खेमकरण ‘सोमन’ की दस कविताएँ

खेमकरण सोमन
कैसा होगा वह घर
 
फूल ही होती हैं लड़कियाँ
जनमती हैं जिस जगह पर
महकाती रहती हैं उस जगह को
दूसरी जगह को भी 

कई कई परिवारों में 
कराती रहती हैं आभास अपने होने का
अपने कई कई रूपों का

इस तरह 
जनमती जीती रहती हैं जिंदगी

ओह! कैसा होगा वह घर आंगन
जहाँ फूल नहीं!
***


कभी बेचैन नहीं देखा
 
कभी किसी पेड़ को बेचैन नहीं देखा
न नदी को
न खेत को
न पहाड़ को
न जंगल को
न कभी सूरज, चाँद, सितारे को
न कभी हवा को

कभी बेचैन नहीं देखा
एक, दो, पाँच, दस, बीस, पचास, 
सौ, पाँच सौ अथवा
दो हजार रूपये के नोटों को भी

बस बेचैन देखा कुछ लोगों को
कुछ देशों को,
सब कुछ हथियाने के लिए

ये देश, ये लोग 
आखिर किधर जा रहे है?
***


नमक
 
अन्न, अनाज फल फूल औषधि
हवा पानी धूप से बहुत लाभान्वित मैं
पूर्णतः स्वस्थ,
बहुत बहुत शुक्रिया अदा करता हूँ
इन सबका

शुक्रिया अदा करता हूँ नमक का भी
जिसने क्षण क्षण बताया मुझे
जब तक रहूँ इस पृथ्वी पर
ईमानदारी, नमक हलाली का 
न छोड़ूँ दामन ।
***


मौत
 
मौत अब उसके आसपास है
मौत अब उसके इधर उधर है
बातों में, हाथों में है 

लगता है वह, इस बुरे वक्त में
उठ खड़ा हुआ है 
देश के लिए, न्याय के लिए
अन्धेरी शक्तियों के खिलाफ !
***


कम लोग ही बनते हैं 
 
आसमान से गिरीं बूँदें
इतनी गिरीं कि गिनती करना असंभव था

फिर हर दिशा में पानी पानी 
जीवित हो गए प्राण प्राणी
जीवित हो गए पेड़ पौधे, दूब घास
जीवित हो गईं नदियाँ झील, नहरें
खेत खेतों में खड़ी फसलें
जीवित हो गईं खुशहाली, रंग उमंग
जीवित हो गईं उस जगह की हवाएँ

बिना गणित और दिमाग लगाए
कम लोग ही बनते हैं 
बूँदें।
***


फिर मिली तुम
 
कभी बनना पड़ा ठोस
कभी द्रव
कभी भाप बनकर उड़ता ही चला गया 
पता नहीं कहाँ 
कभी यहाँ कभी वहाँ
फिर मिली तुम

कभी बनना पड़ा उदास पेड़
कभी पीले उदास पत्ते
कभी उदास सुबह शाम
कभी अन्धेरा, कभी उखरी हुई बात
कभी पंखा बनकर घूमता रहा दिन रात
फिर मिली तुम

कभी बनना पड़ा दर दर की ठोकरें खाता हुआ 
सड़क पर गिरा अनाथ पत्थर,
कभी सूखी नदी
कभी बिन सुर लय ताल की हवा
कभी हारा, कभी मरा हुआ
फिर मिली तुम

कभी कहीं बैठकर रोने लगा
कभी कहीं खोने लगा, जमीन पर सोने लगा
कभी कोसने लगा समाज को
कभी खुद को
कभी सोचा अब खत्म कर दूँ अपने वजूद को
फिर मिली तुम।
***

लड़की है लाखों में एक
 
लड़के के परिवार वालों ने कहा 
लड़की है लाखों में एक

लड़के के पड़ोसियों ने कहा 
लड़की है लाखों में एक

लड़के की बुआ ने कहा 
लड़की है लाखों में एक
ऐसी लड़की नहीं मिलेगी यहाँ कहीं

लड़के के पिताजी ने भी कहा 
लड़की है गोरी खूबसूरत यानी लाखों में एक
और ऊपर से एक दो बार लग जाएगी हल्दी
फिर हो जाएगी और भी गोरी
और भी खूबसूरत

उनकी बातों को सुनकर
सोच रहा था लड़का 
क्या होगा उस लड़की का
जो नहीं है लाखों में एक,
जो नहीं है किसी की नजरों में
जो नहीं है किसी की गिनती में
जो नहीं है किसी की दृष्टि में खूबसूरत

क्या होगा उस लड़की का
जिसके लिए नहीं है किसी के पास
प्रशंसा भरी आवाज और
प्यार के दो तीन शब्द भी

लड़का खोज रहा था अब ऐसी लड़की
जो लाखों में एक न हो। 
***


कल हरे भरे पेड़ उजड़ेंगे 
 
इधर
कुछ दिन पहले ही सफल हुए हैं चिड़े चिड़िया
तिनका तिनका जोड़ घोंसला बनाने में
थोड़ा हँसने मुस्कुराने में

और उधर
हो चुकी है घोषणा 
काट दिए जाएँ कल ही
सड़कों के इर्द गिर्द खड़े 
सारे पेड़ और झाड़ियाँ
हो सके ताकि सड़कों का चौड़ीकरण

ओह!
कल हरे भरे पेड़ उजड़ेंगे
कितनों की हरी भरी जिंदगी 
घर परिवार भी।
***


बात अटक गई थी
 
जिन्दगी
मौत की समर भूमि में
मौत न ले जाती उसे परास्त कर
घसीट कर
परन्तु बात अटक गई थी
डॉक्टर की फीस पर।
***


बिल्कुल भी स्वीकार न हुआ
 
जेब में हाथ घुसाकर बहुत विश्वास से कहा उसने 
आप इजाजत दें यदि तो 
दे दूँ पैसे मैं आज

मन उन्नीस सौ सैंतालिस तो था नहीं कि
स्थिति परिस्थिति समझ सम्भाल न सके 
अतः बिलकुल भी स्वीकार न हुआ कि यह दे 
या दूसरा 
या तीसरा 
या दे चौथा पाँचवाँ

जब कभी सुनता अपने इन जूनियर भाइयों को
बोली पर भाषा पर देश पर विदेश पर
समाज पर संस्कृति पर धर्म पर अर्थ पर राजनीति पर
क्षेत्रीय वैश्विक हाल पर
गरीबी की चाल पर तो
आसमान में बिखर जाता इन्द्रधनुष

सोच में पड़ जाता मैं कि 
बाप रे बाप! कितने रंग ढंग चमक है इनमें
कितने उपजाऊ बीज हैं ये सब
पर कहीं खुद को छिड़क न लें ये
समय की बंजर भूमि में
अपने पूर्वज पुरखों की तरह

इसलिए
समय समाज की भूमि करनी होगी तैयार और उपजाऊ
ताकि पेड़ बन सके,
लहलहाती फसल बन सके ये सब 
और लिख सके अपने समय का मान गान संघर्ष
तब क्या मजाल कि मेरे जूनियर
दे दें चाय पकौड़ी समोसे या किताब कोचिंग के पैसे
जबकि जानता समझता हूँ इनके जेबों की असलियत

जैसे वर्षों बरस पूर्व 
मेरे जेबों की असलियत भी
जानता समझता था मेरा एक सीनियर।
***

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