रतन कुमार सांभरिया रचित नाटक ‘वीमा’ की कथावस्तु

- सुनील जाधव


वीमा नाटक में एक नेत्रहीन पति की नेत्रहीन पत्नी का अपहरण होने के बाद पत्नी को पाने के लिए पति का दृढ़ सघर्ष हैं। इस अपहरण का कारण जाति-भेद हैं। रत्नकुमार सांभरिया द्वारा रचित वीमा नाटक में नेत्रहीन विजातीय दम्पति हैं। नेत्रहीन जमन वर्मा दलित हैं तो उसकी पत्नी वीमा सवर्ण ज़मींदार की लड़की हैं। नाटक में दलित होने का खामियाजा जमन वर्मा को भुगतना पड़ता हैं। अपनी पूरी सच्चाई के साथ आपसी सहमती से जमन वर्मा और वीमा का विवाह हुआ था। किन्तु कथावस्तु में मोड़ तब आता हैं जब ज़मींदार पिता द्वारा वीमा को जमन वर्मा को बिन बताये घर ले जाया जाता हैं। जमन वर्मा वीमा की खोज करता हैं तो पता चलता हैं कि वीमा को जबरन ले जाया गया हैं। वह इसका विरोध करता हैं। वह अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता हैं इसीलिए वह उसे किसी भी हालात में पाना चाहता हैं।

नाटक की कथावस्तु में पूर्वदीप्ति (फैलशबैक) शैली का प्रयोग किया गया हैं। किसी फ़िल्म की तरह जमन और वीमा की पहली मुलाक़ात का दृश्य हमें दिखाई देता हैं। नाटक की नायिका वीमा सवर्ण ज़मींदार की लड़की हैं। उसे दो भाई हैं। माँ की मृत्यु हो चुकी हैं। वह घर पर उससे जो बनता हैं वह काम कर लेती हैं। ज़मींदार पिता अपनी नेत्रहीन बेटी का विवाह अपने ही जैसे एक अधेड़ उम्र के पहले से विवाहित निःसंतान ज़मींदार से करवाना चाहता हैं। किन्तु वीमा इसका विरोध करती हैं और एक दिन मौका पाकर घर से भाग कर शहर पहुँचती है।

वीमा, “ हमारा खाता-पीता नामी-गिरामी घर है। जमीन है। माँ नहीं है तो क्या! बाप है। दो भाई हैं। दोनों सर्विस में हैं। दो भावजें हैं। एक टीचर है। घर-परिवार में दो रोटियों के लिए हाथी का पेट बन गई मैं। आँखें नहीं तो क्या? जितना बनता था, करती थी। बर्तन-भांडे धोना, बच्चों को नहलाना-धुलाना स्कूल भेजना।" 40 
"मेरी शादी एक अधेड़ से करना चाहते थे।" 40
अकेली, बेसहारा नेत्रहीन जवान वीमा को देखकर एक गुण्डा उसे स्टेशन के पास एक गड्ढे में ले जाकर अवसर का लाभ उठाना चाहता हैं। ऐसे में उसकी चीख-पुकार सुनकर नाटक के नायक अर्थात हीरो नेत्रहीन जमन वर्मा की इंट्री होती हैं। और वह नेत्रहीन होने के बावजूद भी उस गुण्डे को पत्थर से मारकर भगा देता हैं। और वीमा को बचा लेता हैं। नायक जमन का नेत्रहीन होने के बावजूद भी नायिका वीमा को बचना उसके साहस का परिचय देता हैं।

जमन वीमा को अपने साथ ले जाता हैं और नेत्रहीन संस्था के चालक श्यामाजी से मुलाक़ात करवाता हैं। श्यामाजी ने ही जमन को नौकरी और रहने के लिए अपने ही स्कूल के ऊपर कमरा दिया हैं। जमन के अनुसार श्यामाजी उसे अपने बेटे की तरह देखता हैं। इसीलिए वह वीमा को श्यामाजी से मिलवाना चाहता हैं। श्यामाजी वीमा को देखकर उसे जमन को अपने साथ रखने के लिए कहता हैं।

जमन वीमा को स्कूल के ऊपरी भाग पर स्थित अपने कक्ष में ले जाता है। तीन दिन से भूखी वीमा को बाहर भोजन लाकर खिलाता हैं। रात में जब वे एक ही बिस्तर पर सोते हैं तो इंसानियत और नैतिकता का पालन जमन करता हैं। इस बात से वीमा जमन से प्रभावित हो जाती हैं और उसे अपने विवाह के संकेत देती हैं। इस पर जमन श्यामाजी के पास अनुमति के लिए जाता हैं। इससे पहले जमन श्यामाजी से अनुमति ले श्यामाजी ही उसे विवाह की बात करता है।

"वह भी नेत्रहीन। तुम भी नेत्रहीन। वह भी सुंदर। तुम भी सुंदर। हमउम्र से भी हो तुम दोनों। चाहो तो शादी कर लो अभिभावक की भूमिका में मैं हूँ ना।" 44
और फिर दोनों का आपसी सम्मति से विवाह हो जाता हैं। विवाह से पहले वह अपनी दलित होने की सच्चाई को उसके सामने व्यक्त करता हैं। वीमा तो जात-पाँत से ऊपर हैं। 
जमन, “तुम ऊँची जात। मैं नीची जात। तुम सवर्ण होम मैं दलित हूँ। मन में ऊँच-नीच का भेद रहते गृहस्थी की गाड़ी नहीं चलती।"45 
वीमा, “छोडो भी जमन! इतने पढ़े-लिखे होकर भी जात की काप में पाँव मार रहे हो। तुम मर्द हो, मैं औरत हूँ - दो जात। तुम नेत्रहीन, मैं नेत्रहीन - एक जात।" 45

विवाह होने के बाद वीमा चार माह के पेट से हैं। एक दिन जमन वर्मा को पता चलता हैं कि घर पर ताला लगा हुआ है और वीमा घर पर नहीं है। वह अंदाजा लगाता हैं कि वह पेट से होने के कारण मइके गयी होगी। किन्तु बिन बतायें जाना उसे यह बात खलती है। वह श्यामाजी के पास जाता है और वीमा की बात कहता है किन्तु श्यामाजी उसे सामूहिक विवाह में किसी दूसरी लड़की से विवाह और पाँच सौ रूपये वेतन बढ़ाने की बात कहता है। 

“निशक्तों के सामूहिक विवाह के लिए हमने आवेदन आमंत्रित किए है। तुम भी अपनी अर्जी लगा दो। हाँ, जाति के कॉलम में अपनी जाति ज़रूर लिख देना, साफ-साफ।"17 
"वह जमींदार, तुम फाकामार। वह सिर, तुम चरण। शर्म आनी चाहिए तुम्हें।" 19 
"तुमने जात छुपा कर शादी कर ली बेचारी से कि दलित से सवर्ण बन जाऊँ।" 19

 वह तलाक के कागजात पर हस्ताक्षर करने के लिए कहता है। जब जमन नहीं मानता तो श्यामाजी उसे जाति छुपाने का आरोप लगाता हैं। इस वक्त जमींदार और उसका लड़का वहीं पर बैठे हैं। श्यामाजी उसे स्कूल से निकाल देता हैं। लेकिन जमन वर्मा उनसे डरता नहीं। वह निडर होकर स्पष्ट कहता हैं, "मैं नेत्रहीन हूँ। कायर नहीं। विमा की खातिर मरने से भी नहीं डरूंगा मैं। ----- वीमा को चौथा महीना है। अगर मेरी बीवी और होने वाले बच्चे के साथ कुछ हो गया तो कटघरे में होंगे आप।" 21-22

स्कूल से निकाले जाने पर वह निशक्तजनों के आका के पास जाता हैं। आका निशक्तजनों के रक्षक हैं। वहाँ दिन भर निशक्तजनों की अपनी समस्याओं को लेकर भीड़ बनी रहती हैं किन्तु वह भी श्यामाजी की बोलती बोलता हुआ दिखाई देता हैं।

“हम सालों-साल, उम्र भर, बिना धर्म जी सकते हैं, बिना जात एक पल भी नहीं रह सकते। पक्षी भी अपनी हैसियत के मुताबिक ही पंख फड़फड़ाता है। उड़ता है। तुमने अपनी औकात का अतिक्रमण किया है वर्मा। पेज-31

जमन, “आप इतने बड़े पद पर होकर भी जात जी रहे हैं? बड़े होकर छोटे विचार रखते हैं?"-31

"प्रेम के पौधे पर जात की कुल्हाड़ी मार रहे हैं आप। जो श्यामाजी कह रहे थे, वही आप कह रहे हैं।"31

“ये जो आका हैं ना, दो मुँहे हैं। उनको अपने चहेते चाहिए। ऐसे वफादार जो पैर चाटते रहें और पूँछ हिलाते रहें। नि:शक्तों की पीड़ा से उनका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं हैं।” 52

 जमन समझ जाता हैं कि श्यामाजी, जमींदार और उसका लड़का पहले से ही वहाँ बैठे हुए हैं। जमन किसी से डरता नहीं हैं। वह किसी भी हालत में अपनी पत्नी वीमा को पाना चाहता हैं। वह वहाँ से हताश होकर निकल जाता हैं। 
वह ऑटोरिक्शा में सवार हो विकलांग संघ के अध्यक्ष एवं अपने मित्र देवतसिंह की ओर निकल पड़ता हैं। देवतसिंह को पत्नी वीमा के अपहरण, श्यामाजी एवं निशक्तजनों के आका, वीमा के ज़मींदार पिता एवं भाई का व्यवहार बताता हैं। देवतसिंह उसके साहस एवं विश्वास को बढ़ाते हुए पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करने की बात करता हैं। देवतसिंह चौहान के दोनों पैर घुटने तक ही हैं। वह जमन वर्मा के साथ पुलिस थाने जाता हैं। थाने में शिकायत दर्ज की जाती हैं। किन्तु बाद में पता चलता हैं कि थानेदार ने एफ. आई.आर. दर्ज करवाकर ली ही नहीं वह तो वैसे ही टेबल पर पड़ी हुई हैं।

देवतसिंह अपने परिचित शहर के प्रतिष्ठित अखबार ‘दैनिक बाज’ के संवाददाता चमक चन्द्र झा को बुलाता हैं। उसे वीमा के अपहरण, श्यामाजी, आंका, ज़मींदार पिता, भाई, थानेदार के व्यवहार के बारे में बताता हैं। श्यामाजी द्वारा वीमा का अपहरण, नौकरी से निकाला जाना, जाति छिपाने का आरोप, जबरन तलाक पेपर पर हस्ताक्षर करने की बात आदि सारी घटित बातें सुनकर इस पर पत्रकार उन्हें अपने समाचार पत्र के माध्यम से न्याय देने की बात करता हुआ चला जाता हैं। और सीधे श्यामाजी से रूबरू होता हैं। और वीमा के अपहरण, जमन वर्मा को नौकरी से निकालने, जाति-भेद आदि का कारण पूछता हैं। श्यामाजी पत्रकार झा के कारण अपने भविष्य को संकट में पाता हैं इसीलिए पहले वह उसे जाति का प्रलोभन देता हैं। 

“नीची जात होकर भी उसने बड़ी जात की लड़की से शादी की है। यह धर्मघात है। जात को मात है। बेटे झा, यह जात-पाँत, छुआछूत ही हमारी साँसें हैं। जात मरी, हम बदर हुए।” 66

“बेटे, आपकी शिराओं में भी उसी जाति का रक्त है, जो मेरी शिराओं में बह रहा है। झा बेटे, दुर्योग यह रहा कि वह लड़की मेरी रिश्तेदार निकल आई। नीची जाति का जमन वर्मा मेरे स्कूल में टीचर और उसकी पत्नी मेरी रिश्तेदार। बेटे, आँखों देखे मक्खी नहीं निगली जाती न?” 67

जब वह जाति के प्रलोभन से नहीं मानता तब वह पैसों के प्रलोभन से खरीद लेता हैं। पत्रकार झा श्यामाजी के अनुसार खबर को दूसरे दिन दैनिक बाज समाचार पत्र में छाप देता हैं। जमन वर्मा को समाचार पत्र से न्याय देने की बजाय, उसे ही गलत साबित करते हुए वह श्यामाजी को सही साबित करता हैं।

 “नेत्रहीन ने जात छुपा कर ब्याह रचाया, पत्नी को तलाक चाहिए।
वीमा नाम की भोली-भाली एक ग्रामीण लड़की घर से रूठ कर शहर आ गई। संयोग से रेलवे स्टेशन पर उसे नेत्रहीन संस्थान का एक नेत्रहीन अध्यापक जमन वर्मा मिल गया। वर्मा उस बेचारी को बहला-फुसला कर अपने कमरे पर ले आया। कई दिनों तक अवैध रूप से उसे अपने कमरे पर रखा और उस के साथ ज्यादती करता रहा। 
जब लड़की को जमन वर्मा के नीची जाति का होने का पता लगा तो उसे मूर्च्छा आ गई। लड़की की हालत बिगडती रही, लेकिन जमन उससे ज्यादती करता रहा। एक दिन मौका पाकर लड़की नेत्रहीन संस्थान के संस्थापक श्यामाजी के चैम्बर में गई और आपबीती सुनाई। जमन के चंगुल से छुड़ाने के लिए वह खूब रोई, गिड़गिड़ाई। सहृदय श्यामजी ने उसको ढाढस बंधाया। उन्होंने ही वीमा के गाँव खबर की । वीमा के पिता और उसका भाई आए उसे अपने साथ गाँव ले गए। नेत्रहीन संस्थान के संस्थापक श्यामाजी ने जमन वर्मा के इस कुकृत्य पर कठोर कारवाई करते हुए उसे अध्यापक की नौकरी से बर्खास्त कर दिया।

(जमन का झूठा बयान)-मुझे नहीं मालूम लड़की किस जात की है। अगर वह तलाक लेना चाहती है तो मुझे कोई एतराज नहीं है -जमन वर्मा, नेत्रहीन संस्थान का पूर्व अध्यापक।” 70-71

 दुबारा जब जमन और देवतसिंह थाने जाते हैं तब थानेदार समाचार पत्र में छपी बात को लेकर उन्हें ही डराता हैं, 
“स्साले, अंधे, लंगड़े-लूले भी बड़े घरों की लड़कियों को धोखा देकर उसने शादी रचाने लगे हैं। ज्यादती करने लगे हैं। गुंडे कहीं के।” 70

“ले ये तेरी अर्जी पकड़ और भाग जा यहाँ से। विकलांग हो दोनों। और होते, तो सीधा अंदर कर देता। आइंदा ऐसी झूठी शिकायत लेकर थाने मत चले आना।” 73

जमन के पास यह एक ही मौका था। जिस कारण वह वीमा को प्राप्त कर सकता था। वह श्यामाजी, निशक्तजनों के आँका, थानेदार, पत्रकार, विकलांग संघ के अध्यक्ष देवतसिंह चौहान के पास जाता हैं। लेकिन चहुँ ओर से वह अपने आपको असफल पाता हैं। वीमा को पुनः पाने की जिद्द, उसका सपना सबकुछ उसके सामने धरा का धरा-सा लगता हैं। किन्तु उसका मित्र विकलांग संघ के अध्यक्ष देवतसिंह चौहान उसमें साहस, आशा, विश्वास को जगाता हैं। वह कहता हैं, “नि:शक्त अपनी पर उतर आएँ तो लोहे की गेंद हैं। लोहे की गेंद को न किक मारी जा सकती है, न उसे उछाला जा सकता है।”

जमन वर्मा, देवतसिंह और अन्य विकलांगों के साथ निशक्तों के आका के कार्यालय के सामने धरना देता है। वह एक पैर पर खड़ा हो जाता है। पैर के नीचे श्यामाजी का गमछा दबाया हुआ है। निशक्तों के आका को कार्यालय में जाने से रोका जाता। इस खींचातानी में उसकी धोती निकल जाती है और वह धोती जमन के पैर के नीचे रखा जाता है। यह खबर शहर के सभी अख़बारों में सुर्खियाँ बनती हैं। यह समाचार सुनकर सभी विकलांग धरने में शामिल हो जाते हैं। इस का प्रभाव ऐसा पड़ता है कि डर के मारे वीमा को जमन को लौटा दी जाती है।

इस प्रकार एक ओर पति की पत्नी को पुन: पाने का साहस, वीरतापूर्ण संघर्ष पूरा होता है। तो दूसरी ओर जाति पर इंसानियत की जीत होती है। वहीं पर जाति भेद, नेताओं, थानेदार, पत्रकारों की दोगली निति का पोल खोलने का काम भी यह नाटक करता हुआ नजर आता हैं। नाटक कई महत्वपूर्ण विषयों को एक साथ लेकर चलता हुआ नजर आता हैं। 1.विकलांग अर्थात दिव्यांगों की समस्याओं का चित्रण 2.वैवाहिक जीवन में बाधा उपस्थित करता जाति-भेद 3.एक नेत्रहीन पति की अपने नेत्रहीन पत्नी के अपहरण के बाद उसे पाने का साहसपूर्ण कड़ा संघर्ष का चित्रण। 4.निशक्तों के रक्षक कहलाने वाले नेता का दोहरा रूप 5.बिकाऊ पत्रकार 6. दबाव में काम करनेवाली पुलिस व्यवस्था 7. ईमानदार विकलांग संघ का कार्य ८.नेत्रहीनो के रहनुमा का दोगला रूप 9.जाति-भेद का शिकार अध्यापक का चित्रण हुआ हैं।

कथावस्तु अभिनेय एवं रंगमंच के अनुकूल हैं। समाज में स्थित जाति-भेद के भयंकर जहर की समस्या का चित्रण करते हुए नाटक को विकलांग विमर्श से जोड़ते कर नया मोड़ देने का काम किया गया है। पात्रों की संख्या की भरमार न करते हुए कम पात्रों को लेकर कथावस्तु को न्याय देने का कार्य किया गया है। सम्पूर्ण नाटक 78 पृष्ठों में और दो अंकों में लिखा गया हैं। अन्य पात्रों को पकड़ कर पात्र संख्या 12 हैं। नाटक का रचनाकाल 2012 का हैं। इस नाटक की कथावस्तु उन्हीं के द्वारा लिखी गयी एक कहानी ‘संवाखे’ के कथावस्तु से प्रेरित है।

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