पुस्तक समीक्षा: आस्था और विश्वास की धरोहर, ब्रज क्षेत्र की यात्रा का दर्पण: अध्यात्म का वह दिन

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: अध्यात्म का वह दिन (यात्रा साहित्य)
लेखिका: डाॅ. विमला भण्डारी
पृष्ठ: 120
मूल्य: ₹ 200.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2020
ISBN: 978.93.88816.49.6
प्रकाशक: सनातन प्रकाशन, जयपुर

प्रख्यात बाल साहित्यकार डॉ. विमला भण्डारी जी की पुस्तक-‘ अध्यात्म का वह दिन’ एक ऐसा यात्रा साहित्य है जिसमें आस्था और विश्वास का सागर प्रत्येक पृष्ठ पर हिलोरें लेता नजर आता है। लेखिका की पुस्तक-‘कारगिल की घाटी’ पर पं. हरप्रसाद पाठक-स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार समिति मथुरा की ओर से ‘बाल साहित्य भूषण पुरस्कार’ दिया जाना था जिसके लिए लेखिका को सलूम्बर, उदयपुर से मथुरा आना पड़ा। तीन लोक से न्यारी मथुरा आने पर लेखिका की आध्यात्मिक चेतना पूर्ण जाग्रत हुई और आस्था और विश्वास का जो सैलाव उमड़ा तो पुस्तक-‘ अध्यात्म का वह दिन’ का जन्म हुआ।
विदुषी लेखिका डॉ. विमला भण्डारी ने पुस्तक को 16 शीर्षकों में विभक्त किया है जिनमें मथुरा-वृन्दावन सहित आस-पास के ब्रजक्षेत्र का उल्लेख, आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं सामाजिक, सांस्कृतिक सभी दृष्टिकोणों से करने का पूर्ण प्रयास किया है।

‘दाऊजी मंदिर-किस्सा बड़ी बहू, बड़े भाग’ पुस्तक का प्रथम अध्याय है जिसमें बलदेव कस्बा में स्थित श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव यानि दाऊजी एवं उनकी पत्नी रेवती जी के प्राकट्य की कथा एवं मंदिर परिसर की व्यवस्था आदि का वास्तविक वर्णन लेखिका ने किया है-
‘दाऊजी, रेवती जी से दो युग छोटे थे तो आकार में भी छोटे थे। ग्वाल-बाल कहने लगे-बड़ी बहू बड़े भाग्य। तब दाऊजी ने हल से रेवती जी को खींचकर ऊपर मूसल धर दिया। रेवती जी छोटी हो गईं।’ (पृष्ठ-17)

दिनेश पाठक ‘शशि’

ब्रह्माण्ड घाट-माटी का डेला यह घुटक-घुटक खाए... शीर्षक है पुस्तक के दूसरे अध्याय का। जहाँ बाल कृष्ण ने मिट्टी खाने के बाद माँ यशोदा के आग्रह पर अपना मुँह खोलकर दिखाया तो मुँह में सारा ब्रह्माण्ड देखकर यशोदा जी चकित रह गईं।
बालक ध्रुव की साधना स्थली- ध्रुव टीला जहाँ ब्रह्मा जी ने भी सृष्टि से पूर्व साधना की थी साथ ही जहाँ नारद जी के शाप से कुबेर के दो पुत्र मणिग्रीव और नीलकूबर यमलार्जुन नाम के दो वृक्षों में परिवर्तित होकर खड़े थे, जिनकी मुक्ति बालकृष्ण ने की थी, आदि की गाथा समेटे इस तीसरे अध्याय को लेखिका ने -‘ध्रुव टीला परिचय और यमलार्जुन उद्धार कथा’ शीर्षक में बांधा है।

ध्रुव टीला से और आगे बढ़ने पर लेखिका रमण विहारी मंदिर पहुँचती हैं जिसके पास ही रसखान जी ने भी तपस्या की थी। लेखिका ने इस अध्याय को -‘रमण विहारी मंदिर, आश्रम की रमणरज और भण्डारा’ शीर्षक के अन्तर्गत सजीव वर्णन किया है-
‘रमण रेती अर्थात् ऐसी रेती जिसके स्पर्श से आनन्द हो। यहाँ नंगे पैर ही चलना पड़ता है। यह यमुना की रेत है। इसमें कोई कंकर नहीं। ....यह गुरु गुरुशरणानन्द जी का कार्ष्णि आश्रम है।...(पृष्ठ-33)

‘माता चन्द्रावली-भक्त और भगवान की महिमा’ शीर्षक से पाँचवाँ अध्याय है। माता चन्द्रावली जो पूर्व जन्म में शबरी और द्वापर में श्रीकृष्ण की पटरानी यानि रावल की राधारानी थीं के मंदिर के बारे में तो वर्णन किया ही है साथ ही लोहबन, जहाँ श्रीकृष्ण ने लोहासुर राक्षस को मारा आदि का भी वर्णन है-
‘ब्रज की यही महिमा है और यहाँ की यही आस्था बहुत प्रबल है कि भक्त पत्थर में से भी भगवान को ढूंढ़ निकालता है।’ (पृष्ठ-46)

श्रीकृष्ण के महारास को देखने की तीव्र इच्छा ने महादेव जी को नारी रूप धारण करने पर विवश किया और गोपेश्वर महादेव कहलाये, यमुना जी ने उन्हें स्नान के लिए कहा तो ब्रज में मानसरोवर भी बना, राधा रानी रूठ कर सरोवर के पास जा बैठीं तो राधारानी मानसरोवर कहलाया...आदि का उल्लेख पुस्तक के छठे अध्याय में ‘राधा रानी मान सरोवर और महादेव, रासलीला कथा’ शीर्षक से किया गया है-
‘गोपियों ने एक राधा-कृष्ण के साथ अपनी रात अपने प्राण प्रिय पति के रूप मे बिताई है। लेकिन यह कोई साधारण रात नहीं थी, ब्रह्मा की रात्रि थी और लाखों वर्षों तक चलती रही। आज भी वृन्दाबन में निधिबन में प्रतिदिन कृष्ण रास करते हैं।’(पृष्ठ-57)

‘निधिबन महिमा’ के अन्तर्गत 5200 वर्ष से आज तक प्रत्येक रात को होने वाले रास का बहुत ही मोहक वर्णन किया गया है जिसमें बताया गया है कि -
‘निधिवन की सारी लताएँ गोपियाँ हैं जो एक दूसरे की बाँहों मे बाँहें डाले खड़ी हैं। जब रात में निधिवन में राधारानी जी, बिहारी जी के साथ रासलीला करती हैं तो वहाँ की लताएँ गोपियाँ बन जाती हैं और फिर रासलीला प्रारम्भ होती है। इस रासलीला को कोई नहीं देख सकता। दिनभर में हजारों बंदर, पक्षी, जीव जन्तु निधिबन में रहते हैं, पर जैसे ही शाम होती है, सभी अपने आप निधिवन से चले जाते हैं। ...रासलीला को कोई नहीं देख सकता क्योंकि रासलीला इस लौकिक जगत की लीला नहीं है।(पृष्ठ-61)

आगे के अध्यायों में श्री रंगनाथ मंदिर दर्शन, मीराबाई मंदिर और शालिग्राम शिला दर्शन, राधा दामोदर मंदिर और गिरिराज शिला परिक्रमा, परिक्रमा रहस्य, बांके बिहारी जी की महिमा और संत हरिदास, साहित्य उत्सव, द्वारिकाधीश मंदिर एवं भूतेश्वर महादेव, कंकाली माता दर्शन आदि शीर्षकों में एक दिन की अपनी इस अध्यात्मिक यात्रा को समेटने का प्रयास किया है जिसमें उन्होंने ब्रज की माटी, ब्रज के बाग-तड़ाग, ब्रज के बन-उपबन, ब्रज के मंदिर और आस्था-विश्वास की प्रगाढ़ता ‘यहाँ डाल-डाल और पात-पात पै राधे-राधे होय’ को प्रकट करते ऐसे-ऐसे तथ्यों का मनोहारी, सजीव वर्णन किया है कि पुस्तक पढ़ना प्रारम्भ करने के बाद बीच में छोड़ पाना असम्भव है।
विदुषी लेखिका डॉ. विमला भण्डारी की लेखनी की प्रवाहमयता और शैली अद्भुत है। पुस्तक का महत्व इस बात से ही परिलक्षित होता है कि पुस्तक प्रकाशन के कुछ समय बाद ही पुस्तक को एक साहित्यिक संस्था द्वारा एक लाख रुपये का पुरस्कार भी घोषित कर दिया गया।

पुस्तक - ‘अध्यात्म का वह दिन’ का हिन्दी यात्रा साहित्य जगत में भरपूर स्वागत होगा, ऐसी आशा है। हार्दिक शुभकामनाएँ।

3 comments :

  1. वाह! उत्तम समीक्षा! बधाइयां।

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  2. विस्तृत एवं सारगर्भित सटीक समीक्षा जो की पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता जगाती है. आपने बहुत श्रम के साथ प्रत्येक महत्वपूर्ण बिंदुओं को खोज निकाला है और उन्हें रेखांकित किया है.

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  3. विस्तृत एवं सारगर्भित सटीक समीक्षा जो की पुस्तक को पढ़ने की उत्सुकता जगाती है. आपने बहुत श्रम के साथ प्रत्येक महत्वपूर्ण बिंदुओं को खोज निकाला है और उन्हें रेखांकित किया है.

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