21वीं सदी के सामाजिक सांस्कृतिक सरोकार और हिंदी भक्ति आंदोलन: संत कबीर के संदर्भ में

दयानिधि सा

सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग प्रमुख, महात्मागांधी स्नातक महाविद्यालय, भूक्ता-768045,
जिला–बरगढ़, (ओड़ीशा)
चलभाष: +91 917 828 1452 ईमेल: sa.dayanidhi2011@gmail.com

       भारतीय धर्म साधना में ज्ञानयोग, कर्मयोग तथा भक्ति योग के रूप में तीन प्रणालियाँ प्रचलित रही हैं। भारतीय विद्वानों ने भक्ति के इस स्वरूप की व्यापक व्याख्या की है। साधन की प्रणालियों में एक गहरा अंतर्संबंध भी है। शांडिल्य भक्ति सूत्र स्वीकार करता है कि ईश्वर में अतिशय अनुरक्ति ही भक्ति है। श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ धर्म वही है, जिसके द्वारा भगवान कृष्ण में भक्ति हो। भक्ति ऐसी हो जिसमें किसी प्रकार की कामना न हो और जो नित्य निरंतर बनी रहे। ऐसी भक्ति से आनंद स्वरूप भगवान की उपलब्धि करके भक्त कृतकृत्य हो जाता है। भक्ति आंदोलन भगवान के प्रति मानव की प्रेम भावना का निरंतर प्रवाह है। इस भावना प्रवाह से भक्त तो आनंदित होता ही है दूसरे भी उससे आनंद और आलोक प्राप्त करते हैं। भक्ति आंदोलन का इतिहास कोई नया इतिहास नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। भक्ति का मूल उद्गम तो हमारे वेद हैं। उपनिषद, महाभारत, रामायण आदि ग्रंथों में विष्णु को भगवान के रूप में प्रतिष्ठा मिल चुकी थी। भगवत पुराण, विष्णु पुराण, पद्म पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भक्ति का ऐसा ही बहुविध रूप वर्णित है। इसके बाद भक्ति आंदोलन का संपूर्ण रुप हिंदी के भक्ति साहित्य में दिखाई पड़ता है।

       ईश्वर भक्ति को केवल वैष्णव भक्ति से जोड़कर नहीं देखना है। यह साधना की अनेक प्रणालियों में किसी न किसी रूप में अंतर्निहित रही है। भक्ति हमारे जीवन में हमेशा से ही प्रवाहित होती रही है। ईश्वर भक्ति की गति हमेशा एक जैसी नहीं रही है। सामाजिक राजनैतिक जन आकांक्षाओं में ईश्वर भक्ति की गति और प्रवृत्ति में युग के अनुरूप परिवर्तन भी देखने को मिलता है। भारतवर्ष में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात दक्षिण से हुआ है। दक्षिण प्रदेश के तमिळ राज्य में जैन और बौद्ध संप्रदाय को सत्ता का आश्रय प्राप्त था और वे दोनों शैवों और वैष्णवों पर अनेक प्रकार का अत्याचार कर रहे थे। उनके गृहस्थ विरोधी विचार और अत्याचार इतने प्रबल हो गए थे कि जनता भी जैनों-बौद्धों के विरुद्ध हो गई थी और शैवों और वैष्णवों के साथ मिलकर इनके विरुद्ध मोर्चा खड़ा किया और इन को निर्मूल कर दिया।  जनता ने यह मान लिया था कि नास्तिक धर्मों में कोई भी चीज तत्व की नहीं है। डॉ.  मलिक मोहम्मद ने लिखा है- "शैवों और वैष्णवों ने मिलकर जैनों और बौद्धों का बड़ा विरोध किया। उससे तमिळ प्रदेश में जैन और बौद्ध धर्म की नीव  हिलने लगी और नवीं शताब्दी तक आते-आते उन दोनों नास्तिक धर्मों की शक्ति क्षीण हो गई।"01

      भारतवर्ष में भक्ति आंदोलन का अभ्युदय मुस्लिम शासकों के अन्याय-अत्याचार को भी माना जाता है। इसके विषय में आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं, “देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिंदू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए अवकाश न रह गया था। उसके सामने ही उसके मंदिर गिराए जाते थे, देव मूर्तियाँ तोड़ी जाती थीं और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था। वे कुछ न कर सकते थे। ऐसी स्थिति में अपनी वीरता के गीत न तो वह गा सकते थे और बिना लज्जित हुए सुन भी नहीं सकते थे। आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर-दूर तक स्थापित हो गए तब परस्पर लड़ने वाले स्वतंत्र राज्य भी नहीं रह गए थे। इतने भारी राजनीतिक उलटफेर के नीचे हिंदू जनता पर उदासी छाई रही। अपने पौरुष-हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग ही नहीं था।"02

       आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भक्ति संबंधी इस धारणा का खंडन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कर देते हैं। उनका कहना है यह बात अत्यंत हास्यास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मंदिर तोड़ रहे थे तो उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार के कारण यदि भक्ति की भावना को उमड़ना था तो पहले उसे सिंध में फिर उत्तर भारत में प्रकट होना चाहिए था पर प्रकट हुई वह दक्षिण में।"03

       भक्ति आंदोलन को भागवत धर्म एवं धर्म पद्धति के विकास का स्वाभाविक परिणाम मानना ही युक्तिसंगत प्रतीत होता है। इस्लाम धर्म के प्रचार एवं मुसलमानी शासन अपने संगठन को शक्तिशाली बनाने में सहायक सिद्ध हुआ होगा। भक्ति आंदोलन एक महान ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम था, जिसका मूल्यांकन करना सरल नहीं है। भगवत गीता के युग के आसपास उसकी लहर प्रकट हुई। भगवत के साथ वह शक्ति संपन्न हो गई। आचार्यों के हाथों में आने पर दर्शन की चरम कोटि तक पहुंची और लोकप्रिय शक्तियों के द्वारा आसेतु हिमाचल सारे देश को आप्लावित कर सकी।

       भक्ति आंदोलन के इतिहास में आलवार संतों और म्यानमार संतों का विशेष योगदान रहा है। आलवार संतों को वैष्णव कहा गया है जिनकी संख्या बारह मानी गई है। आलवार संतो की रचनाएँ 'दिव्य प्रबंधम' में संकलित है। नायनमार संतो को शैव कहा गया है, जिनका उद्देश्य हिंदू धर्म की रक्षा करना था। इन संतों ने अपनी सारी पूजा अर्चना वंदना शिवजी को केंद्र में रखकर की है। भक्ति आंदोलन के इतिहास को विकसित करने में भारतीय आचार्यों का विशेष योगदान है। शंकराचार्य ने पूरे देश में भक्ति का प्रचार ही नहीं किया वरन आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन भी किया। अपने अद्वैतवादी दर्शन का प्रचार करना ही उनका जीवन लक्ष्य था। उन्होंने समाज में परिव्याप्त अनैतिकता,अंधविश्वास तथा हिंसा को रोकने में ईश्वर भक्ति को ही एक मात्र शक्ति के रूप में स्थापित किया। 

     भक्ति आंदोलन के संगठनात्मक तत्वों को बलशाली सिद्ध करने का सबसे बड़ा श्रेय रामानुजाचार्य को है। उन्होंने भक्ति जगत में बुद्धि पक्ष एवं भावना पक्ष दोनों का समन्वय स्थापित किया। उनके द्वारा स्थापित दार्शनिक सिद्धांत विशिष्ट अद्वैतवाद के रूप में जाना जाता है। ग्यारहवीं-बारहवीं सदी में निंबार्काचार्य ने द्वैताद्वैतवाद की स्थापना करके भक्ति आंदोलन को गतिशील बनाया। स्वामी रामानंद ने अपने गुरु राघवानंद से दीक्षा ग्रहण करके उत्तर भारत में वैष्णव भक्ति का प्रचार प्रसार किया। काशी-बनारस में वैष्णव भक्ति को संगठित कराकर भक्ति के द्वारा सभी वर्गों और जातियों के लोगों के लिए द्वार खोल दिए। इसी संदर्भ में दक्षिण के कर्नाटक के मधवाचार्य ने द्वेतवादी चिंतन का प्रवर्तन किया और मायावाद का विरोध करते हुए ईश्वर का एक नया स्वरूप स्थापित किया। वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वेतवाद  यानी पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन करते हुए कृष्ण भक्ति का जो स्वरूप निर्मित किया, उससे संपूर्ण भारतीय जनमानस कृतकृत्य हो गया। आचार्य वल्लभ ने सोलहवीं सदी में श्रीनाथ जी का मंदिर बनवाया। हिंदी भक्ति साहित्य की समृद्धि में इस मंदिर का विशेष महत्व है। इस मंदिर के महत्व को रेखांकित करते हुए देवीशंकर अवस्थी ने लिखा है, “यह मंदिर आगे चलकर न केवल वल्लभ संप्रदाय का ही केंद्रपीठ बल्कि अष्टछाप के कवियों की जन्मभूमि भी बनने का गौरव प्राप्त किया। हिंदी के भक्ति साहित्य के निर्माण में इस मंदिर का स्थान अक्षुर्ण रहेगा।"04 चैतन्य महाप्रभु ने पूर्वी भारत तथा बंगाल में कृष्ण भक्ति तथा राधा कृष्ण की लीलाओं का स्मरण-संकीर्तन के माध्यम से भक्ति आंदोलन को त्वरानवित किया।

    हिंदी साहित्य में भक्ति आंदोलन की चरम अभिव्यक्ति संवत 1375 विक्रम से सत्रहवीं  विक्रम तक मानी जाती है। भक्ति साहित्य के अंतर्गत निर्गुण और सगुण भक्ति काव्य के रूप में कबीरदास, राय दास,नानक, दादू दयाल, सुंदर दास, मलूक दास, जायसी, कुतुबन, मंझन, उसमान,सूरदास, नंददास,परमानंददास, रसखान, मीराबाई, तुलसीदास, अग्रदास, नाभादास, ईश्वरदास आदि भक्त कवि अनमोल रत्न हैं। इन भक्त कवियों ने भक्ति आंदोलन को जिस तरह से जन उपयोगी और जन कल्याणकारी बनाया है, उससे भारतीय जनमानस ईश्वर भक्ति को अपने आप में उतारने का सौभाग्य प्राप्त कर सका है। भक्ति साहित्य हमारे जीवन का हमारे समाज का साहित्य है। इतना ही नहीं वह हमारे समाज का दर्पण है, हमारे समाज का दीपक है। अपनी इसी उपलब्धियों के कारण भक्तिकाल हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग कहलाता है। भक्ति आंदोलन सामाजिक विषमता को मिटाकर सामाजिक सद्भाव स्थापित करता है। वह सांप्रदायिक भेदभाव, ऊँच-नीच, जात-पात, अमीर-गरीब में किसी प्रकार का भेद स्वीकार नहीं करता। भक्ति आंदोलन व्यक्तिगत और सामाजिक शुचिता पर भी विश्वास करता है। व्यक्ति के चरित्र निर्माण का पक्षधर है। इसी सामाजिक सद्भाव को गोस्वामी तुलसीदास ने इस तरह से स्थापित किया है और लोक निंदा का विरोध किया है -           
     "तुलसी जे कीरति चहहिं, पर कीरति को खोय।  
       तिनके मुंह मसि  लागिहै, मिटै न मरिहैं धोय।।"05

     भक्ति आंदोलन धार्मिक सद्भाव एवं मानवता की प्रतिष्ठा पर आधारित है। इस आंदोलन ने धर्म के असली स्वरूप की वकालत की है। बाह्य आडंबरों, यज्ञ अनुष्ठान, पापाचारों का तीव्र विरोध इस आंदोलन का मुख्य लक्ष्य रहा है। इस लक्ष्य को चरितार्थ करते हुए कबीर जैसे क्रांतिदर्शी संतो ने हिंदू और मुसलमान में कोई भेद नहीं माना है। कबीर दोनों धर्मों के लोगों को समझाते हुए कहते हैं -
     कह हिंदू राम पियारा, तुरक कहे रहमाना।
     आपस में दोउ लरी-लरी मुये  मरम न काहू जाना।06

     भक्ति आंदोलन सामाजिक सद्भाव एवं शांति स्थापित करने का एक सांस्कृतिक उपक्रम है। धार्मिक उदारता एवं सहिष्णुता इसका मूल स्वर है। इस आंदोलन में ज्ञान और भक्ति में, निर्गुण और सगुण में, शैव और वैष्णव में, राम और रहीम में, कृष्ण और करीम में एकता स्थापन का विनम्र प्रयास है। प्रेम इस आंदोलन का मुख्य स्वर है। सूफी मुसलमान कवियों ने हिंदू धर्म के स्वर के प्रति अनुरक्त होकर जो प्रेमाख्यानक काव्य रचे हैं, वह सांप्रदायिक सद्भाव का परिचायक है। संत कवियों, सूफी कवियों, कृष्ण भक्त कवियों तथा राम भक्त कवियों ने अपनी-अपनी प्रेम मूर्ति को लेकर ऐसी प्रबल रसधारा बहायी है जिससे संपूर्ण जनमानस लाभान्वित हुआ है।

     भक्ति आंदोलन मानवीय सरोकारों और आशयों का आंदोलन है। यह भक्ति आंदोलन प्रेम का आंदोलन है, जिसमें मनुष्य के प्रति, समाज के प्रति और संस्कृति के प्रति गहरा और निर्बंध प्रेम विद्यमान है। भक्ति काव्य ने इस आंदोलन को बड़ी व्यापकता और विस्तार प्रदान किया है। वास्तव में भक्ति आंदोलन मनुष्य के विवेकपूर्ण कर्तव्यों-अभिप्रेतों का आंदोलन है। इस भक्ति आंदोलन की प्रासंगिकता हमेशा से ही रही है। आज इक्कीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर में हमारे सामने जितनी चुनौतियाँ खड़ी हैं, उन तमाम चुनौतियों को जड़ समेत मिटाने और वैश्विक सद्भाव स्थापित करने का महामंत्र भक्ति आंदोलन हमें दे सकता है। जरूरत है तो केवल उस महामंत्र को अपने आप में उतारने और उसकी पहल करने की।

         हिंदी भक्ति आंदोलन को मुख्यतः चार रूपों में देखा जा सकता है - संत काव्य, सूफी काव्य, राम भक्ति काव्य और कृष्ण भक्ति काव्य।  निर्गुण भक्ति काव्य में संत और सूफी काव्य के बीच एक सामंजस्य दिखाई पड़ता है। संत काव्य के प्रणेता कबीरदास ने सांप्रदायिक सद्भाव के महान उद्देश्य के साथ हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों को मुस्लिम धर्म के मूल सिद्धांतों से मिलाकर एक नई पंथ की कल्पना की थी, जिसमें एकेश्वरवाद का संदेश था। वह निर्गुण-सगुण से परे था। उसकी सत्ता प्रत्येक कण में परिव्याप्त थी। गुरु में बड़ी शक्ति थी। वह गोविंद से भी बड़ा था, गोविंद के समान था।
        "गुरु गोविंद तो एक है दूजा यह आकार।
          आपा मिटै गुरु मिलै तो पावे करतार।।"07

     संत कबीर भारतीय धर्म साधना के क्रांतिदर्शी साधक तथा युग दृष्टा साहित्यकार हैं। उन्होंने भारतीय धर्म के क्षेत्र में विराट क्रांति का आह्वान किया था। उनके समकालीन भारतीय समाज अनेक दुराचारों, धर्मांधताओं, पाखंडों, व्यभिचारों से ग्रस्त था। धर्म के ठेकेदार मिथ्या एवं असत्य आचरण द्वारा भारतीय जनमानस में धर्म का दुरुपयोग करके अपनी मान प्रतिष्ठा के लिए हमेशा चिंतित रहते थे। ऐसी भीषण सामाजिक परिस्थिति से ग्रसित भारतीय समाज को धार्मिक प्रपंचों और बाह्य आडंबरों के चंगुल से मुक्ति दिलाने के लिए संत कबीर मसीहा बनकर आविर्भूत हुए थे। समय की मांग की पूर्ति करते हुए कबीर ने अपने क्रांतिकारी विचारों का तेज अस्त्र धारण करके इस विश्रृंखलित समाज को सुव्यवस्थित करने का साहसिक प्रयास किया था। 

        क्रांतिदर्शी कवि संत कबीर के व्यक्तित्व के बारे में डॉ. कांतिकुमार जैन लिखते हैं, “कबीर एक खतरनाक कवि हैं। कबीरदास से खतरा उस युग की उन सभी लोगों के लिए था जो स्थापित मूल्यों के परिवर्तन की कल्पना मात्र से भयभीत थी और उनसे खतरा आज के पाठक को भी है। कबीर को पढ़ने के बाद हम ठीक वही नहीं रह जाती जो हम उन्हें पढ़ने से पहले होते हैं। उनका काव्य हमें जीवन, समाज और काव्य की मूलभूत समस्याओं पर विचार करने के लिए बाध्य करता है। उनके प्रशंसक दोनों ही कबीरदास की प्रतिभा से अभिभूत होते हैं।"08

      कबीर की धर्म साधना अत्यंत सरल, निराडम्बर और युगानुकूल थी। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में यदि कहें - "कबीर की वाणी वह लाता है,जो योग के क्षेत्र में भक्ति के बीज पड़ने से अंकुरित हुई थी।" कबीर ईश्वर की सत्ता पर संपूर्ण विश्वास करते थे। ईश्वर भक्ति में ही जीवन की सार्थकता मानते थे। ईश्वर सानिध्य के बिना मनुष्य जीवन व्यर्थ है मूल्यहीन है। भगवत भक्ति आराधना से ही मनुष्य को सद्गति प्राप्त हो सकती है। सत्यम-शिवम-सुंदरम ईश्वर प्रदत्त सत्ता की अध्यात्म शक्ति को कबीर सहर्ष रूप से स्वीकार करते हैं। जनमानस में ईश्वरीय सत्ता के प्रति समर्पण की अपेक्षा रखते हैं। लोगों को ईश्वर भक्ति की ओर प्रेरित करते हुए कहते हैं - 
           चलती चक्की देखि कै दिया कबीरा रोय।
           दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोय।।09

       अध्यात्मवादी चिंतक के रूप में कबीर अपनी भक्ति की पावन धारा में ज्ञान को उचित मार्ग के रूप में ग्रहण करते हैं। ज्ञान का ऐसा पवित्र मार्ग है जिस पर चलकर मनुष्य ज्ञान के प्रकाश से ज्योतिर्मय होकर ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है। ज्ञान प्राप्ति के लिए एक उचित गुरु की आवश्यकता होती है। एक महान गुरु ही शिष्य के हृदय में ज्ञान-दीपक प्रज्वलित करके ह्रदय की कल्मषता मिटा सकता है। आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में अध्यात्म मार्ग के अनुसरण द्वारा गृहस्थ जीवन जीता हुआ व्यक्ति ईश्वर सान्निध्य प्राप्त कर सकता है। उसे सांसारिक जीवन त्याग कर तपस्वी जीवन जीने की जरूरत नहीं है। इस सिद्धांत का वर्णन करके कबीर साधु सन्यासियों के जप-तप को निरर्थक मानते हैं। गृहस्त्त्यागी, साधु सन्यासी, तपस्वी लोगों पर कटाक्ष करते हुए कबीर लिखते हैं -
        "कस्तूरी कुंडली बसै मृग ढूंढे बन माहि। 
      ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।।"10

     वस्तुतः कबीरदास साम्यवादी मानवतावादी तथा क्रांतिदर्शी संत कवि हैं। कबीर ने जनमानस में अज्ञानता के अंधेरे को मिटा कर ज्ञान की जो ज्योति जलाई है, वह पूरी विश्व मानवता के लिए हितकर है, फलप्रद है। हजारी बाबा के शब्दों में - "हजार वर्ष के इतिहास को ढूंढा जाए तो कबीर जैसा कोई चिंतक दिखाई नहीं पड़ता। निश्चित रूप से भक्ति काल के जिन चार कवियों- कबीर, जायसी, सूर, तुलसी की गणना की जाती है, उनमें कबीर आधार स्तंभ हैं।"11 कबीर की ओजस्वी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में प्रासंगिक थी। आज इक्कीसवीं सदी के विकास के दौर में हमारे सामने जितनी चुनौतियाँ हैं, उनसे लड़ने, संघर्ष करने, विमर्श करने की युगानुकूल शक्ति कबीर-वाणी में मौजूद है। कबीर का ज्ञान दीपक आज की जीवन-जटिलताओं को मिटा कर विश्व मानवता एवं वैश्विक शांति-सद्भाव का प्रकाश चारों तरफ फैला सकता है।

संदर्भ ग्रंथ सूची-
01. www.hindikunj.com
02. हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, नवीन संस्करण -2020, पृष्ठ- 67
03. हिंदी साहित्य की भूमिका, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, नवीन संस्करण- 2019, पृष्ठ-87
04. www.hindisamay.com
05. रामचरितमानस, अयोध्या कांड, श्री ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार, वाराणसी, संसोधित संस्करण -2007, पृष्ठ -107
06. कबीरदास, कांतिकुमार जैन, दिव्या प्रकाशन, ग्वालियर, 1994, पृष्ठ- 83
07. कबीरदास, कांतिकुमार जैन, दिव्या प्रकाशन, ग्वालियर, 1994, पृष्ठ- 89
08. कबीरदास, कांतिकुमार जैन, दिव्या प्रकाशन, ग्वालियर, 1994, पृष्ठ-75
09. कबीरदास, कांतिकुमार जैन, दिव्या प्रकाशन, ग्वालियर, 1994, पृष्ट-86
10. कबीरदास, कांतिकुमार जैन, दिव्या प्रकाशन, ग्वालियर, 1994, पृष्ठ-91
11. कबीर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिंदी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई, 1960, पृष्ठ- 56      


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