कुछ सम कुछ विषम’ - ऐसी कविताओं की जरूरत वर्तमान को है!

समीक्षक: मुकेश कुमार सिन्हा

द्वारा सिन्हा शशि भवन, कोयली पोखर, गया-823001; चलभाष -9304632536
कृति: कुछ सम कुछ विषम
कृतिकार: धर्मपाल महेन्द्र जैन
प्रकाशकः आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल।
पृष्ठः 152 मूल्यः ₹ 200.00 संस्करण 2021

सात समंदर पार रहकर भी हिन्दी ‘माय’ की सेवा में समर्पित रहने वाले प्रवासी कलमकार धर्मपाल महेन्द्र जैन की काव्य पुस्तक आयी है- ‘कुछ सम कुछ विषम’। इसमें 91 कविताएँ हैं, जो अलग-अलग मिजाज की हैं, लेकिन हर कविता पाठकों को उद्वेलित करने की क्षमतावान है। धर्मपाल महेन्द्र जैन की कलम राह दिखाती है, ताकि भविष्य को ‘सुयोग्य’ बनाया जा सके। पीड़ा को अभिव्यक्त करती है, ताकि स्वर को ‘गति’ मिल सके। कलम वर्तमान को आगाह करती है, तो भविष्य के लिए फिक्रमंद है। ‘कुछ सम कुछ विषम’ से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है कि कविताएँ आपसे बतिया रही है, कुछ कहना चाह रही है।

मुकेश कुमार सिन्हा

यह किताब समर्पित है आराध्य महावीर को, जिन्होंने जग को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। हम आपस में झगडे़ क्यों करें? आखिर कटुता का भाव क्यों पनपने दें? कवि ने सच कहा कि यहाँ आदमी होने का कोई इतिहास नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र हैं, मगर आदमी नहीं। भीड़ में कवि को आदमी की तलाश है! पता नहीं आदमी की तलाश का अंत कब होगा? कब यह बात फिर से गूँजित होगी कि नहीं...नहीं...मैं आदमी हूँ, आदमीयता पहचान है मेरी?

उन्होंने बताया मैं हिन्दू क्यों हूँ
उन्होंने बताया मैं मुस्लिम क्यों हूँ
उन्होंने बताया मैं सिख, ईसाई, बुद्ध या जैन क्यों हूँ
वो नहीं बता सके कि मैं आदमी क्यों हूँ।

आदमी ‘स्वार्थी’ हो गया है। शहर खड़े कर रहा है जंगल को काटकर। स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी अब नसीब कहाँ है? पक्षी खामोश है, झाड़ियों में नन्हा खरगोश दुबका पड़ा है? हद है! आदमी जीवित बम बन गया है आज-कल।

धर्मपाल महेंद्र जैन
आकाश, चाँद, सूरज, पृथ्वी, नदी, पर्वत
और वे सभी
जिन्होंने मनुष्य को ऋचाएँ लिखते हुए देखा था
डर रहे थे कि प्रकृति का स्वर झर रहा है
आत्महंता आदमी के साथ।

आगे-

धरती के गर्भ में
उसी तेवर के साथ
फिर आदमी बनने लगा
डायनासोर की जगह भरने।

धर्मपाल की लेखनी सोचने को बाध्य कर रही है, उनकी सोच की गहराइयों के क्या कहने? सच में आज आदमी पेट से लाचार है। इसी पेट ने समस्याएँ खड़ी की हैं। पेट न होता, तो कितना अच्छा होता? परेशानियों से मुक्ति मिलती! यदि समाज में विकृतियाँ बढ़ रही हैं, तो पेट सबसे बड़ा कारण है। ‘हाकिम’ भी जानते हैं कि पेट की आड़ में स्वार्थ सिद्ध हो सकता है, इसलिए वह पेट की आग को कभी ठंडा होने ही नहीं देते। 
मत पूछिए, यह पेट बहुत बड़ी साजिश है
दुनिया के मजदूर
कभी एक नहीं हुए इसके खिलाफ।

योजनाएँ बनती हैं, ताकि देश की सेहत सुधर सके। मगर, देश की सेहत कहाँ सुधर पायी है? जिनके लिए योजनाएँ बनती हैं, उन्हें कहाँ मुकम्मल लाभ मिल पाता है। यदि ऐसा होता, तो क्या देश में गरीबी, बदहाली, लाचारी जैसे शब्द होते? आज भी दुखना दुखी है और गरीबनी गरीब। योजनाएँ बनीं, मगर मुट्ठी भर लोगों को इसका लाभ पहुँच पाया है। योजना और लाभुक के बीच की खाई को ईमानदारी से पाट दिया जाये, तो क्या जरूरत थी कवि को आदिवासी होस्टल के बच्चों के दर्द को उघारना। यह तो बस बानगी है। सवाल है कि हाकिम को बताये कौन? कौन साफगोई से बातों को कहे, आईना दिखाये? कवि ने कहा- इतना आसान नहीं है आईना बनना।
 
हम खामोश हो गये हैं। कहाँ विरोध कर पाते हैं अब अन्याय के खिलाफ? वो आँखों के सामने ‘मनमर्जी’ करने पर उतारू है और हम तटस्थ हैं। हमारी आँखें शांत हैं। कलमकार दरबारी बन गया है। वैसे कलम की कभी चाहत नहीं रही है दरबारी गीत गाना, मगर शासकीय खौफ ने कलम को जी-हुजूरी करने को मजबूर किया है। कवि को दर्द है-
मुट्ठी ताने हाथ
जय-जयकारा के लिए
उठने लगते हैं।
हालाँकि कवि आश्वस्त है-
तलवार पर भारी पड़ती है
कलम की धार।

भले पुत्र थक जाये, मगर माँ कभी थकती नहीं है। रात भर अपनी निंदिया बेचने वाली माँ सुबह पहर उसी उत्साह से कामों में लग जाती हैं। हँसती है, खिलखिलाती है। माँ को कभी थकते नहीं देखा? झल्लाते नहीं देखा? माँ तो सुकूनदायिनी है। हर गमों को दूर भगाने वाली माँ ही होती है। कवि ने लिखा कि थक जाता हूँ काम करते-करते, मगर गोद नहीं तलाशता, बच्चों के सवालों में ही उलझ जाता हूँ। हालाँकि वे पूछते हैं-
माँ तुम कैसे हँस लेती थीं
दिन भर के काम के बाद।
बहुत दिन हो गए मुझे खुल कर हँसे
इसके सिवा सब ठीक है तुम्हारे बिना।

वो तुलसी चौरा कहाँ है? संझा-बाती दिखाने की परंपरा? कहाँ मिलते हैं अब सुबह पहर गऊ माता को रोटी खिलाने वाले हाथ? हम भाग रहे हैं बहुत तेजी से, मानो समय को पीछे छोड़ दें। आधुनिकता के कारण परंपराएँ मर-सी गयी हैं। हम आधुनिकता के रथ पर सवार होकर भाग रहे हैं? पीछे देख नहीं रहे हैं उदास चूल्हे को, बूढ़े पीपल को, चहचहाते पक्षी को, आकाश से बतियाते पर्वत को, बालियों से लहराते खेत को। माँ को याद कर कवि ने वर्तमान पीढ़ी को कोसा है। कवि की इस पंक्ति से शायद परंपराओं से दूर होते पाँव संभल जाये।

माँ नहीं है अब
पीपल नहीं है अब
तुलसी नहीं है अब
पुरखों की यादें नहीं है अब
परंपरा की बातें नहीं है अब
अब भगवान भी नहीं आ बैठते
कभी चबूतरे पर।

आत्मा चली जाए तो शेष क्या बचता है! 

कविता क्या है? कविता कैसी होनी चाहिए? कवि ने बहुत सुंदर वर्णन किया है। कविता भावों की अभिव्यक्ति है। भाषा सरल हो, सहज हो, ताकि कविता अंतिम जन तक अपनी पैठ बना ले। कवि ने लिखा कि कविता गिनती की तरह सरल होनी चहिए। यदि कोई एक अंक बोले, तो अगला स्वतः अपने क्रम में आ जाये। एक-एक को जोड़कर कविता अनंत तक पहुँच जाये। संख्या चाहे सम हो या विषम। शायद कवि ने इसी वजह से इस पुस्तक का शीर्षक रखा है- कुछ सम कुछ विषम। आज कविता को बंद कमरों से निकालने की जरूरत है, ताकि कविता शंखनाद करे।

गिनती की तरह अपने अंकों से
शून्य को अर्थ देती हो कविता
कि वह सबसे आगे खड़ी हो जाए
जब शून्य करार दिए जा रहे हों लोग। 

पहली बारिश, दोपहर, प्यार, पूर्व, सापेक्षिता और नजदीकियाँ छोटी कविताएँ हैं, लेकिन अर्थ व्यापक हैं। यही कविता की सार्थकता भी है।
चट्टानों को बाँहों में भर
बेतहाशा चूमती है नदी
इस उम्मीद में कि एक दिन
आकार देगी पत्थर को
अपने मिजाज से। 

संग्रह में गाँव छोड़ने का गम है। वसंत की चर्चा है। मानव के रोबेट होने की कहानी है। भारत की बेबसी है। निश्छल प्रेम है। जीवनदायिनी गंगा की धार से बहते आँसू हैं। ट्रांसजेंडर का दर्द है। भाषा की बदलती हुई कहानी है। शरणार्थी की दास्तां है। रंग की अभिलाषा है। गऊ माता की पीड़ा है। आम आदमी के दर्द हैं। सरकार के तेवर से डर का एहसास है। समाज का सूरत-ए-हाल है। गरीब बस्तियों की वेदना है। प्रेमिल मन की ख्वाहिश है। घर लौटते हुए मन की यादें हैं। स्काय डाइव का डर है। बिटिया की खिलखिलाहट है। माँ की पोटली है। उछलते-गाते शब्द हैं। पेड़ का दर्द है। अश्वेत किशोर की पीड़ा है। पत्रकारिता का गिरता स्तर है। संग्रह में प्रेम है, दर्शन है, आशाएँ हैं और उम्मीदें भी। कविताओं में उम्दा प्रतीकों का समावेश किया गया है। नायग्रा जलप्रपात, अटलांटिक महासागर, भरतनाट्यम, ठुमरी, खुसपुस, रैम्प वॉक, गाँधारी, ब्लैक होल, कोशिका, इंजेक्शन, मिसाइल, पेशेन्ट, सीलिंग फैन, गीगा बाइट जैसे शब्द कविताओं में हैं। मसलन, कवि को अंग्रेजी शब्द से कोई एतराज नहीं है। कविताओं को जो शब्द चाहिए, वो शब्द हैं। लीलाधर मंडलोई ने लिखा- ‘धर्मपाल महेन्द्र जैन की अगली कविताओं की प्रतीक्षा मुझे और पाठकों को रहेगी।’ निश्चित, सुंदर और सरल भाषा में रची गयी ऐसी कविताओं की जरूरत वर्तमान को है!

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