कलाएँ और अहिंसक कलावादी समाज की पड़ताल

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी

- कन्हैया त्रिपाठी

डॉ. कन्हैया त्रिपाठी, भारत गणराज्य के माननीय राष्ट्रपति जी के विशेष कार्य अधिकारी का दायित्व निभा चुके हैं और सेतु सम्पादक मंडल से संबद्ध हैं।


आज के समय में रेखांकन, कलात्मकता और कला में अभिरुचि रखने वाले लोग अगर सकारात्मक दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं तो उन्हें हिंसक और अतिक्रमण करने वाली कलाओं का प्रतिरोध करते हुए बेहतर दुनिया के लिए अपने सृजन पर बल देना होगा। दुनिया की कला के लिए यह वह समय है, जब व्यापक ध्रुवीकरण के साथ दुनिया बसाने पर बल दिया जा रहा है। समाज में विकृतियों और हिंसाओं को क्रूर तरीके से प्रकट किया जा रहा है। ऐसे में, बहुत सूझबूझ के साथ सृजनात्मक लोगों को एक स्वर में आशावादी दुनिया और प्रकृति को मजबूती प्रदान करना है, और वह अपने कुशल बुद्धि और विश्वास के माध्यम से ही किया जा सकता है।

अब तो मानवाधिकारों की पहल भी सकारात्मक कलात्मकता में देखी जा रही है। लुईस आर्बर (संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार के लिए उच्चायुक्त, 2004) ने कहा था ‘मानवाधिकार हमारी साझी विरासत है और उनकी प्राप्ति योगदान पर निर्भर करती है।’ उन्होंने यह बात एक पेंटिंग समारोह में मानवाधिकार दिवस पर कही थी। दुनिया के बहुत से देशों में मानव अधिकार पर बनाई गई पेंटिंग्स को अहिंसक पेंटिंग्स के रूप में इसलिए परिभाषित किया गया है क्योंकि उन पेंटिंग्स में कलाकार कहीं न कहीं उन हिंसाओं को उभारता है जो किसी न किसी समाज पर किए जा रहे अतिक्रमण को रेखाँकित करती हैं। हिंसा के दृश्यों के साथ पेंटिंग्स बना रहा कलाकार, और हिंसा को किसी नाटक में रेखांकित करता कोई नाटककार एक अहिंसक समाज के लिए यह सब कुछ करता है, इसलिए अहिंसक समाज विनिर्मिति में मानवाधिकारवादी कलाकृतियाँ, रेखांकन, चित्र और मूर्तियाँ निःसंदेह अहिंसक सभ्यता के सन्देश देती हैं। मानव अधिकार के सार्वभौम घोषणा-पत्र के 70वीं वर्षगांठ पर दुनिया भर के बच्चों के बीच संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से पेंटिंग्स पर कार्यशाला और प्रतियोगिता का आयोजन किया था इसमें शामिल ब्रुसेल्स में स्पैनिश कलाकार क्रिस्टोबल गैबरोन के मार्गदर्शन में बच्चे जो रंगों के साथ रेखांकन कर रहे थे या जो रंग भर रहे थे, वे मनुष्य की विद्रूप सोच- जो बच्चों के प्रति थे, वही उभरकर सामने आए थे। ये देखने में कलाएँ नकारात्मक पक्ष को प्रदर्शित कर रही थीं लेकिन उनसे जो सन्देश जा रहे थे, उनमें सन्देश था। उनमें भविष्य के प्रति चिंताएँ और आशाएँ थीं। 1970 में यूनेस्को संग्रहालय अधिग्रहण की नीतियों पर कन्वेंशन को देखें तो उसमें कलाकृतियों के संरक्षित करने के प्रशिक्षण पर बल दिया गया था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के धरती पर दो ऐसे बदलाव वाले पल हैं जो कलाकारों और हिंसा से जूझते समाज की भयावह पीड़ा को देखे हैं। इस दौर में साहित्य, संगीत, कलाकृतियाँ और रेखांकन के साथ जीवन जीने वाले सृजनकर्ता जिन भयावह स्थितियों को देखे, उसका उन पर बहुत प्रभाव था। प्रतिरोध व्यक्त करना अपने समय में बहुत कठिन कर्म है। मध्यमार्गी तो कभी विरोध नहीं दर्ज करा पाते इसलिए उनसे कोई क्रांति की कल्पना नहीं की जा सकती। अगर सच कहा जाए तो वे ही हिंसा के लिए जिम्मेदार होते हैं। वे अपने समय में सही का साथ नहीं देते। इसलिए उनकी मुखर न होने की स्थितियों का राज्य लाभ लेते हैं। इसी समय में कलाकार अपने साथ, समाज के साथ और राष्ट्र के साथ न्याय नहीं कर पाते।

मानव अधिकार या किसी भी मनुष्य केन्द्रित संवेदना की बातें हों, अगर उसके प्रति सर्जक समष्टिगत नहीं सोचता है, तो वह अपने कर्त्तव्यों से किसी न किसी रूप से विमुख हो जाता है। अब जब दुनिया भर में कलाकारों की पाण्डुलिपियों और कलाओं की चोरियाँ हो रही हैं, तो उसके पीछे के मनोविज्ञान को समझा जा सकता है। विगत वर्ष 2020 में न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक अनोखी कला प्रदर्शनी आयोजित की गई थी उसमें दुनिया भर से लायी गई ऐसी कला कृतियाँ प्रदर्शित की गई थीं जो इतिहास की एक झलक पेश करती हैं। इस मौके पर महासचिव एँतोनियो गुटेरेश ने "रिकवर्ड आर्ट: द आर्ट ऑफ़ सेविंग आर्ट" नामक इस कला प्रदर्शनी का उदघाटन करते हुए कहा था कि कुछ कला प्रदर्शनियों में कुछ ख़ास कलाकारों की कलाकृतियाँ प्रदर्शित की जाती हैं, या फिर किसी कला आंदोलन की झलकियाँ पेश की जाती हैं। ‘इस कला प्रदर्शनी में एक अनोखी बात ये है कि यहाँ प्रदर्शित हर कलाकृति की चोरी हो गई थी और हर कलाकृति को बरामद किया गया। इसमें इटली की पुलिस की जाँच-पड़ताल, उनकी महारत और उनके पक्के इरादे के परिणाम नज़र आते हैं। इस मुहिम में इटली पुलिस को अक्सर अनेक देशों के साथ मिलकर काम करना पड़ा।’ इस तरह ये कला प्रदर्शनी बेशक़ीमती कलाकृतियों की झलक पेश करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ताक़त की एक तस्वीर भी पेश करती हैं। महासचिव एँतोनियो गुटेरेश ने साथ ही अफ़सोस व्यक्त करते हुए ये भी कहा कि हाल के वर्षों में किस तरह दुनिया भर में कितनी बड़ी संख्या में सांस्कृतिक धरोहर गुम हो गई हैं। ये धरोहर इराक़, सीरिया से लेकर यमन, माली और अफ़ग़ानिस्तान तक अनेक देशों में गुम हुई हैं। महासचिव का कहना था, ‘दरअसल, हम सभी ऐसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं जो हमारी साझा धरोहर को संरक्षित रखने के प्रयासों में बाधा खड़ी करते हैं। इनमें जलवायु संकट से लेकर सिविल अशांति, सशस्त्र संघर्ष से लेकर आतंकवाद की भी चुनौतियाँ शामिल हैं।’ आखिर कलाकार और कलाकृतियों से भय क्यों है? दुनिया के बहुत से देशों के बीच कलाओं के चोरी की घटना उन तथ्यों की चोरी है जो आने वाली पीढ़ी को यह बताने वाली हैं कि हमारे पूर्वज किस सभ्यता में जीने वाले लोग थे, उनकी कल्पना क्या थी, और वे क्या सोचते थे। इसमें उनके द्वारा किए गए संघर्ष और युद्ध के भी समय को चित्रित किया गया है जो उनके हिंसक होने के प्रमाण हैं। किसी भी सहिष्णुता या क्रूरता की चोरी करना भी तो एक जुर्म है और कोई भी ज़ुर्म हिंसा की कोटि में ही आता है।

संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय में विकास, रचनात्मकता का विकास: कलाएँ समाज को कैसे और क्यों बदल सकती हैं, इस विषय पर कटरीना ओइवो और जॉन क्लैमर की लम्बी बातचीत हुई थीं। अपने इस इंटरव्यू में क्लैमर ने कहा है कि कलाएँ आर्थिक और सामाजिक विकास में सीधे योगदान दे सकती हैं, और यह कि रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने से वैकल्पिक विकास पथ और संस्कृति के स्थायी रूप मिल सकते हैं। ज्ञातव्य हो कि जॉन क्लैमर ‘कला, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय विकास: मानवीय सामाजिक परिवर्तन’ नामक पुस्तक के लेखक भी हैं, जो कला को नए रूपों में व्याख्यायित करते हैं। उन्होंने जिस और संकेत किया है उनमें कला का भविष्य है और कलाकार के रचनात्मकता की असीम संभावनाएँ भी हैं। हिंसक कलाकृति से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। एक सवाल- कला और संस्कृति को विकास की सफलता के महत्वपूर्ण घटक के रूप में कैसे बढ़ावा दिया जा सकता है?, के ज़वाब में जॉन क्लैमर ने कहा था कि यूनेस्को की पहल और उसके जैसे अन्य लोगों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा है। वे सरकारों को संस्कृति के महत्व की याद दिलाते हैं- भले ही पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वाद्ययंत्र समाप्त हो- और सांस्कृतिक परियोजनाओं के साथ-साथ अधिक पारंपरिक बुनियादी ढांचे की फंडिंग की संभावना के लिए वित्त पोषण एजेंसियों का ध्यान आकर्षित करें। कला के लिए आर्थिक तर्क निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन इन चुनौतियों के लिए जब कलाकार या सर्जक किसी अश्लील या ओछे किस्म की रचनाधर्मिता को अपना लेता है और उनकी कृतियाँ किसी ख़ास राज्य, जाति, पंथ, समुदाय या व्यक्ति के लिए हिंसा का कारण बनती हैं, तो भले ही वे वित्तीय लाभ पहुँचाती हों किसी को, लेकिन उनसे केवल हिंसाएँ और अराजक स्थितियाँ ही बनती हैं।

बौद्ध प्रतिमाएँ पूरी दुनिया के कलाकारों की अभूतपूर्व संकल्पना रही हैं। इसीप्रकार सभ्यताओं की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ मनुष्य के विकास और उसके संघर्ष को दर्शाती हैं। इन अभिव्यक्तियों की शिल्पकारों की कल्पनाशीलता और उनकी बौद्धिकता पर अगर आज बात हो रही है या चोरियों की भी बात हो रही हैं। इस क्रम में आर्थिक, सांस्कृतिक या सामाजिक विकास यात्रा की अनेकशः उपलब्धियाँ हमारे यहां अनेकों हिंसक घटनाओं की भी कारक हैं। लेकिन यह हम जानते हैं कि बौद्ध धर्मावलम्बियों ने किसलिए विश्व के अनेक देशों में बुद्ध की प्रतिमाएँ स्थापित कीं? गांधी या दूसरे अहिंसा के अग्रहियों ने कला या साहित्य के माध्यम से जो अभिव्यक्त किया उसके भी पीछे दरअसल अहिंसक सोच का प्रसार करना था। प्रकृति के प्रति मनुष्य के भीतर जागृति के लिए भी अहिंसक प्रयास, कलावादियों और सभ्य समाज के सृजनकर्ताओं द्वारा समय-समय पर किया गया। वह चाहे पेंटिंग्स के जरिये हो, मूर्ति के माध्यम से हो या दूसरे अनेक सृजन के विधाओं के जरिये हों। वह मनुष्य के उन्नति और उनके विकास के गीत हैं। यह उनके सतत विकास और शांति की अवधारणा है, यह भी कहा जा सकता है। शांति और सतत विकास की अवधारणा अहिंसक सभ्यता की अनुपस्थिति में संभव ही नहीं है।

सृजनात्मकता में दिलचस्पी लेने वाले लोगों का दायित्व है कि वे अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हुए एक दृढ़ इरादे वाली पीढ़ी का विकास करें जिनमें सत्य के लिए संघर्ष करने की दृढ़ इच्छाशक्ति भी हो।

श्रेष्ठ संभवनाओं की प्रत्याशा में विकसित हुईं कलाएँ भी अच्छे समाज के निर्माण हेतु थीं। अब भी मानव अधिकारों की रक्षा या स्वतंत्रता, गरिमा की अभिवृद्धि के लिए जो संकल्पनाएँ आ रही हैं वे भले ही कई स्तर पर अपना प्रभाव डाल रही हैं लेकिन सबका उद्देश्य बहुत पवित्र है और वह है अहिंसक समाज निर्माण का कार्य। अगर उन्नत मनुष्य और प्रकृति के भविष्य की अपेक्षा की जाएगी तो किसी भी समाज से यह अपेक्षा होगी कि वे जीवन में अहिंसक सोच के साथ आगे बढ़ें। और यह स्वीकार करना चाहिए कि हमारे पूर्ववर्ती रचनाकार, शिल्पकार और सभ्यता को प्रतिष्ठा प्रदान करने वाले लोग महान थे और उन्होंने हमें जो दिया है उसमें अहिंसक सृजनात्मक सोच की मात्रा अधिक थी।


पता: यूजीसी-एचआरडीसी, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर-470003 (मध्य प्रदेश),
चलभाष: +91 981 875 9757, ईमेल: hindswaraj2009@gmail.com

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