कहानी: सतरंगी दुपट्टा

ज्योत्सना सिंह

- ज्योत्सना सिंह


सूरज इस होली भी भीगा हुआ ही निकला, कल की पूरी रात बारिश ने अपनी भरपूर साजिश की। बिल्कुल वैसे ही जैसे आज से सत्रह बरस पहले की होली थी। 

उसी वर्ष मैं कॉलेज पहुँची थी। कुणाल से पहली मुलाकात कॉलेज के गेट पर ही हुई थी। उसी ने पहल की थी, “सुनिये,आपका दुपट्टा सफाई कर्मचारी बना हुआ है।” दुपट्टा संभालते हुए मैंने चिढ़कर बोला, “आपको कोई परेशानी है?” “मुझे नहीं दुपट्टे को है।” अब मेरे लिए वह बेहद बदतमीज इंसान साबित हो गया मैंने उसे झिड़कते हुए कहा, “माइंड योर ओन बिजनेस।” लटकते दुपट्टे को थोड़ा सा और बेपरवाही से ढील देते हुए मैं आगे बढ़ गई। न जाने क्यों मुझे यह महसूस हो रहा था कि उसकी निगाहें मेरा ही पीछा कर हैं। 

जैसे ही मेरी दोस्त शाइस्ता मुझे मिली मैंने उसे पूरी कहानी कह सुनाई बल्कि थोड़ा सा और नमक-मिर्च लगाकर ही सुनाई। उसने हँसते हुए कहा या तो तुझ पर आशिक होगा या तेरे इस सफेद अनारकली सूट पर मर मिटा होगा। जैसे कि मैं मर मिटी हूँ।” उसके लंबी चोटी खींचते हुए मैंने कहा, “मरवायेगी तू मुझे, घर वाले पढ़ाई-लिखाई सब बंद करवा देंगे।”

दूसरे ही दिन वह मुझे फिर टकरा गया इस बार हम दोनों सहेलियों के साथ ही वह भी सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। मैंने शाइस्ता का हाथ पकड़कर उसे पीछे खींचते हुए कहा, “पहले इन्हें रास्ता दे दो शाइस्ता!” वह रुकते हुए बोला, “शाइस्ता, जी पहले आप!” शाइस्ता उसकी ओर मुखातिब होते हुए बोली, “लखनऊ के नवाब साहब आपको हमारा नाम कहाँ से पता चला? इत्ते फेमस तो न हम कानपुर में हैं और न ही इस कॉलेज में।” 

“अभी तो आपकी सहेली ने आपका नाम लिया।”

  कहते हुए उसने मेरे चेहरे पर अपनी निगाहें टिका दी। उसकी इस बात से मैं तिलमिला उठी मेरी जुबान में कड़वाहट घुली ही रही थी कि उसने फिर कहा, “वैसे मुझे तो आपकी सहेली का नाम भी पता है। कहिए तो बता दूँ।” उसकी बात सुनते ही मेरा तन-बदन सुलग उठा। मेरे हालात समझते हुए शाइस्ता ने कहा, “ऐ,लो जी नाम पता है तो इसमें कौन सी आप बहुत दूर की कौड़ी ले लाए हैं। एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं तो नाम जानना कौन सा बड़ा काम है।” अब तक मेरी झल्लाहट इतनी बढ़ चुकी थी कि मैं तेज़ी से सीढ़ियाँ चढ़ क्लास रूम में जा पहुँची वह और शाइस्ता भी पीछे से आए और मेरी साथ वाली बेंच पर बैठ गए उसे घूरते हुए मैंने कहा, “तो क्या अब आप इतिहास भी पढ़ेंगे?” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे अपने जीवन का भूगोल बनना है तो आपका इतिहास तो पढ़ना ही पड़ेगा।” “आप हद से बाहर जा रहे हैं मैं शिकायत करूँगी।” तब तक प्रोफेसर आ गए और रज़िया सुल्तान के शासन काल और याकूत से हुए उसके प्रेम पर अपना लेक्चर देने लगे। मेरा मन लेक्चर छोड़कर उसे घूरने में लगा हुआ था और वह मुझे देखते हुए अभी भी मुस्कुरा रहा था। 

पीरियड खत्म हो होने के साथ ही जब मैं बाहर जाने लगी तो देखा शाइस्ता उससे बातें करने में मशगूल थी। यह देखते ही मेरा मूड खराब हो गया और मैं बिना उसका इंतज़ार किए हुए ही नीचे चली आई। थोड़ी ही देर में शाइस्ता हँसती मुस्कुराती उसके साथ नीचे आई और जोर से मुझे आवाज़ लगाई उसकी इस तरह की हरकत से मेरे दोनों कान गर्म हो गए उसकी तरफ़ तीखी नजरें फेंकते हुए मैं मुड़ गई। पलक झपकते ही वह मेरे पास आ बोली, “अरे मेरी जान! यूँ ख़फ़ा नहीं होते वह भी नेक बंदा है। हमने उससे ज़रा सी बात क्या कर ली आप तो नाराज हो बैठीं।” “ऊह! हम क्यों होने लगे नाराज़? हमें तो उसके रंग-ढंग अच्छे नहीं लगते तभी दूरी बनाकर चल रहे हैं। आप जाइए और अपनी दोस्ती को परवान चढ़ाइए।” शाइस्ता हँसते हुए बोली- “रंग-ढंग का तो पता नहीं पर शिवालय में दुपट्टे रंगने की दुकान है उसकी रंगरेज है तेरा आशिक़!” उसकी बात सुन रुआँसी होती हुई मैं बोली, “देख तुझे पता है। मुझे ऐसी बातें पसंद नहीं है। मुझे पढ़ने की इजाज़त कितनी मुश्किल से मिली है ये तुम जानती हो। खुदा के वास्ते मुझे पढ़ लेने दो।”

वक्त रोज ही नए रंग बिखेर रहा था। वह मुझे हर दिन नए तरीके से देखता और मैं अपना दामन उससे बचाती हुई कभी इस राह तो कभी उस राह हो लेती लेकिन ये दिल सच में बड़ा कमबख़्त होता है। नज़रें और दामन बचाते-बचाते न जाने कब मैं चुपके-चुपके उसे देखने लगी। उसका आस-पास होना अब मुझे भी अच्छा लगने लगा था। वह हमारी दोस्ती के दायरे में आने लगा और हर दिन हमारी दोस्ती में एक नया रंग घुलने लगा। शायद कोई पक्का रंग, हाँ! यह इश्क़ का रंग था जो मेरी सुबह ओ शाम को रंग-बिरंगा कर रहा था। 

एक रोज मेरा दुपट्टा थामते हुए उसने कहा था, “तुम सफेद दुपट्टा मत ओढ़ा करो यह मुझे उदास कर देता है। सफेद भी कोई रंग होता है।”

अपना दामन उसकी गिरफ़्त से खींचते हुए मैंने कहा था, “सफेदी का अपना ग़ुरूर होता है ये तुम नहीं समझोगे रंगरेज!” उसने कहा, “रंग क्या होता है यह मैं कल दिखाऊंगा तुम्हें। कल की होली मेरे साथ खेलना तुम्हारे घर आऊँगा तुम्हें अपने रंग में रंगने के लिए।”

“न, मेरे घर मत आना हमारे यहाँ होली नहीं खेली जाती।” मैंने घबराते हुए कहा। 

“पर मैं तो खेलूंगा तुम्हारे सिर की कसम। होली जलते ही तुम्हारे अब्बा के कदमों में गिरकर तुम्हें माँग लूँगा।” 

उसे तरह-तरह से कसमें दे मैं घर वापस आ गई। उस रात बहुत बारिश हुई होली कैसे जली मुझे नहीं मालूम वैसे भी तो कभी मालूम नहीं होती थी। पड़ोस से गुझिया और रंग की थैली रात में ही चंदा चाची दे जाती थीं। दूसरे दिन घर के खिड़की दरवाजा सब सवेरे से ही बंद हो जाते थे। इस बार भी सब वैसा ही था पर मेरा मन झरोखे पर पड़े चिलमन के उस पार झांकने को बेताब था। डर और आस हर साँस के साथ आ जा रही थीं। वह यहाँ तक न आए ये दुआ हर वक्त पढ़ रही थी और एक झलक देखने को मिल जाए ये जुस्तजू बराबर बनी हुई थी। 

दिन बीता रात गई होली की छुट्टियाँ खत्म हो कॉलेज खुले। उससे मिलने की बेताबी ने मेरे कदमों में पंख लगा दिए। 

कॉलेज में सन्नाटा पसरा पड़ा था। एक शोक सभा आयोजित की गई थी। सामने सफेद चादर से ढकी मेज़ पर कुणाल की तस्वीर रखी हुई थी उस पर लोग फूल माला चढ़ा रहे थे। शाइस्ता मुझे देखते ही आकर मुझसे लिपटते हुए बोली-

“तेरा रंगरेज चला गया।” मैंने खुद को बड़ी सख्ती से संभाला अब तक छुपा लाई अपने इश्क़ को अब मैं दुनिया से रूबरू नहीं करवाना चाहती थी। लेकिन उसे क्या हुआ और कैसे हुआ सब जानने की बहुत जल्दबाजी थी मुझे। 

शाइस्ता को लेकर मैं उसकी दुकान जा पहुँची उसके बाबा ने आज ही दुकान खोली थी। उनके करीब जा मैंने बहाने से कहा, “चाचा, एक दुपट्टा रंगवाना है।” उन्होंने भीगी आवाज़ में कहा, “बेटी मैं आज से दुकान बंद कर रहा हूँ अब मुझसे यह काम नहीं होगा तुम किसी और दुकान में रंगवा लो।” 

शाइस्ता ने उन्हें हौसला देते हुए कहा, “चचा, क्या हुआ था कुणाल को, बताइए न हम उसके साथ ही पढ़ते थे।” अपना माथा ठोंकते हुए वह बोले, “कर्म ख़राब थे मेरे और क्या हुआ था? किसी को चाहने लगा था वह उसके लिए दुपट्टा रंगने में लगा था मैंने कहा भी तुम रहने दो मैं रंग दूँगा पर उसे तो सतरंगी दुपट्टा खुद ही रंगना था। रात हुई बारिश से यहाँ फिसलन बढ़ गई थी। राम जाने  उसका पैर फिसला या क्या हुआ अचानक  खौलते रंग की पतीली उसके ऊपर गिर गई। वह  नीचे से पूरा जल गया। अस्पताल पहुँचाने में भी देर हुई। होली का दिन था, जुलूस में एक घंटा गाड़ी फँसी रही। डॉक्टर भी देर से मिले तीन दिन वह अपनी ज़िंदगी से लड़ता रहा फिर उसके बदन में सड़न फैल गई और वह मेरे सारे रंग स्याह करके चला गया।”

उन्हें दिलासा दे ग़मग़ीन हो हम वहाँ से चले आए मगर दुकान के कोने से झाँकता वह सतरंगी दुपट्टा आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ता। 

 तभी बैठक से सलीम ने आवाज दी, “बेगम साहिबा शर्मा जी के यहाँ होली की मुबारकबाद देने चलना है जल्दी से तैयार हो जाइए।”

मैं वार्डरोब से सतरंगी जयपुरी निकालकर खुद को सँवारने लगी। 

1 comment :

  1. कानपुर, शिवाला, कितनी तो यादें ताजा हो गईं और कसक भरी मिठास घोल गये कॉलेज कॉरिडोर्स में लहराते, उंगलियों में लपेटे जाते दुपट्टे।

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