कहानी: आई लव यू (तृप्ति वर्मा)

तृप्ति वर्मा
आज अलमारी को क़रीने से लगा रही थी कि हाथ एक प्लास्टिक की थैली पर पड़ गया। सख़्त स्पर्श के साथ खड़खड़ाहट हुई। इन आवाज़ों से जान पहचान थी सो जल्दी से थैली खोली और निकाली इतिहास बन चुकी कुछ पुरानी सीडी। नीले अक्षरों में उसका और मेरा नाम लिखा था। साथ में दो बिंदु और एक अर्ध्चंद्राकार :) की मुस्कुराती हुई आकृति बनी थीं।मैंने भी पलट कर जवाब दिया और अपने होंठों पर अर्धचन्द्र तान दिया। सीडी को हाथ से सहलाने लगी। एक निर्जीव वस्तु को प्यार से सहलाने की क्रिया अपने अंदर भावनाओं का एक पूरा समुंदर समेटे होती है। उठती-गिरती, दौड़ती-कूदती और फिर फिसल कर एक दूसरे से जा लिपटती लहरो की तरह जाने कितनी ही यादें और उनसे जुड़े एहसास के शहद से भरा छत्ता छिपा होता है उस स्पर्श में। उसी शहद की मिठास मेरे हलक को तर करती हुई आँखो के सामने बिखरने लगी थी। पंद्रह सालो के विस्तार को पल भर में सिकोड़कर छोटा करने का हुनर सिर्फ़ यादों में है। अभी तो तीव्र इच्छा थी कि सीडी को प्ले करके देखा जाए। पर कहाँ? ये भी एक बड़ा सवाल है। टेक्नॉलजी के तेज़ी से विकास ने हमें बहूत ही भीषण असमंजस दिया है। हर पल कुछ नया सीखो और इससे पहले कि उसे आराम से भोगने का प्लान करो तो पता चलता है कि फिर कुछ नया आ गया है और जो सीखा था अब वो चलन में नही रहा। इसी नए-पुराने की मुठभेड़ में कब घर अपडेटेड हो गया पता नही चला। सीडी प्लेयर और डेस्कटॉप जैसी चीजें तो कब की घर से विदा ले चुकी थीं। पहले लैपटॉप की सीडी ड्राइव से काम चला लिया करती थी लेकिन आधुनिकता में आगे रहने की होड़ में आज वो सुविधा भी नही रही। हाथ में सीडी पकड़े हुए मैंने मैकबुक की तरफ़ देखा और फिर सीडी उठाकर बेडसाइड ड्रॉअर में रख दी। अलमारी को वापिस उसी हालत में बंद करके मैं अपनी बेटी के कमरे में गई। उसको फ़ोन पर देखकर मैंने उससे पूछा, “जिया बेटा, तुम फ़ोन हर वक्त हाथ में लिए रखती हो? कभी आसपास भी देखती हो कि असल दुनियाँ में क्या चल रहा है?” मेरे इस सवाल के पीछे छुपे व्यंग्य को समझकर, थोड़ा चिढ़ते हुए जिया ने अपनी भाव-भंगिमा छुपाने की कोशिश की और बहूत ही सरलता से बोली, “हाँ! मैं आपको देख सकती हूँ और आसपास भी देखती हूँ। फ़ोन पर मैं कुछ चेक कर रही थी। बताइए, आपको क्या काम है?” ऐसे जवाब, जो खुद में सवाल लेकर बने होते हैं उन में प्रत्यक्ष से कहीं अधिक अप्रत्यक्ष प्रश्न चिन्ह होते हैं। बेटी बड़ी हो रही है। उसका ऐसा व्यवहार कष्टदायी है लेकिन अकारण नही है। व्यंग्य भरे सवाल भला किसे अच्छे लगते हैं? क़द में पूर्ण और उम्र में किशोर हुए बच्चों को देखकर माता-पिता ये तय करने में अक्सर मात खा जाते है कि बच्चों को किस श्रेणी में रखें? कभी तो हम उनसे कहते है, “अब तुम बड़े हो गए हो अपनी ज़िम्मेदारी समझो।” और फिर अगले ही पल किसी बात पर ये कहकर डाँट देते हैं कि, “अभी तुम छोटे हो”। जो बच्चे पहले से इतने सारे बदलाव से गुज़र रहे हों। जिनका व्यक्तित्व अपनी गति पकड़ने को उतावला हो ऐसे में हमें उनकी सहायता करनी चाहिए। लेकिन हम भी तो उतने ही नासमझ होते हैं जितने वे बच्चे। जिस अंदाज़ में मैंने जिया से सवाल पूछा था क्या इस अंदाज़ में मैंने उससे तब बात की थी जब वो पाँच साल की थी? अपनी गलती का एहसास मुझे जिया के जवाब को सुनकर हो गया था। ऐसे मौक़ों पर मेरी भरपूर कोशिश होती है कि सकारात्मकता बरकरार रखी जाए। थोड़ी देर तक मैं उसको देखती रही फिर बात की दिशा बदलते हुए बोली, “तुम्हारे लिए मेरे पास कुछ है।” मेरे इस वाक्य की भी जिया आदी थी।”क्या है?” उसने फ़ोन में आँखें गड़ाए हुए कहा।अब बारी थी एक कदम आगे बढ़ाने की, मैंने जिया के बिस्तर पर जाकर उसे ज़ोर से जकड़ कर प्यार से हँसते हुए कहा, “मेरे पास है जादू की झप्पी।” जिया भी ज़ोर से हँस पड़ी। उसका फ़ोन एक तरफ़ तकिए से जा लगा। जिया ख़ुशी से सिर्फ़ इतना बोली, “मॉम यू आर सो फ़न। आई लव यू सो मच।”

ये “आई लव यू” कहने का रिवाज़ हमारे घर मैंने ही चलाया था। शुरू में थोड़ा मुश्किल था, कहने-सुनने में अजीब लगता था। कई बार लोग इशारों से या शब्दों से हमारे इस रिवाज़ की हँसी भी उड़ाया करते थे। लेकिन मेरा विश्वास है कि ऐसी छोटी-छोटी कोशिशें बड़ा बदलाव लाती हैं। ये छोटी कोशिशें सिर्फ़ नाम की छोटी होती हैं, उन्हें अपनाने में लगने वाली हिम्मत और जज़्बा बहूत बड़ा होता है। ये बात मैंने उसी से सीखी थी। “उसी से” मतलब उससे जिसके साथ मेरा नाम नीले अक्षरों में सीडी पर लिखा था।

छोटी-सी, नन्ही-सी गुलाबी होंठो वाली जिया ने रो- रोकर पूरा हॉस्पिटल सर पे उठाया हुआ था। मैं उसे गोद उठाए कभी इधर तो कभी उधर टहल रही थी कि उसका रोना बंद हो। मन ही मन मैं हास्पिटल और डाक्टर को कोस रही थी, जो देर किए जा रहे थे।बच्चे पालने का और उनके रख रखाव का पहला अनुभव था तो हर छोटी-बड़ी बात के लिए डाक्टर के पास पहुँच जाना मेरा नियम बन गया था।

“इक्स्क्यूज़ मी”, मुझे पीछे से किसी ने आवाज़ दी। मैंने जैसे ही पलट कर देखा, “ आपकी बेटी को कोई ख़ास तकलीफ़ है क्या?” उसने ये सवाल मुझ पर दाग दिया। मैं पहले से ही बहूत परेशान थी ऐसे में एक अजनबी के ऐसा पूछने पर मैं थोड़ा चिढ़ गयी, “ जी तकलीफ़ है तभी रो रही है।” मैंने अपनी चिढ़न छुपाने की कोशिश की थी जो शायद नाकाम रही थी। जवाब में उसने कहा,” अरे आप तो बुरा मान गई, दरअसल मैंने आपको इस हॉस्पिटल में अक्सर देखा है, आप जो दवाई अपनी बेटी को दे रही हैं उसके बिना भी उसकी परेशानी दूर हो सकती है अगर आप अपनी बेटी से ज़्यादा अपने पर ध्यान दे।” अब मेरा पारा सातवे आसमान पर चढ़ चुका था। एक अजनबी मुझ पर नज़र रखे है, मेरी बेटी की दवा भी उसे पता है, आख़िर ये है कौन? और मुझे सलाह दे रहा है जैसे कि मैं कोई अनपढ़-गँवार हूँ। ग़ुस्से और असुरक्षा की भावना चरम पर आ चुकी थी। मैंने अपनी बेटी को पास की बेंच पर लिटाया और उससे लड़ना शुरू कर दिया। शोर सुन आसपास लोग इकट्ठा हो गए। मैंने भी ठान लिया था कि आज इस आदमी को पुलिस के हवाले कर के दम लूँगी। चिल्ड्रन हॉस्पिटल में बच्चा चोरी की कई वारदातें मैं अख़बार में पढ़ चुकी थी। क्या पता ये भी उनमें से कोई हो। मैं इकट्ठे हुए लोगों के बीच एक नेता की तरह भाषण देने में, उनको बच्चाचोरी के बारे में बताने में इतनी मशगूल हो गयी की जिया को भूल ही गयी, “… ये बच्चों को उठा ले जाते हैं,उन्हें देश-विदेश में बेच देते हैं, या फिर हाथ-पैर तोड़ कर भीख मँगवाते हैं। ऐसे दरिंदो को जूते मार-मार कर सड़क-चौराहे पर घुमाना चाहिए, जिससे कोई आगे से ऐसा करने की हिम्मत ना करे…” बोलते-बोलते मैं उस आदमी का कॉलर पकड़ने के लिए जैसे ही मुड़ी, मैं अवाक रह गयी। वो आदमी वहाँ नही था। जिया का कम्बल और स्वेटर वग़ैरह बेंच पर पड़े थे…. मैं ज़ोर से चिल्लाई, “हाय मेरी बेटी! वो हरामज़ादा बच्चा चोर मेरी जिया को ले गया।बचाओ, कोई बचाओ।” भीड़ में हड़बड़ी मचने लगी। हॉस्पिटल का स्टाफ़ भी भीड़ को हड़का कर तितर-बितर करने की कोशिश में जुट गया। एक औरत जो शायद मैनजमेंट से थी, मुझसे कुछ कहने के लिए आगे बढ़ी, शायद मेरी बेटी के बारे में कुछ कहना चाह रही थी।मैं उस पर हावी होने की तैयारी कर ही रही थी कि मुझे जिया का स्पर्श महसूस हुआ। जिया मेरी आँखो के ठीक सामने थी और ज़ोर से खिलखिला रही थी। मैंने बिना इधर-उधर देखे उसे अपनी गोद में दबोच लिया और खूब ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी, “मैं तुझे कैसे भूल गई मेरी गुड्डो? तू कहाँ चली गई थी? तेरे बिना मेरा क्या होता?” शायद वो सारे डायलोग मुँह से निकल रहे थे जिन्हें हम हिंदी फ़िल्मो में सुनकर बड़े होते हैं। सब कुछ इतनी हड़बड़ी में हो रहा था कि लॉजिक कोसो दूर था। सोच पर मातृत्व सवार था। मातृत्व के असंख्य रूप है, उन्ही में से एक है डर और घबराहट। शायद वही डर और घबराहट मुझ पर हावी था। जब मेरा रोना-धोना थोड़ा सिमटा, मैंने महसूस किया कि वो मैनजमेंट वाली औरत अब भी मेरे पास बैठी थी। और लगातार मेरा कंधा सहलाकर मुझे शांत कर रही थी। अब शायद मेरा नज़रिया उसके लिए थोड़ा अलग था। मैंने उसे प्रेम और कृतज्ञता की दृष्टि से देखा। वो कह रही थी, “घबराओ मत। तुम्हारी बेटी बिल्कुल ठीक है। तुम उसे बेंच पर रोता छोड़, बच्चाचोरों के ख़िलाफ़ जब मोर्चा खोल रही थी तब नीतीश उसे गोद में लेकर चुप कराने और बाहर की हवा खिलाने ले गया था। “कहते हुए उन्होंने अपने हाथ से जिस शख्स की ओर इशारा किया उसे देख मैं थोड़ा सिकुड़ गई और अपने भौहें तानकर उस औरत से बोली, “ये अब भी यहाँ है? ये मुझ पर और बेटी पर नज़र रखता है।” मैं अपनी बात पूरी करती इससे पहले ही वो औरत बोल पड़ी, “रोहिणी जी, ये ही नीतीश है। ये कोई बच्चा चोर नही है ये हमारे हॉस्पिटल की फ़ार्मेसी चलाता है। इसी ने आपकी रोती हुई बेटी को चुप कराया है।” अब तक शायद मैं सामान्य हो चुकी थी। मैंने थोड़ी शर्मिंदगी से नीतीश से माफ़ी माँगी। बदले में वो it's ok बोल, औपचारिकता निभाकर चला गया। मैं जिया का कम्बल और स्वेटर समेटकर उसे पहनाने लगी कि जिया ने फिर से रोना शुरू कर दिया। शायद मैं अब समझी थी नीतीश की बात का मतलब। मैंने मुस्कुरा कर वापिस उस पर से मोटे कपड़ों का बोझ हटाकर बैग में रख लिया।

अपनी किसी भी मूर्खतापूर्ण हरकत की याद हम पर कई दिनों तक हावी रहती है। मेरे साथ भी यही हो रहा था। इस हॉस्पिटल प्रकरण को 2 हफ़्ते से ज़्यादा बीत गए थे लेकिन मेरी शर्मिंदगी कम होने का नाम नही ले रही थी। अंततः मैंने निर्णय लिया नीतीश से मिलकर उससे अपनी गलती के लिए खेद प्रकट करने का। मैं हॉस्पिटल पहुँच गई। वहाँ जाकर लॉबी में इधर- उधर ताँक-झाँक़ करने लगी, 15 मिनट तक यूँही इधर-उधर घूमती रही। नीतीश नही दिखायी दिया। तभी अचानक याद आया कि मैनजमेंट वाली औरत ने बताया था नीतीश फ़ार्मेसी चलाता है। मैं जल्दी से फ़ार्मेसी पर पहुँची। वहाँ पर वो नही दिखा, एक 27-28 साल का लड़का वहाँ था। उसने मुझे प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा। मेरे पास कोई प्रिस्क्रिप्शन नही था। मैंने हड़बड़ाहट में कुछ strepsils ख़रीदी और वापिस होने लगी कि आवाज़ आई, “मैडम, अब जिया बेटी कैसी है?” पलटकर देखा तो नीतीश ठीक मेरे सामने था। मेरा यहाँ आना सफल हो गया था। मैंने मुस्कुराते हुए उसे देखा, “जी बिलकुल ठीक है।” कह कर मैं उसके साथ धीमी गति से चलने लगी। कुछ बातें जितनी अनकही होती हैं उससे कहीं अधिक उनमें अर्थ छिपा होता है। ये शायद मेरे और नीतीश के एक साथ बढ़ाए पहले कुछ कदम थे। वे कदम जो हम बिना कुछ बोले साथ चले थे उन्ही कदमों में हमने अपनी ज़िंदगी की सबसे महत्वपूर्ण वार्ता की थी। मैंने चुप्पी तोड़ते हुए कहा,” मैं दरअसल आप ही से मिलने आयी थी। उस दिन मैंने जो कुछ भी आपसे कहा, जो भी किया, उसके लिए मैं बहूत शर्मिंदा हूँ। आपसे मिलकर अपने किए के लिए माफ़ी माँगना चाहती थी।”

“माफ़ी तो आपने उसी दिन माँग ली थी, और मैंने भी it's ok बोल दिया था” उसने कहा।

“जी वह तो है लेकिन वह पर्याप्त नही लगा मुझे..”

“तो फिर क्या पर्याप्त है?” नीतीश ने थोड़ा मज़ाक़िया होते हुए पूछा।

“जी, क्या हम कहीं बैठ कर बात कर सकते है? “

नीतीश मुझे पास ही कैंटीन में ले गया और दो चाय ऑर्डर कर दी। मैं चाय पीना पसंद नही करती लेकिन मैंने उसे नही टोका। चाय शायद सिर्फ़ एक बहाना था साथ बैठकर बातें करने का। सिर्फ़ मैं ही नही और भी बहूत से ऐसे चायबाज है दुनिया में जिनकी चाय का स्वाद, पत्ती, चीनी और दूध से ज़्यादा बातों में छुपा होता हैं।

“तो बताइए, क्या बात करनी थी आपको” नीतीश ने बात शुरू करते हुए कहा।

जवाब में मैं चुप ही रही।इतने दिनो की एहसास-ए-शर्मिंदगी आज मुझसे कोसों दूर थी। बस चाय और नीतीश का साथ सुकून दे रहा था। मनोज को खोये मुझे एक साल बीत चुका था। उसके जाने के बाद मैंने ना सिर्फ़ उसके जाने के ग़म को झेला था बल्कि मुझे और इतनी तकलीफ़ों ने आ घेरा था जिनकी कल्पना भी आम इंसान की सार्म्थ्य से परे है। सास-ससुर को अपने बेटे के खोने का ग़म जितना था उससे अधिक चिंता उन्हें इंश्योरेंस के पैसे की थी, उस फ़्लैट की थी जो मैंने और मनोज ने अपने पैसे जोड़कर बुक कराया था। होने वाले बच्चे और बहू की ओर से वो पूर्णतः आश्वस्त थे कि वो अपने माता-पिता के साथ ही रहेगी। मनोज के अचानक चले जाने से मैं घर में रहकर भी बेघर सी हो गयी थी। मेरे माता-पिता भी असमंजस में थे। समय और स्वास्थ्य की दृष्टि से जैसे-तैसे मैंने अपने माता -पिता और सास-ससुर के घर में थोड़ा-थोड़ा समय बिताया। डिलीवरी के वक्त मनोज की मम्मी ने खूब पूजा-पाठ किए, वो आश्वस्त थी कि पोते के रूप में वो अपने बेटे को पा लेंगी लेकिन जिया के आगमन ने उनकी तंद्रा तोड़ उन्हें बुरी सास बनने पर मजबूर कर दिया।ये स्पष्ट हो चुका था कि ससुराल में गुज़ारा नही है। समय रहते फ़्लैट का पज़ेशन मिल गया। अपने माता -पिता से ज़िद करके मैं अपने फ़्लैट में आकर बस गई। अकेले बच्चे को पालना कितना मुश्किल है ये मुझसे बेहतर कौन जानेगा भला?

“हेलो! कहाँ खो गई आप?” नीतीश ने मुझे पुकारते हुए कहा।

“कुछ नही, बस यूँ ही…” मैंने थोड़ा झेंपते हुए कहा।

“आप जो कहना चाहती हैं मैं सब जानता हूँ। “नीतीश ने कहना शुरू किया…” आप सिंगल मदर है, संघर्षों के साथ जीवन जी रही हैं। बेटी को सम्भालना एक बात है लेकिन उससे ज़्यादा ज़रूरी है अपना ख़याल रखना। अगर आप ही खुश नही होंगी तो बच्चे को कैसे खुश रख सकेंगी।” नीतीश ऐसे बोले जा रहा था जैसे मेरे बारे में सब कुछ जानता हो। और हाँ वो मेरे बारे वाक़ई सब कुछ जानता था पर कैसे?, ये मुझे तब पता चला जब उसने मुझे मेरे घर ड्रॉप करने का आग्रह किया। मैंने ये कहते हुए मना कर दिया कि “आपको तकलीफ़ होगी।”

“जी बिल्कुल भी नही, मेरा घर भी उसी तरफ़ है बी-ब्लॉक, एफ़-57”

उसका जवाब सुन मैं चौंक गई, “एफ़-57... मेरे घर के ठीक सामने” अब मैं समझी कैसे ये जनाब मेरे बारे में इतना कुछ जानते हैं। और हमारा इस दिन एक साथ घर आना हमेशा के साथ में बदल गया। नीतीश आज भी मुझे दवाई लेने पर डाँटता है। खुद दवाइयों का काम करता है लेकिन पैरवी प्राकृतिक चिकित्सा की करता है। अपनी इस सुहानी यादों में टहलते हुए कब शाम हो गयी मुझे पता ही नहीं चला। दरवाज़े की घंटी बजी तो जिया दौड़कर गई और दरवाज़ा खोल कर शोर करते हुए बोली, “पापा, कितनी देर लगा दी।” इसके बाद कुछ शांति सी हुई, मैंने देखा कुछ इशारे हो रहे थे बाप-बेटी के बीच। मुझे अपनी ओर देखता देख दोनों एकदम नोर्मल बिहेव करने का नाटक करने लगे। ये इन दोनों का अक्सर चलता रहता था इसलिए मैंने कुछ ध्यान नही दिया। जिया कमरे में गयी तो नीतीश मेरे पास आकर प्यार से मुझे एक बॉक्स देते हुए बोले, “आई लव यू रोहिणी” मैंने बिना कुछ उत्तर दिए बॉक्स की तरफ़ देखा। ये एक ब्रांड न्यू सीडी प्लेयर था। मैंने चौंक कर नीतीश की तरफ़ सवालिया नज़रें घुमाई ही थीं कि सामने से जिया आती दिखी। उसके हाथ में वही सीडी थीं जो सुबह मैंने अपने बेड-साइड ड्रॉर में रखी थी। सीडी पर नीले अक्षरों में लिखा था “रोहिणी वेड्ज़ नीतीश :)” सीडी मेरी ओर बढ़ाते हुए उसने सिर्फ़ इतना कहा, “हाँ! मैं आपको देख सकती हूँ और आसपास भी देखती हूँ।” मेरी आँखें ख़ुशी से छलछला गयी। जिया और नीतीश ने मुझे कसकर गले लगा लिया। हम तीनों के मुँह से एक साथ निकला “आइ लव यू बोथ” और हम तीनो ज़ोर से हँस दिए।


सिनसिनाटी, ओहायो (संयुक्त राज्य अमेरिका)

5 comments :

  1. Bahut sundar rachna.lekhika ko badhai.

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    1. हार्दिक आभार🙏🏼

      -तृप्ति

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  2. भावनाओं के उतार, चढ़ाव बहुत खूबसूरती से उकेरे हैं। बधाई।

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    1. इतनी ख़ूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए बहुत शुक्रिया आदरणीया।

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  3. इस ख़ूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीया🙏🏼।

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