व्यंग्य: हमारे पास पोपट जो है

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

मतगणना जब होगी तब होगी। नहीं होगी तो भी भ्रांतिलाल जीत जाएँगे। उन्होंने जी भर कर भ्रांतियाँ फैलाईं। बंपर वोटिंग हुई। अपने लोगों को बिस्तर से उठा-उठा कर पोलिंग बूथ तक धकेला गया। जो धरती पर नहीं थे पर वोटर लिस्ट में विराजमान थे, उन्हें साक्ष्यों सहित अवतरित कराया गया। लोकतंत्र में चुनाव हो और हिंसा न हो तो प्रक्रिया संदिग्ध हो जाती है। इसलिए हिंसा को खूब प्रतिष्ठा मिली। पुलिस रिकॉर्ड में कोई नहीं मरा। आज चुनावी दफ्तर में जीत का माहौल है। भ्रांतिलाल उसी उन्माद में हैं। शैम्पेन की महक जिन्होंने कभी नहीं सूंघी वे आज ‘नीट’ गटक रहे हैं।

पत्रकार - मैं स्वतंत्र चैनल ‘अभी तक’ से। यहाँ माहौल देखकर लग रहा है आप जीत गए हैं। आप किन मुद्दों पर चुनाव लड़े थे?

भ्रांतिलाल - आप हटिए, आप हमारे चैनलों के नहीं लगते। हमारे चैनल वाले हमारी तारीफ में अपनी तरफ से मुद्दे जोड़ देते हैं। हम तो सिर्फ जीत के मुद्दे पर लड़े थे।

पत्रकार - सर मुद्दों से मेरा मतलब, महँगाई, बेरोजगारी, शिक्षा…

भ्रांतिलाल – हमारे ये मुद्दे कतई नहीं हैं। हम महँगी चीजें खरीदते ही नहीं, वे उपहार में आ जाती हैं। हमारे पास सरकारी कार है, सरकारी पेट्रोल पर चलती है तो महँगाई कहाँ! फिर हम सत्ता में हैं, बेरोजगार कैसे हुए? और बार-बार हमारी शिक्षा की बात क्यों? हमने इंग्लैंड से पत्राचार पाठ्यक्रम आधा किया है।

पत्रकार - सर हम आपकी नहीं, जनता की बात कर रहे हैं।

भ्रांतिलाल - कौन सी जनता? हमने जनता को टुकड़े-टुकड़े गैंगों में बाँट दिया। इन गैंगों के नाम हैं- किसान, मजदूर, कर्मचारी, छात्र, विपक्षी। उनकी समस्याएँ हैं तो वे लोग आंदोलन करें। समस्याएँ शाश्वत होंगी तो आंदोलन असमाप्त रहेंगे। फिर भी, हम आश्वासन दिए हैं कि शपथ विधि के बाद की पहली मीटिंग में हम कुछ घोषणाएँ करेंगे ही।

पत्रकार – आप फूट डालते हैं, फिर फोड़ डालते हैं और राज करते हैं।

भ्रांतिलाल – किसी को नहीं फोड़ा जी। हमने ध्रुवीकरण किया है। पहले दुबे-द्विवेदी, तिवारी-त्रिवेदी, चौबे-चतुर्वेदी हुआ करते थे। हमने उनका एक गठ्ठर बना दिया, सब ब्राह्मण। हमने जात-पाँत की भावना हटा दी। हमने इन टुकड़ों को आधुनिक नाम दिए- सवर्ण, पिछड़े, दलित आदि।

पत्रकार – जाटों और यादवों का क्या हुआ!

भ्रांतिलाल – कैसे पत्रकार हैं आप? राजनीति का बेसिक नहीं जानते। ब्राह्मण मुख्यमंत्री तो ठाकुर गृहमंत्री, बनिया वित्त मंत्री तो आदिवासी कृषि मंत्री। सूचित, अनुसूचित और पूजित, प्रजातंत्र में सब समान। गोरे, गेहुँआ, साँवले, काले, सबके वोटों का रंग एक। हमारे लिए पश्चिमी, दक्षिणी, मुगलिया सब संस्कृतियाँ सनातन। कोई शक?

पत्रकार – ये तो वोट कबाड़ने का गणित है। पर वोटर विकास और सुशासन चाहते हैं।

भ्राँतिलाल – सुनिए, हमारे वोटर चाहते हैं कपड़े, दारु, रुपया। सबको बूथ स्तर पर रिझाने की व्यवस्था है। हम बूथ दर बूथ जीतेंगे और देश जीतेंगे।

पत्रकार - ठोस कुछ करते नहीं। बस प्रचार-प्रसार, शिलान्यास, भाषण-घोषणाएँ। असल काम कब होगा?

भ्रांतिलाल – हमारा काम कानून बनाना है। जिसका कहो उसका पक्का कानून बना देंगे। फिर लोकतंत्र की मर्यादा है। नौकरशाही में ढीले-ढाले लोग बैठे हैं, उनके रिटायर होने का इंतजार करिये। हम दूसरों की रोटी नहीं छीनते और न ही किसी को हमारे बाड़े में घुसने देते हैं।

पत्रकार - मान लीजिए जन विरोधी गलत नीतियों के कारण आप हार गए तो?

भ्राँतिलाल – कौन-सी गलत नीतियाँ? सब नीतियाँ सही हैं। विपक्षी नासमझ हैं, विरोध के लिए विरोध करते हैं। वे हर चीज गलत बताते हैं। हमने हाथ खड़े करके नीतियाँ बनाईं। वे तो बहिर्गमन कर भाग गए थे। अंदर रह कर बहस करते तो मालूम होता कि कानून पास होने पर कितनी जोर से टेबलें थपथपाई गई थीं।

पत्रकार – रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, इन मामलों में आपकी सरकार कुछ खास नहीं कर पाई। कैसे जीतेंगे आप?

भ्रांतिलाल – विपक्षियों ने सत्तर सालों तक कुछ खास नहीं किया तो भी वे जीतते रहे। दस-बीस साल हम कुछ खास नहीं कर पाए तो क्या बिगड़ जाएगा? अब कहीं जाकर हाईवे बने हैं। हमारी सरकार शपथ लेते ही हाईवे पर दौड़ने लग जाएगी, देखना।

पत्रकार – नेताजी, जनता जागरूक बन रही है। आप ऐसे ही चलते रहे तो सब चौपट हो जाएगा।

भ्रांतिलाल - जा, हट बे। हम जीतेंगे, कुछ चौपट नहीं होगा, हमारे पास पोपट जो है।

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