कहानी: सांझ का सूरज

राजनारायण बोहरे


दरवाजा चाची ने ही खोला।
राकेश को देखकर उनके चेहरे पर प्रसन्नता की हल्की सी किरण थिरकी और तुरंत ही लुप्त हो गई। वे फिर से संजीदा हो आयी थीं। नजर नीची कर एक ओर को हटते हुए उन्होंने राकेश को रास्ता दिया।

राकेश ने सूटकेस एक तरफ रखा और झुक कर चाची के चरण छू लिए। जाने पैर के नाखूनों से आँखों का क्या सीधा संबंध है कि इधर चाची के पैरों से उसकी अंगुलियों का स्पर्श हुआ और उधर चाची की आँखें सावन भादों बन गईं। सिर्फ सिसकी का धीमा सा स्वर आया। राकेश की हिम्मत नहीं हुई कि उनसे आँख मिला सके। खुद उसकी आँखों में पानी बहने लगा था।

चाची से आँख चुराते हुए वह सूटकेस उठाकर भीतर की तरफ बढ़ गया। बीच वाले डाइनिंग रूम में एक स्टूल पर अपना सूटकेस रख कर वह बाथरूम में घुस गया। नल चलाकर ठण्डे पानी से छींटे मारते हुए उसने हाथ मुँह धोये। बाहर आकर आदतन दीवार पर टंगे कांच के बगल में लगे हुक पर तौलिया के लिए हाथ बढ़ाया तो उसे झटका सा लगा। हुक पर सदा टंगे रहने वाले नये और उजले से तौलिया की जगह एक घिसा हुआ जर्जर सा पुराना तौलिया लटक रहा था। राकेश ने इधर उधर नजर मारी फिर बैठकर अपने सूटकेस को कुर्सी पर लिटाकर अपने दोनों हाथों से दोनों तरफ के लॉक खोलने ही जा रहा था कि चाची पास आकर खड़ी हो गईं और अपनी उन्होंने साड़ी का पल्लू उसकी ओर बढ़ा दिया। राकेश ने एक क्षण चाची की स्नेह में डूबती आँखों को ताका और सूटकेस छोड़कर उनके पल्लू से हाथ मुँह पोंछने लगा।

उसे याद आया कि यही चाची सदा नयी डिजाइन की नयी नयी साड़ी पहना करती थी। पल्लू से भीनी भीनी खुशबू आया करती थी और राकेश उसी खुशबू के लिए तौलिया की जगह चाची का पल्लू खींच कर अपना चेहरा पोंछ लिया दिया करता था। तब हर बार चाची नाराज होती थी। आज वही चाची एक सस्ती सी सूती साड़ी पहने है और खुद अपने पल्लू से मुँह पोंछने को कह रही हैं। विचारों में डूबा वह भूल गया था कि यह घर पहले जैसा नहीं रहा। बाथरूम में नई सुगंधित साबुन की जगह छोटे-छोटे घुले किसी सामान्य से साबुन के साधारण टुकड़े थे और बाहर सदा लटकने वाले नए साफ तौलिया की जगह पुराना तौलिया लटक जाना उस अंतर के साक्षी हैं जो इस घर में पिछले दो सालों में आया है।

घर में घुसने के साथ ही क्षण क्षण बैठता उसका दिल पल्लू से हाथ मुँह पोंछने में कुछ थिर हुआ।
चाची बोली "तुम यहीं बैठो, मैं तुम्हारी पसंद की अदरक वाली चाय बनाती हूँ।"
राकेश ने कुर्सी खींची और इत्मीनान से बैठ गया।

छोटे चाचाजी टू बीएचके का यह छोटा सा फ्लैट जब खरीद रहे थे तो चाची को बिलकुल पसन्द नहीं आया था। देखते ही कह बैठी थी कि वे नहीं आने वाली यहाँ। जिस किराए के मकान में रहती हैं वहीं जिंदगी क्यों ना गुजर जाए मगर इस घोंसले जैसे छोटे फ्लैट में वे नही रह पायेंगी। वह तो चाचाजी की हठधर्मिता थी कि उन्होंने डेवलपमेंट अथॉरिटी से उस समय सस्ते दामों पर यह फ्लैट ले लिया था और बड़े मजे से यहाँ रहने चले आए थे।

दरअसल छोटे चाचाजी की हठधर्मिता ही उनके जीवन की सारी उथल-पुथल का कारण रही है। याद है कि जब बड़े चाचा जी को बड़ी जुगाड़ के बाद पेट्रोल पंप का एलॉटमेन्ट मिला था और वे पेट्रोल पंप खोल रहे थे तो प्रेमवश छोटे चाचा से कहा था कि उनके साथ वर्किंग पार्टनर बन जाएँ- मुनाफे में सत्तर परसेंट-तीस परसेंट का अनुपात रख लेंगे। लेकिन चाचाजी को यह कैसे मंजूर होता कि एक ही पिता की संतानों में से एक मालिक की गददी पर बैठे और दूसरा नौकरी करे!

राकेश के पिता और दोनों चाचा अपने पिता की तीन संतान थे। राकेश के पिता युवावस्था में ही आने गांव खेड़ा से दूर जबलपुर जाकर एक फैक्ट्री में नौकरी पर लग गए थे और अपने परिवार के साथ मजे से गुजर बसर करने लगे थे। घर में बचे उनके दूसरे और तीसरे भाई पहले तो गांव पर ही रहकर खेती-बाड़ी देखते रहे और बाद में दोनोँ अपने हिस्से की जमीन बेचकर इन्दौर चले आए थे। यहाँ वे सीजनल धंधे करने लगे थे। कभी कूलर पंखा बेचते तो कभी दीवाली पर बल्बों की लड़ियाँ और फुलझड़ी-पटाखे बेचने लगते। छोटे मोटे धंधों में पैसा कमाकर हर साल अच्छी-खासी रकम बचा लेते थे। दोनों जन सम्मिलित रह कर आम इन्दौरी आदमी की तरह ठप्पे से अपना जीवन बिता रहे थे कि इंडियन ऑयल ने जबलपुर के ग्रामीण इलाके में नये पेट्रोल पंप के एलॉटमेन्ट के लिए विज्ञापन निकाला था।

मंझले ने चाची के नाम से पेट्रोल पंप के लिए आवेदन किया और हर तरह की जुगाड़ में लग गये थे। जिस के एलॉटमेन्ट में वे सफल हुए तो उन्होंने छोटे चाचा से साझेदार होने को कहा था।

मंझले से कम हिस्सा छोटे को मंजूर नही था सो छोटे अलग हो गए थे। अपने हिस्से में मिली रकम के एक हिस्से से ही उन्होंने यह फ्लैट खरीद लिया था जो आज उनके लिए सर छुपाने के काम आ रहा है। चाचाजी ने जवाहर मार्ग इन्दौर पर किराने की एक छोटी सी दुकान भी डाल दी थी जो उनके गुजर-बसर के लिए पर्याप्त पैसा दे देती थी और चाचाजी मजे में रहने लगे थे।

वह तो दो साल पहले अचानक वह सब हुआ था। एक दिन जब भोजन नली में कुछ अटकने जैसा अनुभव करते चाचाजी ने तुरन्त ही अपने फेमिली डॉक्टर से सम्पर्क किया।उसकी सलाह पर बड़े डॉक्टरों से जाँच कराई।
बहुत दिनों तक जाँच पड़ताल करते रहने के बाद अन्ततः डॉक्टर ने बताया था कि उन्हें वह भयानक बीमारी हो गई है, जिस को जड़ से मिटाना आज भी विज्ञान के लिए संभव नहीं है यानी कि कैंसर ! भोजन नली को जकड़ते हुए उसके आसपास एक बड़ा सा टयूमर बढ़ रहा था यानि कि उन्हें पेट का कैंसर हो गया था। और चाचाजी के घर पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा था, घर के लोग दहशत से भर उठे थे। चाचाजी को क्या उनकी गृहस्थी को कैंसर हो गया था। राकेश मानता है कि सच यही है कि जिस घर का इकलौता कमाऊ व्यक्ति ही ऐसी भयानक बीमारी का शिकार हो जाए उस घर में बाकी रहता ही क्या है ? बचता ही कौन है फिर घर चलाने वाला?

चाचा का बेटा सुचित तब चौदह साल का था और ऋतु बिटिया मात्र आठ बरस की। चाचा तो अस्पताल में भर्ती होगये। चाची का अस्पतालों में भागना या चलाफिरी करना बहुत मुश्किल था क्योंकि चाचाजी ने उन्हें हमेशा से सजा धजा कर गुड़िया सा बना रखा था, उन्हें वे किसी काम में हाथ नहीं लगाने देते थे। यकायक उस गुड़िया को खुले आसमान में कोई कैसे उछाल सकता था।

राकेश के घर तार पहुँचा था तो राकेश के पिता जी ओवरनाइट एक्सप्रेस से भागे और मंझले चाचाजी भी अपनी कार लेकर चले आए थे।

कुछ दिनों तक दोनों भाइयों पिता और मंझले चाचाजी छोटे चाचा को समझाया था कि जबलपुर चलो वहाँ बहुत लोग हैं। वहाँ जैसा होगा इलाज भी हो जाएगा और घर के लोग बारी-बारी से उन्हें अटेंड भी कर लेंगे। विपत्ति के दिनों में सब लोग साथ-साथ रह लेंगे दुख भी कम होगा। लेकिन चाचाजी की हठधर्मी टूटी नहीं थी बल्कि बीमारी में तो हठधर्मी बढ़ ही गई थी। वे बोले थे " इंदौर से अच्छा कैंसर का हॉस्पिटल पूरे मध्यप्रदेश में कहीं नहीं है, मैंने निर्णय किया है कि इलाज भी यही होगा और रहेंगे भी यहीं। आगे जो होना है तो ईश्वर की मर्जी।"

डॉक्टरों ने कहा कि अभी कैन्सर पहली स्टेज में है। सो इसका एक रास्ता यह है कि भोजन नली में एक प्लास्टो वैलून इसर्ट कर देते हैं जो भीतर से भोजन नली को सहारा देगी जिससे आसपास का टयूमर कुछ दिन के लिए वैसी तेजी दिखा पायेगा।

चाचाजी को कुछ दवाइयाँ दे दी थी और फिलहाल घर जाने को छुट्टी दे दी थी क्योंकि अंतिम इलाज तो ऑपरेशन ही था जिसमें पूरे दस लाख खर्च होने का अनुमान था। चाची ने बताया था कि इस समय उनके पास तो मुश्किल से एकाध लाख रूपया पड़ा होगा। पिताजी और चाचाजी रुपयों की व्यवस्था करने जबलपुर चले आए थे और चाची ने इस संग्राम से लड़ने के लिए अपनी कमर कस ली थी।

राकेश को चाची के चेहरे पर उसी संग्राम के निशान दिख रहे थे। जब चाचाजी का काम धंधा जोरों पर था। तब घर के सब बच्चे इन्हीं सितार वादक चाची की खूबसूरती और नफासत पर नाज किया करते थे और अब वही चाची कैसी उदासीन और सामान्य सी लगने लगी हैं। वे बूढ़ी और थकीथकी सी लगने लगी थी।

चाची चाय लेकर आयीं तो राकेश को पहले घूँट में बरसों पुराना स्वाद मिला। यानि चाची अभी भी पूरी तरह टूटी नही है-थैंक गॉड।

चाय पीते राकेश ने कमरे में चारों ओर नजर फेंकी तो सहसा उसका ध्यान दीवारों पर बनी आकृतियों पर अटक गया। पूरा कमरा हंसते मुस्काते चेहरों यानि कम्प्युटर के आइकान से भरा पड़ा था। कौतूहल से उन आकृतियों से देखते हुए पाकर उसे चाची ने मन्द स्मित के साथ बताया -यह सब ऋतु की कारस्तानी है। वह आजकल पैन्टिंग सीख रही है।

अपनी पीढ़ी में रितु इस पीढ़ी की सबसे छोटी सदस्य है, राकेश सबसे बड़ा यानि बत्तीस साल का है। राकेश को ऋतु पर बहुत लाड़ उमढ़ आया, बेचारी ने अभी देखा ही क्या है? दो वर्षों से घर में मचा रहने वाला हा हा कार और पैसे पैसे की किल्लत। चाची का एक एक जेवर गिरवी रखा जा चुका है और कीमती सामान भी बाजार का रास्ता पकड़ गया है। घर के दूसरे भाई मदद भी करें तो कहाँ तक करें? रोज-रोज के दवाइयों के खर्चों से लेकर खाने और राशन पानी के लिए कहाँ पैसा? साँप के पैर साँप को ही दिखते हैं।

चाचा जी का पलंग अब बहुत बदल गया था। राकेश ने चाचाजी के कमरे में प्रवेश करते हुए देखा कि वे अपने पलंग पर आसमानी नीले रंग का अच्छा सा कंबल ओढ़े लेटे थे। बहुत दुबले हो चुके थे। लग रहा था पलंग पर हड्डियों के किसी ढांचे को लिटा कर उस पर कंबल उड़ा दिया है। पलंग के पास एक स्टूल पर दवाइयों का जखीरा रखा था और उसी के पास दूसरे स्टूल पर जूस निकालने की छोटी सी मशीन भी कसी हुई थी। एक टोकरी में ढेर सी मौसम्बी रखी थी। पिताजी ने बताया था कि अब चाचाजी का खाना पीना यानि सारा आहार यही मौसम्बी का जूस है। ऑपरेशन में उनकी एक तिहाई भोजन की नली निकाल दी गई थी। जिससे उन्हें ठोस खाना नहीं दिया जा सकता था। नली का प्रभाव आवाज पर भी आया है और उनकी वाणी भी लुप्त हो गई है।

राकेश को फिर अचरज हुआ कि चाचाजी के पलंग के अलावा पूरे कमरे में कोई भी ऐसी चीज न थी जिससे उदासी प्रकट होती हो। एक कोने में म्युजिक सिस्टम था तो दूसरे में एक बड़ा सा सितार रखा हुआ था।लगता है सितार वादक चाची ने फिर से रियाज़ शुरू कर दिया था। राकेश चकित था। छत से लटकते लंगूर और बन्दर थे तो दीवार पर लगे एक छोटे से ब्रेकेट पर हंसोड़ मुँह बनाए जोकरों की पंक्ति बैठी थी। कमरे की दीवारों पर फूल। पत्ती। झाड़ी और तालाबों के चित्र भरे पड़े थे। ऋतु का हाथ सचमुच सध गया था और उसके बनाये सारे चित्र बहुत जीवंत और चटखदार थे।

आहट पाकर चाचाजी ने राकेश की ओर देखा। उनकी बुझी बुझी आँखों से क्षणिक चमक चौंधी और उनके कमजोर से हाथों ने राकेश को गले लगाने के लिए निकट आने का संकेत दिया तो राकेश लपक कर चाचाजी के निकट पहुँचा और जीर्णशीर्ण चाचाजी से हौले से लिपट गया। बोल न सकने का दर्द चाचाजी की आँखों से टपक रहा था।
जब हम अकेले हों तब अपने विचारों को संभालें…और जब हम सबके बीच हों तब अपने शब्दों को संभालें…भावुक होते होते जा रहे राकेश ने मन ही न सोचा और अपने गले को साफ कर चाचाजी के आँसुओं को पोंछा और साहस करके मुस्करा के बोला-आप जल्दी ठीक हो जाओगे चाचाजी।

यहाँ आने के बाद उसका यह पहला वाक्य था। इसका कोई अर्थ नहीं था। चाचाजी जैसे विद्वान को वह असंभव बातों से बहलाने का प्रयास कर रहा था। लेकिन राकेश को लग रहा था कि किसी के जाने के बाद "आपकी यादों के साथ हूँ" लिखने से बेहतर है उसके ज़िंदा रहते हुए "मैं आपके साथ हूँ" कहना चाहिए।

‘भैया आज पापा खुद की विवशता के लिए नहीं रो रहे हैं बल्कि पापाजी के आँसू अपने भतीजे से बहुत दिन बाद मिलने के बाद छलके खुशी के आँसू है।" आवाज सुन कर सहसा उसकी निगाह ऋतु पर गई जो एक कोने में खड़ी मुस्काते हुए राकेश को ही देख रही थी।

राकेश ने देखा चाचाजी मुस्काते हुए ऋतु की बात का समर्थन कर रहे थे और चाची भी अपनी चिरपरिचित गाढ़ी मुस्कान बिखेरने लगी थीं। पल भर में ही कमरे का वातावरण बदल गया था।

"भैया कहाँ है रितु दीदी?" हर बहन को दीदी कहने की अपनी आदत के अनुकूल राकेश ने अपनी आवाज में मुलामियत लाते हुए पूछा।

"वे तो दुकान गए हैं और शाम को लौटेंगे!" रितु ने बताया तो राकेश को याद आया कि पिछले वर्ष से सुचित ने स्कूल छोड़ दिया है और रात को लगने वाली कक्षाओं में जाने लगा है। दिन में दुकान पर बैठता हैं, उसी दुकान से दवा खर्च सहित यह सब खर्च चलते हैं।

आँखों की भी शायद एक भाषा होती है और राकेश व चाचा जी दिन भर उसी भाषा में बात करते रहे। बीच में चाची भी आई और बैठकर अपनी दिनचर्या, ऋतु की चित्र प्रदर्शनी व सुचित को शौकिया शतरंज खेलने में मिले जिला स्तरीय पुरस्कार की बातें बताती रहीं। स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती है। घर में घुसते समय दोपहर को उसे जो एक अजीब से तनाव संकोच का अहसास हो रहा था वह शाम तक समाप्त हो गया था और अब वह वातावरण में पूरी तरह घुलमिल गया था।

शाम को नौ बजे जब सुचित लौटा तो राकेश को देख मुस्कुरा रहा था। उसे लगा सुचित कम उम्र में बड़ा हो गया था। वह लपक कर राकेश भाई के पैर छूकर उससे गले मिला और जब अचानक उसने देखा कि राकेश की आँखों में आँसू हैं तो वह कहने लगा "क्या हुआ दादा? विदाई तो देर-सबेर तय है, बचे हुए समय को ऐसे बिताएँ न कि सब नॉर्मल रहे।"

अचानक राकेश समझ नही पा रहा था कि चाचाजी की लम्बी बीमारी से अचानक ही सुचित बड़ा हो गया है और इन्दौर बड़ा शहर है जहाँ वह अच्छे समझदार लोगों के बीच में हैं या फिर हताश हो चुका वह अभी भी छोटा है। जबलपुर में उसके आसपास कम समझदार लोग रहते हैं। जीने के साथ लगातार सीखते भी जाना चाहिए इस भरोसे पर नही रहना चाहिए कि उम्र अपने साथ बुद्धि भी लेकर आएगी, राकेश ने एक पल सोचा और मुस्कुराते हुए सुचित को दोबारा से गले लगा लिया।

उनको मुस्कुराते देख चाची को राहत महसूस हुई और ऋतु भी मुस्कुरा के बोली "आओ भैया मैं आपको मेरा केनवास दिखाती हूँ।"

कुछ देर बाद राकेश लाड़ और गर्व के भाव लिए ऋतु के केनवास पर बन रहा नया चित्र देख रहा था। जिसमें आसमान में गहरी लालिमा के साथ डूब रहे सूर्य के साथ एक बस्ती का लॉंग शॉट उकेरा जा रहा था। ऐसी बस्ती, जिसके एक आंगन में हँसते-कूदते बच्चे थे, तो पोपले मुँह के हँसते हुए एक बेहद दुबले बुजुर्ग भी - अचरज की बात यह थी कि उन बुजुर्ग सज्जन का चेहरा छोटे चाचाजी से जबर्दस्त मिलता जुलता था। अचरज तो यह था कि डूबता हुआ सूरज किसी उदास मुद्रा में न था।
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लेखक परिचय
राजनारायण बोहरे का जन्म 20 सितम्बर 1959 को मध्यप्रदेश के अशोकनगर जनपद में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर स्नातक तक शिक्षा अशोकनगर में करने के उपरांत एल-एल.बी. और हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर तक का अध्ययन गुना में किया तथा पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री भोपाल से प्राप्त की। इनके कहानी सँग्रह "इज़्ज़त-आबरू" "गोस्टा तथा अन्य कहानियाँ" "हादसा" " मेरी प्रिय कथाएँ" एवं उपन्यास "मुखबिर" प्रकाशित हुआ है।
बच्चों के लिए इनके उपन्यास "बाली का बेटा", "गड़ी के प्रेत", "रानी का प्रेत", " छावनी का नक्शा" और "आर्यावर्त की रोचक कथाएँ" प्रकाशित हुए हैं।
मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा "वागीश्वरी पुरस्कार" से इन्हें सम्मानित किया गया है तो साहित्य अकादेमी मध्यप्रदेश से उन्हें "सुभद्राकुमारी चौहान पुरस्कार" से अलंकृत किया गया है। चिल्ड्रन्स बुक ट्रस्ट दिल्ली ने उन्हें सन 1994, 1996 और सन 2009 में पुरस्कृत किया तो 1997 में वे प्रधानमंत्री महोदय के कर कमलों से एक कहानी "भय" के लिए पुरस्कृत किए गए हैं।
सम्पर्क: 89, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया मप्र 475661
वर्तमान पता: 3/2 कमलासन एपार्टमेंट, जानकीनगर, नवलखा, इन्दौर मप्र 452001;
चलभाष: +92 982 668 9939


1 comment :

  1. कितनी प्यारी कहानी है। त्रासदी झेलते जीवन को भी हम अपनी सोच और नजरिए से खूबसूरत मोड़ दे सकते हैं। बहुत साधुवाद।

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