कहानी: मालती

प्रियांकी मिश्रा

- प्रियांकी मिश्रा


ब्लैक एंड व्हाईट तस्वीरें कितना कुछ समेटती है अपने फ्रेम में। पलाश का नन्हा सा पौधा, उसकी एक डाल पकड़े, ठीक उसी कद की, गुड़िया सी गोल मटोल, बड़े बड़े फूलों के छापे वाली स्कर्ट पहने खड़ी रूपमती, और लाल, मुरूम, कंकरीली मिट्टी से बने टीले पर पैर पसारे, देवानन्द सदृश रूपमती के पापा, उस जमाने के अनुरूप अपनी पूरी साज सज्जा में, और उनके अंक में बैठी छुटकी, सोनमती, उस जमाने से ही नाक हमेशा चढ़ी रहती थी उसकी, तेवर दिखाना तो कोई उससे सीखे, एक वो दिन था और एक आज का दिन है, सब कुछ बदल गया, नहीं परिवर्तित हुआ तो उसके नाक पर चढ़ा गुस्सा। 

पर आज बात इनकी नहीं, ये सब किसी और दिन। हर तस्वीर में कुछ नहीं होकर भी सबसे ज्यादा होता है, इस तस्वीर की अदृश्य नायिका है, नहीं, नहीं, आज इनकी माँ भी नहीं, आज तो बात मालती की है। मालती, बस,  बस,  वही मालती, सुवासित, सुगन्धित लता पर लाल-गुलाबी पंखुड़ियों वाली छोटी सी पुष्पगुच्छ, देख कर ही तरोताजा हो जाये चित्त जिनसे। 

अपनी मालती बस वही धी, रूपमती और सोमनती के जीवन का केन्द्र बिन्दु, बियाबान से पलाश के जंगलों के बीच, एकाकी सा सुपरिंटेंडेंट हॉस्टल, बीच में कच्ची सड़क, दूसरी तरफ़ जिले के विख्यात महाविद्यालय का पुरुष छात्रावास, दोनो बहनों का साथी था उस छात्रावास से लगा हुआ यूक्लिप्टस वृक्षों का वह झुरमुट, दिन का अधिकांश भाग दोनों वही बिताती थी, उन पेड़ों से झरते पत्तों और बीजों से खेलते हुए, वही उनका खिलौना हुआ करता था, और उनके साथ होती थी, मालती। मालती, दो छोटी बालिकाओं की केयरटेकर... नहीं, धोखा बिल्कुल नहीं खाइयेगा, ये प्रेमचंद के गोदान की मालती बिल्कुल भी नहीं। वो तो विदेश में पढ़ी, बाहर से तितली, भीतर से मधुमक्खी, संभ्रांत नवयौवना थी। पर हमारी मालती, मधुमक्खी... कदापि नहीं, वो तो भीतर बाहर, बस तितली ही थी, नौ वर्षीय मालती, दो बच्चों को दिन भर, पूरे जतन से संभाला करती थी। उनकी माँ स्थानीय स्कूल में शिक्षिका थी, पिता कॉलेज टीचर और हॉस्टल सुपरिंटेंडेंट, वह क्वार्टर ही उनका निवास था तब। कोमल कंधों पर मालती दो बच्चों का बोझ सारा दिन ढोती थी, जो खुद एक छोटी चिड़िया थी। 

श्याम वर्ण, घुटनों तक मोड़ी हुई मम्मी की दी हुई पुरानी साड़ी, पैरों में हवाई चप्पल, औसत सी कद काठी, पर चपलता से भरपूर बचपन, बहुत मीठा सा भाव लिए चमकता हुआ चेहरा, ग्रामीण बालिका की समझदारी से परिपूर्ण आंखें ..आकर्षक व्यक्तित्व था उसका, दोनों बच्चियाँ तो आँखों का तारा थी उसकी, बच्चियों का भी नामुमकिन सा था गुजारा उसके बगैर, जान समाई थी दोनों की मालती में, किस जन्म का नाता था, ईश्वर ही बता सकते थे बस। 
पहली बार जब मालती का बाबा अपनी मातृविहीना बच्ची से मिलने आया, तो उसने अपने पिता को चुपचाप खुचरों की एक पोटली पकड़ाई। घर में इधर-उधर पड़ी रेजगारी थी उसमें। भोजन करने के उपरांत जब वह जाने लगा, उसने मालती को आवाज़ दी और वह पोटली देते हुए बोला, "यह मम्मी का पैसा है, वापस करो मम्मी को," कितना ईमान उस गर्दिश में भी, रूपमती की माँ का मन भर आया था तब। 

सच ही तो है, सिक्कों से कमतर अक्सर दिल के धनी और ईश्वरत्व के अधिक करीब होते हैं। 

पलाश के उन जंगलों के ठीक पीछे छोटे छोटे कुछ गाँव थे। कृषक खेती करते थे और गाँवों के बगल से एक पतली सी पहाड़ी नदी गुजरती थी, गाँव के गुजर बसर की एकमात्र स्रोत। प्रेम में छोटी सोनमती को लिटाकर,रूपमती का हाथ पकड़, प्रैम को लुढ़काते हुए, नदी के पास वाले टीले तक पहुँच जाती थी मालती। पलाश की छाया में सोनमती को प्रैम में छोड़, नदी तक चली जाती मालती, रूपमती को साथ लिए। नदी तो बस नाम मात्र की थी,छिछले जल में अपनी गमछी डाल, छोटी मछलियों का खूब शिकार करती। एक भी आ गई पकड़ में। फिर क्या था, उसकी आँखों मे सींके डाल, फिर घर की राह पकड़ते ये शैतान मुसाफ़िर। कभी कभार उसी टीले पर सूखे पत्ते और लकड़ियाँ जला, बारबेक्यू होती थीं मछलियाँ। बस, इस शहरी शब्द से परिचित नहीं थे ये लोग।

शहरों में जिन चीजों को अब ऐशो-आराम में गिना जाता है,गाँवों में ये सब बहुत ही सुगम और सुलभ है। चकाचौंध भरा जीवन पाने के लिए इंसान कितना कुछ खो देता है, समझ भी नहीं पाता, यदि अंशतः भी सोच पाता तो शायद अपनी मिट्टी से कभी जुदा न होता। 

पुटुस एक जंगली फूल है, विविध रंगों में खिलते हैं,गुलाबी,बैंगनी,नारंगी और सफेद भी। हरे फल जब पक कर काले हो जाते हैं,मिठास से भर उठते हैं, फल भी फूलों जैसे ही होते हैं .बेर जैसे, पर उनसे काफी छोटे, शायद इसीलिए बड़ों को कभी चखते भी नहीं देखा उनको। छोटे जंगल में रहने वाले, बच्चों के लिए ही खास बनाया होगा प्रभु ने इनको। सो बस, मालती इसमें भी खूब निपुण थी। पलाश पत्तों का ही दोना बनाकर तोड़ लाती थी उसमें भर कर वह काला फल। बहुपयोगी टीले पर उस दिन पुटुस का भोज होता था, रूपमती तो विशेष चाव से खाती ही थी, सोनमती भी कुछ न कुछ ग्रहण कर ही लेती। लाख चैरी,कीवी और अन्य महंगे फल उस स्वाद की भरपाई न कर पाते। 
होली के मौसम में जब पलाश के मखमली फूल झर कर जब अपने प्रियवर वसंत का स्वागत करते,टीले पर बने उस नर्म बिछौने पर रूपमती और मालती घंटों आनंद लेते, सोनमती भी उनके साथ ही पड़ी रहती। 

मालती के साथ माँ के बनाये झूले पर हिलोरें लेने का असीम सुख हो या फिर घर के पीछे बेर के फल झाड़ने का मजा, मालती के सान्निध्य ने दोनों बच्चियों को पूरी तरह से हरा भरा कर दिया। प्रकृति से एक अलग सा जुड़ाव हो गया था उनका। 

समय परिवर्तनशील होता है, मालती के बाबा उसके लिए एक वर ढूंढ कर आये थे गाँव में, रूपमती की माँ का बस न चला, बाल विवाह था, पर उसके पिता की यही इच्छा थी, माँ के दिये हुए ट्रंक में उसकी पच्चीसियों नई साड़ियां जमा हो गई थी जो उसे हर तीज त्यौहार पर मिली थी, दोनों बच्चियों को जब पता चला कि वह जाने वाली है, दोनों ने उसके पैर पकड़ कर कलपना आरंभ किया, "नहीं जाने देंगे हम मालती को", बहुत जतन से दोनों को खुद से कठोरता से अलग कर निकल पड़ी मालती, बाबा की इच्छा का मान रखने, खुद को दुल्हन बनाने, ना जाने क्या भाव उठते होंगे उस वक्त मन में उसके, मालती क्या गई, दोनों फूल सी बच्चियाँ भी कुम्हला गई जैसे, मालती लता ही काट दी हो जैसे किसी ने। 

दिन गुजर ही गये। रूपमती उच्च शिक्षा हेतु हॉस्टल में थी। मालती की याद तो दिल के एक नितांत प्रिय हिस्से में बरकरार थी, बचपन की पहली और इतनी प्यारी सखी जो थी उसकी। माँ से पता चला कि मालती आई थी एक दिन। दो बेटे और दो बेटियों की माँ हो चुकी थी वो तब तक। अपने पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी वह। पिता भी संसार पहले ही त्याग चुके थे। ज़िद्द धरी बैठी थी कि अब वो यहीं रहेगी। वापस कभी नहीं जाने की इच्छा थी उसकी। कौन मानता उसकी ये ज़िद? बेटी की इच्छा चाहते हुए भी मान नहीं सकते माँ बाप। शायद धृष्टता की श्रेणी में आता हो ये. फिर सृष्टि के नियमों का पालन भी तो जरूरी है, समझा बुझा कर वापस उसी घर में भेज दिया गया उसे। छोटी सी चिड़िया हठात् विशाल हो गई थी उस दिन, बड़े डैने फैलाये गरूड़ की मानिंद, उनकी छाँह में अपने दुःख, पीड़ा, झंझावात, सब कुछ समेटती हुई। 

"क्यों, रख लेना था उसे, उसकी इच्छा के विरुद्ध वापस क्यों जाने दिया उसे?" रूपमती के इस उच्छृंखल प्रश्न का उत्तर माँ के पास नहीं था। माँ की खामोशी का अर्थ समझने लायक परिपक्व नहीं हुई थी रूपमती उस वक्त तक, पर आगे कुछ और बोलने का साहस भी न हुआ उसे।

उसके पश्चात भी माँ से अक्सर भेंट हो जाती थी मालती की, शहर के बीचोंबीच लगने वाले बुध बाजार में, गृहस्थी के छोटे मोटे सामान लेने के बहाने से आया करती थी वह वहाँ। जार-जार रोती थी माँ के गले लग कर भरे बाज़ार में वह। ऐसे दृश्य उस बाजार के लिए कुछ अनहोनी नहीं थे, अक्सर इस तरह के मिलन वहाँ होते थे। माँ उसे कुछ दिलासा देती,थोड़े पैसे भी और ढेर सारा आशीर्वाद और स्नेह खोइंछा में समेटे मालती पुनः अपनी वंश बेल को समेटने अपने आंगन में लौट जाती। 

रूपमती के लिए तो मालती सिर्फ कथाओं में ही शेष रह गई। उसकी भी शिक्षा पूर्ण हो गई, वैवाहिक जीवन का सफर आरंभ हुआ, माँ की उस दिन की खामोशी का अर्थ समझने लगी अब वो भी। 

युग बीत जाते हैं,समय रीतता जाता है। पर कुछ चीज़ें जीवन धारा के बहाव के लिए जस की तस रह जाती है,बिल्कुल नहीं बदलती। स्त्री की ममता,उसके बाल्यकाल से ही परिलक्षित होने लगती है। लाखों दुःख तकलीफ सह कर भी वह जननी,अन्नपूर्णा और त्याग की परिभाषा पर अंततः खरी उतरती है, तब तो चलती है जीवन रूपी नदी, रेत,पत्थर सब कुछ समेटती हुई, तब तो फैलती है मालती लता, भर भर कर फिर से फूल खिलते हैं उस पर, अपनी सुवास चहुँओर बिखेरते हैं फिर वो अहर्निश।

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