समीक्षा: हुल पहाड़िया उपन्यास

लक्ष्मी
लक्ष्मी
एम.ए.- जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
पीएच.डी. शोधार्थी -हिंदी अध्ययन केंद्र, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर-382030 (गुजरात) 

हुल पहाड़िया आदिवासी साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बना चुके लेखक राकेश कुमार सिंह का 2012 में प्रकाशित उपन्यास है। राकेश कुमार सिंह का बचपन झारखण्ड के पलामू में बीता। इनके सभी उपन्यास इसी अंचल को आधार बनाकर लिखे गए। इनके शुरुआती चार उपन्यास है- जहाँ खिले हैं रक्त पलाश (2003), पठार पर कोहरा (2003), जो इतिहास में नहीं हैं (2005) और “साधो यह मुर्दों का गाँव” (2008)। इनके अन्य उपन्यासों की तरह हुल पहाड़िया उपन्यास भी झारखण्ड के आदिवासी समाज, संस्कृति और इतिहास पर केन्द्रित है। इस उपन्यास में राकेश जी ने झारखण्ड के आदि विद्रोही तिलका मांझी की समरगाथा प्रस्तुत की है। यह उपन्यास ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषक साम्राज्यवादी नीतियों के विरुद्ध पहाड़िया जनजाति की बगावत पर आधारित है।   

राकेश कुमार सिंह
उपन्यास के मुखपृष्ट पर इसे “आदि विद्रोही तिलका मांझी की समरगाथा” संबोधित किया गया है। यहाँ से इसकी विषयवस्तु का सीधा संकेत हमें मिल जाता है। इस उपन्यास की भूमिका में लेखक ने इस विषय पर उपन्यास लिखने की चुनौती का जिक्र करते हुए लिखा है कि “बाबा तिलका मांझी पर लिखना मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ने जैसा है।”1 इसका कारण भी वे आरम्भ में ही स्पष्ट कर देते हैं। वे लिखते हैं कि “तिलका बाबा संताल समाज के लिए उनका तिलका मुरमू है। कुछ पहाड़िया विद्वानों के लिए यह जबरा पहाड़िया है। इतिहासविदों के एक समूह के लिए यह ‘मांझी’ नाविक/मल्लाह जाति का व्यक्ति है। कतिपय विद्वान तिलका को मुसहर (एक जाति) से जोड़ते हैं। संताल परगना के जिला गजेटियर (पृष्ट 67) का ‘जउराह पहाड़िया’ नामक यह तथाकथित डकैत कुछ इतिहासकारों के लिए तो एक नितांत कपोल-कल्पित चरित्र ही है। कथा-किवदंतियों का महानायक...!”2 ऐसे व्यक्ति पर लिखना सचमुच चुनौतीपूर्ण कार्य था, जिस के बारे में इतिहास में अधिक कुछ उपलब्ध नहीं था।

हिंदी साहित्य में आदिवासी विमर्श की शुरुआत हुए कुछ दशक बीत चुके हैं। इसके बाद भी आदिवासी विद्रोहों पर बहुत ही कम साहित्य लिखा गया है। इसका कारण संभवतः यह है कि आदिवासी विद्रोहों के बारे में इतिहास और सरकारी दस्तावेजों मे जानकारी ही बहुत कम उपलब्ध है। रचना के इतिहासबोध की परिपक्वता के लिए रचना का ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाना जरूरी है। ऐसे में किसी भी लेखक के लिए इस विषय पर लिखना साहसपूर्ण और श्रमसाध्य कार्य हो जाता है। साहसपूर्ण इसलिए कि रचना के इतिहासबोध पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं और श्रमसाध्य इसलिए कि ऐतिहासिक तथ्य जुटाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। उपन्यास के रचयिता राकेश कुमार सिंह पलामू, झारखण्ड में जन्मे और पले-बढे हैं। उस क्षेत्र की लोककथाओं से वे भली-भांति परिचित रहे होंगे। संभवतः क्षेत्र की ओर प्रतिबद्धत्ता ने उन्हें इस चुनौती को स्वीकार करने का साहस प्रदान किया होगा। 

साहित्य तथ्य और गल्प के समावेश से बना होता है। परन्तु हर रचना में इनका एक ही निश्चित अनुपात नहीं होता। ऐतिहासिक विषय को लेकर लिखे साहित्य में तथ्य केंद्र में होते हैं और रिक्त स्थान को संभावना के आधार पर कल्पना से भरा जाता है। रचना के इतिहासबोध से ही रचना की ऊँचाई का निर्धारण होता है। यदि इतिहासबोध परिपक्व नहीं है तो रचना कोरी कल्पना मात्र रहकर यथार्थ से कट जाती है। हुल पहाड़िया उपन्यास लिखने के क्रम में लेखक ने इतिहास को खंगालकर तिलका मांझी के जीवन से जुड़े तथ्यों को खोजने का भरसक प्रयास किया है। उन्होंने स्वीकार किया है कि “सबसे बड़ी चनौती तो यही थी कि सच पर छाई धुंध के पार जाकर जो भी तथ्यात्मक सच हैं, उन्हें सामने लाना। इस काम के लिए भागलपुर के बुद्धिजीवी पत्रकार राजेन्द्र सिंह जी ने मेरी हरसंभव सहायता की। दुमका में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के खोजी पत्रकार अनूप कुमार वाजपेयी जी की कई रातों की नींद मैंने हराम की है।”3 परन्तु तिलका मांझी पर तथ्यों की उपलब्धता की सीमाओं का उन्होंने उपन्यास की भूमिका में ही उल्लेख कर दिया है। इससे यह साबित होता है कि तिलका पर लिखे उनके इस उपन्यास को हूबहू इतिहास मानने की गलती पाठक को नहीं करनी चाहिए। इसमें तिलका का विद्रोह सत्य है तो उसकी पारिवारिक जानकारी काल्पनिक। राकेश जी के शब्दों में “मैंने तो बस हाशिए के पक्ष में खड़े होकर यह सवाल उठाने की कोशिश की है कि आजादी की लड़ाई का इतिहास दर्ज़ करते हुए आदिवासी समाज के पलड़े में डंडी क्यों मारी? मैं इतिहास का पुनर्लेखन करने की योग्यता नहीं रखता। उपन्यास लिखा है जिसमें चावल दाल की खिचड़ी की भांति रचित साहित्य के साथ इतिहास मिला दिया है।” 4

मेरी नज़र में उपरोक्त दोनों चुनौतियों के बावजूद उपन्यास के लिए ऐसा विषय उठाना ही अपने आप में बड़ी बात है। यह उपन्यास स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक मानसिकता से किये गए इतिहास-लेखन पर सवाल उठाता है। यह ठीक है कि ब्रिटिश राज में जो इतिहास-लेखन हुआ, वह ब्रिटिश हित-पूर्ति के लिए हुआ। इतिहास-लेखन में हमेशा प्रभुत्वशाली पक्ष का गौरवांकन होता आया है। परन्तु आज़ाद भारत में  क्यों उसी परिपाटी पर इतिहास लेखन हुआ? उन्होंने अपनी देशी इतिहास दृष्टि निर्मित क्यों नहीं की? यही वजह है कि तिलका मांझी जो सबसे पहले स्वतंत्रता सेनानी ठहरते हैं, उनको व्यवस्थित इतिहास लेखन में यथोचित स्थान नहीं मिला। यह उपन्यास इस प्रश्न को उठाने के लिए प्रशंसा के योग्य है। 

यह उपन्यास केवल इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण नहीं कि इसने ब्रिटिश-राज के आदिवासी विद्रोही तिलका मांझी पर विमर्श को साहित्य में स्थान दिलाया। इस उपन्यास का महत्त्व इसलिए भी है कि इसमें राजमहल क्षेत्र की पहाड़िया जनजाति की संस्कृति के विविध-पक्षों का बारीकी से वर्णन है। गौरतलब है कि किसी समुदाय की संस्कृति परिवर्तनशील होती है। इसलिए यहाँ अट्ठारहवी सदी में पहाड़िया जनजाति की जो संस्कृति रही उसके बारे में बात की जा रही है। यह उपन्यास आदिवासी जीवनशैली को लेकर गैर-आदिवासी पाठक के ज्ञान को समृद्ध और नज़रिए को परिष्कृत करता है। उनकी परम्पराएं, नृत्य-संगीत, भाषा-बोली, पर्व-त्यौहार इत्यादि का सुन्दर वर्णन उपन्यास में मिलता है। उपन्यास की शुरुआत में ही पहाड़िया समाज की एक बहुत महत्वपूर्ण परंपरा का उल्लेख है-मांझी चुनने की परंपरा। जिससे पता चलता है कि आदिवासी समाज में  लोकतान्त्रिक मूल्यों को स्थान दिया गया था। 

"राजमहल की पहाड़ियों पर बसे पहाड़िया समाज की हजारों वर्षों से चली आ रही परंपरा थी कि गाँव का मांझी (मुखिया) के ज्येष्ठ पुत्र को पिता के बाद मांझी का पद स्वतः प्राप्त हो जाना चाहिए! इस 'चाहिए' में ही भेद था।... भावी मांझी को अपनी पात्रता सिद्ध करनी पड़ती थी।... मांझी के बेटों के परीक्षा में विफल होने पर गाँव का मांझी गाँव के किसी अन्य पुरुष का नाम भी प्रस्तावित कर सकता था।”5 

शेष भारत के समान पहाड़िया आदिवासियों में भी गौत्र के बाहर ही विवाह हो सकते थे। बाल-विवाह होते थे। उदाहरण के लिए- जबरा और रूपनी का विवाह तेरह-चौदह वर्ष की उम्र में निर्धारित हो गया था। विवाह सामान्यत: बड़े-बुजुर्गों द्वारा तय किए जाते थे जिसे नवयुवक और नवयुवतियाँ सहर्ष स्वीकार कर लेती थीं। प्रेम-विवाह को भी नहीं नकारा जाता था। फाल्गुन और गेंदी का विवाह तो इसका प्रमाण है ही साथ ही युवागृह का होना भी यही संकेत करता है। इस समाज में सबसे प्रगतिशील बात थी-यौन शिक्षा की व्यवस्था। इसके लिए ही युवागृह बनाये जाते थे।

 "प्राय: एक झोपड़ी में जीवन काट देने वाले आदिवासी दम्पत्ति देह-भाषा और यौन-छंदों की समझ होने से पहले ही से अपने किशोर बच्चों को युवागृह में सोने भेजने लगते हैं। युवागृह मात्र रात बिताने की जगह नहीं होती वरन किशोर-किशोरियों के युवा प्रशिक्षण केंद्र भी होता है। अरण्य के भावी नागरिकों को सामाजिकता और भावी जीवन के पाठ पढ़ानेवाली शाला। लड़कियों के लिए पृथक युवागृह होते हैं,जहाँ वे विवाह होने तक रात में सोने जाती हैं।  लड़के जब तक विवाह कर अपनी पृथक झोपड़ी न खड़ी कर लें या लडकियाँ ब्याह कर घर से विदा न हो जाएँ, युवागृह ही उनके शयन-स्थल होते हैं।”6

पहाड़िया जनजाति में पर्व-त्योहरों व मेलों को विशेष महत्त्व प्राप्त है। पथरीली धरती पर छींट दी गई कुल्थी और जंगली खरगोशों व बटेरों के शिकार पर जीवन यापन करने वाली पहाड़िया जनजाति का सामाजिक जीवन कितना रसपूर्ण है, इसका अनुमान इनके सामाजिक जीवन खुशहाल जीवन से लगाया जा सकता है। तीन दिन का शिकार पर्व बेझा-तुन हो या शाम ढले मांदल की थाप से निकलता संगीत या बाघबुरु मेले में पारंपरिक पोषाक में सजी बालाओं का झूमर नाच इस जीवन-शैली की एक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। कोई विवादित मसला सुलझाने का अपना तरीका ‘गिरह’ (न्योता) भेजकर पंचायत करना और फैसला न मानने पर ‘बिटलाहा’ यानी पंचायत से बाहर करने के दंड जैसी विशिष्ट परम्पराओं से भी पाठक परिचित होता है।

पहाड़िया आदिवासियों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन और शिकार है। कृषि का इस समाज में अधिक महत्त्व नहीं है। इसके पीछे “जितना प्रकृति से प्राप्त होगा उसी में संतुष्ट रहने की विचारधारा” निहित है। कृषि केवल दुर्भिक्ष काल में की जाती थी, वह भी खुंटकट्टी। जमीन के एक हिस्से से झाड़ियों को काटकर-जलाकर उसे साफ़ करके उस पर हल-बैल के द्वारा नहीं बल्कि कुदाल से जमीन कोड़ कर बीज छींटकर। और इस प्रकार जो भी अन्न हो जाए, उसी में पहाड़िया आदिवासी संतुष्ट रहते। उपन्यास में पहाड़िया आदिवासी समाज की एक विशिष्ट परंपरा का जिक्र किया गया है। असमय मृत्यु होने पर पहाड़िया शव को दुर्गम स्थान पर छोड़ आना। कुछ अन्य समाजों में भी (जैसे पारसी समाज में) इस तरह की प्रथाएँ मिलती हैं। इसके पीछे यह दर्शन होता है कि जिस प्रकार प्रकृति की अन्य चीज़ें मनुष्य के लिए उपयोगी है, उसी प्रकार मनुष्य को भी प्रकृति के लिए उपयोगी होना चाहिए। इसलिए मृत शरीर का सबसे बेहतर उपयोग यही हो सकता है कि वह पशु-पक्षियों की भूख मिटाने के काम आए। 
“हत्या, आत्महत्या, सर्पदंश या किसी  दुर्घटना में अस्वाभाविक मृत्यु होने पर मृतक के लिए विशेष कर्मकांड का विधान तो था नहीं । न शव को जलना था, न जमीन में गाड़ना था । बस मृतक के शरीर को दृष्टि-क्षेत्र से परे किसी दुर्गम स्थान पर छोड़ आना था ।”7

तेलियागढ़ी का सपना इस उपन्यास के शुरू से लेकर अंत तक बना हुआ है। यह फंतासी शिल्प का सफल प्रयोग है। इस शैली से कम शब्दों में उपन्यासकार अपनी बात को पाठक तक पहुंचा सकता है। इतिहास में जबरा पहाड़िया और तिलका पहाड़िया दो नाम मिलते हैं। पहला व्यक्ति संताल परगना गजेटियर में एक डाकू के रूप में नामदर्ज है तो दूसरा लोकमानस में एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में। तेलियागढ़ी के सपने के विकास के माध्यम से लेखक दोनों व्यक्तियों का संबध स्थापित करता है। वे दोनों व्यक्ति दरअसल एक ही व्यक्ति के चारित्रिक विकास के चरण हैं इसलिए सपने में दिखाया गया है कि माँ विषहरी के सम्मुख तिलका जबरा को मार देता है और स्वयं दमदमा बजाने लगता है। इस स्वप्न के माध्यम से लेखक इस तथ्य को तो स्थापित करता ही है साथ में उपन्यास को गति भी प्रदान करता है। 

निष्कर्ष
यह उपन्यास वास्तव में दो संस्कृतियों के टकराव पर आधारित है। एक वह है जो प्रकृति से सब कुछ लूट लेने के लिए भूखी (ब्रिटिश) है और दूसरी (पहाड़िया जनजाति) प्रकृति जितना स्वेच्छा से दे, उसी में जीवन यापन करके संतुष्ट रहने वाली है। एक और है- निश्छल और सादगी भरा जीवन जीने वाले पहाड़िया और दूसरी और लोमड़ी की तरह चालबाज ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी है। तिलका मांझी की बगावत दूसरी संस्कृति के प्रति विद्रोह है। यह बगावत इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यह ब्रिटिश 

सत्ता के विरुद्ध भारत का पहला विद्रोह है। इसके बाद जनजातीय विद्रोहों की एक लम्बी श्रंखला शुरू हो जाती है, जिसमे सिदो-कान्हू, चाँद-भैरव, बिरसा मुंडा, ताना भगत के विद्रोह शामिल हैं। तिलका मांझी से शुरू हुआ ब्रिटिश संस्कृति का विरोध 1947 में आज़ादी मिलने तक लगातार चलता है। यह उपन्यास इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह इतिहास लेखन की पद्धति पर सवाल उठाता है, भारत के एक महत्वपूर्ण विद्रोह (हुल पहाड़िया) को मुख्यधारा में लेकर आता है और इसलिए भी कि पहाड़िया जनजाति के जीवन-मूल्यों से हिंदी के पाठक वर्ग को परिचित कराता है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में आदिवासी विद्रोहों पर उपन्यास लेखन की दृष्टि से एक सशक्त उपन्यास है।  

आधार ग्रंथ
1)  राकेश कुमार सिंह, हुल पहाड़िया, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 110002 
2) राकेश बिहारी, नेपथ्य का नायक-तिलका मांझी, परख, समालोचनडॉटब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम  (https://samalochan.blogspot.com/2014/11/blog-post_7.html)

 
सन्दर्भ ग्रंथ
1)  राकेश कुमार सिंह, हुल पहाड़िया, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 110002 पृष्ठ 7 
2) वही, पृष्ठ 7
3) राकेश कुमार सिंह, साक्षात्कार वार्ता (जूडिथ जोपारी, मिज़ोरम विश्वविद्यालय, एम.फिल थीसिस 
4)  वही 
5) राकेश कुमार सिंह, हुल पहाड़िया, सामयिक बुक्स, नई दिल्ली, 110002 पृष्ठ 12 
6) वही, पृष्ठ 48
7) वही, पृष्ठ 181 
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