पुस्तक समीक्षा: जीवन संघर्ष की संवेदनात्मक कहानियाँ: जल-प्रांतर (अरुण प्रकाश)


समीक्षक: पी. अंजली

पीएचडी. हिंदी (शोधार्थी), हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल (केंद्रीय) विश्वविद्यालय, श्रीनगर, उत्तराखंड
स्थायी पता:- बरगढ़, ओड़िसा
ईमेल:- Panjali9605@gmail.com

कृति:- जल-प्रांतर (कहानी- संग्रह)
लेखक:- अरुण प्रकाश
ISBN:- 978-93-81923-38-2
प्रकाशक:- अंतिका प्रकाशन, गाज़ियाबाद (उ.प्र)
प्रकाशन वर्ष:- 1994 (प्रथम संस्करण); 2013 (पहला पेपरबैक संस्करण)
मूल्य: 100 रुपए , पृष्ठ संख्या:- 96

बिहार के बेगूसराय में जन्मे बहुआयामी प्रतिभा संम्पन्न कथाकार ‘अरुण प्रकाश’ एक सफल आलोचक, पत्रकार, संपादक, कवि, पटकथा लेखक होने के साथ ही एक सफल अनुवादक के रूप में भी सुपरिचित रहे। पत्रकारिता विषय से जुड़े होने के कारण स्वतंत्र लेखन कार्य में भी उनकी रूचि बहुत अधिक थी। ‘उन्होंने विभिन्न विषयों की लगभग आठ पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद भी किया साथ ही वे दूरदर्शन पर प्रसारित ‘चंद्रकांता’ समेत कई धारावाहिकों, वृतचित्रों एवं टेलीफिल्मों से भी जुड़े रहे। अनेक पुरस्कारों व सम्मानों से सम्मानित अरुण प्रकाश जी साहित्य अकादमी के प्रतिष्ठित पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक के रूप में भी कार्यरत रहे। अंततः एक लम्बी अवधि से बीमार होने के कारण 18 जून 2012 को उनका असमय निधन होना सम्पूर्ण साहित्य जगत के लिए क्षतिपूर्ण रहा’1 परंतु उनके लिखित साहित्य सृजना के माध्यम से वे सदा हम सबके बीच अमर रहेंगे।

वर्ष 1994 में अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित अरुण प्रकाश की यह कहानी संग्रह ‘जल-प्रांतर’ अपने कथ्य और कथा शैली के कारण अद्वितीय है। प्रस्तुत संग्रह में मुख्यत: छह कहानियाँ संग्रहित हैं। क्रमशः ‘ये अधूरी कहानी’, ‘एक ज़िन्दगी स्थगित’, ‘छाया-युद्ध’, ‘कथा-उपकथा’, ‘बीच सड़क पर’ और ‘जल-प्रांतर’।

अरुण प्रकाश की प्राय: कहानियाँ सीधे समाज के आम जन से जुड़ती है। यही कारण है कि उनके प्रत्येक कहानियों में जो समाज या पात्रों का चित्र उभरता है उनमें एक गहरी संवेदना अभिव्यक्त होती है। कहानी-संग्रह ‘जल-प्रांतर’ की ‘जल-प्रांतर’ शीर्षक कहानी ‘अरुण प्रकाश’ की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। बिहार के कुछ हिस्से में आए भीषण बाढ़ की विभीषिका पर यह कहानी केन्द्रित है। कहानी का वर्णन लेखक इस प्रकार करते हैं कि पाठक स्वयं अपने आप को उस जल-प्रांतर के मध्य महसूस करता है। लेखक के सहज कथनिय शैली की विशेषता के कारण बाढ़ जैसे भयावह परिदृश्य से शुरू होता हुआ यह कथा वर्णन पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक स्वयं उस जगह मौजूद रहकर जैसा देखा वैसे ही उसका शब्दश: लिख दिए हों। बिल्कुल यथार्थ, एक ‘रिपोर्ताज’ की भांति। कहानी की घटनाएं ऐसी कि पाठक भी स्वयं उस बाढ़ में पीड़ित महसूस करता है और साथ ही बाढ़ के पश्चात पीड़ित अंचलों की समस्याओं को नज़दीकी से देख व जान पाता है। हिंदी साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध आलोचक ‘नामवर सिंह’ भी इस कहानी की लेखन शैली पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं –
“जल-प्रांतर कहानी के रूप में रिपोतार्ज़ है। बिहार की बाढ़ का शायद ही कहीं ऐसा विवरण मिलता हो जो यथार्थ के इतना करीब हो। ”2

कहानियों में पात्रों की अहम् भूमिका होती है। अरुण प्रकाश के पात्र अत्यंत सहज, सरल व संवेदनशील हैं। अपनी बात व चिंता पाठकों तक प्रेषित करने में यह पात्र समर्थ भी हैं। प्राय: उनके पात्र निम्नवर्ग से आते हैं। संग्रह की कहानी ‘ये अधूरी कहानी’ जिसमें एक साउथ इंडियन पांच सितारा रेस्त्रां में वेटर स्टाफ सुपरवाइजर के रूप में काम कर रहे ‘विलियम’ पर केंद्रित है। बड़े-बड़े शहरों और महानगरों के बड़े-बड़े रेस्त्रां में काम कर रहे वेटरों के जीवन संघर्षों को ‘विलियम’ के माध्यम से दर्शाया गया है। इस कहानी के आड़ में सिर्फ एक चीज़ अधूरी रह जाती है वह है- प्रेम (विलियम और हेलेन की) जो अंत में पाठक को गहरी संवेदना से अभिभूत कर देती है।

कहानी ‘एक जिंदगी स्थगित’ में एक सामान्य तालेवाले- ‘सुच्चासिंह’ और उसके जैसे कई अन्य तालेवालों के जीवन संघर्ष व उनके दयनीय परिस्थिति को दर्शाया गया है। इस कहानी के माध्यम से ‘अरुण प्रकाश’ समाज में छोटे-छोटे व्यवसाय कर आजीविका चलाने वालों के विषय में चिंतित लगते हैं जिनका व्यवसाय आज के समय में सम्पूर्णत: खत्म होने जैसे संकट में हैं।

कहानी ‘छाया-युद्ध’ में नाटक कंपनी में पर्दा उठाने वाले व्यक्ति का चित्रण है। नाटक के मुख्य नायक की अनुपस्थिति पर एक दिन उस व्यक्ति को नायक बना दिया जाता है। वह धीरे–धीरे अभिनय सीख लेता है और दर्शकों के मध्य बहुत लोकप्रिय हो जाता है। वह पर्दा उठाने वाले कर्मचारी से अचानक ‘हमारा नायक’ बन जाता है। यह जरुर ‘अरुण प्रकाश’ जी का नाट्य कौशल व पटकथा लेखन का अनुभव ही है जो इस प्रकार के कथ्य को लेकर कहानी रचने को उत्साहित किया होगा। ठीक इस प्रकार कहानी-संग्रह ‘जल-प्रांतर’ में संकलित कहानी ‘बीच सड़क पर’ में कथा की शुरुआत सूत्रधार के माध्यम से करना और साथ ही साथ कथा की घटना का परस्पर आगे बढ़ना, पाठक को बड़ी सहजता से कहानी की मूल संवेदना तक पहुँचने में सहायक होती है। कहानी में एक पिता का अपनी बेटी के विवाह को लेकर किस प्रकार की चिंता स्वभावत: होती है यहाँ दर्शाया गया है। एक पिता-पुत्री के प्रेम का शब्दशः चित्रण अरुण प्रकाश इस कहानी के माध्यम से करते हैं।

कहानी ‘कथा-उपकथा’ के माध्यम से पारिवारिक संबंधों में आज-कल के बढ़ते दूराव को दर्शाने का प्रयास लेखक ने किया है। हमारे समाज की नई पीढ़ी किस प्रकार गाँव को छोड़ शहर की ओर जा रही है और वहां से वापस लौटना नहीं चाहते। दूसरी ओर पुरानी पीढ़ी (बुजुर्ग माँ-बाप) अपनी गाँव छोड़ कर शहर नहीं जाना चाहते इस बात को कहानी के पात्र उमेश चंद्रा के माध्यम से लेखक ने दर्शया है। कहानी में आज-कल के बदलते रिश्तों के मायने एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों के प्रति एक ऊब दिखती है। अपनों के खुशियों के लिए समय निकलना आज सबके पास कम है जिसके कारण आज खास तौर पर परिवार के वृद्ध जनों की स्थिति विमर्श का रूप ले रही है। वे परिवार के मध्य रहकर भी अकेलापन, संत्रास व ऊब की जिंदगी जीते हैं जिसका उदाहरण हम अपने समाज के आस-पास भी देख सकते हैं।

समग्रत: कहानी संग्रह की भाषा सहज, सरल व सामान्य है। लेखक की लेखन शैली व शब्द चयन की कुशलता इस प्रकार का चुम्बकीय प्रभाव रखता है जो पाठकों को प्रत्येक कहानी अंत तक पढने के लिए निरंतर उत्साहित करते हैं। बिहार प्रदेश से जुड़े होने के कारण मातृभाषा भोजपुरी का प्रयोग कई जगह लेखक ने किया है जिससे कहानी की कथात्मकता या मूल संवेदना बिलकुल प्रभावित नहीं हुई बल्कि और अधिक रोचक प्रतीत होती है। इस प्रकार देखा जाए तो ‘अरुण प्रकाश’ की कहानियाँ उनकी लेखनीय कला कौशलता और शिल्पगत कौशलता के सफल परिचायक हैं और कहानी संग्रह ‘जल-प्रांतर’ उसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

सन्दर्भ सूची:-
1. https://www.jagranjosh.com/current(हिंदी-के-उपन्यासकार-और-कथाकार-अरुण-प्रकाश-का-नई-दिल्ली-में-निधन-1340174564-2.
2. अरुण प्रकाश, जल-प्रांतर, 2013, अंतिका प्रकाशन, गाज़ियाबाद-,उ.प्र-201005

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