प्रकृति की श्रेष्ठ रचनाएँ अहिंसक हैं

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


प्रकृति का वास्तविक स्वरूप अभी भी मनुष्य नहीं जानता। बल्कि सच यह है कि प्रकृति के साथ उसका जितना संसर्ग हुआ, वह उतना ही जानता है। प्रकृति का हिस्सा आखिर कौन है और कौन नहीं है? हमारे यहाँ ऋषियों-मुनियों और वैज्ञानिकों की एक लम्बी परम्परा है प्रकृति को समझने की और उसी समझ से हमारा समाज प्रकृति के बहुत से रहस्य को जान-समझ सका है। इतने समुद्र, इतनी सारी नदियाँ, विभिन्न पर्वत की वादियाँ, मरुस्थल, जंगल, जीवन चक्र और उनके रहस्य के साथ ब्रह्माण्डीय घटनाएँ प्रकृति से परे नहीं हैं। क्या आपको यह नहीं लगता कि सम्पूर्ण प्रकृति अजीबोगरीब रहस्य से भरी है। चांद, तारे और सूर्य भी यानी गृह-नक्षत्र प्रकृति के हिस्सा हैं, जिससे हम आलोकित होते हैं। सभी यानी जो दृष्टिगोचर है और जो हमारी कल्पना से इतर है। हम सभी भी उसी से संचालित और पोषित हैं। आश्चर्य में भी कभी कभी मनुष्य समाज पड़ जाता है जब कुछ अलौकिक घटता है। हम जानते हैं कि उसका संतुलन भी प्रकृति अपने स्तर से करती है। सम्मान और न्यायपूर्ण प्रकृति के अपने कानून हैं। उसका अपना प्रत्येक जीवों और इस जगत और ब्रह्माण्ड में व्याप्त अस्तित्वों के लिए सार्वभौम कानून है। वह धार्मिक नहीं है, विभाजित नहीं है, विभेदित नहीं है, और फिर भी उसका अपना धर्म भी है- न्याय का धर्म। जो अध्यात्म और दर्शन में रुचि लेते हैं वे इसे परोक्ष रूप से समझते हैं। सनातन परम्परा में प्रकृति को काल्पनिक तौर पर भी बहुत ही संवेदनशील होकर देखा गया है। इसीलिए सनातन आध्यात्मिक ताकत पर पूरी दुनिया विश्वास कर रही है। 

हमारे सनातन परम्परा में प्रकृति को ही ईश्वर मान लेने की भी बातें आती हैं। प्रकृति का हर पहलू आस्थाओं में बंधा हुआ है। जिससे हम लेते हैं उसका भी धन्यवाद करते हैं और जिसे जीते हैं उसके शांति की कामना करते हैं। उपनिषदों और वेदों में इसके प्रमाण हैं। हमारे ग्रन्थ ही स्वयं हमारे प्रकृति प्रेम के विषय में बताते हैं। यूं तो अगर हम केवल प्रकृति के भारतीय सन्दर्भ में देखें तो ऐसा है वरना दुनिया के विभिन्न कोने में प्रकृति का तो दोहन हो रहा है। सनातन सभ्यता तो देसज है-इंडीजेनस। इस परम्परा से ही पता चलता है कि हमारा पृथ्वी के साथ, गृह-नक्षत्रों के साथ, पेड़-पौधों के साथ क्या रिश्ता है। अब केवल वन्य क्षेत्र की बात पृथ्वी के सन्दर्भ में करें तो पृथ्वी पर मौजूद वनों में, विभिन्न वन्य प्रजातियों का लगभग अस्सी प्रतिशत हिस्सा रहता है। ये प्रजातियाँ जलवायु का संतुलन बनाये रखने और करोड़ों लोगों के आजीविका में मदद करती हैं। विश्व के निर्धन लोगों की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी, किसी न किसी रूप में, नव संसाधनों पर निर्भर है। ये बात विशेष रूप से उन देसज समुदायों के लिए अधिक सटीक है, जो वनों में, या उनके निकट वसते हैं। विश्व की लगभग 28 प्रतिशत भूमि का प्रबंधन देसज समुदाय करते हैं जिसमें पृथ्वी पर मौजूद कुछ ऐसे वन भी हैं जिन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाया। ये वन आजीविका और सांस्कृतिक पहचान मुहैया कराते हैं। वन्य जीव-जंतुओं का अवैध व्यापर आने वाले पीढ़ी या आज की आबादी के लिए खतरा है। यह हमारी खुशियाँ छीनेंगे। प्रकृति के बारे में ऐसी सोच हमारी पृथ्वी को और हमारी मनुष्यता को असभ्य बनाता है जिसकी परिणति मानवीय हिंसा में परिवर्तित हो जाति है। यह तो एक दिशा में प्रकृति के लाभ और हानि के परिणाम को सोच रहे हैं। अब जरा विचार करें कि समुद्र के निचले तल में व्याप्त जीव और ब्रह्माण्ड में गर्म और सर्द की हलचल के पीछे प्रकृति नहीं है इसके पीछे मनुष्य की लिप्सा है क्योंकि मनुष्य जिन तकनीकों के विकास से अपने होने का दम्भ भर रहा है वह उसकी विनाश की ओर ले जा रहा है।

पृथ्वी पर बढ़ते तापमान से मनुष्य प्रभावित होगा। हिमनद-ग्लेशियर का पिघलना और कार्बनमें बढ़ोतरी क्या प्रकृति के लिए कभी भी लाभकारी हो सकती है? क्या नदियों के सूखने की स्थितियां और सूनामी की समस्या यूं ही हो रही है? बिलकुल नहीं। यह तो मनुष्य अपने प्रकृति को स्वयं बेचैन किये हुए है। एक सभा में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने कहा था-मानवता प्रकृति पर युद्ध कर रही है। यह आत्मघाती है। प्रकृति हमेशा पीछे हट जाती है। लेकिन आप सोचें कि वह कब तक हटेगी। कब तक सहेगी। यदि प्रकृति को उसके अनुकूल रहने दिया जाय और मनुष्य सहज, देसज और सामान्यतया जीवनयापन करे तो प्रकृति सदैव अहिंसक है और उसके साथ संसर्ग में रहने वाले लोग उससे सीख सकते हैं।

एक गौरैया अपने बच्चे के मुह में खाना खिलाती है। उस दृश्य की कल्पना कीजिए। उसे किसने पढ़ाया? प्रकृति की ही तो सीख है। उसी प्रकार नदी से किसी ने जल पिया, नदी कभी नहीं कहती कि पानी किसने, क्यों लिया? नदी के छेड़छाड़ की कहानियाँ हम पढ़ते हैं आज। इसी प्रकार किसी निःशक्त को मधुर कंठ मिल जाता है, यह किसकी देन है? बड़े पहाड़ किसी भी मनुष्य को अपने ऊपर पाँव रखने पर नहीं पूछते कि तुम किस जाति से हो, किस धर्म से हो, किस संस्कृति से हो। किसी पेड़ से कोई फल तोड़ ले तो वह कभी किसी के नश्ल, जाति, पंथ, धर्म के बारे में नहीं जानने की इच्छा करता। आप अंदाज़ा लगा लीजिये कि प्रकृति कितनी सहृदय है! कितनी कोमल और प्रिय है प्रकृति के सभी जीवों के प्रति। आसमान में उड़ते हुए पक्षी के पंख में भी और उसको मिले आवेग में भी प्रकृति साथ दे रही है। यह उसकी विराटता है।

प्रकृति के साथ शांति बनाने की चुनौती स्वघोषित सभी समाज से ज्यादा है। तो क्या हम वास्तव में प्राकृतिक पूंजी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? सवाल आज यही है कि हम प्रकृति को कैसे देखते हैं? एक समावेशी दुनिया यह सुनिश्चित करने में मदद करेगी कि लोग बेहतर स्वास्थ्य और अपने मानवाधिकारों का पूरा सम्मान कर सकें, जी सकें और एक स्वस्थ जीवन पर गरिमा के साथ जी सकें, तो हमें इस स्वाभाव को समझकर एक आंदोलन में बदलना चाहिए लेकिन क्या इसे प्रकृति की शर्तों पर नहीं, अपनी शर्तों पर जीना उचित है?। अक्षय संकल्प प्रकृति के साथ, अब न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए अनिवार्य है। हमें बड़े पैमाने पर, व्यवस्थित व अनुकूलन समर्थन की ओर बढ़ने की जरूरत है, जिससे सभ्यता के केवल बचाने की पहल हो अपितु प्रकृति के ही बचाने की आवश्यकता पर बल दिया जाय। यदि ऐसा नहीं होता है तो प्रकृति अपने निरंतरता में अवरोध करने पर विचलित होगी। उसका स्वाभाव हिंसक नहीं है किन्तु उसे अपने अनुकूल वातावरण तैयार करते हुए भी जो हानि होगी वह मनुष्य और जीव-जंतुओं की होगी। प्रकृति के मूल में ही चूंकि अहिंसक और श्रेष्ठ रचनाएँ हैं जो अपने उद्दात्त कारणों से सभी के मंगल में अवस्थित है। इसलिए दोष कदापि प्रकृति का तो हो ही नहीं सकता। 

जीन-जैक्स रूसो ने तर्क दिया था कि सभ्यता, प्रकृति नहीं, हिंसा के लिए मानव प्रवृत्ति को आकार देती है। मनुष्य सांस्कृतिक मानदंडों के प्रति अत्यधिक उत्तरदायी हैं, जिनमें शांतिपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देना शामिल है। अहिंसा की अवधारणाएँ और प्राथमिक प्रथाएँ मानव जाति को एक वैकल्पिक विश्वदृष्टि प्रस्तुत करती है- एक ऐसी विश्वदृष्टि जो ब्रह्मांड को मौलिक रूप से परस्पर संबंधित बनाती है। यह प्रतिमान यथार्थवाद की तुलना में प्रकृति की बहुत सटीक नकल करता है। प्रकृति के कुछ नियमों की जाँच करके, हम यह देख सकते हैं कि प्रकृति के नियमों को कौन सा परिप्रेक्ष्य पूर्ण रूप से ग्रहण करता है और कौन सा नहीं। दिल की एकता उत्पीड़क और उत्पीड़ितों के बीच की खाई को पाटती है। प्रकृति एक अकल्पनीय जटिल कल्पना है। किन्तु ब्रह्मांड के मूल में एकता के स्मरण के साथ, हम यह भी देखते हैं कि सभी विरोधाभासों को समेटने की शक्ति है। अहिंसा प्रतिद्वंद्वी के उस हिस्से को खोजने का प्रयास करती है जो वास्तविक है। अहिंसा मनुष्य, पृथ्वी, जानवरों और एक-दूसरे के बीच एक नए रिश्ते के लिए नींव रख सकती है। हम इस भूमि को मनुष्यों सहित सभी प्रकार के जीवों के साथ साझा करते हैं तो क्या हम हिंसक प्रतीत होती प्रकृति को दोषी मान लेंगे और अपनी जिद पर उसे साबित भी कर देंगे, शायद नहीं क्योंकि प्रकृति अनुरागात्मक रूप से सृष्टि की समस्त रचनाओं में अपनी गति से गतिमान है, उसकी राह में अड़चन तो हम मनुष्य की सभ्यता कहीं अधिक बाधक हो रही है जो हमारे ही भविष्य के लिए ठीक नहीं है। हमारे शास्त्रों में प्रकृति के विभिन्न रूपों के शांति की कल्पना की गई है किन्तु हम अपनी चेतना से प्रकृति के प्रति अनुराग स्थापित करेंगे तो प्रकृति तो हमारे लिए वरदान ही है।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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