नयी सुबह की ओर: कथा संग्रह में कोरोना कालीन समाज चित्रण

समीक्षा: धन्यकुमार जिनपाल बिराजदार


नयी सुबह की ओर

डॉ. मंजुला चौहान
प्रकाशक: साहित्य निलय, कानपुर
मूल्य ₹ 300.00 

2020 मनुष्य के लिए संकटग्रस्त रहा है। मानव निर्मित आपदा तथा प्राकृतिक आपदा के कारण भुक्तभोगी मनुष्य विभिन्न माध्यम से अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त कर रहा है। इससे संवेदनशील रचनाकार कैसे अछूते रहेंगे। एक ओर चीन के साथ विभिन्न देशों का संबंध में आया परिवर्तन, वैश्वीकरण, व्यापार में बढ़ता तनाव, विकसित तथा विकासशील राष्ट्रों के संबंध में आया परिवर्तन रहा तो दूसरी ओर दुनिया के विभिन्न देशों को लॉकडाउन घोषित करने के लिए मजबूर करने वाला कोरोना रहा। मजदूरों की समस्या, प्रवासी मजदूरों की समस्या, सरकारी कर्मचारियों की समस्या तथा विदेशी कंपनियों में काम करने वाले इंजीनियरों का वर्क फ्रॉम होम, लॉकडाउन घोषित होते ही ऑनलाइन अध्ययन-अध्यापन, डॉक्टरों का तीन-तीन, चार-चार महीने घर से बाहर रहते हुए कोरोनाग्रस्त मरीजों की सेवा करना, सर्दी-खांसी भी होने पर संदेहभरी नजर से देखना जैसे कई प्रश्नों से साहित्यकार की चिंता बढ़ती ही रही और अपने घरों में अपने आपको कैद पाते हुए संवेदना के बल पर आम आदमी की आवाज को मजबूत करने हेतु कलम चलाते हुए रचनाकार समाज में चेतना निर्माण करते रहे। इसी तरह दक्षिण भारत के कर्नाटक राज्य में डॉ. मंजुला चौहान जी ने अपनी कथाओं के माध्यम से समाज का चित्रण किया है।

मंजुला चव्हान
'नई सुबह की ओर' शीर्षक कथा संग्रह की चार कहानियाँ कोरोनाकालीन समय का दस्तावेज है। लॉकडाउन घोषित होते ही मजदूरों को काम से निकाला गया। किसी कंपनी में काम करने वाले रमेश को इकॉनॉमिक क्राइसिस की वजह से काम से निष्काषित किया गया। बेरोजगार युवक की मानसिकता दूसरा कोई समझ नहीं पाता। विवाह की उम्र वाले युवक को नौकरी से निकाल दिया जाए तो अपने भविष्य को लेकर उसका चिंता करना स्वाभाविक है। रमेश इसी तरह चिंतित युवक है जिसके मन में आत्महत्या का विचार आता है। वह आत्महत्या का प्रयास कर रहा था, इसके लिए अपने गले में फांसी का फंदा भी लगाना तय किया था। परंतु अचानक गले में रस्सी डालते ही फोन की घंटी बजी। हैरान रमेश ने नीचे उतरकर फोन रिसीव किया तो सामने से बिल्कुल आवाज नहीं आई। कई बार ऐसे हुआ। किसी तेरह वर्षीय बालिका को संकट में देखकर रमेश ने आत्महत्या करने के बदले दूसरे की जान बचाने का विचार किया। तुरंत पुलिस विभाग को फोन करते हुए 13 वर्षीय बालिका के घर पहुँचा। देखा तो पिंकी की माँ की मृत्यु हो गई थी, उसकी कोरोना की रिपोर्ट नेगेटिव आई थी। बेरोजगार तथा अपने घर के माता-पिता, भाई-बहन आदि की चिंता करने वाले रमेश ने यही तय किया कि जीवन आत्महत्या करने के लिए नहीं है बल्कि बेसहारा पीड़ितों की सेवा करने के लिए है। बेरोजगार रमेश ने कोरोना काल में किसी बालिका की रक्षा करते हुए समय का सदुपयोग करना तय किया और कोरोना काल में ही मुसीबत में फंसे लोगों की सहायता करने के लिए संस्था की स्थापना की। उसने पिंकी को किसी आश्रम में पहुँचाया था। सप्ताह में एक बार पिंकी से मिलता रहा क्योंकि "शायद पिंकी ही उसका जीवन बचाने वाली देवी के रूप देवी के रूप में प्रकट हुई थी।" बेरोजगार रमेश ने इस दौरान जो लोग मुसीबत में हैं उनकी मदद करने वाली संस्था की स्थापना की। 

धन्यकुमार बिराजदार
      कोरोना काल में जितना योगदान सामाजिक संस्था के प्रतिनिधि दे रहे थे उतना ही महत्त्वपूर्ण योगदान डॉक्टर, पुलिस तथा स्वच्छता कर्मचारी भी दे रहे थे। सामान्य आदमी के लिए कुछ समय तक नाक पर रुमाल बाँधे रहना संभव नहीं होता परंतु पीपीई किट पहने डॉक्टरों ने कोरोना मरीजों की देखभाल करना तय किया था। 'लॉकडाउन' कहानी में डॉ. आकाश मरीजों की सेवा करता है। इतना ही नहीं, वह कोरोना काल में कई दिनों तक अपनी पत्नी अंजली तथा बेटा बंटी को छोड़कर अस्पताल में रहता है। पत्नी और बच्चे की याद आने पर वह कभी कभार फोन पर बात कर लेता है। मरीजों की बढ़ती संख्या के कारण फोन पर बात करने के लिए भी फुर्सत नहीं मिल पाती है। दूसरी ओर उसका बेटा बंटी पिता की याद करता रहता है, परंतु पिता डॉक्टर होने के कारण घर आने के बदले फोन पर बात करता है। अंजली डरती है। वह देर रात तक सो नहीं पाती है इसलिए फोन करने पर डॉक्टर उसे हर तरह से सतर्क रहने और गर्म पानी पीने की सलाह देता है। दूसरी बात यह है कि लॉकडाउन में मजदूरों तथा चौका बर्तन करने वाली महिलाओं को काम से निकालने के कारण उनकी दुर्दशा बन गई थी। इसका चित्रण 'लॉकडाउन' कहानी में है। शांता नामक महिला कई घरों में काम करते हुए गुजारा करती है। कोरोना के भय से चौका बर्तन करने वाली महिलाओं के प्रति संदेह होने के कारण उन्हें काम से निकाल दिया गया। इसमें शांता नामक स्त्री भी निष्कासित है। उसे कई घरों से काम से से निकाल दिया जाता है। उसका बेटा बीमार पड़ता है। अंजली के कहने पर शांता उसे अस्पताल ले जाती है। उसके बेटे की कोरोना से मृत्यु हो जाती है। ऐसे कई लोगों की मृत्यु कोरोना की वजह से हुई है जिनके समाचार भी हम विगत दस-ग्यारह महीने से पढ़ रहे हैं। डॉ. आकाश की ड्यूटी खत्म होने पर वह सीधे अपने पुराने घर में पंद्रह दिनों तक अकेले रहता है और टेस्ट के बाद घर लौटता है। कोरोना योद्धा की तरह काम करने वाले डॉ. आकाश का स्वागत किया जाता है, तब डॉक्टर आकाश कहता है, "मेरी ड्यूटी अभी पूरी नहीं हुई है। जब तक यह वायरस जड़ से खत्म जड़ से खत्म नहीं होता तब तक मैं ड्यूटी करता रहूंगा।" इस तरह 'लॉकडाउन' कहानी में सेवारत डॉक्टर के वर्णन करने के साथ-साथ शांता जैसी कामवाली महिलाओं की वेदना कहानी में निहित है। ' 2020 का वर्ष ' शीर्षक लघु कथा में गले के आखिरी मोड़ पर कूड़ेदान से कचरा इकट्ठा करने वाले बूढ़े द्वारा लेखिका ने स्वच्छता का महत्त्व प्रतिपादित किया है। 2 वर्ष से कोई बूढा मुँह पर कपड़ा बांधते हुए कचरा उठाता था। यह सब वह एहतियात के तौर पर करता था। मुँह पर कपड़ा बांधे बूढ़े को देखकर लोग उसकी खिल्ली उड़ाते थे। परंतु वर्ष 2020 में कोरोना विषाणू के भय से लोगों ने एहतियात के तौर पर मुँह पर मास्क बांधना शुरू किया। पर "आज लोग उसे चिढ़ाते नहीं है। बल्कि शर्म से झुक जाते हैं फिर भी बूढ़ा व्यक्ति किसी से कुछ नहीं कहता पर अपना काम करके चुपचाप चला जाता है। पर एक बार गौर से उनके मुँह पर बंधे मास्क को जरूर देखता है। " इस वाक्य द्वारा लेखिका ने कचरा इकट्ठा करने वाले बूढ़े द्वारा स्वच्छता का महत्त्व प्रतिपादित किया है।


       मनुष्य दो तरह से बीमार पड़ता है, एक शारीरिक दृष्टि से तो दूसरा मानसिक दृष्टि से। 2020 के फरवरी और मार्च महीने से चीन के साथ कई देशों में कोरोना के मरीजों की संख्या बढ़ने के समाचार सुनने में आए। भारत में भी प्रत्येक व्यक्ति मानो डरता हुआ नजर आया। कोरोना के डर ने मानो उनके मन में घर करना शुरू किया था। "डर इंसान को अंदर से खोखला करता है। डर के कारण एंग्जाइटी हो जाती है।" इससे बचना बहुत ही मुश्किल है शायद यही बात 'मुझे भी हुआ है कॉविड 19' शीर्षक कहानी में प्रतीत होती है। कहानी में नायिका के रूप में स्वयं लेखिका अपना अनुभव व्यक्त करना चाहती है। प्रसार माध्यमों में हमेशा कोरोना के मरीजों की बढ़ती संख्या के साथ रोज सुबह योगा और प्राणायाम की हिदायत दी जा रही थी। इस दरमियान अपने तीन कमरों वाले घर में अपने आप को एक कमरे में बंद कर लेती हैं। यहाँ तक कि खुद के लिए अलग बाथरूम, पीने के लिए पानी की बोतल भी अलग रखती है। घर में एक पल के लिए भी किसी से मिलना उनके लिए डर की बात है। अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी नायिका के मन का डर कम नहीं होता। अब तो शहर में मरीजों की संख्या घट रही थी। घर में बहन की शादी पक्की होने पर भी नायिका सभी से मिलना पसंद नहीं करती है। मास्क एक पल के लिए उतारना मुश्किल मानती है। यहाँ तक कि नायिका के पति, माता-पिता जहाँ तक हो सके एक जगह से हिलना भी पसंद नहीं करते।इस दरमियान स्कूल तथा महाविद्यालय ऑनलाइन ही चालू थे। नायिका जब कॉलेज जा रही थी तभी दो ऑटो की भिड़ंत देखी। उसमें बैठे सवारी घायल हो गए थे। नायिका कार से गुजर रही थी। लोगों द्वारा मदद मांगने पर भी नायिका मदद नहीं कर पाती है। "अगर नॉर्मल समय होता तो शायद मैं गाड़ी रोकती थी, अस्पताल तक उनको छोड़ भी देती। पर कोरोना के इस समय में जब हम अपने दोनों हाथों पर ही भरोसा नहीं कर सकते तो किसी अजनबी पर कैसे?" इस वाक्य द्वारा लेखिका ने इंसानियत पर से भरोसा उठने की बात कही है। इसी तरह डर के कारण उन्हें हर जगह कोरोना ग्रस्त व्यक्ति ही नजर आता है परंतु अभी नायिका सोचती है कि संवेदना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है इसीलिए मन का डर निकालते हुए नायिका सोचती है, "मेरे अंदर के कोरोना को मारना है। धैर्य और आत्मबल से हमें संतुष्ट होना चाहिए। " इसी विचार के कारण नायिका मन का डर निकालते हुए दूसरों की सहायता करती रहती है।

     इस तरह कहानीकार ने अपने इस कहानी संग्रह की चार कहानियों के माध्यम से कोरोनाकालीन समय का चित्रण करते हुए मजदूरों की व्यथा, घरों में काम करने वाली महिलाओं की वेदना, कोरोना वॉरियर्स डॉक्टर तथा स्वच्छता कर्मचारियों का चित्रण करते हुए सकारात्मक विचारों का प्रतिपादन किया है।
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