‘अवाक्’ : कैलाश मानसरोवर की अंतर्यात्रा का वृतांत

स्वाति चौधरी

स्वाति चौधरी

सारांश
 गगन गिल का ‘अवाक्’ विश्व की कठिनतम यात्राओं में मानी जाने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा का एक महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांत है। जिसमें कैलास मानसरोवर का अनुपम सौन्दर्य, पहाड़, सपाट मैदान, ऊँची-नीची पगडंडियाँ, झीलें, तिब्बतियों की संस्कृति, बौद्ध धर्म के प्रति आस्था, दलाईलामा के प्रति निष्ठा जैसी संपूर्णता को एकाकार करके प्रस्तुत किया गया है। इसमें लेखिका ने कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की अलौकिक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान की है। जिससे यह मात्र बाह्य यात्रा को ही प्रस्तुत न करके अंतरयात्रा को अभिव्यक्ति प्रदान करने वाला एक महत्वपूर्ण वृत्तांत है।

बीज शब्द: अवाक्, यात्रा, यात्रा साहित्य, अंतर्यात्रा, कैलास, दर्शन, प्रकृति, सौन्दर्य       

भूमिका 
यात्रा करना एक साहसिक कार्य माना जाता है। जिसके कारण उसके लिए हमेशा पुरुषों को ही प्राथमिकता दी जाती है। आम तौर पर ये होता है कि स्त्रियाँ घर पर रहे और घर का काम करें बाहर के काम पुरुष ही भली-भाँति कर सकता है। लेकिन इस रूढ़िवादी सोच को स्त्रियाँ हमेशा से तोड़ने का प्रयास करती रही है। वे एक चारदीवारी में बंधकर नहीं रह सकती। उनको भी बाहर निकलना है और इन जंजीरों को तोड़ते हुए सरहदों को पार करना है। इसी स्वछंदता की तलाश में अनेक स्त्रियों ने यात्राएँ की है और उन्हें लिखा भी है। जिससे आज हिन्दी में बड़े पैमाने पर स्त्रियों द्वारा भी यात्रा साहित्य लिखा जा रहा है। जिसमें प्रमुख है – कृष्णा सोबती का ‘बुद्ध का कमंडल’, नासिरा शर्मा ‘जहाँ फव्वारे लहू रोते हैं’, गगन गिल का ‘अवाक’: कैलाश मानसरोवर एक अंतर्यात्रा, रमणिका गुप्ता का ‘लहरों की लय’, अनुराधा बेनीवाल का ‘आजादी मेंरा ब्रांड’ आदि। इस कड़ी में गगन गिल का ‘अवाक्- कैलास मानसरोवर एक अंतर्यात्रा’ एक महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांत है। जिसमें दुर्गम यात्राओं में से एक कैलास मानसरोवर की यात्रा को प्रस्तुत किया गया है। यात्राओं के संबंध में स्त्री के संबंध में रमणिका गुप्ता लिखती है कि “मैं महसूस करती हूँ- स्त्री के लिए यात्राओं का मतलब वही नहीं होता, जो किसी पुरुष के लिए होता है। स्त्री के लिए घर यथास्थितिवाद का प्रतीक है और जब वह घर की दहलीज लांघती है तो मुक्ति की दिशा में उसकी वह पहली यात्रा होती है। यात्राएँ स्त्री को यथास्थितिवाद की रूढ़ि से बाहर निकालती हैं, जीवन में बेहतरी की उम्मीद जगाती हैं, यह मैंने अपने अनुभव से जाना है।”  घर की दहलीज को लांघ कर गगन गिल ने जो दुर्गम यात्रा की है उन्हीं अनुभवों का वृत्तांत ‘अवाक’ में प्रस्तुत किया गया है।

सबसे पहले यात्रा शब्द को अगर देखा जाए तो ‘यात्रा’ एक स्त्रीलिंग शब्द है जिसकी व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘या’ धातु के साथ ‘ष्ट्रन’ प्रत्यय के योग से हुई है। (या+ ष्ट्रन) जिसका अर्थ है जाना। यात्रा को अरबी भाषा में ‘सफ़र’ कहा जाता है और इसे विभिन्न उद्देश्यों, स्वरूप, कार्य व्यापार आदि के आधार पर भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता है। भ्रमण, घुमक्कड़ी, यायावरी, चलवासी, खानाबदोशी, आना-जाना, घूमना, भटकना, आवारागर्दी करना, तीर्थाटन, मेला, फेरी आदि विभिन्न शब्दों का प्रयोग इसके लिए किया जाता है। गमन, प्रस्थान आदि अर्थों में भी इस शब्द का प्रयोग होता है। इस प्रकार देखा जाए तो सामान्यत: ‘यात्रा’ शब्द का अर्थ है एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना।
इसी तरह यात्रा-साहित्य को अगर देखा जाए तो कहा जा सकता है कि यात्रा के दौरान जो भी बाह्य और आंतरिक विचार मन में आते हैं वे मानस-पटल पर अंकित हो जाते हैं और इन्हीं मानस-पटल के विचारों को जब लिपिबद्ध किया जाता है तो वहीं से यात्रा साहित्य का जन्म होता है। कोई भी व्यक्ति अपनी यात्रानुभूतियों को जब कलात्मक रूप देकर संवेदना के साथ प्रस्तुत करता है तो उसे यात्रा-साहित्य कहा जाता है। यात्रा-वृत्तांत केवल देखे गए स्थानों का विवरण मात्र नहीं है अपितु इसमें यात्रा के दौरान देखे गए स्थानों, स्थलों, भवनों, भोगी हुई घटनाओं एवं उससे सम्बन्धित अनुभूतियों को कल्पना एवं भाव-प्रवणता के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

2008 में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित गगन गिल का ‘अवाक्’ विश्व की कठिनतम यात्राओं में मानी जाने वाली कैलाश मानसरोवर की यात्रा का एक महत्वपूर्ण यात्रा वृत्तांत है। अवाक् अर्थात् जिसे सन्न, स्तब्ध, हतोत्तर, उत्तरहीन ब्रह्म, अंतराकाश, अव्यक्त, अशब्द, परम तत्त्व, शाश्वत मौन, निमुहाँ, गूँगा, शांत व प्रदक्षिणाशील आदि शब्दों से जाना जा सकता है। इसी अवाक् की अलौकिक अनुभूतियों को शब्दबद्ध करने का प्रयास इस यात्रा वृत्तांत में किया गया है। जिसमें तिथि और समय के फेर को प्रस्तुत न करके उन साधारण-सी घटनाओं का उल्लेख किया गया है जोकि साधारण होने के बावजूद साधारण में भी असाधारण को समेटे हुए है। अपने पति निर्मल वर्मा की अंतिम इच्छा को पूरी करने के विशेष प्रयोजन से की जाने वाली इस यात्रा के लिए लेखिका किसी भी तरह से कैलाश जाना चाहती है। कंधे के दर्द से बेहाल और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद पति की आखिरी कमीज, दारजी की दास्तार, माँ की चुन्नी, कन्नू की कॉपी का पृष्ठ और रिनपोछे की अंगुली का नाखून जैसी वस्तुएँ वही माँ के चरणों में छोड़कर आना चाहती है। अनेक कठिनाइयों के बावजूद इस दुर्दह और कठिन तीर्थयात्रा के लिए जा कर वह निर्मल के प्रति अपने समर्पण व आस्था को दिखाती है। लेखिका ने निर्मल के जीते-जी यह तीर्थयात्रा करने करने का वादा किया था और इसी वादे को पूरा करती हुई यूनानी सहेली वैल्ली, जिस समय निर्मल अस्पताल में बिस्तर पर पड़े थे। तो यह तीर्थयात्रा करके मानसरोवर में खड़े होकर उन्हें पुण्य प्रदान कर रही है। “जब वह अस्पताल में बिस्तर पर पड़े थे, वैल्ली मानसरोवर के जल में खड़े हो कर निर्मल का नाम ले-लेकर देवताओं को पुकार रही थी। अस्पताल में ही मैंने उन्हें मानसरोवर से लाया जल पिलाया था, उन्होंने कैलास-मानसरोवर की तस्वीरों का दर्शन किया था।

- तुम ठीक हो जाओगे, तो मैं खुद जाऊँगी, तुम्हारी परिक्रमा करने...”  इसी वादे को निभाती हुई लेखिका निर्मल के निधन के बाद उनके शरीर का पहना हुआ अंतिम वस्त्र कैलाश में देवी को समर्पित करने व निर्मल को पूर्ण मोक्ष प्रदान करने के लिए इस तीर्थयात्रा की शुरुआत करती है। यह यात्रा आस्था व निष्ठा को किनारे कर निर्मल, मानसिक शांति के लिए की गई अंतर्यात्रा है। जीवन-मरण की अनवरत प्रक्रिया को शाश्वत सत्य मानते हुए लेखिका निर्मल द्वारा ‘अंधेरे में बुद्ध’ के लिए अनुवाद किये गए मोरिस ब्लांशों को बार-बार दोहराती है “जो भी ईश्वर को देखता है, मर जाता है, मरना एक ढंग है ईश्वर को देखने का...”  निर्मल ने इस ईश्वर को देखा होगा या नहीं; बताया नहीं जा सकता और जो प्रार्थनाएँ लेखिका करती है वो भी पता नहीं वहाँ पहुँचती है या नहीं पहुँचती है। यहाँ से उसे जाना नहीं जा सकता। इसी को जानने के लिए लेखिका को कैलाश जाना है “दूर कैलाश-हिमालय की घाटियों में, मुझे लगता है, डॉक्टर नहीं, महादेव जी मुझे खींच रहे हैं, कि मैं मनुष्य नहीं, कोई पतंग हूँ, जो उड़ना चाहती है... बस एक झटका और, कि मैं आसमान में होऊँगी।”

यह यात्रा वृत्तांत गगन गिल की कैलाश-मानसरोवर की यात्रा की अलौकिक अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है। जिससे यह मात्र बाह्य यात्रा को ही प्रस्तुत नहीं करता है बल्कि अंतरयात्रा को भी अभिव्यक्त करता है। कैलाश को अगर देखा जाए तो कैलाश किसी धर्म, अनुष्ठान से दूर तीर्थयात्रियों का एक अनौपचारिक संप्रदाय है जिसका भारत से बहुत पुराना संबंध रहा है। लगभग पाँच हजार वर्षों से भारत और तिब्बत के अच्छे संबंध व धार्मिक घनिष्ठता होने के कारण भारतीय हिंदुओं को तिब्बत जाने व तिब्बती बौद्धों के लिए भी भारत में तीर्थयात्रा को लेकर बिना किसी वैमनस्य के तीर्थयात्राएँ होती रही है लेकिन 1959 में तिब्बत को अधिगृहीत करने के बाद लगभग 22 वर्षों तक इस यात्रा की अनुमति नहीं दी गई। फिर 1981 में भारत-चीन कटूता कम होने के बाद दोनों देशों के बीच समझौता करके करीब 500 यात्रियों को भारत से सीधे पश्चिमी तिब्बत में प्रवेश कराके इस यात्रा को करने की अनुमति प्रदान की गई। लगभग तीस दिन में सम्पन्न होने वाली इस यात्रा का मार्ग अत्यंत दुर्गम व पहाड़ों के स्खलन से भरा हुआ है लेखिका लिखती भी है कि “यह यात्रा औसतन 15,000 फीट से 18,500 फीट की ऊँचाई पर जीवित रहने की चुनौती ही नहीं है, इतनी ऊँचाई पर एक मनुष्य के अंतरतम में क्या विभीषिका होती है, उससे बच आने की कसौटी भी है। इस यात्रा का मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक परीक्षण शारीरिक यातना से कुछ भी कम नहीं।”

कैलाश जाना अर्थात देव-पर्वत कैलाश अर्थात आदिम-स्मृति में जाना है। कैलाश के दर्शन पुण्यकारी है और इसका स्थान और कोई नहीं ले सकता। “कैलाश-मानसरोवर इस महाद्वीप की सामूहिक जातीय को जिस तरह झंकृत करता है, कोई दूसरा शब्द नहीं, कोई दूसरा स्थान नहीं।”  वेदों के रुद्र, पुराणों के शिव, आदिवासियों के भैरव, भोले शंकर कभी शिकारी, कभी वैरागी, कभी नटराज, कभी तांडव तालित, सृष्टि को नियमों में बांधकर नियमों का विध्वंस करने वाले शिव सदाशिव है।

हर यात्रा में बाह्य के साथ-साथ आंतरिक चेतना की अनुभूतियाँ को महसूस करने का अवसर मिलता है। इस अंतर्यात्रा में भी अनेक व्यक्ति आते-जाते रहते हैं। जिससे एक तरफ उनकी छवियों, उक्तियों, संवाद, भंगिमाओं, क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया गया है तो दूसरी तरफ धर्म, दर्शन, विवेक व आस्था को अभिव्यक्त किया गया है। यह मन की पीड़ा को शांति प्रदान करने के लिए की गई तीर्थयात्रा है इसी तीर्थयात्रा के लिए लामा अंगारिका गोविंदा का कथन उद्धत करते हुए लेखिका कहती हैं कि “तीर्थयात्रा केवल बाहर की दुनिया से आरंभ नहीं होती, उसकी वास्तविक लय हमेशा भीतर से शुरू होती है, एक अदृश्य भीतरी बिन्दु से..”   
इस यात्रा में लेखिका की रिश्तेदार दंपति के साथ-साथ अनेक अजनबी लोगों से मुलाकात होती है साथ ही पड़ोसी देश चीन, नेपाल व तिब्बत में गाईडों, ड्राईवरों, घोड़ा चालकों से मिलती है। जिनसे सभी से लेखिका का अपनापन है लेकिन फिर भी वह अपने मन की यादों में लिपटी, स्वास्थ्य से जूझते हुए अरुचनीय पीड़ा को सहते हुए अनेक सदस्यों के बीच भी अपने अंतरद्वन्द्व से मुक्त नहीं हो पाती है। इसीलिए यात्रा से ज्यादा अंतर्यात्रा को अभिव्यक्त करने वाला यह यात्रावृत्तांत अन्य यात्रा वृत्तांतों से बिल्कुल अलग है। यह एक आध्यात्मिक यात्रा है जिसमें विश्वास, मिथक व भौगोलिक समस्याओं को अभिव्यक्त किया गया है। यह यात्रा बाहर की नहीं है बल्कि उसके अंदर के अनजान कोनों तक ले जाने वाली यात्रा है। जिससे इसमें बाह्य चित्रण से अधिक दार्शनिकता का पुट आ गया है। मानसरोवर पहुँचकर लेखिका देखती है कि मानसरोवर उजाड़ पड़ा हुआ है उस पर सिर्फ एक झीना-सा धुंध का परदा पड़ा है। वहाँ की दिव्यता को प्रस्तुत करते हुए लेखिका कहती है कि “कैसी है यह जगह ? कुछ ही दिनों में इसने एक-एक करके सारे कवच उतरवा लिए - ज्ञान के, आस्था और शंका के।

अवाक्? क्या यह सही शब्द है, उसे कहने को, जो इस समय हो रहा है हमारे साथ? 
बूँद-बूँद टपकता सन्नाटा 
बाहर सृष्टि में झर रहा है कि कहीं भीतर?”    

हर जगह यह दार्शनिक रोमांच दिखाई देता है। गहरे दृष्टा भावों को अभिव्यक्ति प्रदान की जाती है भीतर ही भीतर उठने वाले अलक्षित, चेतन सूक्ष्म भावों को बहुत ही आत्मीय ढंग के साथ अभिव्यक्ति प्रदान करते हुए लेखिका एक अन्य लोक की यात्रा करने लग जाती है। इसी आंतरिकता के भूगोल को प्रस्तुत करते हुए इस यात्रा वृत्तांत के संबंध में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि “कवयित्री गगन गिल का यह अंतर्यात्रा-वृत्तांत हिन्दी का एक अनोखा दस्तावेज है जिसमें वृत्तांत का ठोसपन, कथा का प्रवाह और कविता की सघन आत्मीयता सब एक साथ है। उसमें स्मृतियों, संस्कारों, अंतध्वनियों, जीवन की लयों आदि सबका एक वृंदवादन लगातार सुनाई देता है। कुछ इस तरह का भाव कि सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा है, प्रतिकृत और झंकृत है।”   

ये यात्रावृत्तांत अपने साथ पाठक को भी साथ लेकर चलता है प्रकृति, मनुष्य, हिमालय, झीलें, नदियाँ, जल, वायु सब एक निरंतर प्रवाह में आकस्मिक, अप्रत्याशित व रहस्यमय रूप से चलते रहते है। अंतर्यात्रा के साथ-साथ लेखिका अपने बाह्य परिवेश के प्रति भी काफी जागरूक है। आस्था को साथ लेकर भी वह तथ्यों को प्रस्तुत करती है। ऊपर काफी ऊँचाई पर होने के कारण ऑक्सीजन की कमी, साधनों की कमी व डॉक्टरों की सुविधा नहीं होने के कारण अनेक व्यक्तियों की रास्ते में ही मृत्यु हो जाती है। इसी तरह वहाँ जाने वाले तीर्थयात्री, पर्वतारोही व बौद्धभिक्षु रास्ते में जाते समय कचरा फेंक देते है जिससे उनके द्वारा फैंके गए सामान व बोतलों से यहाँ अत्यंत गंदगी फैल गई है। जिसके लिए आस्था और ग्लोबल वार्मिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर लेखिका प्रश्न खड़ा करती है। वह कहती है कि “एक नहीं, दो नहीं, तीन-चार जगह हम रुकते हैं, जहाँ से भी जल भरते हैं, साफ नहीं, कुछ तो तैर रहा है, इसे फेंक दें कहीं तो साफ मिलेगा।”  लेकिन वही मटमैला पानी ही लेकर संतोष करना पड़ता है और कहती है कि खैर मैला हुआ तो क्या हुआ मानसरोवर का तो है पीयेंगे नहीं तो पूजा-स्थल में ही रख देंगे।  लेकिन जो पानी पीने योग्य नहीं वह पूजा योग्य कैसे हो सकता है। इसी चिंता को अभिव्यक्त करते हुए एक और प्रश्न आस्था को लेकर करते हुए वह कहती है कि  “विडंबना - क्या इसे हम हमारी सभ्यता की विडंबना कह सकते हैं ? जो पीने योग्य नहीं, वह पूजा योग्य फिर भी है”

इस पुस्तक का सबसे आकर्षक भाग है बीच-बीच में आने वाले उद्धरण।  हर जगह धार्मिक ग्रंथों, महाशिवपुराण, स्कन्ध पुराण, ऋग्वेद व विचारकों की पंक्तियों जैसे बादलेयर, अक्का महादेवी व मिलारेपा संत कवि की कविताएँ को उद्धत करके इसे विशिष्ठ बनाया गया है।  लेखिका कहती भी है कि “अक्का महादेवी के वचन मेरे साथ लगभग पूरी यात्रा करते रहे, महाभारत की उक्तियाँ भी, बादलेयर और ओडेन की कविताएँ भी।  जो मन यात्रा करने गया था, वह सभ्यता, शिक्षा-दीक्षा, पूर्वजों के लेखन-कथन से सींचा मन था।  उसमें उतनी तरह की खाद-मिट्टी न होती न तो ‘अवाक्’ भी न होती। ”

हर यात्रा साहित्यकार की अपनी एक विशिष्ठ शैली होती है जिसका रूप परिवर्तित होता रहता है, कभी निबंधात्मक, कभी कथात्मक तो कभी आलोचनात्मक। भाषा के स्तर पर अगर देखा जाए तो कैलाश अनुभव की अभिव्यक्ति विशिष्ठ ढंग से की गई है। लेखिका के कवयित्री होने का प्रभाव इस पुस्तक पर सीधा दिखाई दे रहा है। जिसमें इसकी भाषा गद्य के साथ काव्यात्मक अधिक होती दिखाई देती है। जिससे गद्य, कविता और मौन मिलकर अभिव्यक्त हो रहे हैं। इसके अनूठे गद्य के बारे में अशोक वाजपेयी कहते हैं कि “यह अनूठा गद्य है जिसमें गद्य और कविता, वृत्तांत और चिंतन के पारंपरिक द्वैत झर गये हैं और जिसमें होने की, मनुष्य होने के रहस्य और विस्मय का निर्मल आलोक, अपनी कई मोहक रंगतों में आर-पार फैला हुआ है।”

इस प्रकार देख सकते हैं कि इस पुस्तक में कैलास मानसरोवर का अनुपम सौन्दर्य, पहाड़, सपाट मैदान, ऊँची-नीची पगडंडियाँ, झीलें, तिब्बतियों की संस्कृति, बौद्ध धर्म के प्रति आस्था, दलाईलामा के प्रति निष्ठा जैसी संपूर्णता को एकाकार करके प्रस्तुत किया गया है।

संदर्भ सूची:-
1. रामणिका गुप्ता, ‘लहरों की लय’(2015), नेहा प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 07 
2. गगन गिल, ‘अवाक - कैलाश-मानसरोवर: एक अंतर्यात्रा’, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली पृ. 14 
3. वही, पृष्ठ 19 
4. वही, पृष्ठ 21
5. वही, पृ. 217  
6. वही, पृ. 211 
7. वही, पृ. 43
8. वही, पृ. 200 
9. वही, पृ. फ्लैप पेज 
10. वही, पृ. 115 
11. वही, पृ. 116 
12. वही, पृ. 212 
13. वही, पृ. फ्लैप पेज

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