21 वीं सदी की औपन्यासिक सृष्टि में बाज़ारवाद की संरचनात्मक हिंसा

किरण ग्रोवर
सारांश
बाज़ारवाद के दौर में हम बाज़ार जाते नहीं बल्कि बाज़ार की चीज़ें हमारा पीछा करती हैं। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के चमकीले नारों के पीछे हमारी मानवीय संवेदना को ग्रहण लग चुका है। बाज़ारवाद की संरचनात्मक हिंसा से आज हमारी नैतिकता,मूल्य,भावनाओं और संस्कृति को संकट गहरा रहा है। हैं। बाज़ारवाद की इस हिंसा की आंधी ने स्वच्छ हवा, जल, अन्न, आचार, विचार, सोच, मन्थन आदि सभी को गिरवी रख लिया है। बाज़ारवादी व्यवस्था हमसे सांस्कृतिक अस्मिता को छीन रही हैं। बाज़ारवाद के कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्खलन हुआ है। बाज़ार बहुत तेज़ी के साथ प्राकृतिक व गैर प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाता जा रहा है। बाज़ार ने व्यक्ति की ज़रूरतों को इतना फैलाव दिया है कि सम्बन्ध संकुचित हो गये हैं। बाज़ारवाद के द्वारा भारी छूट का हंगामा खड़ा करके समाज की मानसिकता को अपंग बनाने का नाटक रचा जा रहा है। अंधाधुंध गति से पसर रही बाज़ार की शक्तियाँ समाज की कमजोरी को पहचान कर निरन्तर गर्त में धकेल रही हैं। महिला साहित्यकारों यथा ममता कालिया, मधु कांकरिया, अलका सरावगी, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा ने बाज़ारवाद की माया मोहिनी से बचते हुए लेखन का दायित्व निभाते हुए जनता को तैयार करने की चुनौती से लैस होकर सृजनशीलता का धर्म निभाया हैं। बाज़ारवाद की दौड़ में संरचनात्मक हिंसा से अवगत करवाते हुए महिला साहित्यकारों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बढ़ावा देने वाली नई पीढ़ी को उपन्यासों के माध्यम से जागृत करने का प्रयास किया है, इसी में पत्र की सार्थकता है।

बीज शब्द
संरचनात्मक हिंसा, महासमुद्र, अवमूल्यन, हंगामा, महत्वाकांक्षा, सांस्कृतिक संकट।

मूल प्रतिपादन
अनियंत्रित धनसम्पदा, मूल्यहीन बाज़ार, अनियमित विकास ने बाज़ारवाद को जन्म दिया। बाज़ारवाद हमारे चारों ओर मायानगरी की भान्ति व्याप्त है। इसका विरोध व धिक्कार करने के बावजूद भी हम उसी में जीने के लिए अभिशप्त हैं। विश्व बाज़ार के आतंक ने स्वाभाविक व सामान्य को हाशिए पर धकेल दिया है। बाज़ारीकृत संरचनात्मक हिंसा से आज हमारी नैतिकता, मूल्य, भावनाओं और संस्कृति को संकट गहरा रहा है। इस संरचनात्मक हिंसा ने हमारी निजता, सहजता, संवेदनशीलता, मनुष्यता, सामाजिकता को छीन कर उपभोक्ता में बदल दिया है। बाज़ारवाद के इस दौर में मूल्य नदारद हो चुका है। बाज़ारवाद के दौर में हम बाज़ार जाते नहीं बल्कि बाज़ार की चीज़ें हमारा पीछा करती हैं। हम बाज़ार में घूमते नहीं अपितु बाज़ार हमें घुमाता है। उपभोक्तावाद और सूचना क्रान्ति की अन्धी दौड़ ने हमारे पारस्परिक प्रेम व सद्भाव की गांठ ढीली कर दी है। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के चमकीले नारों के पीछे हमारी मानवीय संवेदना को ग्रहण लग चुका है।1 बाज़ार हमारी जीवन शैली व शक्ल का उपहास करके हम में हीन भावना भर देता है। निदा फ़ाज़ली की राय में बाज़ार ने एक नई संस्कृति का गठन किया है, कभी शब्दों की अहमियत होती थी,आज शब्द हाशिये पर चले गये है। क्रिकेट का बल्ला, राजनेता का चेहरा व उनका भाषण संस्कृति के चेहरे बन चुके हैं। बाज़ारवाद की इस हिंसा की आंधी ने स्वच्छ हवा, जल, अन्न, आचार, विचार, सोच, मन्थन आदि सभी को गिरवी रख लिया है।2 ग्लोबल व्यापार और लोकल चेहरा के अन्तर्गत बड़ी बड़ी कम्पनियाँ अपना देशीकरण कर लेती हैं। बाज़ारवादी संस्कृति मीडिया के माध्यम से मुनाफ़ाखोरी को बढ़ावा दे रही हैं। बाज़ारवादी ताकतों ने प्रेम को व्यवसाय बनाकर ‘वेलेन्टाइन डे’ के रुप में प्रकट किया है। बाज़ारवाद व्यवस्था शोषण पर आधारित अर्थ व्यवस्था से अस्तित्व को बनाये रखने के लिए साधन सम्पन्न व साधन हीन दो वर्ग बनाकर उनकी खाई को और अधिक गहरा किया है।बाज़ारवाद की संरचनात्मक हिंसा से आज शिक्षा भी अछूती नहीं रही।3 बाज़ार की मुनाफेवादी शक्तियाँ शिक्षा का निजीकरण करके समाज में असमानता व विषमता को पनपा रही हैं। उदारकरण की प्रक्रिया के तहत आदमी रोज़ सस्ता होता जा रहा है। बाज़ारवादी व्यवस्था हमसे सांस्कृतिक अस्मिता को छीन रही हैं। बाज़ारवाद के कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व का स्खलन हुआ है। बाज़ार का प्रभाव इतना सूक्ष्म है कि इसने हमारे चरित्र में परिवर्तन कर दिया है।

भूमण्डलीकरण की बाज़ारवादी व्यवस्था हसरतों में उफान तो लाई है लेकिन रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अत्यावश्यक सुविधाएँ भी बिकाउ हो जाने के कारण अतृप्त इच्छाओं को मुंह चिढ़ाती नज़र आ रही है। बढ़ती महत्वाकांक्षाओं की गड़बड़ी ने गरीब को बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया है। आज मनुष्य सभ्यता के उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ चहुँ ओर बाज़ार ही बाज़ार है। समकालीन दौर में वस्तुएँ बोलती हैं और इन्सान चुप्पी साधे हुए है।4 समय के साथ बाज़ार की चमक और गति बढ़ती जी रही है। तकनीकी विकास के साथ साथ जैसे हमारे सपने यथार्थ से विमुख हो रहे हैं वैसे बाज़ार हमारे मन-मस्तिष्क पर हावी हो रहा है। बच्चों की अदाओं को निर्देशकीय पटुता से आकर्षक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे बच्चों का शैशव अंधकार में विलीन हो रहा है। नारी शरीर की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। नारी को ढकने की असफल कोशिश आम आदमी के दिमाग में अलभ्य सपने बुन रही है जो सपने सामाजिक विकृतियों के रूप में परिलक्षित हो रहे है। बाज़ारवाद की दुखद परिणति है कि भविष्य के लिए नूतन चिन्ताओं का निर्माण कर रहा है।

बाज़ारवाद हर व्यक्ति के जीवन को अन्दर तक प्रभावित कर रहा है। बाज़ारवाद ने कुछ खास वर्ग के लोगों का ही भला किया है और आम जनों के लिए यह एक विभीषिका बनकर आया है।5 आज पूरी दुनिया पर बाज़ारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाज़ार बहुत तेज़ी के साथ प्राकृतिक व गैर प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाता जा रहा है। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाज़ारवाद की गिरफ्त में शामिल हो गये हैं, यहाँ तक की इन्सान भी बाज़ार की एक वस्तु बनकर रह गया है।6 बाज़ारवाद ने आज विश्वधर्म को आर्थिक रूप से जोड़ दिया है पर रागात्मक सम्बन्धों का ताना बाना विलग कर दिया है। किसानों व मज़दूरों की हालत पर कौन से लेखक अपनी कलम घिसा रहे हैं। आज महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में परम्परागत पाठ्यक्रम पढ़ाये जा रहे हैं जिससे वर्णव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है। शोधकार्य भी केवल छात्रवृत्ति व प्रमोशन प्राप्ति के लिए किया जा रहा है।7 प्रकाशन संस्थान भी नामांतर कर नये नये संस्करण निकाल कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। इक्कीसवीं सदी का समय व समाज आधुनिक उपकरणों से लैस है। बाज़ारवादी संस्कृति का निर्बन्ध फैलाव इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता।8 मूल्यों की विविधता के बीच कुछ ऐसे मूल्यों की तलाश हो जो विविधता के बावजूद भी विभिन्न मानव समूहों और संस्कृतियों के शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व को स्थापित करने की कोशिश हो। 

मानव जीवन में आ रही याँत्रिकता को समाप्त करने के लिए साहित्य ही अध्ययन व अध्यापन का विषय बनकर उभरा है। समाज मानव जीवन के अतीत, वर्तमान व भविष्य की संभावनाओं का केन्द्र होता है जिसे व्यक्त करना साहित्यकार का सामाजिक और लेखकीय दायित्व होता है।9 जिस प्रकार साहित्य व जीवन का निर्विवाद सम्बन्ध है उसी प्रकार साहित्यकार और उसके समाज का पारस्परिक सम्बन्ध है। बाज़ार हमेशा था और हमेशा रहेगा किन्तु मानव निर्मित होकर भी यदि मानव पर हावी हो जाये तो समाज के सचेत साहित्यकार की मुख्य भूमिका हो जाती है कि वे बाज़ार के खतरों के प्रति आम आदमी को सचेत करें।10 डॉ नामवर सिंह जी ने लिखा है कि साहित्य के रुप में समाज की जो छाया प्रकट होती हे वह लेखक के व्यक्तित्व के माध्यम से आती है। साहित्य रचना की प्रक्रिया में समाज, लेखक और साहित्य परस्पर प्रभावित, परिवर्तित और विकसित होता रहता है।11 साहित्य, समाज और साहित्यकार तीनों पृथक् होते हुए भी एक इकाई हैं जिनसे नव्य रचना का सृजन होता है।

महिला लेखिकाओं का मानना है कि ऐसा असंवेदनशील समय आज से पहले कभी नही था, जब बाज़ार के नियम सामाजिक मूल्यों पर हावी हो गये हों। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से बाज़ार की विद्रूपताओं का पर्दाफ़ाश करते हुए बाज़ारवाद को परत दर परत उधेड़ दिया है। बाज़ारवादी ताकतें बाज़ार के तिलस्म की रचना करके मनुष्य को मनुष्य रहने नहीं देती और उसे मशीन में परिवर्तित कर वस्तु बना देती है। 

ममता कालिया का ‘दौड’ उपन्यास 21 वीं सदी की युवा पीढ़ी की बदलती मानसिकता का परिणाम है।‘दौड उपन्यास बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद एवम् व्यावसायिकतावाद की दौड़ में विनष्ट मानवीय सम्बन्धों का मूत्र्त रूप हैे। व्यावसायिकता से आजीविकावाद पैदा होता है जोकि पारिवारिक सम्बन्धों को और सम्बन्धों की भावात्मकता को मृतप्राय कर देता है। वर्तमान दौर में ‘दौड़’ उपन्यास ने नव धनाढ्य वर्ग की नई पीढी के चरित्र के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक प्रतिमान कायम किया हैं। सुशिक्षित और संस्कार युक्त चरित्र रेखा व राकेश को अपने पुत्र पवन व सघन की बाज़ारवाद की अन्धी दौड़ में संवेदनहीन, मूल्यहीन व नैतिकता विहीन जीवन शैली रास नहीं आती। आधुनिक युवकों के बारे में लेखिका कहती है, ‘‘अनिवासी और प्रवासी केवल पर्यटक और पंछी नहीं होते बच्चे भी होते है। वे दौड-दौडकर दर्जी के यहाँ से नए सिले कपडे लाते है, सूटकेस में अपना सामान और कागजात जमाते है। मनीबेल्ट में अपना पासपोर्ट, वीजा और चंद डॉलर रख रवाना हो जाते है अनजान देश, प्रदेश के सफर पर माता-पिता को सिर्फ स्टेशन पर हाथ हिलाते छोड़कर।’12 आधुनिक युवकों का जीवन संघर्ष उनके लिए सहज और चुनौतीपूर्ण है मगर माता-पिता के लिए बोझ बन गया है।

सम्बन्धों के प्रारुप में आये अन्तर का कारण व्यक्ति की महत्वाकांक्षा है तथा दूसरा वह उसके जीवन में इतनी उलझन है कि वह सम्बन्धों को निभा नही पाता। ममता कालिया का ‘दौड’उपन्यास में पवन के माता पिता जिस कॉलोनी में रहते हैं वहाँ बुड्डा बुड्डीं का ही रैन बसेरा है। प्रत्येक परिवार के बच्चे अपना कैरियर बनाने के लिए विदेश में वासित हैं। कॉलोनी में सोनी साहब की मृत्यु हो जाने पर उनका बेटा माँ से फोन पर जो बात करता है वह संवाद सम्बन्धों की शुष्कता की आभास करवाता है-‘लोग बता रहे हैं कि मेरे आने तक डैडी को नहीं रखा जा सकता। आप ऐसा कीजिए, इस काम के लिए किसी को बेटा बनाकर दाह संस्कार करवाइए। मेरे लिए तेरह दिन रुकना मुश्किल होगा।मजबूरी है मम्मा, मैं आपकी मुसीबत समझ रहा हूँ। घर अन्जान लोगों के लिए खुला मत छोड़िएगा, इंडिया में अपराध कितना बढ़ गया है।’13 बाज़ार ने व्यक्ति की ज़रूरतों को इतना फैलाव दिया है कि सम्बन्ध संकुचित हो गये हैं। आज मनुष्य कर्तव्यों, मूल्यों और ज़रूरतों को नज़र अन्दाज़ करता हुआ बाज़ार के नियमों से संचालित होने लगा है। ममता कालिया का ‘दौड़ उपन्यास भारतीय समाज के गहरे सांस्कृतिक संकट का आख्यान है। 

आज की युवा पीढ़ी के पास भविष्य के लिए कोई निश्चित योजना नहीं है। मधु कांकरिया ने पता खोर उपन्यास में बताया है कि आज के युवक युवतियाँ जीवन की सार्थकता जैसे प्रश्नों से न टकराकर जीविका के सामने घुटने टेकने लग गये हैं। वुमैन और वाइन में अपनी मुक्ति खोजने लगे हैं, ‘पढ़ी लिखी पीढ़ी का एक तबका रिश्वतखोरी, सट्टेबाजी, दलाली व ब्लैक मार्केंटिंग में डूबा हुआ है और दूसरा बी.ए. एम. ए. पास वाला तबका प्राइवेट ट्यूशन, क्लर्की, कमीशन एजेण्ट, डोर-टू-डोर सेल्समैनशिप एवम् मकान की दलाली से लेकर रंडी-दलाली तक में स्वयं को खपा रहा है।14 लेखिका ने स्पष्ट किया है कि आज कल का युवा वर्ग महत्वाकांक्षा के पीछे दौड़ रहा है।

युवाओं के पास नौकरियाँ छोड़ने बदलने या अपनी पढ़ाई से ताल्लुक न रखने वाली नौकरी पकड़ने के पीछे एक विभिन्न प्रकार की मानसिकता कार्यरत है जिसकी पृष्ठभूमि बाज़ारवाद से प्रेरित है। अलका सरावगी ने ‘एक ब्रेक के बाद’ उपन्यास में विवेचित किया है कि महत्वाकांक्षा के पीछे दौड़ लगाती युवा पीढ़ी केवल नाम और पैसा कमाना है, ‘ये बहुत जल्दी किसी भी काम से बोर हो जाते हैं।अब इनको न भविष्य के लिए पैसा जमा करना है और न इन्हें मालूम है कि आज से पांच साल के बाद ये क्या कर रहे होंगे। इन्हें जो आज अच्छा लगा रहा है, आज करेंगे और जो कल अच्छा लगेगा लि करेंगे।15 भारी छूट का लालच देकर जनता की मानसिकता में हलचल पैदा की जा रही है। अलका सरावगी ने विवेच्य उपन्यास में रवि कांत को स्वर्ग का कामधेनु बताया है जिसकी कोई भी साध शेष नहीं रह गई । ‘टी. वी., मोबाइल, फोन और डी. वी. डी. प्लेयर से लेकर सोफा सैट, कुर्सियाँ तक स्टोर से ऐसे साफ़ हो रही थी जैसे वे भारी छूट पर न मिलकर मुफ्त में बोटी जा रही हों।’16 बाज़ारवाद के द्वारा भारी छूट का हंगामा खड़ा करके समाज की मानसिकता को अपंग बनाने का नाटक रचा जा रहा है। आज बाज़ार के आदर्श का निर्माण बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ कर रही हैं जिन्होंने आर्थिक साम्राज्यवाद का रास्ता विकास की गाारंटी पाकर खोल दिया है। 

बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने माल की खपत के लिए मौके की तलाश में रहती हैं, यह मौका चाहे आज़ादी की वर्ष गांठ जैसे महान मूल्यों का ही क्यों न हो, उन्हें तो सिर्फ़ अपना फायदा करना होता है।अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलि कथा वाया बाईपास’ ने बाज़ारतंत्र का पर्दाफ़ाश करते हुए जताया है कि इस बाज़ार ने भारतीय समाज को उपभोक्तावादी समाज में परिणित कर दिया है। बाज़ार ने नारी को सौन्दर्य का प्रलोभन देकर वस्तु में परिवर्तित कर दिया है। आज नारी विशिष्ट स्थिति प्राप्त करने के लालच में बाज़ार के चंगुल में फंसती जा रही है। समकालीन बाज़ार नव साम्राज्यवाद की आयोजित नीति है जो पूरे विश्व को मण्डी में तबदील कर रही हैं। अलका सरावगी के इसी उपन्यास का पात्र किशोर बाबू अपने बेटे केदार को गाड़ी खरीदने की व्यर्थता समझाते हैं तब केदार कहता है कि‘और कान्ता भाभी का सबको मालूम है - नये फर्नीचर और गहनों के सैट का दाम दिया नहीं, भैया जी ने । इसलिए ऐन दीवाली के पहले ज़हर खा लिया उन्होंने। दो दीदीयों के घर में बड़ी गाड़ी है। हमारा मन नहीं होता क्या। क्या आप चाहते हैं कि जो भैया के साथ हुआ वो मेरे साथ भी हो।’17 कर्ज उठा कर भी उपभोग की वस्तु जुटाना जीवन की अनिवार्यता बन चुका है। यह सोच बाज़ारवाद के कारण ही विकसित हो सकी हैं।

समाज में विज्ञापनों के प्रभाव से बाज़ारवाद को बढ़ावा मिल रहा है। चित्रा मुद्गल ‘आवां’ उपन्यास में नमिता के माध्यम से बाज़ारवाद के अवमूल्यन से हमारा परिचय करवाती हैं। बाज़ार आर्थिक समृद्धि का सुन्दर सपना दिखाकर स्त्रा को देह के रुप में प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास का पा़त्र संजय कनोई व्यवसाय में मुनाफ़े के लिए नमिता को विदेशी बाज़ार की वस्तु बना डालता है व नमिता के व्यावसायिक हित में प्रस्ताव रखता है- ‘देखो पोर्टफोलियो मैं तुम्हारा बनवा दूंगा--तुम्हें लक्ष्य तक पहुँचाने में कोई कसर नहीं रखूंगा----चालीस तुम्हारा। पोर्टफोलियो बनाने के एवज में तुम्हें मेरे साथ दैहिक सम्बन्ध रखने होंगे---हिसाब बराबर। और कोई चिन्ता है।’18 बाज़ार का मनुष्य को अपने जाल में पकड़ने का नया माया प्रपंच है। 

बाज़ार और बाज़ार की रफ्तार वर्तमान समय की सच्चाई है। बाज़ारवाद वर्चस्व के प्रभाव से जीवन का कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा।विज्ञापन की दुनिया ने बाज़ार का इतना महिमामण्डन किया है कि मनुष्य अपनी निजता खोकर उत्पाद में तब्दील हो गया है।19सौन्दर्य प्रतियोगिताओं ने बाज़ार को बढ़ाने का बीड़ा उठाया है।विज्ञापनों की हवा पर सवार होकर उपभोक्तावाद दूर दूर तक यात्रा करता है। चित्रा मुद्गल आवां उपन्यास में यह दर्शाया है कि उत्पाद की बजाये समाज वायदे खरीद रहा है-‘कैटलॉग पढ़ते हुए हर पन्ना पलटने वाले को दबोच ले।--औरतों के लिए औरतें ही चुनौती बन जायें, उसने बेहतर कोई और न पहनें-- हमारी मॉडल को पहने देख वे बाध्य हों फ़ौरन बाज़ार की ओर दौड़ पडें। यही मकसद है न आपका।’20 इससे स्पष्ट होता है कि अंधाधुंध गति से पसर रही बाज़ार की शक्तियाँ समाज की कमजोरी को पहचान कर निरन्तर गर्त में धकेल रही हैं। 

पारम्परिक बाज़ार ज़रूरतों का सौदागर था पर आधुनिक बाज़ार सपनों का सौदागर बन कर उभरा है। वस्तुओं की बढ़ती संख्या के साथ साथ वस्तुओं की टकराहट महासमुद्र तैयार कर रही है। मृदुला गर्ग के उपन्यास ‘कठ गुलाब’ में नमिता कहती है कि अच्छा यह बताओ, यहाँ हर चीज़ की पचास साठ किस्में क्यों बना दी जाती हैं। खरीददारों का बाज़ार है---यहाँ मांग को पूरा करने के लिए नहीं बेचा जाता, बेच बेच कर मांग पैदा की जाती है रोज़ नई चीज़ की। खरीदो फेंको, दूसरा खरीदो।जो कल सबसे बढ़िया था कल सबसे घटिया होगा। फेंको फेंको, नया लो, फिर नया, फिर फिर नया।21 बाज़ारवादी ताकतें समाज पर हावी हो रही हैं। लोगों की आदतें और दिमाग का ढांचा बदलने का काम बाज़ारवाद ने किया है।

बाज़ारवाद के प्रभावस्वरुप मनुष्य ज़रूरत, आरामपरस्ती व ऐश्वर्य तीनों को आवश्यकता में परिणित करने लगा है। चित्रा मुद्गल के ‘एक ज़मीन अपनी’ उपन्यास में नीता अंकिता को कहती है कि यह ग्लैमर की दुनिया है अंकू। यहाँ जीने की, जी पाने की पहली शर्त है, विशिष्ट दिखना, विशिष्ट करना, विशिष्ट होना, विशिष्ट बनना जो वास्तविकता नहीं है।’22 बाज़ारवादी संस्कृति किस प्रकार मनुष्य की मान्यताओं को लीलकर भौतिक लिप्साओं को जागृत की सामान्य को विशिष्ट बनने के लिए विवश करती है।

बाज़ारवाद ने प्राकृतिक आपदा को भी नुकसान पहुँचाया है। पानी जैसी प्राकृतिक सम्पदा को भी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने बिक्री योग्य बनाकर लाभ कमाया है। विश्व बैंक तेल की तरह पानी की आयात व्यवस्था पर जोर देकर गरीब देशों का पानी अमीर देशोंको बेचा रहा है। नासिरा शर्मा ने कुइयाँ जान उपन्यास में मास्टर जी के माध्यम से बाज़ारवाद की नीति पर प्रकाश डाला है कि विश्व बैंक कह ही चुका है कि पानी की कीमत तय करो, बाज़ार में बिक्री के लिए उसे रखो और बाज़ार को उसका भविष्य तय करने दो।’23 लालसा के कारण मनुष्य दिन भर रिक्त होता जा रहा है और भरने की लालसा में जाम खाली होते जा रहे हैं।प्राकृतिक उपहार को हम बेरहमी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। बाज़ारवाद ने मनुष्य के दिल के दरवाजे बन्द करके दिमाग को खुला छोड़ दिया है। 

साहित्यकार भविष्य का द्रष्टा होता है और यह भविष्य कल का यथार्थ है। महिला साहित्यकारों यथा ममता कालिया, मधु कांकरिया, अलका सरावगी, चित्रा मुद्गल, मृदुला गर्ग, नासिरा शर्मा ने बाज़ारवाद की माया मोहिनी से बचते हुए लेखन का दायित्व निभाते हुए जनता को तैयार करने की चुनौती से लैस होकर सृजनशीलता का धर्म निभाया हैं, उनके प्रतिरोध को व्यर्थ नहीं समझना चाहिए। बाज़ारवाद की संरचनात्मक हिंसा से आज आज हमारी नैतिकता, मूल्य, भावनाएँ, मनुष्यता, सामाजिकता और संस्कृति संकट में है। बाज़ारवाद की इस हिंसा की आंधी ने स्वच्छ हवा, जल, अन्न,आचार, विचार,सोच, मन्थन आदि सभी को गिरवी रख लिया है। है। बाज़ारवाद की दौड़ में संरचनात्मक हिंसा से अवगत करवाते हुए महिला साहित्यकारों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बढ़ावा देने वाली नई पीढ़ी को उपन्यासों के माध्यम से जागृत करने का प्रयास किया है, इसी में पत्र की सार्थकता है। बचपन जैसी नैसर्गिक भावना को भी बाज़ार ने छीन लिया है। बूढ़े युवा बनने के प्रयास में विदूषक बनते जा रहे हैं। बाज़ारवाद हर घर में प्रवेश ले चुका है, कबीर ने तो 600 साल पहले बाज़ार रूपी माया के बारे में कह दिया था कि 
 माया महाठगिनी हम जानी 
 तिरगुन फांस लिये कर डौले, बौले मधुर बानी। 


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