उर्दू कहानी: नींद नहीं आती (सज्जाद ज़हीर)

सैयद सज्जाद ज़हीर

अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


प्रस्तुत कहानी 1932 में प्रकाशित उर्दू कहानी संग्रह “अंगारे” से ली गई है। इस संग्रह में कुल दस कहानियाँ शामिल थीं जिनमें पाँच सज्जाद ज़हीर ने लिखी थीं, दो रशीद जहाँ ने, दो अहमद अली ने और एक महमूदुज़्ज़फ़र ने। यह कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ तो इस्लामी कट्टरपंथियों ने इसकी कहानियों को अश्लील घोषित करके हंगामे किये और ब्रिटिश सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया। ये कहानियाँ अपने आप में अश्लील नहीं हैं, लेकिन इनमें दक़ियानूसी परंपराओं और रूढ़ियों के ख़िलाफ़ एक सभ्य बग़ावत नज़र आती है। जिस हल्के-फुल्के और परिहासपूर्ण अंदाज़ में ये कहानियाँ धर्म और धार्मिक आस्थाओं को छूकर गुज़रती हैं वे बातें कट्टरपंथियों की सहनशक्ति से परे थीं। साहित्य के कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ये कहानियाँ प्रगतिशील आन्दोलन का हरावल दस्ता थीं और कुछ इन्हें आधुनिक कहानी का प्रारंभिक विन्दु मानते हैं। 
प्रस्तुत कहानी के लेखक सज्जाद ज़हीर हैं जो प्रगतिशील आन्दोलन के अगुआ थे। यह कहानी ‘चेतना के प्रवाह’ (Stream of Consciousness) शैली में लिखी गई है। संभवतः उर्दू साहित्य में इस शैली में लिखी गई यह पहली कहानी है। इसमें अनुभूति का स्तर अत्यंत सघन है। यह कहानी एक नाकाम, हारे हुए और निराश व्यक्ति की ‘चेतना के प्रवाह’ के द्वारा कई धार्मिक विश्वासों का हलके-फुल्के अंदाज़ में मज़ाक़ उड़ाती है। साथ ही साथ जीवन और समाज के कई ऐसे आयामों को छूकर गुज़रती है जिससे ग़रीबी की त्रासदी मार्मिक रूप से उजागर हो जाती है। 

यह एक तरह से लिप्यान्तरण है और इसे अनुवाद कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि मूल कहानी से गिनती के कुछ शब्द ही बदले गए हैं। इस कहानी द्वारा मैं यह भी दिखाना चाहता था कि अपने असली यानी हिन्दुस्तानी रूप में या बोलचाल के रूप में उर्दू और हिन्दी एक ही भाषा है। यह तो भाषाई सियासत थी जो हिन्दी-उर्दू का कृत्रिम विभाजन पैदा करके उनके बीच की खाइयों को गहरा करती गई।  -----अनुवादक
***


घड़ घड़ घड़ घड़, टिक टिक, चट, टिक टिक टिक, चट चट चट।

गुज़र गया है ज़माना गले लगाए हुए... ए.....ए... ख़ामोशी और अंधेरा, अंधेरा, अंधेरा। आँख एक पल के बाद खुली, तकिए के ग़िलाफ़ की सफ़ेदी, अंधेरा, मगर बिल्कुल अंधेरा नहीं... फिर आँख बंद हो गई। मगर पूरा अंधेरा नहीं। आँख दबाकर बंद की, फिर भी रौशनी आ ही जाती है। पूरा अंधेरा क्यों नहीं होता? क्यों नहीं? क्यों नहीं? 

बड़ा मेरा दोस्त बनता है, जब मुलाक़ात हुई, आइये अकबर भाई, आपके देखने को आँखें तरस गईं। हीं हीं हीं। कुछ ताज़ा कलाम (कविता) सुनाइये... लीजिये सिग्रेट नोश फ़रमाइए (पीजिये), मगर समझता है, शेर ख़ूब समझता है। वह दूसरा उल्लू का पट्ठा तो बिल्कुल गधा है। आहा! आज तो आप नई अचकन पहने हैं। नई अचकन पहने हैं... तेरे बाप का क्या बिगड़ता है जो मैं नई अचकन पहने हूँ। तू चाहता है कि बस एक तेरे पास ही नई अचकन हो! और शेर समझना तो दूर सही पढ़ भी नहीं सकता। नाक में दम कर देता है। बेहूदा, बदतमीज़ कहीं का! मगर बड़ा भाई मेरा दोस्त बनता है । ऐसों की दोस्ती क्या! मेरी बातों से उसका दिल थोड़ा बहल जाता है, बस, यही दोस्ती है। मुफ़्त का मुसाहिब मिला, चलो मज़े हैं... ख़ुदा सब कुछ करे, ग़रीब न करे। दूसरों की ख़ुशामद करते-करते ज़ुबान घिस जाती है, और वह हैं कि चार पैसे जो जेब में हमसे ज़्यादा हैं तो मिज़ाज ही नहीं मिलते। मैंने आख़िर एक दिन कह दिया कि मैं नौकर हूँ, कोई आपका ग़ुलाम नहीं हूँ, तो क्या आँखें निकालकर लगा मुझे देखने। बस जी में आया कि कान पकड़कर एक चांटा लगाऊँ, साले का होश ठिकाने आ जाए। 

टप टप खट टप टप खट टप टप खट, टप टप टप... ट... 

इस वक़्त रात को यह आख़िर कौन जा रहा है? मरन है उसकी, और कहीं पानी बरसने लगे तो और मज़ा है। लखनऊ में जब मैं था, एक जलसे में, मूसलाधार बारिश। अमीनुद्दौला पार्क तालाब मालूम होता था। मगर लोग हैं कि अपनी जगह से टस से मस नहीं होते। और क्या है क्या जो यूँ सब जान पर झेलने को तैयार हैं। महात्मा गांधी के आने का इंतज़ार है। अब आएँ, तब आएँ, वह आए, आए, आए। वह मचान पर महात्मा जी पहुँचे... जय, जय, जय, ख़ामोशी।

मैं आप लोगों से ये केना चाहता हूँ कि आप लोग बिदेशी कापड़ पेनना बिल्कुल छोड़ दें। ये सेतानी गवरनमेंट... 

यहाँ पानी सर से होकर पैरों से परनालों की तरह बहने लगा। प्रकृति मूत रही थी। सेतानी गवरनमेंट, शैतानी, गवर्नमेंट की नानी। इस गांधी से गवर्नमेंट की नानी मरती है। अहा हा, शैतानी और नानी... अकबर साहब, आप तो माशाअल्लाह शायर हैं, राष्ट्र प्रेम पर कोई कविता लिखिए। यह गुल व बुलबुल का विषय कब तक। क़ौम (राष्ट्र) की ऐसी-तैसी! मेरे साथ क़ौम ने क्या अच्छा सलूक किया है कि मैं गुल व बुलबुल छोड़ कर क़ौम के आगे थिरकूँ।

मगर मैं यह कहता हूँ कि मैंने आख़िर किसी के साथ क्या बुरा व्यवहार किया है कि सारी दुनिया हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ी है। मेरे कपड़े मैले हैं... उनसे बदबू आती है... बदबू सही। मेरी टोपी देखकर कहने लगा कि तेल का धब्बा पड़ गया, नई टोपी क्यों नहीं ख़रीदते? क्यों ख़रीदूँ नई टोपी, नई टोपी। नई टोपी में क्या सुरख़ाब का पर लगा है?

अंगुश्तनुमा थी कजकुलाही जिनकी वो आज जूतियाँ चटख़ाते फिरते हैं

हम ओज-ए ताल-ए-लाल-ओ-गुहर को... 

(अंगुश्तनुमा- उठी हुई ऊँगली; कजकुलाही –तिरछी टोपी, बाँकपन, अदा; ओज-ए ताल-ए- लाल-ओ-गुहर- मणियों के भाग्य की पराकाष्ठा)

वाह वा वाह! क्या बेतुकापन है। जॉर्ज पंचम के ताज में हमारा हिन्दुस्तानी हीरा है। ले गए चुराके अंग्रेज़, रह गए न मुँह देखते! उड़ गई सोने की चिड़िया, रह गई दुम हाथ में। अब चाहते हैं कि दुम भी हाथ से निकल जाए, दुम न छूटने पाए। शाबाश है मेरे पहलवान! लगाए जा ज़ोर! दुम छूटी तो इज़्ज़त गई। क्या कहा? इज़्ज़त? इज़्ज़त ले के चाटना है। रोटी और नमक खाकर क्या बांका जिस्म निकल आया है। उपवास हो तो फिर क्या कहना, और अच्छा है। फिर तो बस इज़्ज़त है और इज़्ज़त के ऊपर पाक ख़ुदावंद पाक। 

ख़ुदावंद पाक, ईश्वर, अल्लाह, रब, पालनहार, परमेश्वर, परमात्मा, लाख नाम ले जाओ। जल्दी, जल्दी, जल्दी और जल्दी। क्या हुआ? आत्म-शान्ति? बस तुम्हारे लिए यही काफ़ी है। मगर मेरे पेट में तो दोज़ख़ (नरक) है। दुआ करने से पेट नहीं भरता, पेट से हवा निकल जाती है। भूख और ज़्यादा मालूम होने लगती है। 

भौं, भौं, भौं... 

अब इनका भौंकना शुरू हुआ तो रात भर जारी रहेगा। मच्छर अलग सता रहे हैं। तौबा है तौबा! एक जाली का पर्दा गरमियों में बहुत आराम देता है। मच्छरों से निजात मिलती है। मगर क्या, निजात क्या! दिन भर की मशक़्क़त, चीख़-पुकार, कड़ी धूप में घंटों एक जगह से दूसरी जगह घूमते-घूमते जान निकल जाती है। अम्मा कहा करती थीं: अकबर धूप में मत दौड़, आ, मेरे पास आके लेट बच्चे! लू लग जाएगी तुझे बच्चे। एक मुद्दत हो गई उसे भी। अब तो ये बातें सपना मालूम होती हैं। और मौलवी साहब हमेशा मेरी तारीफ़ करते थे: ‘देखो नालायक़ो, अकबर को देखो, इसे शौक़ है इल्म (ज्ञान) का। सपना, वो सब बातें सपना मालूम होती हैं। मैं बस्ता तख़्ती लिए दौड़ता हुआ वापस आता था। अम्मा गोद से चिमटा लेती थीं। मगर क्या आराम था! उस वक़्त भी क्या आराम था! ये सब चीज़ें मेरी क़िस्मत में ही नहीं। मगर जो मुसीबत मैं बर्दाश्त कर चुका शायद ही किसी को उठानी पड़ी हों। उसे याद करने से फ़ायदा? ख़ैराती अस्पताल, नर्सें, डॉक्टर, सब नाक भौंह चढ़ाए और अम्मा का यह हाल कि करवट लेना मुश्किल। और उनके उगालदान में ख़ून के थक्के के थक्के। लगता था कि गोश्त के लोथड़े हैं... और मैं सब को ख़त पर ख़त लिखता था। यही सब जो रिश्तेदार बनते हैं! आइए अकबर भाई आइए! आपसे तो बरसों से मुलाक़ात नहीं हुई... यही! इन्ही के माँ-बाप। क्या हो जाता अगर थोड़ी और मदद कर देते। दुनिया भर की ख़ुराफ़ात पर पानी की तरह दौलत बहाते हैं। किसी रिश्तेदार की मदद करते वक़्त मल-मलकर पैसा देते हैं। और फिर एहसान जताना इतना कि ख़ुदा की पनाह! एक दिन मैं कहीं बाहर गया हुआ था, इन्हीं साहबज़ादे की माँ, अम्माँ को देखने आईं। मैं जब पहुँचा तो उन्हें आये हुए कुछ ही मिनट हुए थे, चेहरे से टपक रहा था कि उन्हें डर है कीटाणु उनके सीने में न घुस जाएँ। मगर बीमार को देखने आना फ़र्ज़ (कर्तव्य) है! सवाब (पुण्य) का काम है! ये सब तो सब, उल्टे मुझे डाँटना शुरू किया: कहाँ गए थे तुम अपनी माँ को छोड़कर? इनकी हालत ऐसी नहीं कि इन्हें इस तरह से छोड़ा जाए... मरीज़ के मुँह पर इस तरह की बातें! मैं ग़ुस्से से खौलने लगा, मगर मरता क्या न करता। अस्पताल का ख़र्च इन्ही लोगों से लेना था। मेरे बीवी-बच्चे का ठिकाना इन्हीं के यहाँ था... मेरी शादी की जिसने सुना मुख़ालिफ़त (विरोध) की। लेकिन अम्मा बेचारी का सबसे बड़ा अरमान मेरी शादी थी: अकबर की दुल्हन ब्याह के लाऊँ, बस मेरी यह आख़िरी तमन्ना है। लोग कहते थे कि घर में खाने को नहीं, ब्याह किस बूते पर करोगी। अम्मा कहती थीं कि अल्लाह अन्नदाता है। जब मेरी सगाई तय हो गयी, शादी की तारीख़ पड़ गई, शादी का दिन आ गया, तो वही लोग जो मुख़ालिफ़त (विरोध) करते थे सब बरात में जाने को तैयार होकर आ गए। सारी बची-बचाई पूँजी अम्मा की मेहमानदारी और शादी के ज़रूरी सामानों में ख़र्च हो गई। गैस की रौशनी, रेशमी अचकनें, पुलाव, बाजा, मसनद, हँसी मज़ाक़, भीड़, खाने में कमी पड़ गई, बावर्ची ने चोरी की। बादशाह अली साहब का जूता चोरी गया। ज़मीन आसमान एक कर दिया। अबे उल्लू के पट्ठे तूने जूता सँभाल के क्यों नहीं रखा। जी हुज़ूर! क़ुसूर मेरा नहीं... मेहर1 का झगड़ा होना शुरू हुआ। मुअज्जल (अविलम्ब देय) और मुज्जल (स्थगित देय) की बहस, मुँह दिखाई की रस्म, सलाम कराई की रस्म। मज़ाक़, फूल, गाली-गलौज, शादी हो गई। अम्मा का अरमान पूरा हो गया... मुहर्रम अली बेचारा चालीस बरस का हो गया उसकी शादी नहीं हुई। अकबर मियाँ शादी करवा दीजिये, शैतान रात को बहुत सताता है। शादी, ख़ुशी, कोई हमदर्द बात करने वाला जिससे अपने दिल की सारी बातें अकेले सुना दें। कोई औरत जिससे मुहब्बत कर सकें, दो घड़ी हंसें बोलें, छाती से लगाएँ, प्यार करें... अरे मान भी जाओ मेरी जान! मेरी प्यारी, मेरी सब कुछ, ज़ुबान बेकार है। हाथ, पैर, सारा जिस्म, जिस्म का एक-एक रोंगटा... क्यों आज मुझ से ख़फ़ा हो? बोलो! अरे तुमने तो रोना शुरू किया। ख़ुदा के वास्ते बताओ आख़िर क्या बात क्या है? देखो मेरी तरफ़ देखो तो सही। वह आई हँसी, वह आई होंठों पर। बस अब हंस तो दो। क्या दो दिन की ज़िन्दगी में ख़ामख़ाह का रोना धोना। ओफ़्फ़ोह, यूँ नहीं यूँ, और और और ज़ोर से मेरे सीने से लिपट जाओ... लखनऊ के कोठों की सैर मैंने भी की है। ऐसा ग़रीब नहीं हूँ कि दूर से ही रंडियों को देखकर सिसकियाँ लिया करूँ। आइए हुज़ूर अकबर साहब! यह क्या है जो मुद्दतों से हमारी तरफ़ रुख़ ही नहीं करते। इधर कोई नई चलती हुई ग़ज़ल कही हो तो इनायत फ़रमाइए (दीजिये), गाकर सुनाऊँ, लीजिये पान नोश फ़रमाइए (खाइए)। ऐ लो और लो, ज़रा दम तो लीजिए, नहीं आज तो माफ़ फ़रमाइए, फिर कभी। मैं तो आपकी ख़ादिम (सेविका) हूँ... रूपये की ग़ुलाम। समझती है मेरे पास टके नहीं। रूपये देखकर राज़ी हो गई। क्या सुनाऊँ हुज़ूर?... तबले की थाप, सारंगी की आवाज़, गाना बजाना। फिर तो मैं था और वह थी और सारी रात। नींद जिसे आई हो वह काफ़िर। यह रातों का जागना, दूसरे दिन सिरदर्द, थकावट, बदमज़गी। अम्मा की बीमारी के ज़माने में उनकी पलंग की पट्टी से लगा घंटों बैठा रहता था। और उनकी खाँसी। कभी-कभी तो मुझे ख़ुद डर मालूम होने लगता। मालूम होता था कि हर खाँसी के साथ माँ के सीने में एक गहरा ज़ख़्म और पड़ गया, हर साँस के साथ जैसे किसी ने तेज़ छुरी की धार चला दी, और वह घरघराहट जैसे किसी पुराने खंडहर में लू चलने की आवाज़ होती है। भयानक। मुझे अपनी माँ से डर मालूम होने लगता। उस हड्डी चमड़े के ढाँचे में मेरी माँ कहाँ! मैं उनके हाथ पर अपना हाथ रखता, धीरे से दबाता, उनकी आधी खुली आधी बंद आँखें मेरी तरफ़ मुड़तीं, उनकी नज़र मुझ पर होती। उस वक़्त उस टूटेफूटे मुर्दा जिस्म भर में बस आँखें ज़िन्दा होतीं। उनके होंठ हिलते। अम्मा, अम्मा! आप क्या कहना चाहती हैं, जी! मैं अपना कान उनके होंठों के पास ले जाता। वो अपना हाथ उठाकर मेरे सिर पर रखतीं। मेरे बालों में उनकी उंगलियाँ मालूम होता था फँसी जाती हैं और वो छुड़ाना नहीं चाहतीं: बहुत देर हो गई, जाओ तुम सो रहो... अम्मा यूँही पलंग पर लेटी हैं। एक महीना, दो महीना, तीन महीना, एक साल, दो साल, सौ साल, हज़ार साल। मौत का फ़रिश्ता आया। बदतमीज़, बेहूदा कहीं का! चल निकल यहाँ से, भाग, अभी भाग, वरना तेरी दुम काट लूँगा, डांट पड़ेगी फिर बड़े मियाँ की! हँसता है? क्यों खड़ा है सामने दांत निकाले, तेरे फ़रिश्ते की ऐसी तैसी। तेरे... फ़रिश्ते... की... 

सारी दुनिया की ऐसी तैसी, मियाँ अकबर तुम्हारी ऐसी तैसी। ज़रा अपनी सूरत तो देखिये। फूँक दो तो उड़ जाएँ। बहुत महान शायर बने हैं। मुशायरों में तारीफ़ क्या हो जाती है कि समझते हैं... क्या समझते हैं बेचारे, समझेंगे क्या! बीवी जान कुछ समझने भी दें। सुबह से शाम तक शिकायत, रोना-धोना, कपड़ा फटा है, बच्चे की टोपी खो गई, नई ख़रीद के ले आओ... जैसे मेरी अपनी टोपी नई है... कहाँ खो गई टोपी? मैं क्या जानूँ कहाँ खो गई। इसके साथ कोने-कोने में थोड़ी भागती फिरती हूँ, मुझे काम करना होता है। बर्तन धोना, कपड़े सीना, सारे घर का काम मेरे ज़िम्मे है, मुझे किसी की तरह शेर कहने की फ़ुर्सत नहीं, सुन लो ख़ूब अच्छी तरह से, मुझे काम करना होता है। भिड़ का छत्ता छेड़ दिया, अब जान बचानी मुश्किल हुई। क्या क़ैंची की तरह ज़ुबान चलती है... माशाअल्लाह! चश्म-ए-बददूर... अच्छी तरह जानते हो कि मेरे पास पहनने को एक ठिकाने का कपड़ा नहीं है, लड़का तुम्हारा अलग नंगा घूमता है, मगर तुम हो कि मालूम होता है कोई वास्ता ही नहीं, जैसे किसी और के बीवी-बच्चे हैं। हाय अल्लाह, मेरी क़िस्मत फूट गई... अब रोना शुरू होने वाला है। मियाँ अकबर बेहतर यही है कि तुम चुपके से खिसक जाओ, इस में शरमाने की क्या बात है। तुम्हारी मर्दानगी में कोई फ़र्क़ नहीं आता, ख़ैरियत बस इसी में है कि ख़ामोशी के साथ खिसक जाओ। हिजरत करने से एक रसूल (पैग़म्बर मुहम्मद साहब) की जान बची। मालूम नहीं ऐसे मौक़ों पर रसूल बेचारे क्या करते थे। औरतों ने उनके भी तो नाक में दम कर रखा था, तो फिर मेरी क्या हस्ती है। ऐ ख़ुदा आख़िर तूने औरत क्यों पैदा की? मुझ जैसा ग़रीब, कमज़ोर आदमी तेरी इस अमानत का भार अपने कन्धों पर नहीं उठा सकता और क़यामत के दिन मैं जानता हूँ क्या होगा। यही औरतें वहाँ भी चीख़ पुकार मचाएंगी, वह नाज़ नख़रे करेंगी, वह आँखें मारेंगी कि अल्लाह मियाँ बेचारे ख़ुद अपनी सफ़ेद दाढ़ी खुजाने लगें, क़यामत का दिन आख़िर कैसा होगा? सवा नेज़े (भाले) पर सूरज, मई जून की गर्मी उसके सामने तुच्छ होगी... गर्मी की तकलीफ़, तौबा तौबा, अरे तौबा! यह मच्छरों के मारे नाक में दम, नींद हराम हो गई। पिन पिन, चट, वह मारा! आख़िर यह हरामख़ोर ठीक कान के पास आकर क्यों भिनभिनाते हैं। ख़ुदा करे क़यामत के दिन मच्छर न हों। मगर क्या ठीक, कुछ ठीक नहीं। आख़िर मच्छर और खटमल इस दुनिया ही में ख़ुदा ने किस मसलहत (गुप्त युक्ति) से पैदा किये? मालूम नहीं पैग़म्बरों को खटमल और मच्छर काटते हैं या नहीं। कुछ ठीक नहीं, कुछ ठीक नहीं... आपका नाम क्या है? मेरा क्या नाम है, कुछ ठीक नहीं। वाह वा वाह! मसलहत-ए-ख़ुदावंदी (ख़ुदा की गुप्त युक्ति), ख़ुदावंदी और रंडी और भिंडी। ग़लत! भिन डी है। भंडी थोड़ी है। मियाँ अकबर! इतना भी अपनी हद से न बाहर निकल चले। और क्या है? बह्र-ए-रजज़ (एक छंद) में डाल के बह्र-ए-रमल (एक छंद) चले, बह्र-ए-रमल चले, ख़ूब! वह तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले। अंगूर खट्टे! आपको खटास पसंद है? पसंद, पसंद से क्या होता है? चीज़ हाथ भी तो लगे। मुझे घोड़ा गाड़ी पसंद है, मगर क़रीब पहुँचा नहीं कि वह दोलत्ती पड़ती है कि सर पर पाँव रखकर भागना पड़ता है। और मुझे क्या पसंद है? मेरी जान! मगर तुम तो मेरी जान से ज़्यादा प्यारी हो... चलो हटो! बस रहने भी दो, तुम्हारी मीठी-मीठी बातों का मज़ा मैं ख़ूब चख चुकी हूँ... क्यों क्या हुआ क्या? 

हुआ क्या? मुझे से यह बेग़ैरती नहीं सही जाती। तुम जानते हो कि दिन भर लौंडी (दासी) की तरह से मैं काम करती हूँ, बल्कि लौंडी से भी बदतर! जबसे मैं इस घर में आई हूँ किसी नौकरानी को एक महीने से ज़्यादा टिकते न देखा। मुझे साल भर से ज़्यादा हो गए और कभी जो ज़रा दम लेने की फ़ुर्सत मिली हो। अकबर की दुल्हन यह करो, अकबर की दुल्हन वह करो... अरे अरे क्या हुआ क्या, तुमने फिर रोना शुरू किया... मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूँ, मुझे यहाँ से कहीं और ले जाके रखो... मैं शरीफ़ज़ादी (कुलीन परिवार की बेटी) हूँ... सब कुछ तो सह लिया, अब मुझसे गाली न बर्दाश्त होगी। गाली! गाली! मालूम नहीं क्या गाली दी। मेरी बीवी पर गालियाँ पड़ने लगीं। या अल्लाह! या अल्लाह! उस बेगम कमीनी का गला और मेरा हाथ। इसकी आँखें निकल पड़ीं, ज़ुबान बाहर लटकने लगी। ख़स कम जहाँ पाक (कूड़ा करकट साफ़ हुआ)... ख़ुदा के लिए मुझे छोड़ दो! क़ुसूर हुआ, माफ़ करो, अकबर! मैंने तुम्हारे साथ एहसान भी किए हैं... एहसान तो ज़रूर किये हैं। एहसानों का शुक्रिया अदा करता हूँ। मगर अब तुम्हारा वक़्त आ गया। क्या समझ के मेरी बीवी को गालियाँ दी थीं? बस ख़त्म! आख़िरी दुआ मांग लो! गला घोंटने से सर काटना बेहतर है। बालों को पकड़कर कटा हुआ सर उठाना, ज़ुबान एक तरफ़ को निकली पड़ रही है। ख़ून टपक रहा है। आँखें घूर रही हैं... या अल्लाह मुझे क्या हो गया? ख़ून का समुन्दर! मैं ख़ून के समुन्दर में डूबा जा रहा हूँ। चारों तरफ़ से लाल लाल गोले मेरी तरफ़ बढ़ते चले आ रहे हैं। वह आया! वह आया! एक, दो, तीन! सब मेरे सर पर आकर फटेंगे... कहीं यह दोज़ख़ (नरक) तो नहीं? मगर ये तो गोले हैं, आग के शोले नहीं... मेरे तन बदन में आग लग गई, मेरे रोंगटे जल रहे हैं। दौड़ो! अरे दौड़ो! ख़ुदा के लिए दौड़ो! मेरी मदद करो, मैं जला जा रहा हूँ, मेरे सर के बाल जलने लगे। पानी! पानी! कोई सुनता क्यों नहीं? ख़ुदा के वास्ते मेरे सर पर पानी डालो! क्या? इन जलते हुए अंगारों पर से मुझे नंगे पैर चलना पड़ेगा? क्या? मेरी आँखों में दहकते हुए लोहे की सलाखें डाली जाएंगी? क्या? मुझे खौलता हुआ पानी पीने को मिलेगा? क्या क्या क्या? मुझे पीप खाना पड़ेगी? ये शोले मेरी तरफ़ क्यों बढ़ते चले आ रहे हैं? ये शोले हैं या भाले हैं? आग के भाले! ज़ख्म की भी तकलीफ़ और जलने की भी। यह किसके चीख़ने की आवाज़ आई? मैं तो सुन चुका हूँ इस आवाज़ को। ऊ ऊ ऊ... ओओ ओओ... आवाज़ दूर होती जाती है। मेरे लड़के ने आख़िर क्या क़ुसूर किया है? मेरे लड़के को किस जुर्म की सज़ा मिल रही है? मेरा लड़का तो अभी चार बरस का है। इसे तो माफ़ कर देना चाहिए। मैं गुनहगार हूँ! मैं ख़तावार हूँ! यह कौन आ रहा है मेरे सामने से? अरे अल्लाह माफ़ करे! साँप चिमटे हुए हैं इसकी गर्दन से। इसकी छातियों को काट रहे हैं... ऐ हुज़ूर! आदाब अर्ज़ है! ऐ हुज़ूर भूल गए हम ग़रीबों को? मैं हूँ मुन्नी जान! कोई ठुमरी, कोई दादरा, कोई ग़ज़ल। ऐ हे आप तो जैसे डरे जाते हैं हुज़ूर! ये साँप आपसे कुछ नहीं बोलेंगे। इनका भी अजीब चुटकला है। मैं जब यहाँ दाख़िल हुई तो दारोग़ा साहब ने कहा, बी मुन्नी जान! सरकार की आज्ञा है कि पाँच बिच्छू तुम्हारी सेवा में प्रस्तुत किये जाएँ। मैं हुज़ूर सहम गई। बचपन से मुझे बिच्छुओं से नफ़रत थी। मैंने हुज़ूर बहुत हाथ पैर जोड़े, मगर दारोग़ा साहब ने कहा सरकार की आज्ञा का पालन उनका कर्तव्य है। तब मैंने कहा अच्छा आप मुझे सरकार के दरबार में पहुँचा दें, मैं ख़ुद उनसे निवेदन करुँगी। दारोग़ा साहब बेचारे भले आदमी थे, मुझे अपने पास बुलाकर बिठाया, मेरे गालों पर हाथ फेरे, आख़िरकार मान गये। पहले तो मुझे कई घंटे इंतज़ार करना पड़ा। दारोग़ा साहब ने कहा कि इस वक़्त सरकार पैग़म्बरों की कौंसिल कर रहे हैं, जब इससे फ़ुर्सत होगी तब मेरी पेशी होगी। मैंने जो यह सुना तो कोशिश की कि झाँक कर अपने पैग़म्बर साहब का जल्वा देख लूँ, मगर दरवाज़े के दरबान, मुए मुस्टंडे देव, मुझे धक्का देकर अलग कर दिया। ख़ैर हुज़ूर, आख़िरकार मेरी बारी आई। मेरा दिल धड़-धड़ कर रहा था कि देखूँ क्या होता है। सरकार के दरबार में दाख़िल होने के साथ ही घुटनों के बल गिर पड़ी। मेरी अपनी ज़ुबान से तो कुछ बोला न जाता था, दारोग़ा साहब ने मेरा हाल बयान किया। इतने में हुक्म हुआ खड़ी हो। मैं हुज़ूर, खड़ी हो गई। तो सरकार ख़ुद उठके मेरे पास तशरीफ़ लाए। बड़ी सी सफ़ेद दाढ़ी, गोरा चिट्टा रंग, और मेरी तरफ़ मुस्कुरा के देखा। फिर मेरा हाथ पकड़ के एक बग़ल के कमरे में ले गए। मेरी हुज़ूर समझ में ही नहीं आता था कि आख़िर मामला क्या है... मगर हुज़ूर देखने ही में बुड्ढे मालूम होते हैं, ऐसे मर्द दुनिया में तो मैंने देखे नहीं, और आपकी दुआ से हुज़ूर, मेरे यहाँ बड़े-बड़े रईस आते थे! ख़ैर, तो हुज़ूर, बाद में सरकार ने फ़रमाया कि सज़ा तो मुझे ज़रूर मिलेगी, क्योंकि उनका इंसाफ़ तो सबके साथ बराबर है, मगर बजाय बिच्छू के मुझे दो ऐसे साँप मिले जो बस मेरी छातियाँ चाटा करते हैं। सच पूछिए हुज़ूर तो इसमें तकलीफ़ कुछ नहीं और मज़ा ही है... मगर आप तो मुझसे डरे जाते हैं। अकबर साहब! ऐ हुज़ूर अकबर साहब... कोई ठुमरी, कोई दादरा... कोई ग़ज़ल... 

या अल्लाह मुझे जहन्नुम की आग से बचा! तो सबसे बड़ा रहम वाला है। मैं तेरा एक नाचीज़ गुनाहगार बन्दा तेरे सामने हाथ उठाकर दुआ करता हूँ... मगर कुछ भी हो बेइज्ज़ती मुझ से बर्दाश्त न होगा। मेरी बीवी पर गालियाँ पड़ने लगीं। मगर मैं करूं तो क्या करूँ? भूखा मरूँ? हड्डियों का एक ढाँचा उसपर एक खोपड़ी। खट खट करती सड़क पर चली जा रही है। अकबर साहब! आपके जिस्म का गोश्त क्या हुआ? आपका चमड़ा किधर गया? जी मैं भूखा मर रहा हूँ, गोश्त अपना मैंने गिद्धों को खिला दिया, चमड़े के तबले बनवाकर बी मुन्नी जान को तोहफ़ा दे दिया। कहिए क्या ख़ूब सूझी! आपको रश्क (ईर्ष्या) आता हो तो अल्लाह का नाम लेकर मेरा अनुसरण कीजिए। मैं किसी का अनुसरण नहीं करता! मैं आज़ाद हूँ, हवा की तरह से! आज़ादी की आजकल अच्छी हवा चली है। पेट में आंतें सिकुड़ रही हैं और आप हैं कि आज़ादी के चक्कर में हैं। मौत या आज़ादी! न मुझे मौत पसंद न आज़ादी। कोई मेरा पेट भर दे।

पिन, पिन, पिन, चट, हत तेरे मच्छर की... टन टन टन... टन टन... 

संदर्भ:

1 मेहर: मुस्लिम विवाह में निकाह के समय वरपक्ष की ओर से वधू को तलाक़ देने के बाद उसके भरण-पोषण के लिए देने के लिए क़बूल की गयी धनराशि। जो धनराशि पहली ही रात को वधू को दे दी जाती है उसे मेहर-ए-मुअज्जल  (अविलम्ब देय) कहते हैं और जो बाद में दी जाती है उसे मेहर-ए-मुवज्जल (स्थगित देय) कहते हैं।  

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।