होली के रंग, पर्यावरण के संग

- विनोद नायक

रंग बिरंगी खुशियाँ लेकर
फूलों की रंगीनी लेकर
दिल से दिल मिलाने आई
रंगने सबको होली आई

रंग मानव हृदय में उमंग, उत्साह व उल्लास भर देते हैं। प्रकृति में फैले नाना रंग, मनुष्य को आनंद ही नहीं बल्कि जीवन को श्रेष्ठ रूप में जीने के लिए लालायित करते हैं। प्रकृति के समस्त रंग सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करते हैं। कहते हैं न, जीवन में जितने अधिक रंग होंगे, जीवन उतना आनंदमय, सुख-सम्पन्न व यशमय होगा।

रंगों का त्यौहार होली भी तो वर्षों से यही संदेश देता आ रहा है कि -
रंग जाइए परमानंद के रंग में
रंग जाइए कृष्ण के रंग में
रंग जाइए प्रकृति के रंग में
तब, ये दुनिया और सम्पूर्ण तत्व में हमें उन रंगों की अनुभूति होगी जो वास्तव में मनुष्य को चाहिए होते हैं।

लाल सुर्ख गुलाब के रंग को ही तो नन्हे प्रह्लाद ने अपने मन में बसा लिया था।पिता हिरण्यकश्यप जो स्वयं को ईश्वर कहता था। लाखों बार मना करने पर भी प्रह्लाद के मन से, हरि रंग नही निकाल सका।

नन्हे से प्रह्लाद पर पिता हिरण्यकश्यप ने कठोर से कठोर वेदनाएँ व मृत्यु दण्ड दिये लेकिन हरि प्रेम में रंगे नन्हे प्रह्लाद पर कोई प्रभाव नही पड़ा। हिरण्यकश्यप ने अंत में अपनी बहन होलिका को आदेश दिया कि - प्रह्लाद को अग्नि में लेकर बैठ जाये। होलिका धार्मिक तो थी परंतु राजा और अपने भाई के दिये आदेश का प्रतिरोध नही कर सकी।और वह नन्हे भतीजे प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ गई। नन्हा सुकोमल प्रह्लाद प्रचण्ड अग्नि में, हरि के प्रेम रंग में शीतलता का अनुभव कर रहा था। वहीं अग्नि में नही जलने का वरदान प्राप्‍त होलिका, अग्नि में भयंकर चीख पुकार करती क्षणभर में भस्म हो गई थी। यह भक्त प्रह्लाद का हरि के प्रति प्रेम रंग था और अग्नि स्वयं प्रकृति का ही एक रंग है, जिसे हरि ने ही निर्मित किया है।जब बालक प्रह्लाद हरि के रंग में रंग गया हो तो उन्हीं की बनाई अग्नि उसे कैसे जला सकती है ?

वही हरि की अग्नि का लाल रंग, आज तक हम खुशी-खुशी एक दूसरे को लगाकर रंगों का त्यौहार मनाते आ रहे हैं। हरि के ऐसे अनेकों, अलौकिक रंग, प्रकृति में दृष्टिगोचर होते हैं।

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्यौहार है। यह पर्व हिन्दू  पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इससे पहले यानि माघ पूर्णिमा को होली का दण्ड विधि-विध‍ान से लगाया जाता है। दण्डारोपण के साथ ही होली तक, शुभ कार्य करना रुक जाते हैं। होली का दण्ड भक्त प्रह्लाद के सत्य व प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। जिसे होलिका दहन के बाद पूजा करके बाहर निकाला जाता है।

होली का त्यौहार वसंत ऋतु के आगमन से ही शु्रू हो जाता है। वसंत ऋतु से तापमान धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। सभी जगह हरे भरे पेड़ -पौधे और फूलों के कारण चारों तरफ हरियाली रंगीन छटा बिखर जाती है। जंगल में रहने वाली जनजाति प्रकृति की इस रंगीन छटा को देखकर अर्थात वसंत पंचमी से होली का उत्सव मनाना शुरू  कर देते हैं। अपने लोकगीत व ढोल की थाप पर नाच -गा उठते हैं। पलाश के फूल से बनाए प्रकृति रंग से होली में डूब जाते हैं। ये रंग का त्यौहार रंगपंचमी तक बड़े उमंग से मनाते हैं। फाल्गुन और चैत्र मास वसंत ऋतु के माने जाते हैं। हिंदु पंचांग का फाल्गुन मास वर्ष का अंतिम मास होता है।  इस मास में सर्दी कम हो जाती है और मौसम सुहावना हो जाता है। पेड़ों में नये पत्ते आने लगते हैं। आम के पेड़ बौरों से लद जाते हैं। महुए और पलाश के पेड़ों में फूल खिल उठते हैं। सरसों के फूल लुभावने लगते हैं। मौसम का गरम होना, फूलों का खिलना, पेड़ -पौधों का हरा - भरा होना और बर्फ का पिघलना ऐसा लगता है प्रकृति स्वयं ही होली खेलने लगी हो। हम तो यही कहेंगे कि-

मौसम की है छटा निराली
महकी महकी है हर क्यारी
अब न किसी को होश है
फागुन का ये जोश है

प्रकृति भी मधुर राग सुनाकर हर मन को जीत लेती है। मानव ही नही जीव -जंतु में भी नवजीवन का संचार हो जाता है। कोयल मधुर आवाज में कूकने लगती है। मोर झूमकर नाच उठता है। हिरणों के झुण्ड खेतों में ऊँची-ऊँची छलांगे भरते नजर आते हैं।आसमान में पंछियाँ किलकारी मारकर उडा़न भरने लगते हैं। ऐसा लगता है मानों जंगल का प्रत्येक प्राणी, प्रकृति के साथ होली खेल रहा हो। प्रकृति में तापमान का बढ़ना, ठण्डी हवा का मचल-मचल कर बहना व नदी -तालाब के जल का कुनकुना होना। सभी प्राणियों में नवस्फूर्ति भर देते हैं।

होली का त्यौहार किसानों के लिए अति महत्वपूर्ण होता है।किसानों की बोई फसलें अधपकी होकर लहलहाने लगती है। गेहूँ, चना, मटर, मसूर, सरसों व धनिया आदि फसलें हवा से बातें करती, सरसरानें लगती हैं। जिन्हें देखकर किसान का हृदय स्वयं ही होली खेलने को मजबूर हो जाता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि - फाल्गुन मास में सम्पूर्ण प्रकृति, आनंदमय संतुलन में रंग जाती है। जो समस्त प्राणियों को होली खेलने का निमंत्रण देती है।

होली की बात हो और भगवान राधाकृष्ण की बात न हो तो होली अपूर्ण ही होगी। प्रकृति के सम्पूर्ण फूलों से, उनके बनाये रंगों से, होली के गीत -भजनों से, मुरली की तान सें, मोरमुकुट के मोह से, अधरों की मुस्कान से, नयनों के वाण से, मनमोहित नृत्य से, मिश्री -मख्खन की मिठास से कृष्ण, राधा-गोपियों को होली खेलने को वाध्य कर देते हैं। राधा और गोपियों पर कृष्ण का रंग चढ़ जाता है। यही तो होली हेै। प्रकृति के सप्तरंगी फूलों से कृष्ण, राधा और गोपियों को मनभर कर रंगते हैं तो राधा व गोपियाँ अपने समर्पित प्रेम के रंग से कृष्ण को रंगती हैं।  राधा व गोपियों पर फूलों का रंग चढ़ जाता है। वही प्रकृति फूलों का रंग जो कृष्ण ने बड़े प्रेम से उन पर डाला था। वे अब उस रंग में सदा -सदा के लिए रंगी रहना चाहती हैं। वह कृष्ण के प्रेम रंग में डूब जाती हैं। आज भी ब्रज में फूलों की होली खेलने की परम्परा है। जो प्रकृति के साथ-साथ कृष्ण रंग का भी संदेश देती हैं। कि-

कृष्ण रंग में रंग गया
धरती और आकाश
गोपी राधा खिल उठीं
जैसे फूल पलाश

रंगों का त्योहार होली, महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। वे होली के पूर्व तैयारियाँ  शुरू कर देती हैं। गाय के गोबर से गुल्लेरी बनाती हैं। जिनकी संख्या सात होती है। इनके बीच में छेद कर एक रस्सी में पिरो लेती हैं। जिन्हें होली में डाल कर पालतू पशुओं के संवर्धन की कामना करती हैं। गेहूँ की बालियों को होली में भूनकर धन-समृद्धि व अनाज भण्डारित होने की मनोकामना करती हैं।

महिलाएँ, रंगों के साथ-साथ स्वादिष्ट व्यंजनों से जैसे-  गुजिया, इमरती, घेवर, मावा मिठाई, लड्डू, रसगुल्ला, रबड़ी, खीर, हलबा, बेसन की पपड़ी, मैंदा की पपड़ी, भांग शरबत व ठण्डाई आदि बनाकर होली के रंग में मिठास घोल देती हैँ। गीत -संगीत व नाच से होली का भरपूर आनंद उठाती हैं। यही कहा जायेगा कि-

रंग गालों पर मल रहीं
उड़ाया मन भर गुलाल
गुजिया और पपड़ी संग
गूंजे ढोलक की ताल

बच्चों के लिए रंगों का त्यौहारों मस्ती का त्यौहार बनकर आता है। रंग, पिचकारी और चुंग से सारी दुनिया को मस्ती से रंग देते हैं। बड़े -बुजुर्ग गुलाल लगाकर तो हुरियारों की टोली फाग गाकर अबीर- गुलाल से आसमान को रंग देते हैं। घर-घर फाग गाकर होली की बधाईयाँ व शुभकामनाएँ  देते हैं। होली का यह पर्व रंगपंचमी तक मनाया जाता है।

प्रेम, एकत‍ा व सद्भावना का यह त्यौहार पूरे भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। लेकिन होली के रंग पर्यावरण के संग खेलने के लिए हमें हमारी भूलें सुधारना अति आवश्यक हैं।जैसे अंधाधुंध जंगलों का काटना बंदकर, पेड़ -पौधें लगाना। नदी, तालाब, कुएँ व बाबडी आदि जल स्रोतों को संरक्षित व प्रदूषण से बचाना होगा। जीव-जंतु, पशु-पक्षियों को जीने का अधिकार देना होगा। मिट्टी को प्रदूषण से बचाना होगा। प्रदूषण ने पर्यावरण के रंग को फीका किया है। जिससे अवश्य ही होली के रंग फीके हुए हैं। पानी, प्रदूषण व वर्षा जैसी विकट समस्याओं ने जन्म लिया है।

वायु, मिट्टी, जल, जंगल, पशु-पक्षियों को प्रदूषण मुक्त करना होगा। यदि पर्यावरण सुंदर और प्रसन्न होगा तो हमें अलौकिक रंग दिखाई देंगे। अवश्य ही पृथ्वी का प्रत्येक प्राणी प्रसन्न होगा तभी हम सच्चे अर्थों में होली के रंग, पर्यावरण के संग पुरातन रूप में मनाकर, सुख-समृद्धि के फाग गीत गा सकेंगे। चेहरे पर अवश्य ही पर्यावरण के रंग खिलते हुए नज़र आयेंगे।

हाल ही में, कोरोना काल में लॉकडाउन के कारण पर्यावरण को सँवरने का अवसर मिला जिससे वायु, नदी, तालाब, कुएँ, बावडी, पेड़-पौधे व जीव-जंतुओं ने पर्याप्त लाभ उठाकर, पृथ्वी का शृंगार किया। ये हम सब ने भली भांति अनुभव किया है। यही तो होली के रंग, पर्यावरण के संग, होली के अलौकिक रंग हैं। इन्हीं शब्दों के साथ होली की अनंत शुभकामनाएँ सहित यही कहूँगा -

यशमय, मधुमय, नवलय हो जीवन में।
मंगलमय हो होली आपकी, यही कामना हृदय में।

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