कविताएँ: स्वर्गीय नीति वर्मा

तिरंगा

आन बान और शान तिरंगा
जीवन का अभिमान तिरंगा
तीन रंगों में रचा बसा ये
हम सबकी है जान तिरंगा।

हरियाली ने दिया हरा रंग
खुशहाली बना केसरिया रंग
श्वेत शान्ति की पावन गंगा
मेरा ये अभिमान तिरंगा।

लहर-लहर लहराता जाये
लहरों से यह लड़ कर आये
फहर-फहर फहराता जाये
पहाड़ों पर यह चढ़ जाये
निकले सीना तान तिरंगा
जीवन का अभिमान तिरंगा।

सीमाओं पर फौज लड़े जब
तब चक्र सुदर्शन बन जाये
दुश्मन के हर एक वार का
करे सामना, बढ़ जाये
आगे आने वाला दुश्मन
देखे इसको थर्राये
मेरे देश की शान तिरंगा
जीवन का अभिमान तिरंगा
***


बाल दिवस - चाचा नेहरू

एक थे चाचा, एक थे बापू
थे तो वे इंसान
कद काठी में हम तुम जैसे
पर थे बड़े महान।

बापू चले थे सत्य राह पर
अहिंसा का पाठ पढ़ाते
चाचा भी थे उनके पीछे
जग में नाम कमाते

जब भारत में जीना था दूभर
हर इंसा था पग-पग बेघर
ऐसे में ही जब बापू का
छूट गया था साथ
चाचा ने था सबको संभाला
रखकर सबके सर पर हाथ

बने वो नेता प्रथम देश के
आगे थी कठिनाई
ऐसे में ही देखो चढ़कर
चीन की सेना आई
अपने पद का मान बढ़ा
सेना लेकर की अगुवाई
पंचशील का नियम बनाया
दिशा नई दिखलाई।

बच्चों के संग बैठकर
बच्चा बनना हमें सिखाया
कोमलता से खिले पुष्प को
अपने हृदय पर सजाया
सारे जग के चाचा बनकर
प्यार का रस बरसाया।

पर है एक बड़ा ही निर्दयी 
वक्त है जिसका नाम
चाचा को भी छीन ले गया
कर गया अपना काम।

जीवन का आधार बनकर
बस रह गई उनकी याद
चौदह नवम्बर के दिन
चाचा याद बहुत हैं आते
हम बच्चे बड़े प्यार से
उनका जन्मदिन हैं मनाते
बाल दिवस पर सारे बच्चे 
झूमते नाचते गाते
बाल दिवस हम सब मिलकर
चाचा के गुण गाते।

आओ करें प्रतिज्ञा हम भी
चाचा जैसे बन जायें
देश का ऊँचा नाम करें
और जग में नाम कमायें
***


सफलता का मंत्र

मेहनत से न डरें हम
आगे ही आगे बढ़ें हम
जीत लें दुनिया का हर गम
मेहनत से न डरें हम।

चींटी एक बहुत छोटी-सी
कितना बोझ उठाती है
कभी न थकती, कभी न रुकती
मंजिल पर पहुँचाती है
नहीं वो पल भर लेती दम
आगे ही आगे बढ़ें हम।

मेहनतकश मजदूर को देखो
नई इमारत गढ़ता है
मेहनत से ही तो किसान
धरती को सोना करता है
पर्वत भी कट जाते हैं
नदियों का रूख भी मुड़ता है
मेहनत करके ही सोना
तपकर कुंदन बनता है
कभी न थक कर बैठे हम
आगे ही आगे बढ़ें कदम।

मेहनत ने ही चाँद छुआ
मेहनत ने सागर नापे हैं
इसके आगे बड़े-बड़े
संकट भी शीश झुकाते हैं
मेहनत का ही खेल है सारा
धरती पर जो दिखता है
मेहनत करने वाला इंसाँ
जो चाहे कर सकता है।
***


गुरु की महिमा
 
गुरु तू है सबसे बड़ा
माँ ने जन्म दिया, पिता ने पाल दिया
ज्ञान की गंगा बहा कर तूने
हमको तार दिया। गुरु...

ईश्वर कौन है कहाँ है
चाँद, सूरज चलते हैं कैसे
कैसे टिमटिमाते हैं तारे
कैसे जलता है दीया
तूने हमको बता दिया। गुरु...

नदियों में आता है कहाँ से
अविरल कल-कल पानी
भरता नहीं क्यूँ समंदर
जाता कहाँ है पानी
भेद हमको बता दिया। गुरु...

बीज कैसे धरा में पनपता
फूल बीज में बदलता है कैसे
कैसे खुले आसमाँ में
पंछियों का कारवाँ है उड़ता
हमें ये भी दिखा दिया। गुरु...

मातृप्रेम से देशप्रेम तक
संघर्षों से कैसे है लड़ना
कैसे देशवासी जनों की
प्यार की माला है गूँथना 
तूने हमको सिखा दिया
तूने भेद ये बता दिया
तूने सब कुछ सिखा दिया। गुरु...
***

यादों के आकार

जब भी देखती हूँ यादों के झरोखों से, 
गहरी धुंध के बीच
आती है नज़र एक परछाई भी, 
धुंध छँटती है धीरे-धीरे
और परछाईं लेने लगती है, 
आकार
मैं कोशिश करती हूँ आकार को
जानने की, पहचानने की 
इस कोशिश में पाती हूँ, 
अपने
सारे अस्तित्व को
टूटकर बिखरते हुए, 
मैं घबराकर समेटने लगती हूँ
अपने किरच-किरच हुए
अस्तित्व को
और खो जाता है
वह आकार एक गहरी धुंध में
ले लेता है, एक परछाईं का रूप
सोचती हूँ शायद वह परछाईं
आकार है तुम्हारा
तुम, जिसे पाकर 
मैंने सम्पूर्णता पायी थी
तुम, जिसे पाकर
मेरा अस्तित्व 
तुम में खो गया था
और तुम्हें खोकर जो
किरच-किरच
हो गया है।
***


स्वप्न

तुम आए थे मेरे जीवन में, 
एक अर्थ मिला था, 
जिंदगी को
तुम्हें पाकर पायी थी सम्पूर्णता
मैंने, 
हुआ था यह अहसास मुझे
कि, 
मेरा होना या न होना
अर्थ रखता है किसी के लिए
कोई है
जो दे सकता है
मेरे मन मस्तिष्क को परिपक्वता
कोई है
जो चाहत रखता है
मेरे व्यक्तित्व को संवारने की
निखारने की
कोई है
जो चाहता है मुझे मेरे रूप में, 
शायद
यह भूल गयी थी मैं कि
स्वप्न कितना भी मधुर क्यों न हो
यथार्थ नहीं होता
स्वयं ही ढोना होता है
अपने अहसासों से जुड़े बोझ
अकेले
कोई किसी का साथ एक पल तो
निभा देता है
लेकिन, नहीं निभा सकता
एक पूरी उम्र!
***


नारी का मन

बल और आर्द्रता का
सम्मिश्रण है नारी का मन
सबल है आत्मा
सजल नयन हैं
भावुक बड़ा नारी का मन है।

जब राह कोई दुर्गम आए
तब सबल आत्मा टकराये
जब आह सुने किसी अपने की
तो सजल नयन भर-भर आयें

सम्मान पर जब कोई घात करे
या दुर्योधन का रूप धरे
बन के रूप वो काली का
हर दुर्जन का संघात करें
तब सबल आत्मा साथ रहे।

जब उमड़े प्यार किसी पर भी
या प्यार मिले किसी अपने का
जब साथी बिछड़ रहा हो कोई
या अपना कोई साथ चले
अँखियों से प्रेम का नीर भरे
सजल नयन सब साथ रहे।

आशा और निराशा के
भंवर में उलझी कश्ती
अपने अनथक प्रयासों से
जब नारी उसको पार कर
तब सबल आत्मा साथ रहे।

प्यार बड़ा हो या नन्हा-सा
हर एक, अदा पर मुस्काए 
अंतस के हर एक कोने से
उनकी खुशियों की दुआ करे
सजल नयन तब साथ रहे।

नारी जब नारी का मान रखे
तब दुनिया भी सम्मान करे
सजल सबल का संगम हो
और नये युग का निर्माण करे
तब सजल नयन प्रेम छलकाये
सबल आत्मा नवगान करे।

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