विकास की भूल-भुलैया: [2] गाया की सहमती काया

चंद्र मोहन भण्डारी
माता भूमि:, पुत्रोहं पृथिव्या - अथर्ववेद

जैविक विकास एक विशेष प्रकार का नृत्य है जिसमें जीवित इकाई और उसका परिवेश नर्तक द्वय हैं। इस नृत्य का ही प्रतिफल है गाया। - जेम्स लवलॉक

पौराणिक संदर्भ, वैज्ञानिक दृष्टि
गाया – ग्रीक पौराणिक साहित्य में जीवित धरती का प्रतीक, दैवी मान्यता प्राप्त; बहुत कुछ हमारे ‘माता भूमि:’ से मिलता-जुलता, और किसी न किसी रूप में कई पारम्परिक समाजों में प्रतिबिम्बित। आज इक्कीसवीं सदी में गाया की अवधारणा एक बार फिर उभर कर सामने आई है एक नई प्रामाणिकता व तात्कालिकता के साथ; उभर कर आने की वजह है ‘भूमि-पुत्र’ के अपने अस्तित्व पर खतरा साफ दीखने लगा है। गाया या माता भूमि: की पारम्परिक समझ के इतर कुछ नये आयाम उदभाषित हो रहे हैं वैज्ञानिक-विश्लेषणपरक जानकारी के साथ, जिसने आगामी अस्तित्वजनित संकट का आभास देकर भूमि-पुत्र की चिंता [1,2] को बढ़ा दिया है। अलग-अलग तरीकों से गाया सिद्धांत पर लोगों ने अपने विचार दिये हैं जिनकी मूल भावना लगभग समान है जो इस प्रकार [2] है:
धरती के सभी जीव एवं उनका पूरा परिवेश अंतरंग रूप में जुड़े हैं और यह पूरा निकाय (धरती, उसके जीव व वायुमंडल ) एक स्व-नियोजी रूप में काम करता है जो जीवन के लिये नितांत आवश्यक है।

धरती और उसको घेरे उसका वायुमंडल – यानि जैव-मंडल, सामान्य अर्थों में जीवित हो या न हो विशेष अर्थों में जीवित ही है क्योंकि जीवित देह ही जीव को जन्म देने की क्षमता रख सकती है। लम्बी दास्तान है सूर्य से प्राप्त ऊर्जा की उपस्थिति में किस तरह कार्बन, हाइड्रोजन, आक्सीजन व नाइट्रोजन परमाणुओं से अनेक प्रकार के अणुओं का निर्माण संभव हुआ जिसके बाद के चरणों में प्रोटीन एवं अमीनो एसिड अस्तित्व में आये; फिर किसी चरण में कोशिका अस्तित्व में आई जिसमें अपनी प्रतिकृति बनाने की क्षमता भी विकसित हो गई। यह जीवन का प्रारम्भ था। यह सब गाया का ही कमाल था वरना जीवन जैसी इकाई का पहली बार जीवन विहीन स्थान पर अस्तित्ववान होने की संभावना बहुत ही कम होनी चाहिये। भूमि एवं उसका जैव-मंडल यानि गाया – कुछ लोग उसे जीवित न मानते भी यह तो मानेंगे कि वह जीवनदात्री है और जो जीवन देती है वह माता नहीं तो और क्या है?

माता भूमि:
माता है धरती और हम उसकी संतानें हैं; यह बात हर देश-काल में सही थी, है और रहेगी। यह माना जाता है कि पूत कपूत हो सकता है पर माता कुमाता नहीं होती। आज की तारीख में बस इतना और समझ लेना है कि पूत कपूत हो सकता है कहने के बजाय यह कहना अधिक सही होगा कि वह कपूत हो चुका है खुल्लम-खुल्ला। अगर कल-परसों वह सुधर भी जाता है तो इस वजह से नहीं कि माता के प्रति कर्तव्यनिष्ठा जाग उठी होगी अपितु इसलिये कि खुद उसकी जान पर बन आई होगी। यह बात हमारे सामने चरितार्थ होती नजर आ रही है। 

आज पर्यावरण के प्रति इतना दुलार केवल इसीलिये है कि इंसान को अपने अस्तित्व के संकट का अहसास होने लगा है।

हम मानव की सांस्कृतिक-विकास-यात्रा के जिस मोड़ पर खड़े हैं स्तब्ध हैं एक ओर मानव की सृजन-क्षमता पर, तो दूसरी ओर उसकी संहारक शक्ति एवं लोलुप प्रवृत्ति पर। इन क्षमताओं के कितने आयाम हैं जो चर्चित हैं और कितने ही आयाम हैं जो अभी समझे नहीं गये हैं। शायद कम लोग जान रहे हैं कि हमारा गंतव्य क्या है और वहाँ तक पहुँचने के प्रयास में हमारा मंतव्य क्या होगा? दोनों ही मामले उलझे हुए हैं क्योंकि अधिकतर लोगों को दोनों में से किसी का अता-पता नहीं और जिन थोड़े लोगों को है उनकी कोई सुनने वाला नहीं, ऐसा सुनने वाला जो कुछ कर सकने की क्षमता रखता हो।

आज का आधुनिक मानव करीब तीन लाख वर्षों से विद्यमान था इस धरती पर, लेकिन उसे नहीं मालूम उसके पास कुदरत का दिया करिश्मा था। यह समय लगभग वही था जहाँ से आधुनिक मानव यानि होमो सेपियन (homo sapiens) का आरम्भ माना जाता है। धीरे-धीरे ही सही उसने मस्तिष्क का प्रयोग करना शुरू किया और भाषा की सहायता से संप्रेषण शुरू हुआ। प्रारम्भिक स्तर पर भाषा-ज्ञान का आरम्भ करीब डेढ़ लाख साल पहले से माना जा सकता है जिसमें कुछ परिपक्वता आना आरम्भ होती है करीब पचास हजार साल पहले। अब सांकेतिक संप्रेषण की जगह भाषायी संप्रेषण संभव होने लगा। आधुनिक मानव की कथा अफ्रीका में इथियोपिया के अवाश नामक क्षेत्र से आरम्भ मानी जाती है जहाँ से करीब 70 हजार साल पहले बड़े पैमाने पर मानव का स्थान‍ांतरण उत्तर अफ्रीका एवं एशिया की ओर होना आरम्भ हुआ। भाषा का विकास वैचारिक क्षमता के विकास का कारण बना जो करीब दस हजार साल पहले तक परिपक्व एवं प्रभावी होने लगा था कुछ सभ्यताओं में। वैचारिक विकास के साथ ही तेजी आना शुरू हुई उसके काम-काज में, तौर-तरीकों में; भाषा के विकास का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि सोच-विचार की प्रक्रिया शुरू हुई और जीवन से जुड़ी समस्याओं के निदान मिलने शुरू होने लगे। कृषि-क्रांति इस सोच-विचार का पहला बड़ा निष्कर्ष था। इसके साथ ही यायावरी जीवन से मुक्ति मिली और स्थायी निवास की शुरुआत हो गई। स्थायी निवास का सबसे बड़ा लाभ था सोचने-समझने के लिये अधिक समय मिला और विकास कार्यों में भी तेजी आने लगी।

उत्कर्ष की ओर
चार अरब पुरानी धरती पर कई हजार साल पहले जो विकास-कथा आकार लेने लगी थी उसका भविष्यपथ उस समय अनिश्चित था लेकिन मात्र कुछ ही समयान्तराल में वह हो गया जो अरब वर्षों में नहीं हुआ। चिंपांजी का ही करीबी मानव-जीव अब तेजी से अपने पैर पसार रहा था उसको कुदरत ने वह दे दिया था अजाने में ही, या यह कहें उसे मस्तिष्क के रूप में एक सुपरकम्प्यूटर पकड़ा दिया। वह शायद इसका अधिकारी नहीं था। यह एक बच्चे के हाथों में एटम बम देने जैसा था जिसको ठीक से पता नहीं कि उसका करना क्या है? वह उस डाल को काटना शुरू कर रहा था जिसपर स्वयं बैठा था।

स्व-नियोजी प्रणाली
यह जानना जरूरी है कि गाया यानि धरती एवं वायुमंडल सहित पूरा जैव-मंडल अपने संतुलन को कैसे बनाये हुए है पिछले लगभग तीन अरब सालों से। अब ऐसा क्या हो गया जिसने हमारी चिंता बढ़ा दी। यह गाया एक स्व-नियोजी निकाय है वैसे ही जैसे हमारा शरीर स्व-नियोजी निकाय है यानि अगर शरीर का ताप बढ़ता है तो शरीर में ऐसा प्रावधान है कि उसे वापस सामान्य स्थिति में स्वत: ले आया जाय। अगर तेज चलने की वजह से हृदय की धड़कन बढ़ जाती है तो धीरे-धीरे हृदय वापस सामान्य स्थिति में आ जाता है। यही बात रक्त चाप के लिये भी है। कुछ इसी तरह वायुमंडल में कुछ समय के लिये ताप, दाब, आर्द्रता, वायु में आक्सीजन प्रतिशत आदि गुणों में परिवर्तन हो जाय तब उसे फिर वापस लाने की संपूर्ण व्यवस्था लगभग 3 अरब वर्षों से मौजूद रही थी और आज भी है। धरती पर वायु में आक्सीजन का प्रतिशत 21 के करीब होना कैसे निश्चित हुआ और किसने किया यह हम नहीं कह सकते पर यह प्रतिशत जीवन के लिये बहुत उपयुक्त है और कम या ज्यादा होने पर स्व-नियोजन के तहत फिर इसी मान पर आ जाता है। धरती के अधिकतर भागों का औसत ताप 10 एवं 30 सेलसियस के पास लगातार बना रहा यह अनुमान [2] लगाया गया है। गाया सिद्धांत के अनुसार यह स्थिरता जीवन की उपस्थिति की वजह से ही हो सकती है। जीवन की अनुपस्थिति में धरती जैसे ग्रह का ताप बहुत अधिक बदलना निश्चित है जो ऊपरी स्तर पर 70-80 सेल्सियस और निचले स्तर पर –50 तक बदल सकता है। यह संतुलन व्यवस्था ही स्व-नियोजन (self regulation) कहलाती है। जो व्यवस्था अरब वर्षों से लगातार बनी रही वह पिछली तीन सदियों में स्व-नियोजन खो देने के करीब पहुँच रही है। यही आज की हमारी चिंता का मुख्य विषय है। यह बात कुछ समय से कही जा रही थी पर धीरे-धीरे वैज्ञानिक परीक्षणों से भी यह बात सामने आने लगी है कि अरबों सालों से विद्यमान गाया की स्व-नियोजन प्रणाली गड़बड़ा रही है। यह संकेत और चेतावनी है कि होश में आने और कुछ ठोस कार्यवाही करने का समय आ चुका है। स्व-नियंत्रण एवं स्व-नियोजन की इस बात को थोड़ा और विस्तार से समझना जरूरी होगा।

सायबरनेटिक्स एवं स्व-नियोजन
विज्ञान की वह शाखा जिसमें किसी निकाय में नियंत्रण व स्व-नियोजन का अध्ययन किया जाता है सायबरनेटिक्स कहलाती है यह बात मशीनों एवं जीवित निकायों में हो सकती है। जीवित या प्राकृतिक निकायों (जैसे जैव-मंडल) में यह प्रावधान स्वत: निर्मित होता रहा है जबकि मशीनों (जैसे फ्रिज या ओवन) में यह मानव-निर्मित है। इन मशीनों में ताप का नियंत्रण आम बात है और एयर कंडीशनर में आर्द्रता नियंत्रण का भी प्रावधान है।

जीवित निकाय में स्व-नियोजन का एक सरल व सटीक उदाहरण है साइकिल चलाने का; साइकिल को दो पहियों पर सीधे खड़ा नहीं किया जा सकता अगर स्थिर अवस्था हो; लेकिन गति की अवस्था में यह संभव है पर एकदम आसान भी नहीं। हमारे मस्तिष्क में सेन्सरी एवं मोटर कोशिकाऐं इस प्रक्रिया मे अपनी भूमिका निभाती हैं। हैंडल पर रखे हमारे हाथ सेन्सरी कोशिकाओं व मोटर कोशिकाओं के साथ निरंतर संपर्क में रहते हैं और आवश्यक संतुलन बना रहता है। आरम्भ में हमें काफी प्रयास करना होता है पर धीरे-धीरे यह हमारे अवचेतन मन की कार्यवाही में शामिल हो जाता है और हमें पता भी नहीं लगता। कुछ यही बात दो पैरों पर खड़े होकर चलने में [2] भी प्रतिबिम्बित होती है। अधिकतर जंतुओं की तरह चार पैरों पर संतुलन व नियोजन आसान है लेकिन दो पैरों पर यह काम उतना असान नही़; फिर भी इंसान बखूबी यह काम कर लेता है और सारी प्रक्रिया में मोटर कोशिकाएँ वही भूमिका निभाती है जो साइकिल चलाने में। अगर यह स्व-नियोजन व्यवस्था गड़बड़ा जाय तब हम दो पैरों पर चलने में या साइकिल चलाने में दिक्कत महसूस करेंगे।

यही स्व-नियोजी स्वभाव सभी जीवों में परिलक्षित होता है और गाया में भी है जिसके कारण ही धरती पर जीवन का उदभव एवं विकास संभव हो सका। जब कभी ताप, दाब या आक्सीजन प्रतिशत में साम्य अवस्था से कुछ विचलन होता है स्व-नियोजी प्रणाली के तहत वह मान पुन: साम्यावस्था में आ जाता है। पर इस नियोजन-क्षमता की भी कोई सीमा है और सामान्य अवस्था से बहुत अधिक विचलन होने पर नियोजन कारगर नहीं हो सकता। ऐसे संकेत मिलने लगे हैं कि गाया के संदर्भ में वह सीमा बहुत दूर नहीं [2,3]।

कुछ ही समय पहले प्रकाशित एक पुस्तक [4] ‘तृतीय चिंपांजी का उत्कर्ष एवं पतन’ काफी चर्चित हुई है जिसमें इस बात का विशद वर्णन है कि किस तरह मानव के कार्यों से अरबों सालों से स्व-नियोजन बनाकर रखने वाली ‘गाया’ अपना संतुलन खो देने के कगार पर पहुँच रही है। यदि कुछ ठोस काम इस दिशा में नहीं हुआ तब वह आवश्यक संतुलन बिगड़ना ही है जो धरती पर जीवन के लिये खतरा होगा। और यह भी तय है कि उस असंतुलन से सबसे पहले प्रभावित होने वाला जीव इंसान ही होगा। जहाँ तक इंसान के प्रभावित होने की बात है उसकी कुछ शुरुआत तो हो ही चुकी है जिसमें वैश्विक ताप वृद्धि के कारण मौसम में बदलाव एवं सागर के जल-स्तर बढ़ जाने से निचले क्षेत्रों का जलमग्न हो जाना आरम्भ हो गया है और अगले कुछ दशकों में मौसम के बड़े बदलाव करोड़ों लोगों को विस्थापित होने पर मजबूर कर देंगे। इसका एक उदाहरण लेते हैं जो हालात की गंभीरता को बयाँ करता है।

आर्कटिक महासागर
उत्तरी ध्रुव को घेरे आर्कटिक महासागर का अधिकांश भाग सदैव बर्फ से ढँका रहता था पर पिछले कई दशकों से यह बर्फ पिघल रही है। सन 2007 में उपग्रह से प्राप्त चित्रों से यह जानकारी प्राप्त हुई कि पहले की तुलना में तीस लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बर्फ रहित हो गया है और इसमें वृद्धि जारी है। यह क्षेत्र लगभग भारत के छेत्रफल के बराबर है। सन 2020 तक यह बर्फ रहित क्षेत्र बढ़कर 37 लाख वर्ग कि मी हो चुका था।

इसके दुष्परिणाम क्या होंगे इस पर विचार करें। एक बड़े क्षेत्र में बर्फ होने से उस क्षेत्र पर पड़ने वाली लगभग 80 प्रतिशत सूर्य किरणें परावर्तित हो जाती हैं ; जो 20 प्रतिशत अवशोषित होती हैं वह भी ताप वृद्धि अधिक नहीं कर सकती। यह इसलिये कि पानी का ताप 1 डिग्री बढ़ाने में जितनी ऊर्जा लगती है उसकी 80 गुना ऊर्जा खर्च होती है बर्फ को पिघलाकर पानी बनाने में। जैसा पहले जिक्र किया गया एक क्षेत्र जो हिमविहीन हो चुका है अब सूर्य किरणों का अधिकांश भाग अवशोषित करेगा और पानी का ताप बढ़ेगा अपेक्षाकृत तेजी से। कुछ यही हालात दक्षिणी ध्रुवीय प्रदेशों और अंटार्कटिक महाद्वीप में भी दिखाई देने लगे हैं जहाँ पूरा क्षेत्र बर्फ की मोटी चादर से घिरा रहता था। पिछले कई दशकों से यह बर्फ तेजी से पिघल चुकी है। मौसम में ऐसे बदलाव गंभीर रूप ले सकते हैं। कई विचारकों का मानना है कि मौसम के विराट परिवर्तन बड़ी संख्या में लोगों को अपना स्थान छोड़कर दूसरे स्थानों पर बसने के लिये मजबूर करेंगे। जो आँकड़े उपलब्ध हैं उनसे मिली जानकारी के आधार पर पिछली दो सदियों में विश्व का औसत ताप लगभग 6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। अगली दो सदियों में औसत ताप यदि उसी दर से बढ़ता रहे तब सन 1800 की तुलना में सन 2200 तक औसत ताप वृद्धि 10 से 12 डिग्री हो जायगी। उष्ण प्रदेशों में अधिकतम ताप 45-50 सेल्सियस तक पहुँचता रहा है जो 60 सेल्सियस के निकट जा सकता है। सागर के निकटवर्ती तटीय क्षेत्रों का जलमग्न होना और औसत ताप 10-12 डिग्री बढ़ना बड़े पैमाने पर आबादी का स्थानांतरण करने पर मजबूर कर सकता है।

कुछ लोगों का मत है कि इंसान विचारशील प्राणी है और अपनी सारी कमियों के बावजूद उसमें वह क्षमता है कि वह कोई रास्ता खोज लेगा जिसमें विकास और गाया के साथ तारतम्य बैठाना संभव हो सकेगा।

यदि ऐसा होना संभव है तब राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर काम करना होगा। यह कहना मुश्किल है कि इस कार्य के लिये भविष्यपथ क्या होगा पर उसकी रूपरेखा के प्रारूप तो बनाने ही होंगे। इस तरह के संकेत मिलते रहे हैं और मिलते रहेंगे जिनमें से कुछ की चर्चा पहले भी हुई है। कई विचारकों ने पर्यावरण की हमारी समझ [1,5,6,7] को अघिक गहराई देने का प्रयास किया जिनमें आर्ने नेस, वारविक फाँक्स, महात्मा गांधी सहित कई अन्य का भी योगदान रहा है।

विकास में प्रौद्योगिकी
विकास यात्रा के जिस मोड़ पर हम खड़े हैं वह जिस प्रौद्योगिकी की दरकार रखता है उसमें पर्यावरण की क्षति होनी ही है। अगर दस हजार साल पहले की हालत में लौटना चाहें यह भी संभव नहीं, तब फिर क्या हो?
ऐसे में बीच का रास्ता तलाशना होगा तथाकथित मध्यम मार्ग की धारणा, जिसकी बात बुद्ध के उपदेशों में होती रही है। वैसे भी ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ की धारणा हमारे वैचारिक धरातल को परिपक्वता प्रदान करती रही थी। इस संदर्भ में यह कहना होगा कि यह मध्यम मार्ग कोई एक निश्चित मार्ग नहीं है देश, काल व जरूरतों के अनुसार आवश्यक निर्णय लिये जा सकते हैं।

जनसंख्या विस्फोट
2019 में मानव की अनुमानित आबादी लगभग 7.7 अरब है और उसमें वृद्धि जारी है। दो सौ साल पहले आबादी लगभग एक अरब थी। धरती का क्षेत्रफल वही है जो पहले था जबकि वनों, जल-संसाधनों में लगातार कमी होती जाती है। इतनी बड़ी आबादी की लगातार बढ़ती जरूरतें पूरी कर सकना इस धरती के लिये संभव ही नहीं [4]। आज की तारीख में हम नहीं जानते कि आबादी में यह वृद्धि कहाँ जाकर रुकेगी? अनुमानित 12 अरब पर जाकर अगर यह वृद्धि रुक भी जाती है तब भी यह निश्चित है कि इतनी बड़ी आबादी के लिये धरती के संसाधन पर्याप्त नहीं। साथ ही इतनी बढ़ी आबादी की जरूरतें पूरी करने के प्रयासों से गाया की स्व-नियोजी प्रणाली बुरी तरह प्रभावित हो जाएगी।

गाया-संकट और गांधी
महात्मा गांघी के विचारों एवं कार्यों की सराहना बहुत होती रही है उन लोगों द्वारा भी जो उनसे सहमत नहीं थे। जो सिद्धांत रूप में सहमत थे या हैं उनमें से भी अपवाद छोड़ अधिकतर क्रियान्वयन के स्तर पर उनसे सहमत नहीं थे। और जो पूरी ईमानदारी से उनपर आस्था रखते हैं उनके लिये भी शायद उन्हें ठीक से समझ पाना आसान भी नहीं। ऐसा इसलिये कि सारा मामला उलझा हुआ है क्रियान्वयन के स्तर पर।

इस स्तर पर कई पहलू सामने आ जाते हैं राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक। इन पर चर्चा किये बिना बात आगे बढ़ाना आसान नहीं। सबसे अहम बात तो यह है कि जिस जीवन शैली के हम आदी हो चुके हैं उसमें बहुत कुछ बदलना काफी कठिन होगा। सच तो यह है कि विकास की अवधारणा में एवं जीवन शैली में आवश्यक परिवर्तन करे बिना कुछ ठोस कदम उठाना मुश्किल होगा। हमारी अर्थव्यवस्था की मूलभूत अवधारणाओं पर भी पुनर्विचार करना होगा। यह सब करना होगा उन हालात में जहाँ दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने से अधिक सोच भी नहीं सकती। ऐसा करना असंभव न भी हो असाध्य तो होगा ही। पर यह तो दूर की बात लगती है अभी तो जमीनी स्तर पर कोईं कार्यवाही सोची भी नहीं जा रही।

शायद आपसी मतभेद भुलाकर कोईं ठोस कदम उठाने की बात तभी उठेगी जब पानी खतरे के स्तर से ऊपर आ जाएगा। दो सूरतें नजर आती हैं: [क] तब शायद बहुत देर हो चुकी हो और गाया अपना संतुलन खो बैठे। 
धरती पर जीवन किसी न किसी रूप में मौजूद रहेगा पर मानव सहित बड़ी प्रजातियाँ विलुप्त होने लगेंगी।
[ख] सभी देश इन संकट के हालात में आपसी मतभेद भुलाकर कोई ठोस कदम उठाने के लिये राजी हो जाऐं जिनमें विकास, औद्योगीकरण व अर्थव्यवस्था जैसे मसलों पर विकल्प खोजे जा सकें। सौभाग्य से अगर ऐसा होता है तब आर्ने नैस, महात्मा गांधी जैसे विचारकों की भूमिका निर्विवाद महत्वपूर्ण होगी।

गांधी सामान्य अर्थों में पर्यावरणविद नहीं थे और देश में उस उथल-पथल के दौर में यह उनकी प्राथमिकता थी भी नहीं। इसके बावजूद उनके लेखन व जीवन-यापन में उनकी पर्यावरण संबंधी समझ व प्रतिबद्धता साफ झलकती रही। आज से लगभग सौ साल पहले का उनका कथन कि ‘आधुनिक शहरी औद्योगिक सभ्यता में उसके विनाश के बीज निहित हैं’ एक द्रष्टा की पैनी नजर को इंगित करते हैं और आज गाया पर छाये संकट को भी। जिस जीवन को वे आदर्श मानते रहे और अपने जीवन में भी लागू करते रहे उसमें और उनके अहिंसा संबंधी विचारों में पर्यावरण सहज रूप में विद्यमान रहा है। राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गाया संकट से उबरने का जो भी विकल्प खोजा जाय गांधी के विचारों को लेकर चलना हमारा मार्ग प्रशस्त कर सकेगा ऐसा मुझे विश्वास है। इस संबंध में विस्तृत चर्चा अगले लेख में।

संदर्भ
[1] चन्द्रमोहन भंडारी, पर्या-दर्शन: पर्यावरणीय समस्या पर एक गहन-चितन, सेतु, नवम्बर 2020.
[2] James Lovelock, Gaia, Oxford University Press, 1979.
[3] James* Lovelock, The Vanishing Face of Gaia, Penguin Books, 2010.
[4] Jared Diamond, The Rise and Fall of the Third Chimpanzee, Vintage Publications, 2002.
[5] Arne Naess,”The shallow and the deep, Long-range ecology movement”, Inquiry 16:95-100 (1973).
[6] Warwick Fox,”Transpersonal Ecology”, ’pychologising’ ecophilosophy, Journal of Transpersonal psychology, 22(1), 59 (1990).
[7] महात्मा गांधी , द हिंद स्वराज, प्रकाशन 1909 ( original in Gujarati) published in Gujarati Columns of Indian Opinion, December 1909; English translation published by International Printing Press, Natal, South Africa, 1910. 

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