पुस्तक समीक्षा: जीवन के अनुभव और अनुभूतियों से उपजी मार्मिक कहानियों का संग्रह: कुहासा छँट गया

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

28, सारंग विहार, मथुरा-6; चलभाष: +91 987 063 1805; ईमेल: drdinesh57@gmail.com

पुस्तक: कुहासा छँट गया (कहानी संग्रह)
लेखिका: श्रीमती ममता त्यागी
पृष्ठ: 96
मूल्य: ₹ 175.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
ISBN: 
978.93.90593.24.8
प्रकाशक: शिवना प्रकाशनसीहोर

हिन्दी की पहली आधुनिक कहानी की लेखिका राजेन्द्र बाला घोष उर्फ बंग महिला ने अपनी कहानी ‘कुंभ में छोटी बहू’ लिखकर हिन्दी साहित्य में कहानी विधा की प्रतिष्ठापना के प्रारम्भ से ही महिला कहानीकार के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी थी। बंग महिला की ‘कुंभ में छोटी बहू’ कहानी इतिहास का वह सोपान साबित हुई, जहाँ से हिन्दी कहानी की नई यात्रा प्रारम्भ हुई।

 इस प्रकार हम देखते हैं कि कहानी के क्षेत्र में एक महिला कहानीकार का कृतित्व नींव के पत्थर के रूप में अवस्थित है।

 अध्यापन के क्षेत्र में तीस वर्ष गुजारने के बाद सुश्री ममता त्यागी जी अमेरिका में हिन्दी के प्रचार, प्रसार में अपने आप को संलग्न किए हुए हैं। लेखक चूँकि एक संवेदनशील प्राणी होता है। आम आदमी से हटकर उसकी संवेदना कुछ न कुछ सोचते रहने पर विवश करती है, यह बात ममता जी भी स्वीकारते हुए कहती हैं कि ‘लेखक के भीतर कुछ ना कुछ उमड़ता ही रहता है।’

दिनेश पाठक ‘शशि’


कुहासा छँट गया, ममता जी का पहला कहानी संग्रह है जिसमें उनकी 11 उत्कृष्ट कहानियों का समावेश किया गया है।

 संग्रह की पहली कहानी, शीर्षक कहानी है। जिसमें सन्तान के व्यवहार के कारण माता-पिता का मोहभंग दिखाया गया है। अति भौतिकतावादी और आपा-धापी के इस युग में हर प्राणी आत्म केन्द्रित होता जा रहा है किन्तु हृदय को आघात तब अधिक लगता है जब अपनी ही सन्तान जिसके लापन-पालन में माता-पिता ने अपने दुःख और अभावों की परवाह न करते हुए उन्हें अच्छे से अच्छा उपलब्ध कराने का प्रयास किया वही सन्तान समर्थ होते ही माता-पिता की अवहेलना करना प्रारम्भ कर देती है।

कुहासा छँट गया कहानी के दोनों पुत्र अमेरिका में बसने के बाद अपने माता-पिता के प्रति सारे कर्तव्यों को भुला बैठे हैं। छोटा पुत्र पराग जहाँ कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता वहीं बड़ा पुत्र मधुर अपनी पत्नी नव्या की निरंकुशता को रोक पाने में अपने आप को पूर्णतः असमर्थ पाता है परिणामतः माता-पिता जिन्होंने कभी जिन परिस्थितियों की कल्पना भी नहीं की थी, उन्हीं को भोगने पर विवश हैं।

‘अब जब से यहाँ आये थे तो पराग की तरफ से उन्हें कोई खास तबज्जो नहीं मिली। रमा और तिवारी जी के लिए ये सब सहना आसान नहीं था, जिन कलेजे के टुकड़ों को इतनी मेहनत करके आज इतना काबिल बनाया वही दोनों इस तरह बदल जायेंगे, उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी।’ (पृश्ठ-12)

लेखिका ने पुत्र और पुत्र-वधु के बदले हुए व्यवहार की पराकाष्ठा की ओर इंगित करते हुए लिखा है-

‘रमा और तिवारी जी की स्थिति बड़ी विकट हो गई।....रमा के लिए उस रसोई और उन्हीं बर्तनों में जिनमें माँस पकता था, अपना खाना बनाना बड़ा मुश्किल लगता था पर करती भी क्या?.......नव्या की मानसिकता पूरी तरह बदली हुई थी। ना किसी की भावनाओं का खयाल ना अपने रीति रिवाजों और परम्पराओं का आदर।(पृष्ठ-11)

‘लाकेट’ संग्रह की दूसरी कहानी है। बचपन के सहपाठी, मित्र और फिर एक-दूसरे का साथ निभाने का वायदा करने वाले प्रेमी-प्रेमिका माधुरी और सूरज।

कभी-कभी मनुष्य की अति महत्वाकांक्षा जीवन की धारा ही बदल देती है। सूरज की अति महत्वाकांक्षा ने फिल्मी दुनिया की राह दिखाई तो वह किए गये वायदे ही भूल गया और जब वापस लौटा तो बहुत देर हो चुकी थी। संवेदना के स्तर पर हृदय के तारों को झंकृत कर सोचने पर विवश करती प्रेम कथा है-‘लाकेट’।

‘माधुरी ने कुछ नहीं कहा, बस उठ खड़ी हुई और अपने गले से लाकेट उतार कर सूरज की हथेली पर रख दिया। फिर जैसे डूबते से स्वर में बोली, जब तुम्हारी बेटी का विवाह हो तो उसे दे देना और अब जीवन में मुझसे कभी मत मिलना। मेरा तुम्हारा साथ तो कब का छूट गया था ये तो बीते वक्त की परछाई थी जो अब तक हमारे साथ चल रही थी। आज वह परछाई भी गुम हो गई।’ (पृष्ठ-23)

‘पुनर्जन्म’ ‘तिरस्कार की भरपाई’, ‘ममता की कशिश’ और ‘सम्बल’ जीवन के संयोगों की कहानियाँ हैं। पुनर्जन्म की हरप्रीत अपने पुत्र को अपनी निःसंतान जिठानी को गोद दे देती है। किन्तु जिठानी उसपर एकाधिकार जताते हुए हरप्रीत से दूर अमेरिका लेकर चली जाती है। किन्तु जीवन के संयोग ने अमेरिका में ही हरप्रीत से उसके पुत्र को मिला दिया।

‘तिरस्कार की भरपाई’ में लेखिका ने कहानी के माध्यम से दहेज जैसी रूढ़ि के विरुद्ध आवाज उठाने का प्रयास किया है। कहानी का अमित अपने पिता की दहेज-लालसा का विरोध नहीं कर पाता और रेणु के साथ विवाह से वंचित रह जाता है। जीवन के संयोग एक बार पुनः उसे रेणु से मिलाते हैं और तब वह रेणु के तिरस्कार की भरपाई करने का प्रयास करता है।

एक लड़की पत्नी बनते ही अपने परिवार, बच्चे और पति की भावनाओं का सम्मान करते-करते न जाने कब अपने आप को ही भुला बैठती है लेकिन जीवन के संयोग जब उसे ऐसा अवसर प्रदान कर देते हैं तो वह खुलने लगती है और अपनी जिन्दगी जीने की ललक प्रबल हो उठती है। ‘सम्बल’ की सुगन्ध भी अपने व्यापारी पति की भावनाओं की कद्र करते-करते अपने लेखन की रुचि को भूल ही बैठी थी लेकिन अमेरिका में अपने पुत्र और पुत्र-वधु के पास कुछ दिन रहने पर उसकी मुलाकात एक साहित्यिक रुचि के व्यक्ति से होती है तो सुगन्ध को जैसे अपना नया जीवन जीने की राह ही मिल गई।

‘और वह लौट ही आया’ कई बातों की ओर सहज ही इशारा करती हुई कहानी है। लेखिका ममता त्यागी ने इस कहानी में परोक्ष रूप से यह उपदेष दे दिया है कि यौवन की उमंग में यातायात के नियमों की अवहेलना हानिकारक ही सिद्ध होती है। दूसरा जीवन की कठिन राहों को मनुष्य किसी न किसी भुलावे में भटकाकर जीने की राह खोज ही लेता है।

‘ब्रांडेड कपड़े’ संग्रह की आठवीं कहानी है जिसमें दोहरा जीवन जीने वालों के चरित्र को उजागर करने का प्रयास लेखिका ने किया है किन्तु सूक्ष्मता से दृष्टिपात किया जाय तो इस कहानी के माध्यम से लेखिका ने बड़े ही सहज रूप में यह भी बताने का प्रयास किया है कि माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को वास्तविक प्रेम प्रदान करना चाहिए, पैसे की तराजू में तोलकर किया गया प्यार बच्चों में हीन भावना पैदा करके उनको दोहरा जीवन जीने पर मजबूर करता है-

‘मैं ना तो तुम्हारे जितनी बुद्धिमान थी और ना तुम्हारे जैसा परिवार ही पाया था मैंने। मेरी माँ के पास अपनी पार्टीज से ही समय नहीं था कि कभी प्यार से मेरा टिफिन बनाकर मुझे तैयार करके स्कूल भेजें। बस पैसे पकड़ा दिए और हो गया प्यार।’

‘अपने साथ के सारे दोस्तों के बीच खुद को बेहतर साबित करने के लिए मुझे फैशन परस्ती बड़ा सरल उपाय लगा।’(पृष्ठ-64)

पुनर्मिलन संग्रह की नौवी कहानी है। इसको भी जीवन के संयोग की कहानी कहा जाय तो उपयुक्त होगा। हवाई जहाज में शिवम की बराबर वाली सीट पर जो बच्चा है उसका नाम परम है जिसे सुनकर शिवम बचपन के अपने दोस्त की यादों में खो जाता है। और जब अमेरिका में वह अस्पताल में मरीजों को देख रहा होता है तो संयोगवश वही बचपन का दोस्त परम, एक गम्भीर मरीज के रूप में दिखाई देता है-

‘शिवम उसका हाथ अपने हाथों में लिए बैठा था, उसकी आँखें नम थीं और सोच रहा था, ये कैसा पुनर्मिलन है?’(पृष्ठ-71)

इस कहानी का अन्त बहुत ही जल्दी में किया गया सा लगता है जबकि कहानी अभी और विस्तार की मांग करती नजर आती है।

‘अमावस की रात’ कहानी भी संग्रह की अन्य कहानी ‘पुनर्मिलन’, ‘सम्बल’, ‘ममता की कशिश’,‘पुनर्जन्म’ आदि की भाँति ही जीवन के संयोगों की कहानी है। इसमें बचपन की संकोची अलका और चुस्त, बुद्धिमान समीर, दोनों ही सहपाठी 40 साल बाद जब अमेरिका में एक साहित्यिक कार्यक्रम में मिले तो आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक ही है।

एक पत्नी, अपने पति, बच्चों और परिवार के लिए अपने आप को होम करके, ईंटों की दीवारों से बने मकान को घर में तब्दील करती है। भले ही उसके इस त्याग का बखान कोई न करे पर देर-सवेर उसका त्याग रंग तो लाता ही है। विदुषी लेखिका ममता त्यागी हर घरेलू महिला के अन्तर्मन की व्यथा को अलका के ष्शब्दों में अभिव्यक्त करने में सफल रही हैं-

‘अलका ने खुद को गृहस्थी की आग में ऐसा झोंका कि भूल ही गई कि वह स्वयं क्या चाहती है? सिर्फ पति की इच्छा और बच्चों के सपने याद रहे उसे। अमावस का चाँद बनकर रह गई बस, जो किसी को दिखता ही नहीं, बस अपनी सारी रोशनी लुटाकर अंधेरों में खो जाता है।’(पृष्ठ-76)

‘पितृ़ऋण’ संग्रह की ग्यारहवीं और अंतिम कहानी है। कहानी के सभी मुख्य पात्र तो भारतीय हैं किन्तु देशकाल एवं वातावरण विदेश (अमेरिका के विभिन्न नगर) का है। विदुषी कहानीकार सुश्री ममता त्यागी ने इस कहानी के एक सामान्य से कथानक को जिस तरह विस्तार दिया है वह अद्भुत है। सत्रह पृष्ठों में फैली यह कहानी संग्रह की सबसे लम्बी कहानी होते हुए भी अपनी सहज प्रवाहमयता और सुगठित घटनाक्रम के कारण पाठक को पढ़ते जाने के लिए विवश करती है।

पति रमेश शराब के नशे में पत्नी सपना को आये दिन प्रताड़ित करता रहता है। भारत में अधिकांश निम्न परिवारों में यह आम बात है कि शराबी और निठल्ले पतियों की प्रताड़ना, पत्नियाँ चुप रहकर ताउम्र सहन करती हैं। लाखों में एक कोई साहसी पत्नी अपने मन के गुबार को निकालने के लिए, पीकर देर से लौटे पति के लिए दरवाजा नहीं खोलती तो पति गली में खड़ा दरवाजे पर गरियाता रहता है और पड़ोसी ष्शान्ति से सोते रहते हैं। किन्तु यह घटित हो रहा है अमेरिका में जहाँ के नागरिक अपने जीवन में किसी का हस्तक्षेप सहन नहीं करते।

‘सपना की सहन ष्शक्ति अब जबाव दे रही थी और फिर एक दिन उसका सब्र का बांध टूट गया। हमेशा की तरह जब देर रात रमेश नशे में धुत्त आया, उसने दरवाजा नहीं खोला। रमेश आदतन बाहर खड़ा चिल्लाने लगा। अब यह भारत तो था नहीं कि कोई पड़ोसी ना बोलता। यहाँ तो तुरन्त पड़ोसियों ने पुलिस को बुला लिया।’ (पृष्ठ-82)

पड़ोसियों की शिकायत पर पुलिस रमेश को जेल में डाल देती है और सपना की सहायता के साथ-साथ उसे नौकरी भी उपलब्ध कराती है।

बर्षों बाद एक दिन नताशा जेल अधिकारी के निवेदन पर उससे मिलने गई तो पता चला कि वाशिंगटन जेल का एक कैदी उससे मिलना चाहता है। जब उसे पता चला कि वह कैदी कोई और नहीं उसके पिता ही हैं तो विचारों के बबंडर उसे हिला देते हैं। मिलने के लिए माँ से अनुमति पाकर नताशा अपने आप को रोक न सकी-

‘नताशा माँ से लिपट गई और बोली, माँ मैं सिर्फ एक बार यह देखना चाहती थी कि पिता कैसे होते हैं? जब भी अपने साथ के बच्चों को अपने पापा के साथ देखती थी तो मेरा भी मन होता था कि काश! मेरे भाग्य में भी पिता का सुख होता। वह सुख तो मैंने कभी देखा ही नहीं, मेरी कल्पना में तो पिता की सिर्फ एक धंधली तस्वीर है।’(पृष्ठ-90)

विदुषी कहानीकार सुश्री ममता त्यागी ने इस कहानी में भारतीय एवं पाश्चात्य, दोनों की संस्कृति के अन्तर को बहुत ही सूक्ष्मता से स्पष्ट करते हुए कहानी को आगे बढ़ाया है। भारतीय हृदय की भावुकता और संवेदना की पराकाष्ठा के दर्शन इसमें होते हैं तो पाश्चात्य व्यवहार की कमियाँ और विशेषताएं भी प्रकट होती है।

इस प्रकार कहानी संग्रह-‘कुहासा छँट गया’ की प्रत्येक कहानी में ममता जी ने अपने अनुभव और अनुभूतियों की धरोहर का पूर्ण सदुपयोग करते हुए इनका ताना-बाना बुना है, ऐसा प्रतीत होता है। भाषा सहज, सरल एवं शैली प्रवाहमयी है। कुछ कहानियों में मुद्रण की बहुत सी अशुद्धियाँ कचोटती हैं। कम से कम ‘शिवना’ प्रकाशन, से इस तरह की अशुद्धियों की किसी को अपेक्षा नहीं हो सकती, ऐसा मेरा विचार है।

हिन्दी साहित्य जगत में कहानी संग्रह-‘कुहासा छँट गया’ का भरपूर स्वागत होगा, ऐसी आशा है।

1 comment :

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।