विकास की भूल-भुलैया [1]: अंधे युगों की परम्परा

चंद्र मोहन भण्डारी
अव्यवस्था रहित व्यवस्था, असत विहीन सत
तलाश रहे जो, नहीं जानते
धरती व आकाश के अंदाज-ओ-मिजाज
नहीं समझते किस कदर गुंथा हुआ है
कुदरत का काम-काज।
चुआंग त्सू [1]  

मानव की सांस्कृतिक विकास कथा की शुरूवात उसके भाषा-ज्ञान व भाषाजनित संप्रेषण से होती है जिसने उसे शेष जंतु-जगत से हटकर एक अलग पहचान दी। इसके बाद की बड़ी घटना कृषि-क्रांति थी जिसने यायावर जीवन से निजात दिला जीवन को स्थायित्व प्रदान किया और सोचने-समझने का वक्त दिया। भाषा की सामर्थ्य और सोच-विचार की सुविधा ने एक और बड़ी क्रांति को जन्म दिया – औद्योगिक क्रांति। इसके पहले आधुनिक विज्ञान की नींव ‘बेकनी सिद्धांत’ पर रख दी गई थी जिसमें प्रकृति यानि कुदरत के साथ संतुलन रखते हुए विकास की पारम्परिक सोच के स्थान पर धारणा बनी ‘कि कुदरत को जंजीरों में बांधकर प्रताड़ित किया जाना होगा ताकि वह अपने राज उगल सके।‘ जो विकास इस बुनियादी सोच पर रहा हो उसका अंजाम वही होगा जो हो रहा है यानि जीवन के लिये आवश्यक संतुलन डगमगाने लगा, और जीव-जगत के लिये अस्तित्व का संकट दिखाई देने लगा। तीन लेखों की इस श्रंखला में इसी बात पर चर्चा होगी और उसके संभावित निष्कर्षों एवं विकल्पों पर भी।  

कुदरत का काम-काज
कुदरत का काम-काज वैसा क्यों है जैसा हमें दिखाई देता है?  आज विज्ञान की मदद से बहुत सी ऐसी जानकारी हमें मिल रही है जिसकी तीन सौ साल पहले कल्पना भी न हो पाती। आज इंटरनेट और मोबाइल फोन हमारी जिंदगी से अंतरंग रूप से जुड चुके हैं और हम सूचना-क्रांति से उपजी लहर पर आरूढ़ होकर देख रहे हैं कि देखते-देखते दुनिया एक गाँव सी बन चुकी है। लम्बी और विस्मयकारी फेहरिस्त है टेक्नोलाजी से जुड़ी इंसानी उपलब्धियों की, इसके बावजूद न हर इंसान को पौष्टिक भोजन मिल सका है, न स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी, जो आदि काल से ही धरती के जीवों को आसानी से उपलब्ध थे। और तो और सारी दुनिया पर अपनी विजय पताका फहरा चुके बाहुबली को छुटकू से वाइरस ने दौड़ा दिया और वाइरस है अपना भेष बदल कर उस बाहुबली का जैसे मजाक उड़ाता रहा। यह तो एक छोटी सी घटना है देखते जाइये भविष्य में और भी बहुत कुछ सामने आने वाला है जो इंसानी अहंकार को तार-तार कर सकने की क्षमता रखता है। शायद यही इंसान की नियति है। प्रकृति के प्रति इंसान की ‘बेकनी सोच’ [Baconian spirit; 2] भी इनके लिये जिम्मेदार है इस बात को हमें स्वीकारना होगा।
कथा पुरानी है और लम्बी भी; कोई नहीं जानता कि धरती  पर जीवन का विकास क्योंकर हुआ और कैसे  इंसान जैसा प्राणी अस्तित्ववान हो गया जिसने विकास के नाम पर ऐसी भूल-भुलैया रच दी जिसमें वह खुद ही कैद हो गया। परिणाम यह हुआ कि उसने केवल तीन सौ सालों में अपने और शेष जीव-जगत के लिये गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया। अगर इसी तरह चलता रहा तो इंसान अपने विनाश की कथा स्वयं लिख रहा होगा; केवल कथा-लेखन ही नहीं उसको जमीनी हकीकत में बदलने के प्रयास भी कर  रहा होगा।

गुंथा हुआ काम-काज
चुआंग-त्सू की कविता में कुदरत का काम-काज गुंथा हुआ होने की बात है। गुंथा हुआ, उलझा हुआ जिसमें एक तार सभी अन्य के साथ जुड़ा है और जिसे सुलझाना आसान नहीं लगता। धरती पर जीवन का उद्भव एवं विकास भी कुदरत के काम-काज का अंतरंग हिस्सा है। कुदरत ने यह सब किसी योजना के तहत पूरी सोच के साथ किया हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। जिन नियमों व प्रक्रियाओं से विश्व का घटनाक्रम संचालित हो रहा है उनको किसने और क्यों बनाया यह जान सकने की अक्षमता के कारण उन्हें कुदरत के खाते में डाल देना ही उचित लगा। इसमें हमारा अर्द्ध-विकसित सोच भी शामिल है जो हमारे विकसित मस्तिष्क की देन है। इंसान ने जिस विकास की अंधी दौड़ में अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी है उसको ठीक से परिभाषित करने का भी प्रयास नहीं किया। इंसान बौद्धिक रूप से समर्थ औेर सक्षम है पर मनोवैज्ञानिक रूप से अक्षम व अपरिपक्व; इंसान की मनोवैज्ञानिक अक्षमता भी हमारी समस्या के मूल में है।

जो भी हो यह एक सच है कि सभी जीवों में मानव को बड़ा और उच्च क्षमता वाला मस्तिष्क मिला जिसका फायदा उठाने में कुछ देर की, लेकिन जब इसमें सफलता मिलने लगी तो उसने अपनी पूरी पाशविक मानसिकता का भरपूर उपयोग करना शुरू कर दिया। जिस कुदरत ने उसे यह करिश्माई मस्तिष्क दिया था उसी पर सबसे ज्यादा मार पड़ना शु्रू हो गई। अपने मद में डूबा और विकास की लहर पर आरूढ़ इंसान और कर भी क्या सकता था। कुछ लोग यह सोचते हैं कि शायद इंसान को यह मालूम न था कि विकास की लहर पर आरूढ़ होने का अंजाम इतना खतरनाक हो सकता है। पर अब जब सब मालूम हो रहा है उसके काम-काज और विकास की अंधी दौड़ में क्या फर्क आता दीखता है? 

उत्तराखंड त्रासदी
7 फरवरी को नंदादेवी ग्लेशियर फटने की खबर जब सुनाई पड़ी तो सहसा विश्वास नहीं हुआ कि केवल सात साल पहले इसी तरह की घटना हमारे सामने घटी होने के बावजूद  हम क्यों इसके लिये जरा सा भी तैयार नहीं थे। यह तो कोई नहीं कह  सकता किस दिन और किस स्थान पर समस्या आफत बन कर टूटेगी, पर जब इसके लिये बार-बार चेताया गया हो और सावधान रहने के लिये कहा गया हो हम पूरी तरह असावधानी में पकड़े गए। सात साल पहले की त्रासदी भी न केवल इसी तरह की थी अपितु लगभग इसी भौगोलिक क्षेत्र में थी।

ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट पर काम पिछले दस सालों से चल रहा था। पर्यावरणविदों की ओर से इसका विरोध हुआ और क्षेत्र की जनता ने भी विरोध किया, यहाँ तक कि मामला कोर्ट तक जा पहुँचा जहाँ वह आज भी विचाराधीन है। स्वाभाविक है कि इस घटना ने जून 2013 में केदार घाटी में हुई त्रासदी  की याद ताजा कर दी। तब लगातार भारी बारिश के कारण केदारघाटी में जैसे प्रलयकारी द्दश्य दिखाई दे रहा था। करीब साढ़े पाँच हजार लोग मारे गये थे और दस हजार से अधिक मवेशी भी बह गये थे। यह तो रही प्रकाशित आंकड़ों की बात, उस क्षेत्र में लोग यही मानते हैं कि नुकसान इससे बहुत अधिक हुआ था। 

उत्तर मांगते सवालों के हुजूम
दुर्घटना, विराट त्रासदी और एक नहीं अनेक त्रासदियों का हुजूम और इसके साथ भविष्य में भी संभावित इनकी रूपरेखा – यह सब हमसे सवाल पूछते हैं और जवाब मांगते हैं और हम हैं कि सवालों से कतराकर निकलने का प्रयास करते हैं। आज नहीं तो कल हमें इन सवालों से रूबरू होना ही होगा और उनके तर्कसंगत जवाबों से भी; अगर ऐसा नहीं होता तब हमें तबाही से कोई भी नहीं बचा सकेगा। हमें कुछ सवालों के जवाब ढूंढने ही होंगे:

[क] क्या हम जानते हैं कि वैश्विक ताप बढ़ रहा है और दुनिया भर के ग्लेशियर पिघल रहे या टूटकर बिखर रहे हैं। ध्रुवीय  क्षेत्रों में भी यही हालात हैं जो दुनिया के सबसे शीतल प्रदेश माने जाते हैं। उत्तरी ध्रुव के पास  आर्कटिक महासागर अब पहले ही तरह सदैव बर्फ से ढंका नहीं रहता और दक्षिणी ध्रुवीय प्रदेश अंटार्कटिक महाद्वीप की बर्फ भी तेजी से टूट कर बिखर रही है। वैश्विक ताप का बढ़ना मानव की विकास प्रक्रियाओं की ही देन है। एक या दो शताब्दियों में विश्व भर की तटीय भूमि का बड़ा भाग जलमग्न हो जायगा इसके संकेत मिलने लगे हैं।

[ख] हिमालय पर्वत श्रंखला दुनिया की सबसे ऊंची श्रंखलाओं में एक है परन्तु ये पर्वत अपेक्षाकृत कमजोर हैं। हमारे ही देश में दक्षिण भारत या विंध्य पर्वत हिमालय की अपेक्षा काफी अधिक मजबूत हैं। भारी बारिश होने या भूकम्प आने पर हिमालय क्षेत्र में टूट कर बिखरने की संभावना अधिक होगी। हर बरसात में भूस्खलन की घटनाऐं यहाँ प्रचुरता से होती रही हैं।

[ग] भूकम्प की संभावना के आधार पर भूमि को अलग खंडों में बांटा जाता है जिन्हें सीसमिक जोन्स कहते हैं। भारत मे चार जोन मुख्य हैं जोन 2, 3, 4 और 5; जोन 5 में भूकम्प की संभावना सबसे अधिक है और जोन 2 में सबसे कम। जम्मू काश्मीर, पश्चिमी व मध्य हिमालय, उत्तर-पूर्वी भाग, गुजरात में कच्छ क्षेत्र जोन 5 में आते हैं जहाँ भूकम्प की संभावना सबसे अधिक है। हम यह भी जानते हैं कि भारत की टैक्टोनिक प्लेट तिब्बत की और धंस रही है [3, 4] करीब 5 से मी प्रति वर्ष की दर से, जिसकी वजह से निरंतर एक विराट दबाव टेकटोनिक प्लेटों के बीच बना रहता है जो इस क्षेत्र को अस्थिर बनाने के लिये काफी है।

मध्य हिमालय क्षेत्र जिसमें नेपाल शामिल है सन 2015 में अधिक तीव्रता के भूकम्प से बुरी तरह प्रभावित हुआ। यह भूकम्प 7.8 तीव्रता का था जिसमें करीब 9000 लोग मारे गये और 22,000 घायल हो गये। तीव्रता को देखते हुए यह नुकसान बहुत अधिक हो सकता था यदि  इस क्षेत्र में बडे शहर होते और जनसंख्या घनत्व अधिक होता। भूगर्भशास्त्री मानते हैं कि इस क्षेत्र में बड़े भूकम्प आने की संभावना बनी रहेगी जिनकी तीव्रता 8 से अधिक हो सकती है।

हमारा राजधानी क्षेत्र सीसमिक जोन 4 में आता है और यहाँ पर भी तीव्रता वाले भूकम्प की संभावना निरंतर बनी हुई है। इस महानगर में ऊंचे भवनों के निर्माण में जिन सावधानियों का ध्यान रखा जाना चाहिये क्या इस पर ध्यान दिया गया है? 

इन तथ्यों को  ध्यान में रखते हुए अब निम्नलिखित बातों पर गौर करें: 
उत्तराखंड का जो क्षेत्र यहाँ चर्चा का विषय है उसमें तीनों प्रकार का खतरा मौजूद है; ताप वृद्धि के कारण ग्लेशियर टूटकर बिखरने का, कमजोर पर्वतों के बारिश या अन्य कारण से टूटने का और भूकम्प का। कोई एक कारण भी काफी है किसी बड़ी परियोजना को इस क्षेत्र में न स्थापित करने के लिये। और जब तीनों कारण मौजूद हों तब इस तर्क को पूरी तरह नकार देना हाराकिरी या आत्मघात का प्रयास की कहलाएगा। यह भी तब जब सात साल पहले इस तरह की त्रासदी से यह क्षेत्र गुजर चुका हो।

भारत विश्व सबसे अधिक आबादी घनत्व वाले देशों में एक है और अभी भी यह वृद्धि रुकी नहीं और न ही उस दिशा में कोई गहन विचार-विमर्श चलता दिखाई देता है। बढ़ती आबादी और उसके विकास का दबाव एक विराट समस्या है जिसकी गंभीरता को हमने आत्मसात किया ही नहीं। हमारा सामूहिक सोच तर्कद्दष्टि को अक्सर नकारता रहा है। नेतृत्व को इसमें कोई रुचि नहीं, जनता उदासीन है और हमारा प्रबुद्ध वर्ग जिसे आवाज उठाना चाहिये था और जो उसका दायित्व था वह खेमों में बँटा है वामपंथी, दक्षिणपंथी, मध्यमार्गी, अवसरवादी आदि; दरअसल उसे प्रबुद्ध वर्ग की संज्ञा देना बेमानी होगा। 

जो दलों, खेमों, जातियों व धर्मो के नागपाश में बंधा हो और तर्कपूर्ण चिंतन न कर सके उससे उम्मीद हो भी नहीं सकती। निश्चय ही देश में प्रबुद्ध लोग अवश्य हैं पर उनके बीच संवाद न होने के कारण कोई प्रबुद्ध वर्ग अस्तित्ववान नहीं है। 

एक और अंधा-युग
अपना इतिहास देखें तो साफ नजर आता है कि आरम्भिक काल को छोड़ हम अंधे युगों की कितनी श्रंखलाओं से गुजर चुके और आज का नजारा भी उसी अंधे युग का आधुनिक संस्करण है या यों कहें उसी श्रंखला की एक कड़ी है।

महाभारत की त्रासदी पर बहुत कुछ लिखा गया है और उसका महत्व इसलिये भी है कि वह त्रासदी केवल युद्ध की विभीषिका का चित्रण मात्र नहीं अपितु एक समाज के सामूहिक सोच एवं मानसिकता का दस्तावेज है।
 महाभारत के इस कथा सागर के पात्र मानव के विस्तृत वैचारिक परिवेश का लगभग संपूर्ण वर्णपट प्रस्तुत करते हैं उसकी सारी कमियों, कुंठाओं, आदर्शों, झूठे अहं व मान्यताओं, एवं विकृतियों के साथ – वह सब जो हर कहीं, हर देश-काल में चरितार्थ होती नजर आ जाती हैं। यह कथा साहित्य जीवन के बीहड़ यथार्थ को पूरी स्पष्टता से उजागर करता है [5] और आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।  धर्मवीर भारती का काव्य-नाटक अंधायुग [6] इन सबमें अलग स्थान रखता है। महाभारत की त्रासदी टाली जा सकती थी अगर उस देश-काल के प्रभावशाली लोग चीजों को शांत मन व तर्कद्दष्टि से परख कर निर्णय लेते। भारती के ही शब्दों में:

पथभ्रष्ट, आत्महारा, विगलित
अंतर की अंध-गुफाओं के वासी
यह कथा उन्हीं अंधों की है
यह कथा ज्योति की है अंधों के माध्यम से।

आज की कथा कुछ अलग है पर युग वही है अंधा-युग; कथावस्तु, पात्र व देश-काल बदले हैं, अंधेपन का स्वरूप बदला है। हाँ अंधों के माध्यम से ज्योति की कथा भी आगे बढ़ सके तो इस देश का सौभाग्य होगा। पर जैसा आज दीख रहा है हम सभी अंधों की जमात में हैं जिनमें कुछ धृतराष्ट्र हैं और बाकी सब गांधारी। कुछ हैं जो देख नहीं सकते और कुछ ऐसे भी हैं जो देखना नहीं चाहते। और यह भी कि भगवान कृष्ण नहीं हैं हमारे बीच; पर उनके होते भी तो अंधा-युग आया ही था। शायद इसमें भी एक संकेत छिपा है कि चमत्कार की आशा किये बिना ही हमें अपने ‘अंदर  की अंध-गुफाओं’ यानि मानवीय कमजोरियों को पहचान कर ‘कुदरत के काम-काज’ के साथ तालमेल के साथ आगे बढ़ना जरूरी होगा। विकास जितना बाहर जरूरी है उतना या उस से अधिक अंदर भी अनिवार्य होगा। इसे विकास की भावी रूपरेखा का अंतरंग हिस्सा बनाने के लिए पहल करनी होगी।

विकास की अंधी दौड़ सारे विश्व मे चल रही है, हम भी उस दौड़ में भागीदार हैं। आज सात अरब से अधिक  विश्व आबादी है और अपने देश की लगभग 1.3 अरब। आज लगभग आधी आबादी के लिये रोटी, कपड़ा औेर मकान का जुगाड़ कर पाना भी आसान नहीं; जीवन की गुणवत्ता यानि क्वालिटी की बात बेमानी है अधिकतर के लिये, और दिनों-दिन जरूरतों की लिस्ट लम्बी होती जाती है जो स्वाभाविक है। आबादी बढ़ रही है उसकी जरूरतें भी और विश्व के संसाधन हैं जो दिनों दिन कम होते जाते हैं। धरती का क्षेत्रफल वही है जो पहले था; वनों का क्षेत्रफल घट रहा और खेती योग्य जमीन का भी। शहर सुरसा के मुख की तरह फैलते जाते हैं। सीधा सरल सा तर्क कोई भी कर सकता है कि इतनी बड़ी आबादी और उसकी बढ़ती जरूरतों के लिये धरती के दिनों-दिन घटते जाते संसाधन काफी नहीं। स्वच्छ हवा और पानी की भी  गारंटी नहीं – यह कैसा विकास है कोई आकर समझाए तो।  
फिर वापस लौटते हैं हिमालय से जुड़ी हाल की त्रासदी पर। हिमालय, नगाधिराज व देवतात्मा हिमालय जिसने हमारी सभ्यता को एक पहचान दी, हमारी भूमि को जल से सींचा, मानसूनी हवाओं को संघनित कर इस भूमि पर वर्षा का प्रावधान किया, सबसे बड़ी बात कि इस भूभाग के पर्यावरण को किसी हद तक संतुलन में रखा। आज वह स्वयं अस्थिर हो रहा है और इसमें हमारा भी योगदान है। बद्रीनाथ, केदारनाथ जैसे स्थल आध्यात्मिक अनुभव के बजाय पर्यटन के लिये प्रस्तुत किये जा रहे हैं, निर्माण कार्य जोरों से चल रहा है और चलता रहेगा ऐसा प्रतीत होता है। हमारे कार्यक्रमों में दूरदर्शिता व तार्किकता का नितांत अभाव साफ दिखाई देता है। 

हम सबने वह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की कहानी सुनी है जो रोज एक सोने का अंडा देती। उसके मालिक ने सोचा कि क्यों न सारे अंडे एक साथ ही निकाल लिये जायें; उसने मुर्गी का पेट चीर डाला और पाया वहाँ तो बस एक ही अंडा था। हिमालय जो नदियों का स्रोत है हमारे लिये सोने का अंडा वाली मुर्गी की तरह बन गया है और तर्क आधारित उपरोक्त निष्कर्षों की परवाह न करते हुए हम उस मुर्गी मालिक की तरह ही लालसा के शिकार हैं जिसमें पछताने के सिवाय और कुछ न मिलेगा।
पैरों के नीचे खिसकती है जमीन
जमीन के नीचे की परत
जार-जार रोती है
बाहर निकाले जाने को मजबूर
उसका पानी मर रहा है
इंसानी लालसा का डायनोसौर
धरती को चर रहा है।
ये हरियाली, जो बची है मुमकिन है
कुछ दिन और ठहर जाय
कुदरत का करिश्मा हो
कुछ दिन और धरती संभल जाय;
देखो, होते-होते, जो हो जाय
वैसे उम्मीदों से उम्मीद कहाँ तक कर पाऐंगे
खुद को कितना और छलते जायेंगे
बीहड पथरीली जमीन में
पानी के सोतों की कहानी
बच्चों को भी ज्यादा दिन
यकीन नहीं दिला पायेंगे।

(सेतु, अक्टूबर 2017)

सार-संक्षेप

यह सच है विकास-प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती पर उसका रुख, यानि दशा औेर दिशा, कुछ हद तक नियंत्रित की जा सकती हैं और अविलम्ब नियंत्रित की जानी चाहिये। एक ऐसा भावी समाज अपेक्षित है जहाँ विज्ञान असीम है पर प्रौद्योगिकी सीमित एवं नियंत्रित, जहाँ विकास बाह्य जगत के साथ अंतर्जगत से भी रूबरू होता है, जहाँ आग्रह गुणवत्ता पर हो संख्या पर नहीं, ‘जहाँ विवेक की स्वच्छ निर्मल धारा विलीन न हो जाती हो मृत-आदतों की मरुथली रेत में [7]।

संदर्भ
[1] PDF: The Way of Chuang Tzu by Thomas Morton. (हिंदी अनुवाद लेखक द्वारा).
[2] F. Capra, The Turning Point- Science, Society and the Rising Culture, Simon and Schuster, 1982. 
[3] Russell Banks, Continental Drift, Harper Perennial Modern Classics, 2007 
 [4] चन्द्रमोहन भंडारी, भारतीय जनमानस में हिमालय: संदर्भ नये-पुराने, सेतु, फरवरी 2019.
[5] चन्द्रमोहन भंडारी, अंध-गुफाओं का कैदी, सेतु, सितम्बर 2019.
[6] धर्मवीर भारती, अंधा युग (नाटक), लेखन 1954, प्रथम मंचन 1962, किताबघर प्रकाशन, 2005.
[7] रवीन्द्र नाथ टैगोर की कविता से. (Where the mind is free from fear……../where the clear stream of reason has not lost its way into the dreary desert sand of dead habits; hindi translation by the author.) 

सेतु, फ़रवरी 2021

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