जायसी का पद्मावत: प्रेम घाव दुख जान न कोई


आलोक कुमार पाण्डेय

शोधार्थी, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा–442001, महाराष्ट्र 
चलभाष: +91 885 881 0119

जायसी निर्गुण भक्ति के प्रेममार्गी शाखा के प्रतिनिधि तथा प्रमुख कवि के रुप में ख्यात हैं। उन्हें मध्यकालीन कवियों की पहली पंक्ति में लाने तथा प्रमुख कवि के रुप में प्रतिष्ठित करने में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का योगदान सर्वोपरि है। जायसी के लिखे तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं-पद्मावत, अखरावट, आखिरी कलाम। जायसी की लोकप्रियता का आधार ‘पद्मावत’ है। इसका कारण यह माना जाता है कि जायसी ने ‘पद्मावत’ की रचना लोकभाषा / जनभाषा अवधी में की है। उन्होंने ठेठ अवधी का व्यवहार किया है जिसे कभी विद्यापति ने ‘देसिल बयना सब जन मिट्ठा’ कहा था। उसकी मिठास देसीपन में ही है उसके मिश्रित रूप में नहीं। ‘पद्मावत’ प्रेमगाथा और शौर्यगाथा का मिला-जुला रुप है।

जायसी कृत ‘पद्मावत’ में वियोग शृंगार अथवा विरह पक्ष ही महत्वपूर्ण है। उनका काव्य लोक से न्यारा नहीं है, जिस प्रकार सूर का है। उनका काव्य लोक से जुड़ा हुआ है। वह किसी कल्पनातीत जगत की बात नहीं करते हैं। उन्होंने इसी जगत में रहकर इस जगत के कष्टों के साथ अपना तादात्म्य स्थापित किया है। पद्मावत का विरह वर्णन भी एक सीमा में बंधा हुआ है, उसमें गाम्भीर्य बना हुआ है। 
“प्रेम घाव दु:ख जान न कोई। जेहि लागै जानै ते सोई ॥ 
पारा सो पेम समुद्र अपारा। लहरहि लहर होई बिसंभारा ॥ 
बिरह भौर होई भाँवरि देई। खिन खिन जीउ हिलोरा लेई ॥ 
खिनहि उसास बूड़ि जिउ जाई। खिनहि उठे निसरे बौराई ॥
खिनहि पीत खिन होई मुख सोता। खिनहि चेत खिन होई अचेता ॥ 
कठिन मरन ते प्रेम बेबस्था। ना जिउ न दसव अवस्था ॥” 

जायसी ने प्रेम की तुलना घाव से की है। इसे समझने अथवा जानने की शर्त यह है कि इसे वही जान सकता है जिसने भोगा हो अर्थात जिसने वियोग को झेला है, सहा है वही इसे समझ पाएगा। बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में दो शब्द, सहानुभूति और स्वानुभूति की चर्चा प्रचुर मात्रा में मिलती है। यह शब्द विमर्शों के संदर्भ में प्रयुक्त होता रहा है। जिसे विमर्शों की दुनिया में आज इतना महत्व दिया जा रहा है उसके संदर्भ में जायसी पहले से ही कह रहे थे कि यह सबके समझ में आने वाली पीड़ा नहीं है। यह केवल एक प्रसंग है जिसमें उसे समझने के लिए यथार्थ के धरातल पर उतरना जरूरी है, उसे महसूस करना जरूरी है। जिस तरह से संत कवियों ने अपने प्रेम की कसौटी निर्धारित की है उसी तरह से सूफी कवियों के यहाँ भी प्रेम का पैरामीटर है। इस प्रेम की पराकाष्ठा उसके विरही स्वरूप में सन्निहित है। यह विरह केवल सूफी कवियों तक ही सीमित नहीं है। इसका विस्तार पूरे भक्तिकालीन काव्य में देखा जा सकता है। संत कवियों के यहाँ तो इसकी बेशुमार चर्चा मिलती ही है। तुलसी के राम भी जब सीता के वियोग में व्याकुल होते हैं तो पशु-पक्षी एवं वनस्पतियों से बात करने लगते हैं। उनकी भी स्थिति लगभग नागमती की तरह है। अंतर यही है कि इस विरह से मुक्ति के लिए वो तमाम तरह के उद्योग करते हैं जबकि नागमती केवल संदेश ही प्रेषित कर पाती है। यही विरहाग्नी सूरदास के गोपियों के यहाँ भी दिखाई पड़ता है। इस विरहाग्नि को देखकर ऊधों का हृदय भी पसीज जाता है और वह अपनी ज्ञान की गठरी उठाकर चल देते हैं। मीराबाई तो पूरी तरह से विरह में व्याकुल रहती हैं। अगर इस विरह की दशा को उस युग की प्रधान विचारधारा कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। 

प्रेम में विरह का अपना अलग ही महत्व होता है प्रेम में विरह की आवश्यकता होती है, जिसमें प्रेमी जलकर शुद्ध खरे सोने के समान हो जाता है। जिस प्रकार सोना आंच पर तपकर शुद्ध हो जाता है, उससे मलिनता गायब हो जाती है, ठीक उसी प्रकार विरह में जलकर दोनों, प्रेमी-प्रेमिका का मन शुद्ध हो जाता है। उन्होंने प्रेम की तुलना ज्वाला / अग्नि से की है। जायसी ने लिखा है कि-
“दधि समुद्र देखत तस दाधा। पेम कलुबुध दगध पै साधा ॥
पेम जो दाधा धनि वह जीऊ। दधि जमाइ मथि काढै घिऊ ॥ 
दधि एक बूँद जाम सब खीरु। कांजा बूँद बिनसि होई नीरु ॥ 
सांस डांडी मन मथनी गाढ़ी। हिय चाटैबिनु फूट न साढ़ी ॥ 
जेहि जिउ पेम चदन तेहि आगि। पेम बिहून फिरै डर भागी ॥ 
पेम कै आगि जरै जौं कोई। दुख तेहि खर न अबिरथ होई।।” 

प्रेम, कविता का सनातन विषय रहा है। जायसी के प्रेम की तीव्रता तथा उसका आवेग फारस की प्रेम कथाओं जैसे ही है परन्तु भारतीय कहानियों के तत्व ने उसमें गुणात्मक रुप से इजाफा किया है और उसे जीवन की नाना दशाओं के बीच से गुजारा और निखारा है। ये प्रेम के गूढ तत्व को समझते थे, उसके जीवनव्यापी प्रभाव से परिचित थे। ऐसा भी नहीं है कि यह प्रेम शरीरी था। उसमें अध्यात्मिकता के पुट बार-बार दिखाई पड़ते हैं। मध्यकाल की जो स्थिति थी उसमें सामान्य मनुष्य के लिए अनेक तरह के कष्ट थे। कहीं शाहूकार के ऋण की चिंता थी तो कहीं धार्मिक आडंबरयुक्त तथाकथिक पंडे, पुरोहित और मुल्लाओं के द्वारा धर्म से निकाले जाने की चिंता थी। ऐसा नहीं है कि यह चिंता केवल भारतियों की ही थी। इस समस्या से पूरा विश्व जूझ रहा था। पाश्चात्य देशों में पोप तथा चर्च का बोल-बाला था। पादरियों को सामाजिक शक्ति के साथ-साथ राजनीतिक सत्ता भी प्राप्त थी। हाऊस ऑफ लॉर्ड में इनके लिए सुरक्षित स्थान प्रदान किया गया था। इस तरह की अनेक समस्याएँ थीं। भारतीय संदर्भ में तो यह कहा जा सकता है कि ये समस्याएँ बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दशक तक दिखाई पड़ती हैं। प्रेमचंद का पूरा साहित्य उन्हीं समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसी स्थिति में भक्तिकालीन कवियों की वे पंक्तियाँ कितनी मार्मिक लगती है जिनमें वे इस संसार को ही स्वर्ग बनाने की कल्पना करते हैं। यह शुद्ध भौतिकवादी दृष्टि है जिसका आग्रह आधुनिक चिंतकों ने किया है। यथा-
“मानुष प्रेम भयउ बैकुंठी। नाहिं त काह छार भरि मूठी ॥ 
पेमहीं मांह विरह रस रसा। मैन के घर मधु अमृत बसा ॥” 

शृंगार की कसौटी संयोग चित्रण में न मानकर वियोग के चित्रण में माननी चाहिए, और वह भी इस भूमि पर कि कोई कवि वियोग के क्षेत्र में पूरी गरिमा तथा गंभीरता के साथ कितना टिक पाता है। इस दृष्टि से सूर ही नहीं जायसी भी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं, क्योंकि जायसी के यहाँ संयोग कम वियोग का ही अधिक प्रसार है, तथा गहराई भी वहाँ संयोग से ज्यादा है। प्रेम उनके लिए क्या था यह उन्हीं के शब्दों में स्पष्ट हुआ है-
“प्रीति बेलि जिनि अरुझै कोई। अरुझै मुए न छुटे सोई ॥ 
प्रीति बेलि ऐसे तन डाढ़ा। पलुहत सुख बाढ़त दुख बाढा ॥
प्रीति बेलि कै अमर कै बोई ? दिन दिन बढ़ै छिन नहिं होई ॥
प्रीति बेलि संग बिरह अपारा। सरग पतार जरै तेहि झारा ॥” 

रत्नसेन जो पद्मावत में एक प्रेमी साधक के रूप में चित्रित हुआ है प्रेम के इस बेल में उलझता है और उपर्युक्त पंक्तियों में कही गई एक-एक बात का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। यह प्रेम का बेल ही है जो अमर हो सकता अन्यथा इस संसार में प्रायः सभी वस्तुएँ नश्वर मानी जाती हैं। इस नश्वर जगत में एक प्रेम ही ऐसा पदार्थ है जो दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है, कभी खत्म नहीं हो सकता है। यह प्रेम का मार्ग आसान नहीं है इसका ध्यान रखना है। इसी प्रेम के लिए रत्नसेन अपना राज-पाट छोड़कर चल देता है। इसी प्रेम के कारण नागमती अपना रानीत्व भूल जाती है। इसी प्रेम के कारण पद्मावती अपने पिता का विरोध करती है। यह प्रेम ही है जो व्यक्ति को सामान्य से विशेष बनाता है। लेकिन यह डगर बहुत कठिन है, इस पर चलने के लिए अदम्य साहस एवं दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। 

विरह की स्थिति में व्यक्ति की चित्तवृतियों का विस्तार हो जाता है, अपने से बाहर निकलकर व्यक्ति शेष संसार को भी देखने लगता है। जायसी ने नागमती के वियोग वर्णन में उसके हृदय के इस विस्तार का भी चित्र दिया है। नागमती पशु-पक्षियों से ही नहीं वनस्पतियों से भी अपने आंतरिक क्लेश को कहती है तथा उससे सहानुभूति एवं सहायता की अपेक्षा करती है। साहित्य के इतिहास में विरह वर्णन की जो परंपरा चली आ रही थी उसका जायसी ने बखूबी निर्वाह किया है। उन्होंने बड़ी गहराई में जाकर प्रिय वियोग से प्रताड़ित तथा आहत नारी मन का साक्षात्कार हमें कराया है। यह वह स्थिति है जहां नारी को अपने प्रिय का ध्यान एक पल के लिए भी नहीं भूलता और प्रिय के शुभ के लिए, उसकी एक झलक के लिए, उसके सामीप्य को पाने के लिए वह अपने प्राण तक को निछावर करने के लिए तत्पर है। प्रेम की अनन्यता तथा निष्ठा की बात जाने भी दें तो नागमती के वियोग वर्णन में न जाने कितने स्थल हैं जो दाम्पत्य जीवन को उसकी गरिमा तथा मर्यादा में हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। 
“पिउ वियोग अस बाउर जिऊ। पपीहा एनआईटी बोले पिउ पिउ ॥ 
अधिक काम दाधे सो रामा। हरि लेई सुआ गएउ पिउ नामा ॥ 
बिरह बान तस लाग न डोली। रक्त पसीन भीजि गई चोली ॥ 
सूखा हिया हार भा भारी। हरे हरे प्राण तजहिं सब नारी ॥” 

नागमती के वियोग खंड के विषय में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि, “नागमती का विरह वर्णन हिन्दी साहित्य में एक अद्वितीय वस्तु है।” यह अद्वितीयता इसलिए है क्योंकि इससे पहले के काव्यों में प्रकृति को वह स्थान प्राप्त नहीं हो सका था जो इनके काव्य में संभव हुआ। नागमती वियोग खंड पद्मावत का हृदयस्थल है। वियोग की दशा भी अत्यंत तीव्र है, जिसके कारण नागमती स्वयं को भूल जाती है कि वह एक रानी है न कि सामान्य नारी। इसी में कवि की महत्ता सिद्ध होती है। उन्होंने नागमती के चरित्र को रानीपन से उठाकर सामान्य नारी में मिला दिया है। जायसी ग्रामीण जीवन के सजग चित्रकार हैं। उनकी चेतना का विस्तार तो हुआ है लेकिन ग्रामीण परिवेश को साथ लेकर। उनकी ग्राम दृष्टि अधिकतर स्थितियों की व्यंजना के लिए ठेठ ग्रामीण जीवन के ही उपमान लायी है। 
“नागमती दुख विरह अपारा। धरती सरग जरै तेहि सारा ॥
नगरकोट घर बाहर सूना। नौजि होई घर पुरुष बिठूना ॥
तू कांवरू परा बस टोना। भूला जोग, छरातोहि लोना ॥” 

उपर्युक्त तथ्यों से ज्ञात होता है कि यह सम्पूर्ण प्रबंध काव्य एक विरह विदग्ध कवि की आत्माभिव्यक्ति है। कवि ने अपने वियोग को इस प्रबंध काव्य में बड़े ही सजीव ढंग से वर्णित किया है। ‘पद्मावत’ इसलिए भी कालजयी रचना सिद्ध होता है क्योंकि इससे पहले भी जितने प्रबंधकाव्य, महाकाव्य अथवा काव्य लिखें गए हैं उन सभी में प्रेमी-प्रेमिका के मिलन तथा मिलन के बीच तमाम सारी कठिनाइयों को दिखाना मुख्य अभिप्रेत रहा है। जबकि पद्मावत में मिलन के बाद की स्थितियों को भी दिखाया गया है जो अपने आप में अनूठा है। कुछ ऐसी भी चीजें उनमें है जिसे युगीन चेतना का प्रभाव मानना चाहिए। इस संबंध में इपालित अडोल्फ तेन ने लिखा है कि, “कला मनुष्य की मानसिकता की उपज है और मनुष्य की मानसिकता उसकी परिस्थितियों से प्रभावित होती है।” परिस्थितियों के साथ ही साथ तेन युगीन विचार को प्रमुख मानते हैं। ‘पद्मावत’ में हम देख सकते हैं कि कैसे जायसी ने अपने समाज से प्रभावित होकर एक प्रेममय संसार की कल्पना की हैं जहां प्रेम ही सब कुछ है। लेकिन स्त्री के संबंध में उनके विचार कबीर तथा उस युग की चेतना का समर्थन करते हैं। इसी की चर्चा करते हुए तेन ने युगीन विचार का प्रमुखता से उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि, “एक युग में कुछ प्रधान विचार होते हैं, उनका एक बौद्धिक साँचा होता है जो पूरे समाज के चिंतन को प्रभावित करता है। हर युग में मनुष्य की एक कल्पना या अवधारणा होती है। मनुष्य की यह परिकल्पना आदर्श का रूप धारण कर लेती है।” इसी अवधारणा से प्रेरित होकर जायसी ने पद्मावती तथा नागमती को सती बनाना उचित समझा। आज की आधुनिक दृष्टि इसका खंडन करती है। अकबर ने अपने समय में इस प्रथा का निषेध किया था साथ ही इसके उन्मूलन के कानून भी बनाया गया था। इरफान हबीब ने लिखा है कि, “बलपूर्वक सती को रोकने के लिए अकबर का आदेश 1583 ई. अथवा उससे पहले आया था एक राजपूत अधिकारी के मृत्यु के पश्चात उसने व्यक्तिगत स्तर पर उस आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित किया।” यह उस समय के शासक की उदारता है जिसने इस कुरीति को बंद करने का प्रस्ताव पारित ही नहीं किया बल्कि उसे समुचित रूप से लागू करने का प्रयत्न भी किया।

विजयदेव नारायण साही जी ने पद्मावत के संबंध में लिखा है कि, “अपनी मूल प्रकृति में पद्मावत एक त्रासदी है ... शायद हिंदुस्तान या संभवतः एशिया की धरती पर लिखा हुआ एक मात्र ग्रंथ है जो यूनानियों के ट्रैजेडी के काफी निकट है। यह आश्चर्य का विषय हो सकता है कि जायसी को ऐसी दृष्टि कहाँ से मिली।” साही के लिए यह आश्चर्य का विषय है कि जिस समय जायसी अपने रचना कर्म में संलग्न थे उस समय तक यूनानियों से भारतीयों का कोई संपर्क नहीं था। यह आश्चर्य साही का ही नहीं हम सब का है।

प्रेम में जीने की जो लालसा हमें पद्मावत में दिखाई देती है वह अन्यत्र शायद ही संभव हो। उस प्रेम के पीर के कवि को आगे आने वाली पीढ़ी भी सतत याद करेगी। 
कवि के बोल बिरह के घाया
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संदर्भ

 जायसी ग्रंथावली – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 233, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण – 2012
 वही, पृष्ठ संख्या 247
 वही, पृष्ठ संख्या 253
 वही, पृष्ठ संख्या 288
 वही, पृष्ठ संख्या 326
 त्रिवेणी – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 40, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, संस्करण – 2009
 जायसी ग्रंथावली – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, पृष्ठ संख्या 336, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण – 2012
 साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि – प्रो. मैनेजर पाण्डेय, पृष्ठ संख्या 147, आधार प्रकाशन हरियाणा, संस्करण - 2016 
 वही, पृष्ठ संख्या 143
 भारतीय इतिहास में मध्यकाल – इरफान हबीब, पृष्ठ संख्या 38, ग्रंथ शिल्पी (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड, संस्करण – 2002
 जायसी – विजयदेव नारायण साही, पृष्ठ संख्या 62, हिंदुस्तानी एकेडेमी, इलाहाबाद, संस्करण – 2004


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