व्यंग्य: अब सबक लेने का समय है

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

कोरोना वायरस कई बातें साबित कर गया। वह आदमी से ज्यादा खतरनाक और बहुरूपिया निकला। विरोधियों की तरह पलट-पलट कर आया और ज्यादा आक्रामक हो कर आया। हमारा ज्ञान, विज्ञान, ज्योतिष, आस्था और विश्वास सब भ्रम हो गए। सरकारें लाचार होने लगीं और व्यवस्थाएँ दम तोड़ने लगीं। मनुष्य ने ऐसी कीमत किसी युग में नहीं चुकाई होगी। 

कोरोना संकट ने भीख माँगने के प्रतिमान बदल दिए। गरीब गंगा के किनारे गड्ढे खोद रहे थे और अमीर अस्पतालों के दरवाजों पर असहाय पड़े साँस की भीख माँग रहे थे। अस्पतालों में बेड नहीं थे, ऑक्सीजन नहीं थी, दवाइयाँ नहीं थीं, पर आँकड़ेबाज अफसरशाही के रिकॉर्ड में किसी चीज की कमी नहीं थी। उनके चश्मों से हर चीज लाखों की संख्या में दिख रही थी पर वस्तुतः वह कहीं थी ही नहीं। डॉक्टर थे, जो कभी ऐसे बेबस नहीं हुए थे। लाखों रुपए नगद लिए लोग कतारों में थे पर पैसा मूल्य खो चुका था। कद, पद और पहचान सब बौने हो गए थे। आदमी लावारिस भिखारी की तरह पड़ा था। फिर भी, राजनीति का बिल्ला चिपकाए प्रवक्ता हमेशा की तरह दूसरों की टोपियाँ उछाल रहे थे। बस एक वे ही सही थे और उनके विरोधी हत्यारे। कुछ सुधारात्मक करना उन्हें आता नहीं था। वे या तो विरोध कर सकते थे या कुर्सी पर बैठे सौ करोड़ गिनने वालों की बोली बोल सकते थे। जो लोग सत्ता के दारूखाने में मदहोश पड़े थे उन्हें मूर्छित-सा पड़े रहने में बचाव नजर आ रहा था, क्योंकि उनके करीबियों के शव, दाहगृह पर कतारों में पड़े थे। वे जय-विजय के शंखघोष की प्रतीक्षा कर रहे थे। 

हर कहीं ‘सिस्टम’ जिंदा था पर आदमी मरते रहे। शोक को थामने की बजाय राजनीतिक पार्टियाँ नगाड़े पीटती रहीं। बीता समय इतिहास बन रहा है, पर जख्म भरने की बजाय और गहरे होते जा रहे हैं कि कैसे और क्यों अरमानों से भरे लाखों धड़कते दिल, गट्ठर में बंधी लाश भर रह गए। उनके लिए मुर्दाघरों में जगह नहीं थी। कभी तृप्त नहीं होने वाले श्मशानों और कब्रिस्तानों के इंच-इंच में लाशें थीं। वहाँ जो जीवित बचे खड़े थे उन्हें अपनों को खोने के गम से अधिक अपनी ऐसी मौत था डर अधिक था। अदृश्य वायरस को अपने करीब मंडराता देख उनका साहस घोर हताशा में बदल चुका था। उन्होंने दौड़ती मृत्यु को बहुत करीब से देखा था। मरते हुए आदमी को आँकड़ों के इंजेक्शन और झूठ-मूठ की ऑक्सीजन देकर राजनेता जिंदा रख सकते हैं पर यह हुनर हमारे डॉक्टर नहीं सीख पाए। लाशों पर राजनीति करने वालों के दिल पत्थर के भी होते तो वे पसीज गए होते। पर राजनीति और उसकी सहचरी सत्ता को अपना घिनौना रूप बताने में कभी शर्म नहीं आई। सहायता करने की बजाय वे मदद करते हाथों को भी अपना गुलाम बनाना चाहने लगे।

आदमी किसी काल में इतना नहीं सहमा होगा कि उसे अपनी चीखें दबा कर जिंदा रहना पड़े। अपने घर में बंद वह अपनी व्यथा बताने जाए तो उसे प्रताड़ना का भय सताए। क्या व्यवस्था इसलिए होती है? जिस प्रशासन को घुटी-दबी-कुचली आवाजों को सुनकर सहायता के लिए दौड़ आना था, वह मरियल, मद्धिम आवाजों को दबाने में जुटा था। यह उस समूची प्रशासन व्यवस्था पर कलंक है जो मनुष्य ने हजारों साल की तपस्या में अपनी आधुनिक सभ्यता के रूप में खड़ी की है। दुनिया में प्रजातंत्र इतना भद्दा और आत्मघाती नहीं होता। ऐसा आत्मघाती प्रजातंत्र चुनने के लिए क्या जनता दोषी है जो मौखिक और लिखित घोषणापत्रों पर भरोसा करती है? 

मैं उच्च न्यायालयों को जरूर सलाम करना चाहूँगा जो अपने हिस्से के विवेक को सच बोलने में लगा रहे थे। जनतंत्र एक पाये पर खड़ा रहने की कोशिश कर रहा था। राष्ट्रीय शोक की वेला में अधिकांश टीवी चैनल और कथित जनमीडिया, तरक्की की प्रायोजित खबरें दे रहे थे। वे उस कृपा और पैसे के लिए बिक रहे थे जो उनके ही साथियों को समय पर अस्पतालों में बेड नहीं दिला पाई थी। क्या ऐसा होना हर बार जरूरी है कि कलिंग के राजा अशोक को सद्बुद्धि मिले इसलिए युद्धभूमि में हर ओर लाशें ही लाशें हों। इन सबसे अब सबक लेने का समय है। ___________________________________

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