कहानी: कुली

अमित कुमार मल्ल
अमित कुमार मल्ल


तीस वर्षीय काजल अपने पाँच वर्षीय पुत्र के साथ जनता एक्सप्रेस के ए0 सी 0 टू के कोच ए 1 के बर्थ संख्या 21 पर बैठी। बेटे का बर्थ संख्या 22 था। उसका काफी सामान था जिसे उनके परिवार वालो ने उनके बर्थ के नीचे सेट कर दिया। रेल में यात्रा करने वाले आम परिवार की भांति काजल भी दो बड़े सूटकेस, दो बड़े बैग लेकर चल रही थी। सूटकेस इतने बड़े थे कि बर्थ के नीचे लिटाने के बाद भी, उनका बड़ा हिस्सा बाहर निकला था। इस सामान को लाने के लिये उसके पति, उनका दोस्त और कार के ड्राइवर ने मेहनत की। सामान सेट होने के बाद उसे सामने के बर्थ संख्या 19 पर बेटे को सेट करना था अर्थात जिस यात्री का बर्थ संख्या 19 है, उससे अनुरोध कर बेटे का बर्थ संख्या 22 बदलवाना था ताकि उसका बेटा अजय उसकी आँखों के सामने रहे।
 दोस्त दोनों को समय देने के लिये कोच से बाहर चला गया, तब उसके पति बोले, 
- बर्थ संख्या 19 वाले से रिक्वेस्ट कर लेना। वे बर्थ चेंज कर लेंगे। भले लोग जानते हैं कि छोटे बच्चे मा की आँखों से दूर नही रहते। टैक्टिस के साथ अनुरोध करना।
मुस्कराती हुई काजल बोली
- बात कर लूंगी, आप निश्चिंत रहिये।
पति के जाते ही ट्रेन चल पड़ी। काजल ने एक पैक्ड बर्गर खाने के लिये बेटे को दिया और अधलेटी होकर मोबाइल में फ़ेसबुक खोलकर, फ़ेसबुक देखते हुए हरिद्वार का इंतजार करने लगी। अगला स्टॉपेज हरिद्वार था। तभी बर्थ संख्या 19 का यात्री आ सकता था, जिससे बर्थ इंटरचेंज के लिये बात की जानी थी।
 हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकी। वहाँ पर एक कम उम्र की, स्लिम अकेली, महिला उसके सामने के खाली बर्थ पर आकर बैठी। उसके पास एक वी आई पी अटैची और एक एयर बैग था, जिसे वह बड़ी मुश्किल से लाई थी। उसने लगभग 5 मिनट में सामान सेट किया। सामान सेट करते करते ही ट्रेन चल पड़ी। उस महिला ने परिचय की मुस्कराहट हुए अजय व उसकी माँ काजल की ओर देखते हुए बोली, 
- आपको कहाँ जाना है?
- लखनऊ ... आपको। 
- मुझे भी लखनऊ जाना है।
- अच्छा है देर रात कोई अन्य यात्री आकर डिस्टर्ब नही करेगा।
- लेकिन अभी तो एक अपर बर्थ खाली है न। 
- हाँ, देखते हैं।
- आप देहरादून में ही रहती है।
- हाँ ... और आप। 
- मैं यही हरिद्वार में रहती हूँ।
- लखनऊ कैसे जाना हो रहा है?
- मेरे पति भी पहले मेरे साथ यही हरिद्वार रहते थे। हम दोनों यही जॉब करते थे। एक माह पहले उनका तबादला लखनऊ हो गया। उनका फ्लैट सेट करने जा रही हूँ।और आप..
- हम दोनों तो देहरादून में ही रहते हैं। मेरे मायके में भतीजे का मुंडन है।इनको तो फुरसत नही मिल पाई। भतीजे के मुंडन में जाना जरूरी है। उसी फंक्शन में भाग लेने मैं और बेटा जा रहे हैं।
- मेरा भी मायका लखनऊ में है।
- बढ़िया संयोग है। आपका मायका भी लखनऊ में है और अब आपके हस्बैंड भी वही पोस्ट हो गए।
- जी। .., लेकिन मेरी पोस्टिंग तो अभी हरिद्वार में ही है।
- पति पत्नी को एक जगह पोस्ट करने का नियम नही है क्या?
- है। 
- फिर?
- प्रयास कर रही हूँ। देखिये क्या होता है?
-अच्छा ही होगा। भगवान पर भरोसा रखिये। .. नाम तो अपने बताया नही?
- रश्मि। 
- मेरा नाम काजल है।
- और ..इस क्यूट बॉय का नाम क्या है?
- अजय। 
बेटा बोला।
- किस क्लास में हो?
- किस स्कूल में हो?
- पढ़ाई में कौन सब्जेक्ट पसंद है?
- कौन सा गेम पसंद है?
इन बातों के साथ रश्मि, अजय के साथ घुलने मिलने का प्रयास करने लगी। अजय से फ्री होने के बाद रश्मि व काजल औपचारिक बाते करने लगी।इधर काजल के मन मे घूम रहा था कि वह इससे कैसे कहे कि वह अपना बर्थ बेटे को दे दे और खुद अपर बर्थ पर जाकर सो जाय?कितनी मिलनसार और व्यवहार कुशल है यह?
रश्मि ने कहा, 
- आप लोगों ने डिनर लिया?
- नही। .. मैं सोच रही थी सामने बर्थ का यात्री आ जाय तो इत्मीनान से डिनर करू।
- फिर करते हैं।
दोनों औरतो ने खाने लगाए और अपना खाना एक दूसरे से शेयर किया। एक दूसरे के खाने की तारीफ की। तब तक काजल निर्णय ले चुकी थी अब वह बर्थ इंटरचेंज के लिये रश्मि से नही कहेगी। उसी समय टी सी टिकट चेक करने के लिये आया। उसने बताया कि चौथे बर्थ पर अब कोई नही आएगा।
- बहुत अच्छा हुआ। 
दोनों एक साथ बोली। फिर दोनों ने पर्दा खींचकर उसे चिपका दिया।
 - अजय आओ, बर्थ पर लेटो। 
काजल बोली। 
- मैं अभी नही सोऊंगा।
अजय बोला। 
- अभी मैं भी सोने के मूड में नही हूँ। . ऐसा मौका कहाँ मिलताहै, बाते करते हैं। 
रश्मि ने धीमी आवाज में कहा।
काजल ने उत्तर में कहा कि, 
- नाईट बल्ब जला लेते हैं। धीमी आवाज में बात करते हैं ताकि बगल के केबिन वालो की नीद न टूटे। 
- जी। 
रश्मि ने अजय को आवाज दी, 
- अजय! तुम मेरे पास आकर सो जाओ।
- ना, आंटी। मैं मम्मी के साथ ही सो जाऊंगा। उस समय तो अजय ने मना कर दिया। लेकिन वह अपने मन के अनुसार, कभी बर्थ संख्या 21 पर तो कभी बर्थ संख्या 19 पर बैठ कर, लेट कर दोनों की बाते सुनने लगा। 
 दोनों महिलाओ ने बात करते करते कब बहनापा जोड़ लिया, बड़ी और छोटी बहन बन गयी, यह पता ही नही चला। दोनों अपने स्टूडेंट लाइफ़, अपने आदर्शों, अपने मूल्यों, अपने दोस्तों की बात करती गयी। अजय शुरुआत में दोनों की बातचीत में सक्रिय हिस्सा बना। कई प्रश्न पूछे, उत्तर मिलने पर प्रति प्रश्न भी पूछे। रश्मि उसके प्रश्नों को सुनकर उसकी बुद्धिमानी पर मुस्कराती रही। काजल आंखे तरेर कर अजय को सोने के लिये इशारा करती रही। बाद में वह केवल सुनने लगा। 
- दी, अब लखनऊ कितना सुंदर हो गया न?
- हा। अब यहाँ कई फिल्मों की शूटिंग होने लगी। 
-कितना विस्तार हो गया है?
- एजुकेशन हब बन गया है।
- हर जगह के लिये फ्लाइट हो गयी। अच्छा हो गया।
- वेल कनेक्टेड हो गया है।
- मेदांता खुल गया। पी जी आई और के एम जी सी पहले से है।
दोनों महिलाएं अपने मायके के शहर की यादों को दुबारा जी रही थी। शहर से बात खिसक कर उनके पति व ससुराल तक पहुंची। 
- हम दोनों हरिद्वार में रहते थे। दो साल पहले शादी हुई थी। 
रश्मि ने बताया।
काजल ने बताया, 
- पाँच साल पहले शादी हुई थी। एक यही बेटा है। मेरे पति बिज़नेस मैन है और हम लोग की जॉइंट फैमली है।हम सभी एक साथ ही रहते हैं।
- दी। जॉइंट फैमली में कैसा रहता है?
- अच्छा रहता है। सभी लोग एक दूसरे की मदद करते हैं। 
- मैंने सुना था कि जॉइंट फेमली में बहुओं को दिक्कत होती है।
- मेरे ससुराल में नही है। यह दिक्कत वहाँ होती है, जहाँ बहुओं को स्पेस नही मिलता, लिबर्टी नही मिलती। मेरे यहाँ सब के अपने अपने बेडरूम, उससे अटैच ड्रेसिंग रूम, स्टोर रूम व एक लाबी है। हम सभी को ब्रेक फ़ास्ट पर साथ रहना होता है। फिर डिनर पर साथ रहना होता है। पति व उनके दोनों भाइयों का अलग अलग व्यवसाय है। ब्रेकफास्ट करके ये लोग अपने अपने कमरे में आते हैं। तैयार हो कर अपने काम पर जाते हैं। दोपहर में कुक खाना तैयार कर उनके दफ्तर दे आता है। 
- घर के काम।
- नौकर, नौकरानियां है। सासु जी ने रोटेशन बना दिया है एक सप्ताह एक बहू किचन को सुपरवाइज करेगी, दूसरी घर की साफ सफाई तीसरी कपड़े, दवाई आदि। हर सप्ताह रोस्टर बदल जाता है। यदि कोई इधर उधर जाता है, हम आपस मे को ऑर्डिनेट कर लेते हैं।
- फादर इन लॉ?
- यदि वे घर पर रहते हैं अपने कमरे में 2 बजे लंच करते हैं। उस समय वे माजी के साथ खाते हैं।यदि किसी बेटे साथ ऑफिस चले गए तो वही अपने बेटे के साथ लंच करते हैं।
- दोपहर के लिये बहुए फ्री रहती है कि वे अपने कमरे में खाये या डाइनिंग हाल में खाये या बाहर होटल में खाये या पति के साथ उनके ऑफिस में खाये।
- पैसे की व्यवस्था?
- इसकी कमान फादर इन लॉ के हाथ मे रहती है। हम बहुओं को हर माह की पहली को एक फिक्स्ड रुपया मिलता है। पति व उनके भाई अपने व्यवसाय की आय से 30 % खुद ले लेते हैं, बाकी पैसा फादर इन लॉ के पास चला जाता है। घर का पूरा खर्च वही करते हैं।
- इतने नौकर को हैंडल करना बहुत मुश्किल होगा।
- नही। मेरे ससुर सास इस मामले में परफेक्ट है। वे मानते हैं कि नौकरों से काम लेने की सीमा होनी चाहिये। वे भी थकते है। उनसे काम लेते समय उनकी उम्र, उनकी शारीरिक अवस्था जरूर देखनी चाहिए। उनके भी दुख सुख का ख्याल रखना चाहिये। फादर इन लॉ नौकरो को अच्छी तनख्वाह देते हैं।
-आपके यहाँ नौकर कितने पुराने है?
-एक तो बीस साल से है। एक दस साल से है। दो नौकरानियों को आये 3- 4 साल हुए।
- बढ़िया।
-हमारे घर के नौ करो को सम्मान दिया जाता है।उन्हें परिवार के एक हिस्से के रूप में ही समझा जाता है।
- यह भी यही कहते हैं कि हमे घर के महरियों को, घरेलू कार्य करने वालो, मेहनत करने वालो को थोड़ा अधिक ही देना चाहिये। हमारे दुख सुख में वही ही सहारा देते हैं। हम होटल में टिप दे देते हैं, सैलून व पार्लर में दे देते हैं लेकिन घर के नौकरों को, रिक्शा वालो को, मेहनत का काम करने वाले लोगो को पैसा देते समय उनसे मोल भाव करते हैं।
- सही बात है। वे भी हम लोगों की तरह ही इंसान हैं।
- जी, बिल्कुल दी। आदमी और जानवर में यही तो फ़र्क है। आदमी सोच लेता है। दूसरे के दुःख दर्द को महसूस कर लेता है।
 दोनों की बात सुनते सुनते करीब डेढ़ बजे के आस पास अजय रश्मि के बर्थ पर ही सो गया। काजल ने उसे अपने बर्थ पर शिफ्ट करना चाहा, लेकिन रश्मि ने कहा, 
- वह आराम से अजय के साथ सो जाएगी। 
रश्मि ने अजय को केबिन की दीवार से सटा दिया ताकि वह रात में बर्थ से न गिरे। फिर बर्थ पर लेटते हुए काजल की ओर सिर कर लिया।
 लेकिन दोनों महिलायें सोई कहा? देर रात तक दोनों महिलाएं आपस में एक दूसरे के परिवारों की बातें करते रहे।
- दी, एक बात की आपकी विशेष तारीफ करना चाहूंगी। 
अपने पीछे अजय को सोता देखकर रश्मि बोली। 
- किस बात की?
सिर वापस काजल की ओर घुमाते हुए रश्मि बोली, 
- अजय की इतनी बढ़िया परवरिश के लिये। काजल ने सिर हिलाकर प्रश्नवाचक मुद्रा में रश्मि को देखा। 
- कितना इंटेलिजेंट है? कितने प्रश्न पूछता है? उनके उत्तर के क्रम में प्रति प्रश्न पूछता है। प्रश्न सलीके से पूछता है। 
- जॉइन्ट फैमली के लोग और इसके पापा, इससे बात करते रहते हैं जिससे इसमें यह जिज्ञासु प्रवृत्ति और प्रश्न पूछने का टेम्परामेंट डवलप हो गया है।
- बहुत ही अच्छा है। बच्चों में यह होना चाहिये। बहुत से बच्चे या तो दब जाते हैं या उदंड हो जाते हैं लेकिन अजय की तरह अपनी बात नही रख पाते।
- छोड़ो। अपना नंबर दो।
दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नम्बर लिया। यह तय किया कि परसो दोनों लखनऊ में ही मिलेंगी, साथ घूमेंगे। काजल ने रश्मि व उसके पति को मायके में आने का निमंत्रण दिया। रश्मि ने दोनों को, फ्लैट सेट करने बाद, फ्लैट पर पार्टी का निमंत्रण दिया। यह भी तय किया कि वापस उत्तराखंड आने पर दोनों एक दूसरे से परिवार सहित मिलेंगी और रेगुलर टच में रहेंगी। रात तीन बजे दोनों सोई।
 तीनो की सुबह जब नीद खुली तब ट्रैन हरदोई स्टेशन पार कर रही थी। दोनों महिलाओं ने अपना सामान समेटना शुरू किया।रश्मि ने पूछा, 
-अभी तो लगभग डेढ़ घंटा लगेगा?
- हा कम से कम इतना तो लगेगा ही। 
- क्यूट बॉय ने कुछ खाया। 
- हा मैंने बिस्कुट खाया है।
अजय ने बताया। 
- क्यूट बेटा कब, मेरे पास से मम्मी के पास चला गया?
- सुबह हो रही थी तभी आया।
- चाय पीने की इच्छा हो रही है।
- मेरी भी। 
चाय वाला आता है। दोनों चाय पीते हुए बाते करती है।
- आपके रहने से यात्रा बड़े आराम से कट गया।
- मुझे भी टाइम का पता नही चला। 
- एक नया रिश्ता मिल गया।
- बिल्कुल।
दोनों इधर उधर की बाते करने लगी।
 अजय ने अपने मम्मी से पूछा, 
-मम्मा! अपना इतना सारा सामान कैसे उतरेगा? 
 उसकी माँ बोली
- बेटा! सामान उतर जाएगा। 
 पुनः अजय बोला
- माँ इतना भारी समान हम लोग तो नहीं उतार पाएंगे। 
काजल चुप रही।
- देहरादून में इस सामान को चढ़ाने के लिये पापा, उनके दोस्त और ड्राइवर अंकल आये थे। यहाँ तो कोई नही रहेगा। फिर कैसे समान उतरेगा?
 काजल बोली 
-समान उतर जाएगा, बेटा। ट्रेन लखनऊ में 15 मिनट रुकेगी।
अजय की परेशानी कि समान कैसे उतरेगा, देखकर उसकी जिज्ञासा शांत करने के लिये 
रश्मि बोली, 
- बेटा! कुली उतारेगा।
 - ऑन्टी सही कह रही है। स्टेशन पर एक कुली कर लेंगे। वह सारा सामान उतार देगा। 
काजल बोली।
 अजय ने प्रति प्रश्न किया, 
- एक कुली कैसे इतना सामान उतार पायेगा?
- वह उतार लेगा। 
रश्मि बोली 
-माँ क्या कुली आदमी नहीं है? हमारे जैसा नहीं है?
- क्यो?
- तभी तो तीन आदमियों, पापा, उनके दोस्त, और ड्राइवर अंकल के द्वारा लाया गया सामान, एक आदमी एक साथ उतार देगा।
 दोनों महिलाओं की दृष्टि आपस में मिली। माँ ने बात घुमाते हुए अजय से कहा, 
- बेटा! स्टेशन आने वाला है। सामान गिनो। कोई सामान छूटे नही।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।