखी हों। इसी दुःख-सुख के बीच हर आदमी तब भी जी रहा है, संघर्ष कर रहा है। सभी को मन के भावों को अन्दर छिपाए, मुखौटा लगा कर समाज में स्वयं को प्रस्तुत करना होता है।” एक पात्र द्वारा समाज के सच को स्पष्टरूप से रख देना एक श्रेष्ठ रचनाकार का कौशल माना जाता है, और वही निशंक जी की रचनाशीलता में देखने को मिलता है। बीरा उपन्यास का एक संवाद का अब यदि अवलोकन करें- 

‘तुमने बीरा से पूछ लिया? मेहमानों को विदा करने के पश्चात मामा ने मामी से पूछा।
मामी ने कुछ संकुचाते हुए कहा-'बीरा अभी शादी नहीं करना चाहती, बल्कि आगे पढ़ना चाहती है।'
'अरे कितना और पढ़ेगी अब?' मामा बोले-'दसवीं पास तो कर लिया, फिर ज्यादा पढ़ेगी तो लड़का मिलना मुश्किल हो जायेगा। अच्छा खानदानी घर-वर मिल रहा है तो क्या मुश्किल है?'
मामी चुप रही। मामाजी ने पत्नी के चेहरे को पढ़ते हुए कहा-'तुम शायद मुझसे कुछ छिपा रही हो।
'नहीं तो, ऐसी कोई बात नहीं है। वो तो बस बीरा...' मामी ऐसे नजरें चुराकर बोली मानों कोई चोरी पकड़ी गयी हो। 'हाँ... हाँ... बोलो!' मामा ने प्रोत्साहन देते हुए कहा।
'बीरा के मामा, हमारी बेटी खुश नहीं है इस रिश्ते से। वह वहाँ शादी नहीं करना चाहती' मामी ने कहा।
'वहाँ शादी नहीं करना चाहती का मतलब!' मामा ने कुछ कुछ बात समझते हुए पूछा-'तो फिर कहाँ करना चाहती है? उसे कोई लड़का पसन्द है क्या?'
'हाँ बस ऐसा ही समझ लीजिये' मामी ने थूक गटकते हुए कहा।
'कौन है वह?'
'दीपक।'
'दीपक! श्यामा का बेटा?'
'हाँ!' बड़ी मुश्किल से कह पाई थी मामी।
'क्या कह रही हो तुम? यह कैसे सम्भव हो सकता है, तुम्हें उसके पिता का चरित्र मालूम नहीं है क्या?'
मामाजी मानो आगबबूला हो उठे थे।
"लेकिन दीपक अच्छा लड़का है। मामी शान्त स्वर में बोली।
'अच्छा लड़का है नहीं, अच्छा लड़का लगता है। है तो उसी बाप का बेटा।

एक संवाद के भीतर उपजी- तो उसी बाप का बेटा’। दूसरी कहानी की गुत्थी भी निशंक जी की लेखन की कला है जो पाठक के भीतर जिज्ञासा तो जगा ही देती है कि आखिर वह मामा क्या कहना चाहता है, यानी उसकी भी कोई कहानी है क्या? इस पूरे संवाद में न केवल अपने पात्रों के माध्यम से निशंक जी ने समाज को आइना दिखाना चाहा है अपितु सही तरीके से देखा जाए तो वह तत्कालीन परिस्थितियों की पीड़ाओं और उससे जूझती आधी आबादी की मनोदशाओं को भी दर्शाते हैं। मनुष्य की संवेदना और उसकी जिजीविषा में निशंक जी की प्रगाढ़ और अविचल आस्था है। वे मनुष्य को एक सतत प्रवाहमान मानते हैं। इसलिए उन्होंने अपने उपन्यासों के कथ्य और शिल्प को भी उसी अनुरूप गढ़ने का प्रयास किया है और जीवन के झंझावातों को प्रकट किया है।

संस्कृति और समाज की गति परिभाषाओं से परे, परिवर्तन के नैरन्तर्य से गुजरकर बदलते सरोकारों को विश्लेषित करती है लेखक यदि गति को पकड़ लेता है तो वह विजित होकर अपनी रचना को पाठक के अंतस में उतार देता है। इस बीच समाज, संस्कृति, परम्परा और समकालीन परिस्थितियों में जीवंत मुद्दे लेखक के लेखन में धार पैदा करते हैं। वह अगर संबंधों को नहीं जानता, परिवेश को नहीं जानता, लोगों के भीतर के उधेड़बुन को नहीं महसूस कर पाता, या उसकी कल्पना में लोक की मूल चेतना नहीं है तो भी वह सत्य का उद्घाटन नहीं कर पाता। निशंक जी की कहानियां, उपन्यास और कविताओं में इन सबकी खुशबू है। 

उनकी कहानियों की बात निकली है तो एक कहानी निशंक जी की है- बस एक ही इच्छा। छोटी सी कहानी है। पढ़कर किसी का मन भर आए। लेखक के भीतर आत्मीयता की कथा है- बस एक ही इच्छा। विक्रम को लेकर एक लेखक के भीतर उमड़ते-घुमड़ते सवाल और उन सवालों से एक रेखाचित्र की मिसाल बनती कथा-बस एक ही इच्छा, मजाल है कि किसी पाठक को बिना पूरा पढ़े अपने से अलग होने दे। छोटे-छोटे वाक्यों और शब्द-विन्यासों से गढ़ी कथा-बस एक ही इच्छा उनके भीतर की छटपटाहट को एक बार में अंकित कर देती है। डॉ निशंक ने भारतीय चेतना, समय-काल और भाषाओं को अपने लेखन में महत्व दिया। वह हिंदी को प्यार करते हैं। प्रायः यह देखा गया है कि यदि कोई श्रेष्ठ रचना पाठकों के भीतर जगह बनाती है तो उसके भीतर लेखक की भी अमिट छाप छोड़ती है। निशंक जी की रचनाएं निःसंदेह उनकी अपनी संवेदना और सांस्कृतिक अनुभूति से अलग नहीं हैं, इसलिए आज निशंक जी एक लोकप्रिय कवि, लेखक और चिंतक के रूप में हमें मिलते हैं और यह किसी भी लेखक की शब्द-साधना से सम्भव होता है जिसके कारण वह अपनी लोकप्रियता को अर्जित कर पाता है।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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