यह केवल नींद से जगाने भर की कोशिश नहीं, बहुत कुछ है (पुस्तक समीक्षा)

श्रवण कुमार

शोधार्थी, हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय
चलभाष: 9466803101

पुस्तक: ऐसी कैसी नींद (कविता संग्रह)
कवि: भगवत रावत
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण: 2004

साहित्य में समकालीन कविता के दौर के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर भगवत रावत का काव्य संग्रह ‘ऐसी कैसी नींद’ 2004 में आया कविताओं का संग्रह है जो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है। संग्रह में 54 के लगभग कविताएँ हैं। अपनी सादगी के कहन और ढंग के चलते कवि का हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है। सरलता से शब्दों में अपनी बात कह देना कला का अभाव लगते हुए भी यहाँ एक काव्यात्मकता से भर देता है। इन कविताओं में कवि ने जिस नींद की ओर संकेत किया है वह वास्तव में हमारे पारंपरिक मूल्यों और मानवता के प्रति उदासीनता है। हमारे सामाजिक रिश्तों में आज जिस तेजी से बदलाव आता जा रहा है,जिस अकेलेपन की ओर हमारी दुनिया बढ़ रही है उसी के प्रति कवि यहाँ सचेत कर रहा है। हमारा पारंपरिक भाईचारा आज अपनी ही दुनिया में जीने लगा है। किसी को किसी से कोई वास्ता आज नहीं रहा। इसलिए कवि को लगता है कि शायद हम किसी गहरी नींद में सो गए थे और इसी का फायदा उठाकर कोई हमारे इन मूल्यों को या कहें कि हमारी सामाजिक दुनिया को हम से चुरा कर ले गया है। संग्रह में बहुत सी ऐसी कविताएँ हैं जिनमें इन मूल्यों को खोजने की कोशिश की गयी है और उनके न मिलने पर कवि की पीड़ा छलक उठती है। मसलन ‘ऐसी कैसी नींद’,‘बैलगाड़ी’,‘बच्चों के लिए एक कथा’,‘इसके पहले’,‘अब ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा’ आदि कविताओं को देखा जा सकता है। संग्रह में बहुत सी ऐसी कविताएँ भी हैं जिनमें समाज में आए इन बदलावों के प्रति कवि के मन में विक्षोभ और पीड़ा व्यंग का रूप लेकर उभरती है। समाज में आए इन परिवर्तनों को कवि ने बड़ी ही सधी भाषा में रेखांकित किया है।

श्रवण कुमार
‘सब तरफ सावधानियाँ ही सावधानियाँ
जीभ जल जाए जो सच मुँह से निकल भर आए
अब ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा
कि बिना दहशत, बगैर चोट खाए
कोई घर पहुँच जाए’

अपने चारों ओर डर और भय के वातावरण को देखकर जहाँ अपराधी खुलेआम किसी की हत्या करने से भी नहीं चूकते वहाँ कवि को इस तरह की पीड़ा होना लाजमी है। इसलिए कवि अपनी इस पीड़ा को यहाँ व्यक्त करता है। संग्रह की पहली ही कविता ‘सुनो अशोक’ कवि की आह से निकला वह उद्घघोष प्रतीत होता है जहाँ वह आज के इस वातावरण को देखकर अशोक को कलिंग युद्ध में मारे गए लोगों के लिए जिम्मेदार नहीं मान सकता। आज के युग में जिस तरह का असंतोष और डर का माहौल बढ़ रहा है उसने लोगों की संवेदनशीलता खो दी है। उन्हें किसी दूसरे के दुख-दर्द से कोई मतलब नहीं रह गया है। भरे बाजार में सबके सामने किसी की हत्या कर दी जाती है और लोग उसे बचाने की जगह बुत बनकर खड़े हो जाते हैं। संग्रह की यह कविता एक और जहाँ रघुवीर सहाय की प्रसिद्ध कविता ‘रामदास’ की याद दिलाती है तो साथ में इस ओर भी इशारा करती है कि आने वाले समय में भी शायद हमें अनेकों रामदास की हत्या इसी तरह होते देखनी है। कवि यहाँ इशारा करता है कि आज मारने वाले से बड़ा अपराधी वह है जो हत्या होते देख रहा है,जो इस तरह के माहौल को पनपने में अपनी उदासीनता से बल दे रहा है। कवि यहाँ इंगित कर रहा है कि आज हत्यारा मारने वाला नहीं बल्कि वह है,जो हत्या होने से रोक नहीं पाया।

‘सुनो अशोक!
आज मारने वाला नहीं रहा हत्यारा
हत्यारा वह जो बचा नहीं पाया
बचा नहीं पाया और बचा रह गया’

यहाँ इन कविताओं में वह शक्ति है जो हमें बार-बार किसी नींद से जगाने की कोशिश करती है। हमें हमारे अकेलेपन से बाहर धकेलती हैं लेकिन किसी धक्के के साथ नहीं बल्कि मर्मस्पर्शी भाव से। यहाँ अनेकों ऐसे चेहरे हैं जो कवि की दृष्टि में बहुत ही अलग हो चुके हैं।

अगर सादगी या सरलता का कोई सौन्दर्यशास्त्र या काव्यगत उत्कृष्टता,गुणवत्ता या महानता का कोई पैमाना या प्रतिमान बनाने चलेंगे तो कई मुश्किलें सामने आएँगी। सबसे पहले तो यही कि सरलता और सरलता के दूसरे रूप प्रकारों में फर्क कैसे किया जाए? शमशेर, त्रिलोचन, नागार्जुन, रघुवीर सहाय आदि कवियों की अपनी क्लासिकी रही है। इनकी सरलता को कोई शास्त्र व्याख्यायित करे तो काफी दिक्कतें आ सकती हैं। प्रस्तुत संग्रह की कविताओं में जो एक सघन अर्थ का ठोस वातावरण बना है, उनके स्वभाव, व्यक्तित्व और विचारधारा में इतनी अभिन्नता है कि प्रकट रूप में उनकी सरलता और सादगी को सदासय स्वभाव और काव्य मानस की उपज कह कर नजर अंदाज किया जा सकता है। कवि यहाँ इतना सरल है कि जानबूझकर उसे सरलता के रूप प्रकारों की मुश्किलों में नहीं डालना चाहिए। इन कविताओं को पूर्व निश्चित अथवा अनुमान सिद्ध मानना व्यर्थ ही है। इसकी शब्दावली, वाक्य विधान, काव्यगत सौंदर्य, पैटर्न, रूप या शिल्प को ‘अविचारित रमणीय’ मान लेना सही नहीं है। जैसे यहाँ कोई जोखिम ही नहीं है, न लिखने में, न पाठक द्वारा पढ़ने में, इस तरह की धारणा पाल लेना सही प्रतीत नहीं होता। भगवत रावत के यहाँ बनावट है ही नहीं बल्कि एक अर्थ में तो कोई कला होने से भी इंकार कर सकता है। कला है तो ऐसी जैसी ‘लोक काव्य’ ‘लोक वार्ता’ में मिलती है। भगवत रावत की नागर चिंता में भी ऐसा लगता है मानो कोई लोक कवि ही अपने शब्द उच्चार रहा है। भगवत रावत की इन कविताओं का ठाठ ही कुछ अलग है। इन कविताओं में भगवत की चिर परिचित बतकही शैली भी है या कहें कि यही तो भगवत की इन कविताओं की ताकत भी है। हो सकता है कि कविता के मर्मज्ञ लोग यह कहें कि इन कविताओं में एक तरह की आत्मतुष्टि है जो कविता के लिए सही नहीं किंतु यहाँ यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि भगवत की कविताओं से एकदम सरल निष्कर्ष भी नहीं निकाले जा सकते। इनमें वह कुछ है जो हमें गूढतर ले जाने में सक्षम है। केवल सरलीकरण ही एकमात्र इन कविताओं का सार नहीं है, यहाँ कवि के अपने दुख दर्द से उपजे भाव भी हैं जिन्होंने कवि को सीधा सच्चा कवि हृदय मनुष्य बनाया है। इन कविताओं में कोई कलावंत वाला शगल नहीं है। जहाँ वृतांत में कवि की रूचि है तो आत्म वृतांत में भी। इनमें केवल अपनी दुनिया ही नहीं दूसरों की दुनिया भी शामिल है। वह कविताओं में कोई कलाकृति नहीं उतारते,वह तो सीधे मनुष्य की बात करते हैं। वह वही मनुष्यता फिर से स्थापित करने के इच्छुक हैं जिसमें मानव के बीच का भेद भाव आज की दुनिया से कहीं अधिक कम था। एक निस्वार्थ प्रेम जो हमें कभी मानव और प्रकृति, मानव और मानव के बीच देखने को मिलता था। उस खो गए प्रेम के लिए वह आज भी लालायित दिखाई पड़ते हैं। और शायद इसीलिए आने वाली पीढ़ियों के लिए वह संदेश छोड़ कर जाना चाहते हैं कि वह फिर से उस वातावरण का निर्माण करने की कोशिश करें जहाँ-

‘वे बेरोकटोक एक दूसरे के घरों में आते जाते
धीरे धीरे वे एक दूसरे के सपनों में भी
आने जाने लग जाते थे
उनके घरों के दरवाजे कभी बंद नहीं होते थे
दरवाजों पर ताले तो तभी लगाए जाते थे
जब दुर्भाग्य से घरों में कोई बचता नहीं था
उनके दरवाजों पर कोई कॉल बेल नहीं होती थी
वे एक दूसरे को/जोर से आवाज लगाकर बुलाते थे’

कवि की भावुकता यहाँ स्पष्ट ही अपने अबोध रूप में जाग उठती है। भगवत की यही विशेषता रही है कि उनके यहाँ इस तरह की अनेक भावुक कविताएँ देखने को मिलती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इस संग्रह की कविताएँ भी इस शैली से अछूती नहीं रही है। कवि का यही अबोध रूप कविता में विडंबना को रेखांकित करता,अपने समाज की अंधी दौड़ पर गहरी नजर रखता है। समाज के बनते बिगड़ते माहौल पर अपनी पैनी निगाह रखता है। ‘कलयुग में जब’ शीर्षक कविता समाज में फैल रहे गहरे धार्मिक पाखंड और अंधकार पर एक पैना व्यंग्य है-

‘कलयुग में जब दिखाई देने लगे
जगह-जगह तिलकधारी सतयुगी से चेहरे
तो यह नहीं समझना चाहिए कि सतयुग आ रहा है
इसी तरह जब धर्म से ज्यादा फहराने लगे
धर्म की ध्वजाएँ तो समझना यह चाहिए कि अब
सचमुच धर्म रसातल में जा रहा है’

एक तरफ जहाँ भगवत रावत की कविताओं में वर्णात्मकता है तो दूसरी ओर कम से कम शब्दों में भी अपनी बात कहने की क्षमता है। दूसरी और कविताओं में जीवन का राग है। उनके सामान्य जीवन के कुछ छोटे-छोटे पल इन कविताओं में दर्ज हैं। इस संदर्भ में‘आत्मा का गीत’,‘मनुष्य’,‘अब ऐसा कोई रास्ता नहीं बचा’,‘जब कहीं चोट लगती है,‘तुतलाने की आवाज’,‘उम्र जब झटका देती है’‘इन दिनों’आदि अनेक कविताएँ भगवत रावत के जीवन में आए विभिन्न पलों को व्यक्त करती हैं। इस राग में लघुता और साधारणता का जो बयान है वह त्रिलोचन और नागार्जुन जैसे कवियों की शैली से कवि को जोड़ता है। यहाँ बनावट से भिन्न कलाहीनता के मर्म को समझना जरुरी दिखाई जान पड़ता है। सीधे शब्दों में‘बात’ही भगवत रावत की विशेषता है। भगवत रावत की इन कविताओं में कोई होड़ या प्रतिद्वंदिता नहीं है। इन कविताओं में कवि के आत्म से उपजी एक आह है जो उसे अपने बीते जीवन के पलों से जोड़ती हुई एक अलग ही दुनिया में विचरण करवाती रहती है।

भगवत रावत विभिन्न मोड़ों पर मुख्यधारा से अलग कवि भी दिखाई पड़ते हैं लेकिन समाज के उपेक्षित और पीड़ित वर्ग को अलग छोड़कर नहीं बल्कि सबको साथ लेकर। वह चीज क्या है जो उन्हें मुख्यधारा के कवियों से अलग करती है?इन कविताओं में भी लगता है कि भगवत एक अलग ही दुनिया के कवि है। यह दुनिया शायद उनके अपने ही जीवन से उपजी एक अलग दुनिया हैं जहाँ वे अपनी ही तरह के सामान्य लोक से घिरा रहना चाहते है। इसीलिए शायद‘ईसुरी’जैसे लोक कवि से ही वह ऊर्जा ग्रहण करते दिखाई पड़ते हैं।

भगवत रावत की चर्चा उनकी विलक्षण कविताओं को लेकर होती रही है। संग्रह की यें कविताएँ आज भी अपनी प्रकृति में इतनी सरल देशज हैं कि काव्यात्मक तनाव और काव्य विडंबना के गहरे परीक्षण में लगी आलोचना एक बार तो कोरी अप्रासंगिक और असहाय लग सकती है। इससे पहले त्रिलोचन,नागार्जुन,रघुवीर सहाय जैसे कवि भी इस चुनौती का सामना कर चुके हैं। इसलिए इस तरह के कवियों की सरलता में जो गूढ़ तत्व छुपे हैं वही इन्हें इस तरह से विशेष बनाते हैं। भगवत रावत की ये कवितायेँ अपनी प्रकृति में सरल होते हुए भी कहीं ना कहीं यही गूढ़ तत्व लिए हुए हैं। उनकी प्रकृति की अपनी ही विशिष्ट स्मृतियाँ हैं। कवि ने यहाँ अपनी निजी कविताओं का अपना ही एक मुहावरा गढ़ लिया है। सरलता और सादगी अगर इन कविताओं का गुण है तो इस अर्थ में कि वह प्राय एक विलक्षण नैतिक साहस के साथ है जो महज नोस्टाल्जिया न होकर कवि का एक आत्म परीक्षण है। उनके लिए वह आत्म मुग्धता या आत्म सम्मोहन नहीं बल्कि एक आत्म साक्षात्कार का ढंग है।

संग्रह की कविताओं की भाषा की जब बात करते हैं तो कह सकते हैं कि संप्रेषण का यहाँ कोई झगड़ा नहीं है। भाषा में यहाँ जो सहजता है वही इनकी ताकत भी है। आदमी के अंतर्मन को टटोल कर सीधे और सपाट भाषा में उसे व्यक्त करना इनकी विशेषता रही है। कवि के बारे में रेवतीरमण कहते हैं कि ‘भगवत रावत शब्दों में जीवन लिखते हैं’ अत: यह जीवन बहते पानी जैसी भाषा में इन कविताओं में भी व्यक्त होता है। सुदीप बनर्जी शायद इसीलिए ही कहते हैं कि‘मैं भगवत की कोई भी कविता उनकी आवाज को सुने बिना नहीं पढ़ सकता’यानी वही बतकही की शैली जो भगवत की विशेषता रही है प्रस्तुत काव्य संग्रह में भी उसी लय में उपस्थित है। यह ऐसी भाषा है जो बिम्ब से श्रव्य संसार में बदल जाती है।


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