रामचरितमानस की लोकप्रियता: विश्लेषणात्मक अध्ययन

नेहा कल्याणी

पी.एच.डी (हिन्दी, संस्कृत), एम. फिल.(संस्कृत),  एम.ए. (हिन्दी, संस्कृत), नेट (संस्कृत), सेट (हिन्दी )
सहायक व्याख्याता, भाषा विभाग (हिन्दी), गोविंदराव सेकसरीया अर्थ-वाणिज्य महाविद्यालय, नागपुर
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सारांश:- कलात्मक दृष्टि से रामचरितमानस एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रचना है इसलिए उसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उसका कलात्मक रूप भी है और वह भी ऐसा कलात्मक रूप जो अपने होने का आभास नहीं कराता, अपितु उसकी लोकप्रियता के कारण उसका कलात्मक रूप गौण हो जाता है। प्रायः रचनाओं में जहाँ कला अपने होने का आभास कराने लगे तो वहाँ लोकप्रियता में वह बाधक बन जाती है।
भारत में रामायण-लेखन की एक लम्बी परम्परा रही है; यहाँ शायद ही ऐसा कोई समुदाय हो जिसके पास अपना रामायण न हो लेकिन अवध के रामचरितमानस को जो लोकप्रियता मिली वह किसी अन्य रामकथा को नसीब न हुई। रामचरितमानस की लोकप्रियता का मूल्यांकन करते समय यह भी याद रखना होगा कि पहले से लोक-परम्परा में मौजूद तत्व इसे लोकप्रिय बनने में मददगार कैसे साबित हुए। यह संयोग की बात है कि ऐसी सारी स्थितियाँ जो किसी एक रचना के साथ मुश्किल से घटित होती हैं वह मानस प्रसंग में सम्मिलित रूप से दिखाई देती हैं।

अद्वितीय कथात्मकता के बल पर भी यह रचना लोकप्रिय बनी है, वास्तव में रामचरितमानस का जो नेरेटिव है, कथात्मकता का गुण है, राम-कथा की लम्बी परम्परा में अद्वितीय है। कथा कहने की जितनी उन्नत, सूक्ष्म और प्रभावशाली कला तुलसी की है, राम-कथा की पूरी परम्परा में शायद ही कहीं दिखाई दे। रामचरितमानस के छन्द में जो संगीतात्मकता है, गेयता है उसने भी इस रचना को लोकप्रिय बनाने में योग दिया है। चौपाई, छन्द और दोहा में गेयता बहुत अधिक है।

कुंजी शब्दः- रामचरितमानस, लोकप्रियता, रामायण।


शोध-प्रपत्र

कलात्मक दृष्टि से रामचरितमानस एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रचना है इसलिए उसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण उसका कलात्मक रूप भी है और वह भी ऐसा कलात्मक रूप जो अपने होने का आभास नहीं कराता, अपितु उसकी लोकप्रियता के कारण उसका कलात्मक रूप गौण हो जाता है। प्रायः रचनाओं में जहाँ कला अपने होने का आभास कराने लगे तो वहाँ लोकप्रियता में वह बाधक बन जाती है। लेकिन जहाँ वह अपने होने का आभास न कराये वहीं कला प्रभावशाली बनकर रचना को लोकप्रिय बनाती है रामचरितमानस की कला पाठक को अलग से महसूस नहीं होती बल्कि आप कह सकते हैं कि 'मानस' की संवेदना और विचारधारा दोनों को सहज रूप में पाठक तक पहुँचा देती है। 

विचारधारा की जटिलता को देखिए तो लगेगा कि रामचरितमानस में अनेक तरह के संघर्ष हैं, उन सारे संघर्षो और किंकर्तव्यमूढ़ता को तुलसीदास की चेतना के द्वन्द्व मानकर तो नहीं देखा जा सकता। हाँ, यही बात विनय-पत्रिका के साथ नहीं है, कवितावली के साथ नहीं है जबकि इन रचनाओ का सृजन भी तुलसीदास ने ही किया है; लेकिन ये रचनाएँ भारतीय जन समाज में उतनी लोकप्रिय नहीं हैं, जितनी कि रामचरितमानस। बहुत सारे लोगों का खयाल भी है कि कला की दृष्टि से प्रगति के स्तर पर, आत्माभिव्यक्ति के स्तर पर विनयपत्रिका एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रचना है। फिर भी वह उतनी लोकप्रिय इसलिए नहीं है क्योंकि उसमे कला दिखाई देती है। रामचरितमानस के साथ यह बात नहीं है। उसकी भाषा शैली पाठको को कठिन प्रतीत होती है,तुलसीदास की अन्य रचनाओ की तुलना में रामचरितमानस भारतीय जनसमाज में रचा बसा है। रामचरितमानस की विचारधारा में जो एक तरह से पुरानेपन के तत्त्व हैं या कहिए कि जो स्त्रियों के प्रसंग में, दलितों के प्रसंग में या अन्य किसी भी प्रसंग में या सामाजिक विकास की प्रक्रिया के प्रसंग में जो अतीतोन्मुखी तत्त्व हैं उनको इस रूप में व्यक्त करना कि अपनी अतीत का प्रभाव खोकर वो नवीनता का बोध कराये; यह रामचरितमानस की कला का गुण है। 

भारत में रामायण-लेखन की एक लम्बी परम्परा रही है; यहाँ शायद ही ऐसा कोई समुदाय हो जिसके पास अपना रामायण न हो लेकिन अवध के रामचरितमानस को जो लोकप्रियता मिली वह किसी अन्य रामकथा को नसीब न हुई। यह सही है कि भारत में राम-कथा अनेक रूपों में मौजूद रही है तुलसी के पहले, लेकिन किसी को वह लोकप्रियता नहीं मिली जो रामचरितमानस को मिली। इसका कारण यह हो सकता है कि उत्तर-भारत में तुलसी-पूर्व की अधिकांश रामकथाएँ संस्कृत में लिखी गयी थीं और अनेक लोगों के दावों के बावजूद संस्कृत कभी लोकभाषा नहीं रही। संस्कृत और लोक के बीच मध्यस्थता का लाभ पण्डितों ने उठाया। संस्कृत में मौजूद ज्ञान हो या सहित्य हो, चूंकि जनता उसे सीधे न पढ़ सकती थी न पहचान सकती थी इसलिए उसके लोकप्रिय होने का सवाल ही नहीं था। संस्कृत में मौजूद रामकथा की अलोकप्रियता का बुनियादी कारण तो उसकी भाषा है। दूसरी बात कि तुलसीदास ने लोक और शास्त्र के आपसी सम्बन्ध की तरह ही संस्कृत और लोकभाषा को भी आपस में जोड़ा। बोलियों में सम्प्रेषणीयता की अपार क्षमता होती है। इसका एक प्रमाण यह है कि ब्रजभाषा को ठीक से न जाननेवाला भोजपुरी भाषी भी सूरदास को समझता है, राजस्थानी न जानने के बावजूद पाठक मीराबाई की कविता को समझता है। उसी प्रकार एक ब्रजभाषी सामान्य अनपढ़ भी कबीर को समझता है।

सवांद धर्मिता और सम्प्रेषणीयता ने रामचरित मानस को अधिक लोकप्रिय बनाया। भारत एक धर्मप्रधान देश है और धर्म यहाँ की जनता का प्राण तत्व है। अतः एक स्तर पर रामचरितमानस धीरे - धीरे धार्मिक काव्य बन गया और धार्मिक काव्य बनने के कारण लोगों के लिए आस्था का विषय बना परिणामतः उसकी लोकप्रियता बढ़ी। साथ ही रामचरितमानस एक संयुक्त परिवार की कथा है; संयुक्त परिवार के संकट, उसकी समस्या, उसके द्वन्द्व, उसकी दुविधाएँ इन सभी तत्वों की अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में लोग रामचरित मानस में देखते है; इसलिए आम आदमी अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में मानस की चौपाइयों और दोहों को जितना याद करता है, विशेषकर संकट की घड़ी में, उतना शायद ही और किसी रचना को कोई याद करता हो। यही नहीं, भारत की जनता मानस को पढ़ती नहीं बल्कि रामचरित मानस को अपने दैनिक जीवन में जीती है। वास्तव में दुनिया में महत्त्वपूर्ण काव्य वही होता है जो जीवन में संकट के समय याद आये और काम आये। इस मापदंड पर रामचरितमानस सार्थक प्रत्तीत होता है। रामचरितमानस उन रचनाओं में है जो अपने पाठकों श्रोताओं को कवि बनाता है। भारत के गांव के लोगों को आधी चौपाई याद है और वह आधी चौपाई अपनी ओर से गढ़कर पूरा कर लेता है। इस प्रकार की काव्य क्षमता सम्पूर्ण भारतीय कविता में केवल दो कवियों के पास है एक तुलसीदास और दूसरे कबीरदास के पास।

गीता- गोरखपुर प्रेस ने अनेक तरह के सस्ते और महँगे संस्करण छापकर उन्हें दूर-दूर तक पहुँचाकर और कथा वाचकों ने अपनी प्रभावी वक्तृत्व क्षमता से रामचरितमानस को लोकप्रिय बनाने का काम किया। इस तरह मानस की लोकप्रियता को बढ़ाने के अनेक प्रयत्न एवं पक्ष हैं जिन पर विचार किया जाना चाहिए। रही बात रामचरितमानस की लोकप्रियता एवं उसके सहारे लोकप्रियता के समाजशास्त्र की सामान्य दिशाएँ खोजने की तो प्रतीत होता है कि मानस वास्तविक स्तर पर धार्मिक ग्रन्थ माना जाता है किन्तु दूसरे स्तर पर एक साहित्यिक कृति भी मानी जाती है इसलिए इसकी स्थिति थोड़ी अलग-सी है। इसकी लोकप्रियता पर विचार करते समय साहित्यिक कृति की लोकप्रियता और धार्मिक ग्रन्थ के लोकप्रियता इन दोनों स्थितियों पर विचार करना जरूरी है। केवल एक के बारे में बात करके रामचरितमानस की लोकप्रियता को समग्र रूप से समझना सम्भव नहीं है।

रामचरितमानस की लोकप्रियता का मूल्यांकन करते समय यह भी याद रखना होगा कि पहले से लोक-परम्परा में मौजूद तत्व इसे लोकप्रिय बनने में मददगार कैसे साबित हुए। यह संयोग की बात है कि ऐसी सारी स्थितियाँ जो किसी एक रचना के साथ मुश्किल से घटित होती हैं वह मानस प्रसंग में सम्मिलित रूप से दिखाई देती हैं। हम बाइबिल का उदाहरण दे सकते हैं। लेकिन अनेक स्तरों में रामचरितमानस बाइबिल से भिन्न भी है; बाइबिल की सारी साहित्यिक व्याख्या के बावजूद यह उस तरह की साहित्यिक रचना नहीं है जैसी कि रामचरितमानस है इसलिए जाहिर है कि साहित्य के समाजशास्त्र एवं लोकप्रियता के समाजशास्त्र के निर्माण के सामने रामचरितमानस की लोकप्रियता कई तरह के सवाल खड़ा करती है। जन-जीवन में रामलीला के माध्यम से रामचरितमानस की प्रस्तुति की जो लम्बी परम्परा है उसने मानस ' को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। किन्तु जैसी लोकप्रियता रामचरितमानस को मिली है वैसी लोकप्रियता बाईबल या अन्य किसी धार्मिक ग्रन्थ को नहीं मिली है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से जाहिर है रामचिरतमानत एक लोकप्रिय टेक्स्ट है इसलिए वह सिफ एक साहित्यिक पाठ ही नहीं है बल्कि पाठक को उसे एक सांस्कृतिक पाठ के रूप में देखना चाहिए; क्योकि लोकप्रिय कला अभिजन एवं जन संस्कृति में समान रूप से अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेती है।

 तुलसी वर्णाश्रम' एवं 'ब्राह्मणवाद' के पक्षधर हैं और उसे स्थापित करना चाहते हैं। क्या मानस की लोकप्रियता को हमारे समाज में ब्राह्मणवाद की पुनप्रतिष्ठा का द्योतक माना जा सकता है? स्तर पर, साहित्य और कला की दुनिया की एक विशेषता यह है कि इसमें परम्परा बनती हैं उसमें परिवर्तन होता है लेकिन उनके बनने, परिवर्तन होने में बहुत कुछ नष्ट होने के बावजूद जो विकास की प्रकिया है उसमें पीछे की रचनाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। बहुत पुराना एक कथन है कि साहित्य के लोकतन्त्र में हजार वर्ष पुरानी रचनाएँ भी उतनी ही जीवित नागरिक होती हैं जितनी कि तत्कालीन रचनाएँ। इसलिए तुलसी के मानस' में जो भावनाओं का द्वन्द्व है, लोक जीवन के अनुभव हैं, जो अपने समय और समाज को प्रतिबिम्बित करने का प्रयास है।

अद्वितीय कथात्मकता के बल पर भी यह रचना लोकप्रिय बनी है, वास्तव में रामचरितमानस का जो नेरेटिव है, कथात्मकता का गुण है, राम-कथा की लम्बी परम्परा में अद्वितीय है। कथा कहने की जितनी उन्नत, सूक्ष्म और प्रभावशाली कला तुलसी की है, राम-कथा की पूरी परम्परा में शायद ही कहीं दिखाई दे। जो आख्यान है वह तो जीवन का ही दूसरा नाम है। रोला वार्थ ने कहीं लिखा है कि जैसा जीवन है वैसा ही आख्यान है और जहा आख्यान इतना सहज हो जाये कि वह जीवन से ही एकाकार हो जाये वहा उसका प्रभाव बहत गहरा होता है इसलिए तुलसीदास के इस आख्यान से रामचरितमानस को अद्भुत लोकप्रियता मिली। 
जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्त करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम आख्यान है इसलिए आज के दौर में भी जो थोड़े लोकप्रिय कवि हैं नागार्जुन, रघबीर सहाय इनकी बुनियादी विशेषता यह है कि पांच लाइन की भी ये कविता लिखेंगे तो उसमें छोटी-सी ही सही, कथा होगी, उसमें आख्यान जरूर होगा और वही आख्यान लोगों को बांधता है। इसलिए इसमें तो दो राय ही नहीं कि रामचरितमानस की लोकप्रियता के अनेक कारणों में से एक बड़ा कारण उसका आख्यान भी है। किन्तु तकनीक के इस युग में भी मानस की लोकप्रियता का श्रेय रामानंद सागर के टी.वी. सीरियल को भी दिया जाना चाहिए।

आख्यान के अलावा, रामचरितमानस की लोकप्रियता में उसके दोहा-चोपाई-छन्द का भी योग है। चौपाई में सहज रूप से याद हो जाने की क्षमता, स्मृति में बस जाने की क्षमता बहुत है बल्कि स्मृति मे बस जाने का ही परिणाम यह होता है कि श्रोताओं को वह कवि बनाने लगती है। यह छन्द श्रोता और पाठक की स्मृति पर इतना हावी हो जाता है कि वह स्वयं अपनी ओर से भी कुछ जोड़ने लगते हैं। हिन्दी में ये दोनों छन्द-दोहा-चौपाई बहत पहले से चले आ रहे थे, लेकिन तुलसी ने इसे इतना सहज बना दिया कि 'मानस' में प्रयुक्त अन्य छन्दों को लोग याद तक नहीं करते। लोक-मानस में यही दोनों छन्द इतने बसे हुए हैं कि जन ह्रदय में मानस गहराई से समा गया है। परिणामत: रामचरितमानस में दोहा-चौपाई को सहज रूप से जो कलात्मकता प्रदान की गयी है वह भी उसकी लोकप्रियता का एक बड़ा कारण है।

 रामचरितमानस के छन्द में जो संगीतात्मकता है, गेयता है उसने भी इस रचना को लोकप्रिय बनाने में योग दिया है। चौपाई, छन्द और दोहा में गेयता बहुत अधिक है। वैसे पूरे भक्ति-काव्य में कविता और संगीत की अद्भुत एकता है; वह कबीर के यहाँ भी है, मीरा के यहाँ भी है, सूर के यहाँ भी है। यह अकारण नहीं है कि जितने शास्त्रीय संगीत के गायक हैं वे अधिकांशतः भक्त कवियों के ही गायक हैं। तुलसीदास की विशेषता यह है कि विनय-पत्रिका के पदों के साथ-साथ मानस' की चौपाई में भी वह संगीतमयता विकसित की कि बड़े गायकों को तो छोड़ दीजिए, उन्होंने तो गाया ही है; सहज रूप से आम लोग न सिर्फ इसे गाते हैं बल्कि तरह-तरह के रागों में इसे बाँधने का प्रयत्न करते हैं। 

संदर्भ ग्रन्थ सूची:-
1. तुलसीदास, नंदकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
2. हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल,नागरी प्रचारणी सभा, वाराणसी
3. तुलसी, संपादक उदय भानु सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली
4. तुलसी, आधुनिक वातायन से, रमेश कुंतल मेघ, भारतीय ज्ञानपीठ, 1973
5. लोकवादी तुलसीदास, विश्वनाथ त्रिपाठी, राधाकृष्ण, 2007

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