नयी कविता बनाम प्रगतिवाद और प्रयोगवाद: आंदोलन, प्रवृत्ति और नामकरण का परिप्रेक्ष्य

राजेश कुमार यादव

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, महात्मा गाँधी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
संपर्क : +91 993 546 7677; ईमेल: rajesh31790@gmail.com 
एक विशिष्ट प्रकार की काव्यधारा के लिए ‘नयी-कविता’ नामकरण जगदीश गुप्त और रामस्वरूप चतुर्वेदी द्वारा संपादित 1954 ई0 से निकलने वाली ‘नयी-कविता’ नामक पत्रिका से रूढ़ हुआ, यद्यपि इस प्रकार की विशिष्ट कविताएँ अपने स्वरूप निर्माण में पहले से ही संघर्षरत थीं—विशेषतः अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ (1943 ई0) से चलने वाली ‘सप्तक-श्रृंखला’ और ‘प्रतीक’ (1947 ई0) पत्रिका के माध्यम से। हालाँकि कुछ आलोचकों द्वारा इस बात पर भी जोर दिया गया है कि जिन प्रवृत्तियों के बल पर सप्तक-कवियों को प्रयोगवादी कहा गया उस तरह की प्रवृत्तियाँ, बल्कि इससे कुछ मुखर रूप में, कुछ सप्तकेतर छायावादोत्तर कवियों की रचनाओं में ही मिलने लगीं थीं। इस संदर्भ में सप्तक-कवि-परंपरा में आने वाले  ‘नयी-कविता’ के ही एक विशिष्ट कवि समशेर बहादुर सिंह का एक उद्धरण नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ में दिया है। उद्धरण यों है—“मौलिक रूप से तार सप्तक के प्रयोग अन्यत्र कई और कवियों के इससे काफी पहले के संग्रहों में मिल जाएँगे : प्रथमतः निराला में ही—न केवल तार सप्तक के लगभग सभी प्रयोग बल्कि उससे भी और कहीं अधिक; दूसरे पंत जी में उनकी अतुकांत और मुक्त छंद की कविताओं में—लगाकर ग्रंथि से युगवाणी तक। फिर नरेंद्र शर्मा ने भी अपनी कतिपय वर्णात्मक अतुकांत मुक्तछंद की कविताओं में अपनी एक विशिष्ट शैली का परिचय दिया है (मसलन ‘वासना की देह’ है (में?)—पलाश वन), यद्यपि वह उनकी सामान्य धारा नहीं। उनकी एक कविता        ‘बटन-होल’ भी पाठकों को अपरिचित न होगी।”  स्वयं नामवर सिंह ने भी इसी मान्यता को बल प्रदान किया है, अपनी उसी पुस्तक में वे कहते हैं—“सारांश यह कि तार सप्तक के प्रकाशन से चार-पाँच वर्ष पूर्व तार सप्तक के कवियों के अतिरिक्त केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन, भवानीप्रसाद मिश्र-जैसे अनेक समर्थ कवि नए ढंग की काव्य-रचना कर रहे थे। इस बीच नरेंद्र शर्मा ने भी रूमानियत से अलग हटकर नए           काव्य-प्रयोग किये। निराला की अनामिका में संकलित 1937-38 की कविताओं और आगे चलकर 1941 में प्रकाशित कुकुरमुत्ता शीर्षक लंबी कविता से स्पष्ट है कि हिंदी में तार सप्तक के प्रकाशन से पहले ही नए परिवर्तन की जोरदार हवा बह चुकी थी।” 
 प्रयोगशीलता के पुरस्कर्ताओं की सप्तकेतर या सप्तकपूर्व कवियों की सूची पेश करने वाले उपर्युक्त उद्धरणों, और इन जैसे तमाम उद्धरणों वाली मान्यताओं, पर गहरे विचार की आवश्यकता है—काव्य प्रवृत्तियों और काल विभाजन के संदर्भ में। विचारणीय बात यह है कि सप्तक-पूर्व कवि सप्तक-श्रृंखला के बहुत पहले से ही कविता करते आ रहे थे और उनकी कविताओं का मूल और प्रारंभिक स्वर एवं प्रवृत्तियाँ प्रयोगवादी कवियों से भिन्न थीं, जबकि सप्तक-कवियों ने शुरू से ही अपने आपको ‘राहों का अन्वेषी’ मानकर काव्य को नए पथ की ओर अग्रसर करने की युक्तियों को पाने के लिए संघर्ष किया। उद्धरण में गिनाए गए सप्तक-पूर्व कवि अलग-अलग काव्य-प्रवृत्तियों या खेमों के थे, जबकि सप्तक-कवि घोषित रूप से सामूहिक थे; नए ढंग की कविताओं के सृजन के लिए ही ये कवि एक बैनर तले इकट्ठे हुए थे।  विचारणीय बात यह भी है कि प्रयोग तो अपने-अपने ढंग से सभी कवि करते हैं, अतः बात प्रयोग के साथ-साथ नवीनता की भी है—शिल्प-कथ्य, भाव-विचार, शब्द-भाषा सभी दृष्टियों से। इन सभी में नवीनता के लिए प्रयोग के आग्रही या दुराग्रही घोषित और सजग रूप में सप्तक कवि ही हुए; अतः नए तरह के काव्य-सृजन का प्रस्थान बिंदु तार-सप्तक के प्रकाशन-काल से ही माना जाता है, और यही उपयुक्त भी है। 
काव्य-प्रवृत्तियों और काल-विभाजन के संदर्भ में एक बात और विचारणीय है कि यदि एक कवि, या उसी प्रवृत्ति के कई कवियों का समूह अपने युग की काव्य प्रवृत्तियों के समाप्तप्राय हो जाने के बाद भी कविता करने में सक्रिय रहते हैं—जैसे निराला और पंत—तो क्या दूसरे युग की काव्य-प्रवृत्तियों के पुरस्कर्ताओं या उनके प्रवाह में ऐसे कवियों का भी नाम लिया जाता है, यदि वे नयी-प्रवृत्ति के अनुरूप रचना करने लगते हैं तो—जैसे कि पंत; और यदि वे अपनी ही मूल प्रवृत्ति या उसके विकसित रूप को अपनाते चले जाते हैं तो—जैसे कि निराला। निश्चय ही इसका उत्तर नकारात्मक रुझान की ओर अधिक झुकता है। पंत प्रगतिवादी कवि के रूप में नहीं, छायावादी कवि के रूप में ही प्रतिष्ठित हैं; यद्यपि बाद में उनकी रचनाएँ प्रगतिवादी विचारधारा से लैस होने लगीं और छायावाद का ‘युगांत’ उन्होंने ही घोषित किया।  निराला शुरू से ही—प्रगतिवादी आंदोलन से पहले—प्रगतिशील विचारधारा वाले कवि रहे और अंत तक उन्होंने उसी का निर्वाह किया, पर वे प्रगतिवादियों की सूची से बाहर रहे हैं; वे छायावादी कवि के रूप में ही प्रतिष्ठित हैं।  स्पष्ट है कि प्रवृत्ति-विशेष के पुरस्कर्ता-कवियों की मान्यता और प्रतिष्ठा उसी प्रवृत्ति पर निर्भर होती है।  एक प्रवृत्ति के समाप्त हो जाने पर या तो कवि की सृजन-शक्ति क्षीण हो जाती है या वह अपनी पूर्व-प्रवृत्ति में ही विस्तार करता है। इस आधार पर भी सप्तक-पूर्व कवि अपनी प्रवृत्तियों के साथ थे, और नयी-प्रवृत्तियों की शुरुआत         सप्तक-कवियों ने की, सप्रयास।  
 नामवर सिंह वाले ऊपर के उद्धरण से स्पष्ट है कि उन्होंने रूमानियत से हट कर कविता करने को नयी-प्रवृत्ति का द्योतक माना है, अतः छायावाद की रूमानियत वाली प्रवृत्ति के बाद जैसे ही प्रगतिवाद की यथार्थवादी कविताओं का दौर चलता है तो नयी कविता को वहाँ से शुरू हुआ मान लिया जाता है। रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘नयी कविता और अस्तित्ववाद’ में इस प्रवृत्ति का जिक्र किया है कि कैसे प्रगतिशील कविताओं की शुरुआत से नयी कविता आंदोलन का नाम जुड़ा हुआ है—“नयी कविता का इतिहास प्रगतिशील कविता से जुड़ा हुआ है, इस तरह से जुड़ा हुआ है कि कभी-कभी विद्वानों को दोनों में कोई फर्क नहीं दिखाई देता।”  नामवर सिंह ने खुद इस प्रवृत्ति को बल प्रदान किया है कि नयी कविता का दौर प्रगतिवादी कविता के ही दौर से आरंभ हुआ है। इस संदर्भ में उनका चर्चित उद्धरण ‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक से वह होता है जिसमें उन्होंने कहा है कि “नई कविता से आशय प्रगति और प्रयोग के कल्पित कगारों को तोड़ती हुई समग्र नई काव्यधारा से है।”  पर अब यह हिंदी साहित्य में मान्य धारणा हो चुकी है कि प्रगतिवाद एक अलग काव्य-आंदोलन है, प्रयोगवाद अलग है और नयी कविता अलग—यद्यपि कि अधिकांश प्रयोगवादी कवि नयी कविता के भी कवि हैं, और कुछ प्रगतिवादी कवि भी। प्रगतिवादी कविताओं से ही नयी कविताओं की शुरुआत मानने वाले संदर्भ में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी अपनी कृति ‘नई कविता’ में लिखते हैं—“पिछले कुछ वर्षों से एक समाहार का प्रयत्न किया जा रहा है, जिसके पुरस्कर्ता प्रयोगवादी या प्रगतिवादी विशेषणों को स्वीकार नहीं करते और एक नई धारा के प्रवर्तन का लक्ष्य रखते हैं जिसे वे नई कविता की धारा कहा करते हैं।”  इस समाहार के समर्थकों में एक नाम नामवर सिंह का लिया जा चुका है। इसी समाहार का प्रयत्न करता हुआ मत गिरिजाकुमार माथुर का है। वे मानते हैं कि नयी कविता का उद्भव छायावाद के बाद ही इसकी प्रतिक्रया में शुरू होता है और इसका स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होता है—“सन् 1940-46 के बीच समाजोन्मुखी काव्य-प्रवृत्ति का स्वरूप स्पष्ट हुआ, जो नयी कविता में प्रगतिवाद के नाम से प्रतिष्ठित हुई। धीरे-धीरे दूसरी ओर ‘प्रयोगवादी’ कहलाने वाली प्रवृत्ति स्पष्टतया अलग होकर सामने आयी। इसके बाद दोनों प्रवृत्तियों की ओर से आलोचना का एक समूचा युद्ध नयी कविता की दिशा, स्वरूप, उद्देश्य, प्रतिपाद्य विषयवस्तु, काव्यगत मूल्य, मान्यताओं, रागात्मक संबंध, यहाँ तक कि कवि कर्म, उपकरण और शब्दों के प्रयोगों तक चला।”   
उपर्युक्त समाहारी प्रयत्नों के संदर्भ में यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि भले ही प्रगति-प्रयोग और नयी कविता की कुछ प्रवृत्तियाँ सामान्य रही हों पर अधिकांशतः उनमें अंतर ही था। और ‘नयी कविता’ नाम प्रगति-प्रयोग से लेकर नयी कविता के काल तक की कविताओं के लिए उनकी किसी सामान्य प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर दिया भी नहीं गया है। यह या तो पाश्चात्य साहित्य आंदोलन ‘न्यू पोएट्री’ की नकल पर दिया गया है या कोई उपयुक्त नाम न पाकर काल-सापेक्षता में यूँ ही दे दिया गया है। और यह नाम ‘प्रगति’ और ‘प्रयोग’ के दौर में दिया भी नहीं गया था। यह नाम उस समय रूढ़ हुआ था जब 1954 ई0 में ‘नयी-कविता’ नाम की एक पत्रिका निकलने लगी थी। यह भी उल्लेखनीय है कि नयी कविता आंदोलन चलाने वाले कवि प्रायः प्रयोगवादी कवि रहे हैं, प्रगतिवाद से इसका बहुत लेना-देना नहीं है। प्रयोगवादी कवियों का प्रगतिवाद से विरोध भी रहा है। इस संदर्भ में नामवर सिंह ने एक बात उठायी है कि क्योंकि मुक्तिबोध प्रगतिवादी विचारधारा के समर्थक थे इसलिए उन्होंने नयी कविता की रोमैंटिकता का विरोध किया, उनके इस समर्थन के कारण उन्हें नयी कविता वालों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ा—“इस प्रतिरोध के कारण मुक्तिबोध नई कविता के पूरे दौर में प्रायः उपेक्षित रहे; यहाँ तक कि नई कविता साहित्य के प्रतिष्ठानों में जब बहुत-कुछ स्वीकार भी कर ली गई तो मुक्तिबोध उस दायरे से बाहर रहे। मुक्तिबोध को छोड़कर नई कविता का स्वीकृत होना इस बात का पक्का प्रमाण है कि नई कविता ने कहीं-न-कहीं पूर्ववर्ती रोमांटिकता के साथ चुपचाप समझौता कर लिया था। इस बारे में नई कविता के अंतर्गत मुक्तिबोध की स्थिति बहुत कुछ वही है, जो छायावाद के अंतर्गत निराला की थी।”  बावजूद इसके मुक्तिबोध क्योंकि तार-सप्तक के कवियों में भी थे, उनकी शैली और उनका शिल्प-विधान भी प्रगतिवादी कवियों की तरह न होकर जटिल था, अतः वे नयी कविता के कवियों में गिने जा सकते हैं, गिने जाते हैं। मुक्तिबोध की तरह ही शमशेर बहादुर सिंह की भी स्थिति है। वे भी सप्तक-श्रृंखला के कवि रहे हैं, रूप-विधान उनका भी जटिल रहा है और वे भी नयी कविता और प्रगतिवाद दोनों में गिने जाते हैं; अन्यथा नागार्जुन, त्रिलोचन और केदारनाथ अग्रवाल सरीखे घोषित रूप से प्रगतिवादी कवि और अलग शिल्प-शैली के रचनाकार कहीं भी नयी कविता आंदोलन के कवियों में परिगणित नहीं किए जाते। और यह तो गिरिजाकुमार माथुर और रामविलास शर्मा के माध्यम से स्पष्ट ही है कि प्रगतिवादी और प्रयोगवादी कवियों तथा आलोचकों में एक युद्ध-सा छिड़ा ही रहता था एक-दूसरे को काटने–छेड़ने का। इस संदर्भ में नंददुलारे वाजपेयी का यह कथन भी उद्धरणीय है—“यह तो स्पष्ट है कि प्रगतिवादी और प्रयोगवादी भावधारा और शैली में बहुत कम साम्य है। जो कुछ साम्य रहा भी हो उसे प्रयोगवाद के अतिवादी व्याख्याताओं ने समाप्त करने में सहयोग दिया है। वर्तमान स्थिति यह है कि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, रामविलास शर्मा, त्रिलोचन जैसे कवियों को प्रयोगवादी अपने मजहब या खेमें में लेने को तैयार नहीं हैं और दूसरी ओर अज्ञेय, धर्मवीर भारती, गिरिजाकुमार माथुर जैसे कवियों को प्रगतिवादी अपने मंतव्यों-विचारों के अनुकूल नहीं पाते।”  इस तरह स्पष्ट है कि प्रगतिवाद और प्रयोगवाद दो अलग-अलग विचारधारा और शैली वाले काव्य-आंदोलन हैं। और यद्यपि प्रयोगवादी कवियों में से ही अधिकांश कवि नयी कविता आंदोलन के भी कवि हैं, पर फिर भी नयी कविता आंदोलन की भी प्रयोगवाद से भिन्न कुछ अपनी मान्यताएँ थीं। प्रयोगवाद के पुरस्कर्ता अज्ञेय थे, नयी कविता के जगदीश गुप्त, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि। अज्ञेय को धक्का लगा जब इन लोगों ने कुछ प्रयोगवादी मान्यताओं से असहमतियाँ जताकर नयी कविता नाम का एक नया आंदोलन खड़ा कर लिया। रामविलास शर्मा ने अपनी कृति ‘नयी कविता और अस्तित्ववाद’ में उन घटनाओं का जिक्र किया है कि कैसे अज्ञेय ने नयी कविता के पुरस्कर्ताओं से आहत होकर ‘नयी कविता : संभाव्य भूमिका’, ‘नया-कवि : आत्म स्वीकार’ और ‘नए कवि : आत्मोपदेश’ जैसी कविताएँ लिखीं; और कैसे अज्ञेय को नयी कविता वालों ने क्रमशः अपने खेमे से दूर करना शुरू किया। इस संदर्भ में रामविलास शर्मा का यह कथन द्रष्टव्य है—“स्पष्ट ही अज्ञेय नयी कविता के सूत्रधारों से आश्वस्त न थे। ... इधर नयी कविता के सूत्रधार उसे क्रमशः प्रयोगवाद से अलग करते जा रहे थे। ... अज्ञेय ने सन् 37 में निराला के लिए जो लिखा था—‘ऐज़ ए लिटररी फ़ोर्स, ऐट एनी रेट, निराला इस आलरेडी डेड’, वही बात सन ’61 की पीढ़ी ने अज्ञेय के लिए दुहराई।”   
 इस प्रकार स्पष्ट है कि प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता नाम के तीन आंदोलन चले। और तीनों की अपनी-अपनी अलग-अलग कुछ मान्यताएँ थीं। यद्यपि अधिकांश प्रयोगवादी कवि नए कवि बन गए थे, फिर भी क्योंकि तीनों आंदोलन समय के एक बिंदु पर भी गतिमान थे—नयी कविता के दौर तक प्रगतिवाद और प्रयोगवाद वाले भी लिख ही रहे थे—अतः अगर प्रगति-प्रयोग और नयी कविता के संपूर्ण युग को किसी एक काल के अंतर्गत रखने का आग्रह हो तो उसे कोई और नाम दिया जाना चाहिए—न तो प्रगतिवाद न ही प्रयोगवाद और न ही नयी कविता। क्योंकि ये तीनों आंदोलन क्रमशः साहित्य-पटल पर उभरते गए थे और तीनों का अपना अलग-अलग महत्व है, अतः किसी एक आंदोलन के नाम में दोनों अन्य आंदोलन समेटे नहीं जा सकते। इसलिए ‘नयी कविता’ के नाम पर प्रगति और प्रयोग से लेकर नयी कविता तक के काल को जो एक में समाहारित करने का प्रयत्न किया जाएगा वह अनुचित ही होगा; यद्यपि यह भी महत्वपूर्ण है कि साहित्य में किसी नाम से आंदोलन चलता है तो यह जरूरी नहीं कि नाम उस दौर के साहित्य के स्वरूप और प्रकृति को वहन करने की क्षमता भी रखता हो, एक आंदोलन की कुछ कविताएँ दूसरे आंदोलन की कविताओं से मेल खा सकती हैं—यह बहुत संभव है। पर यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि कोई नाम दे दिए जाने से वह प्रायः उस युग की रचनागत प्रवृत्तियों के लिए रूढ़ हो जाता है। इस दृष्टि से         ‘नयी-कविता’ नाम उस युग की रचनाओं के लिए रूढ़ हो गया है जो 1954 में नयी कविता आंदोलन के शुरू हो जाने पर उसके लिए, मतलब उससे जुड़कर अस्तित्व में आयीं। अब सभी जगह यह बात स्वीकृत है कि आंदोलन के स्तर पर ‘प्रगतिवाद’ प्रगतिवाद है, ‘प्रयोगवाद’ प्रयोगवाद और ‘नयी-कविता’ नयी कविता; यद्यपि प्रवृत्ति के स्तर पर तीनों में कुछ या बहुत-कुछ समानताएँ हो सकती हैं, हैं भी। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद में तो यह समानताएँ कुछ ही जगह ढूँढ़ी जा सकती हैं पर प्रयोगवाद और नयी कविता में तमाम प्रवृत्तियाँ लगभग समान हैं। इसका कारण है कि अधिकांश प्रयोगवादी कवि नयी कविता के भी कवि हैं। 
ऊपर जो यह कहा गया कि आंदोलन के स्तर पर प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नयी कविता एक-दूसरे से पृथक हैं भले ही प्रवृत्ति के स्तर पर तीनों में कुछ या बहुत समानताएँ लक्षित की जा सकें, उसके संदर्भ में यह उल्लेनीय है कि आंदोलन और प्रवृत्ति में अंतर होता है; भले ही आंदोलन प्रायः प्रवृत्तिगत होते हों या प्रवृत्तियाँ आंदोलनरत होती हों। मतलब यह है कि अक्सर साहित्यिक आंदोलन पुरानी साहित्यिक प्रवृत्ति के विरोध में नयी साहित्यिक प्रवृत्ति को लाने के लिए चलते हैं; और क्योंकि ऐसे आंदोलन व्यावहारिक प्रवृत्ति-प्रदर्शन द्वारा संचालित किए जाते हैं, अतः इसी को दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि नयी प्रवृत्ति आंदोलनरत है। प्रवृत्ति और आंदोलन में अंतर एक तो इसी प्रकरण में स्पष्ट है कि प्रायः ‘प्रवृत्ति’ के लिए ‘आंदोलन’ होता है,  दूसरे यह ज़रूरी नहीं कि हर साहित्यिक आंदोलन प्रवृत्तिगत ही हो या हर प्रवृत्ति आंदोलन द्वारा ही स्थापित हो। आंदोलन संगठित रूप से सप्रयास चलाए जाते हैं। आदिकालीन साहित्य की तमाम प्रवृत्तियाँ समान हैं, पर वे संगठित होकर किसी एक बैनर तले नहीं चलायी गईं; जबकि भक्तिकाल एक साहित्यिक आंदोलन है, उसका प्रभाव पूरे देश में छाया रहा। यह संगठित रूप में चला, भले ही अलग-अलग संगठनों द्वारा। तमाम भक्ति-संप्रदाय इस दृष्टि से आंदोलनरत संगठन ही थे। उसके बाद रीतिकालीन साहित्य भी किसी आंदोलन का नहीं बल्कि एक खास प्रवृत्ति की ओर झुकाव का ही परिणाम था। रीतिकाल के बाद भारतेंदु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग साहित्यिक आंदोलन थे क्योंकि प्रायः ये क्रमशः एक-दूसरे की प्रवृत्तियों से असंतुष्ट होकर उनके विरोध में उपजे थे। प्रायः कहने का यह मतलब है कि भारतेंदु युग में बहुत सी रीतिकालीन प्रवृत्तियाँ भी थीं। यह उन प्रवृत्तियों के विरोध में नहीं, बल्कि देश की राजनीतिक और सामाजिक ज़रूरतों से उपजा हुआ आंदोलन था। इस काल में पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन और गद्य की विविध विधाओं के माध्यम से देश की जनता को अपने देश की हीन दशा के प्रति सचेत किये जाने का आंदोलन चला। द्विवेदी युग में महावीरप्रसाद द्विवेदी ने रीतिविरोधी और भाषा के गद्य-पद्य एकीकरण और परिमार्जन का अभियान चलाया। पद्य में भी व्याकरण-सम्मत कर्ता-कर्म-क्रिया के वाक्यात्मक प्रयोग पर जोर देने के कारण इस युग की कविता प्रायः नीरस गद्य में ‘इतिवृत्तात्मक-टाइप’ की होने लगी। इस इतिवृत्तात्मकता के खिलाफ विद्रोह में उठा हुआ साहित्यिक आंदोलन छायावाद था। नगेंद्र की छायावाद की बहुप्रचलित परिभाषा भी है–‘छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।’ इसी प्रकार छायावाद के बाद प्रगतिवाद एक साहित्यिक आंदोलन था। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना द्वारा ऐसे कवियों को एक बैनर तले इकट्ठा कर इस आंदोलन की प्रक्रिया को अंजाम दिया गया। प्रयोगवाद भी एक आंदोलन ही था। इस आंदोलन का नेतृत्व अज्ञेय ने संभाल रखा था। उन्होंने सप्तक-श्रृंखला और ‘प्रतीक’ के जरिए कवियों को एक बैनर तले इकट्ठा किया था और उनके साथ-साथ उनके सहयोगी अन्य कवि भी अपने द्वारा प्रवर्तित की जा रही काव्य-प्रवृत्ति के समर्थन और दूसरी काव्य-प्रवृत्तियों की नुक्ता-चीनी के लिए आलोचना के क्षेत्र में उतर चुके थे। मतलब यह सब संगठित तरीके से किया जा रहा था, तो आंदोलन ही हुआ! इसके बाद नयी कविता भी एक आंदोलन के रूप में ही चली, यद्यपि आरंभ में यह प्रयोगवादी प्रवृत्तियों के विस्तार की मुद्रा में थी पर धीरे-धीरे इसने अपना रास्ता अलग कर लिया, और उसी तरह अपने पक्ष और दूसरों के विपक्ष में इसने भी आलोचना के क्षेत्र में मत दिए जिस तरह से प्रयोगवादी कवियों ने दिया     था। इस दृष्टि से जगदीश गुप्त और लक्ष्मीकांत वर्मा के आलोचनात्मक विचार खास महत्व रखते हैं। नयी कविता इस अर्थ में भी प्रवृत्ति से ज्यादा एक आंदोलन है कि यह प्रयोगवादी कवियों से अलग कुछ खास प्रवृत्ति नहीं निर्मित कर सकी। अतः इस दृष्टि से लक्ष्मीकांत वर्मा का यह कथन बहुत उचित नहीं लगता कि “नयी कविता कोई आंदोलन नहीं है : वह एक साहित्यिक प्रवृत्ति है जिसमें आज का भाव बोध अधिक व्यंजना के साथ अभिव्यक्ति पाता है।”  नयी कविता, जिसको लेकर साहित्यिक क्षेत्र में बहुत दिनों तक कश्मकश जारी रही, जिसके समर्थन के लिए नए कवि संगठित होकर आलोचना के क्षेत्र में उतरे, वह एक साहित्यिक आंदोलन ही थी, इसमें कोई शक नहीं। यद्यपि यह दिखाया जा चुका है कि नयी कविता आंदोलन ने अपने को प्रयोगवादी आंदोलन से पृथक कर लिया था फिर भी प्रयोगवादी प्रवृत्तियों से मेल खाने और कुछ आलोचकों के इस ओर रुझान के कारण अगर प्रयोगवाद को नयी कविता में मिलाकर भी यह कहने की कोशिश की जाएगी कि नयी कविता आंदोलन नहीं एक प्रवृत्ति विशेष है तो भी वह अधूरा कथन ही होगा। इस दृष्टि से भी नयी कविता अंततः एक साहित्यिक आंदोलन ही है, क्योंकि प्रयोगवाद भी एक साहित्यिक आंदोलन है। 
यद्यपि कुछ लोग यह भी मानते हैं कि ‘प्रयोगवाद’ और ‘नयी-कविता’ दो नाम से प्रचलित एक ही काव्यांदोलन हैं। उनके ऐसा मानने के पीछे कारण हैं कि न सिर्फ ‘प्रयोगवाद’ और ‘नयी-कविता’ के कवि प्रायः समान हैं, बल्कि सप्तक-श्रृंखला भी 1979 ई0 (चौथा सप्तक) तक चलती रही—‘प्रतीक’ और ‘नयी कविता’ के समानांतर। इसके समर्थन में वे यह तर्क दे सकते हैं कि नयी कविता ‘तार-सप्तक’, ‘प्रतीक’ और ‘नयी कविता’ नामक पत्रिकाओं के सम्मिलित उद्योग और सहयोग से विकसित हुई। पर, जैसा कि संकेत किया गया, इस भ्रम की स्थिति के बनने के पीछे कारण यह है कि नयी कविता के पुरस्कर्ताओं और सिद्धांतकारों में अधिकांशतः प्रयोगवाद के ही कवि थे, अतः इसके शुरुआती दौर में प्रयोगवाद को इससे बहुत भिन्न नहीं माना जाता था। रामविलास शर्मा ने प्रमाणों के आधार पर लिखा है—“सन् 1954 में डॉ. जगदीश गुप्त और उनके मित्रों ने इलाहाबाद से ‘नई कविता’ का प्रकाशन आरंभ किया। पहले अंक में नयी कविता पर पंत का लेख छपा। तीन साल पहले रेडियो-गोष्ठी में पंत ने प्रयोगवाद पर जो कुछ कहा था, वही शीर्षक बदलकर अब नयी कविता पर छाप दिया गया। ...पंत  का कार्य उचित था क्योंकि आरंभ में नयी कविता को उसके सिद्धांतकार प्रयोगवाद से अलग न करते थे। ‘प्रयोगवादी जिसे हम नयी कविता भी कहते हैं’—सन् ’54 में लक्ष्मीकांत वर्मा ने लिखा था। (आलोचना जुलाई ’54)।”  पर, जैसा कि उपर्युक्त विश्लेषण और उद्धरणों से स्पष्ट है, धीरे-धीरे नयी कविता के कवियों ने अपने आपको प्रयोगवादी सीमा से अलग कर लिया और नयी कविता को एक स्वतंत्र आंदोलन का स्वरूप दिया। अब नयी कविता और प्रयोगवाद व्यावहारिक और सैद्धांतिक रूप से दो अलग-अलग काव्यांदोलन माने जाने लगे हैं, भले ही उनकी अधिकांश कविताएँ प्रायः समान कवियों की होने के नाते समान प्रवृत्तियों वाली हों। और फिर यह उपर्युक्त विश्लेषणों और उद्धरणों से स्पष्ट ही है कि उनमें समानताओं के साथ-साथ पर्याप्त अंतर भी थे। प्रयोगवाद से जब कुछ वैचारिक या भावात्मक असहमति महसूस हुई होगी तभी नयी कविता आंदोलन चलाने की जरूरत समझी गयी होगी। जरूरत न भी रही हो तो भी अगर आंदोलन अलग नाम से चला और उसकी सत्ता साहित्येतिहास में मौजूद रह गयी तो उसकी अपनी अलग महत्ता है ही। उसकी अपनी कुछ विशेषताएँ अन्य काव्य-आंदोलनों से पृथक होनी ही चाहिए, हैं भी।   

संदर्भ:
  1. कविता के नए प्रतिमान : नामवर सिंह,  राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली,  चौथा संस्करण 1990, बारहवीं आवृत्ति 2014,  पृष्ठ 82 
  2. वही, पृष्ठ 83
  3. नयी कविता और अस्तित्ववाद : रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, बारहवीं आवृति 2014, दूसरे संस्करण की भूमिका से 
  4. कविता के नए प्रतिमान : नामवर सिंह,  राजकमल प्रकाशन,  नई दिल्ली, चौथा संस्करण 1990, बारहवीं आवृत्ति 2014, पृष्ठ 64
  5. नई कविता : आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण 1997, पृष्ठ 3
  6. नयी कविता : सीमाएँ और संभावनाएँ : गिरिजाकुमार माथुर, नेशनल पब्लिशिंग हाउस दिल्ली, संस्करण 1973, पृष्ठ 69
  7. कविता के नए प्रतिमान : नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, चौथा संस्करण 1990, बारहवीं आवृत्ति 2014, पृष्ठ 34-35 
  8. नई कविता : आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, संस्करण 1997, पृष्ठ 3 
  9. नयी कविता और अस्तित्ववाद : रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2014, पृष्ठ 35-36  
  10. नयी कविता के प्रतिमान : लक्ष्मीकांत वर्मा, भारती प्रेस प्रकाशन इलाहाबाद, 1957, पृष्ठ [2] भूमिका से 
  11. नयी कविता और अस्तित्ववाद : रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, आवृत्ति 2014, पृष्ठ 34 

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