व्यंग्य: लेखक की बैलेंस शीट

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

हर लेखक कालजयी रचता है। उसके जीते जी उसकी रचनाएँ सुहागन रहती हैं। वह अपने रचनाकर्म का लालन-पालन साथी समालोचकों की सुदृष्टि में करता है। उसकी रचनाओं पर किसी की कुत्सित, ईर्ष्यालु, कुदृष्टि पड़े तो बल्लम, फरसे, फावड़े लिए साहित्य के स्वयंसेवक निकल आते हैं। पर जब वह दिवंगत प्रेमचंद या पंत स्वर्गीय हो जाए तो उनका माल पड़े-पड़े कूड़ा-कचरा और बकवास हो जाता है। आघुनिक आलोचक कह रहे हैं कि उनका नब्बे प्रतिशत माल कूड़ा-कचरा है। हिंदी साहित्य को अब कहीं जाकर सफाईकर्मी मिले हैं जो सूंघ कर साहित्य छाँट सकते हैं। कचरा-बगदा अलग, एक्सपोर्ट क्वालिटी अलग। एक्सपोर्ट क्वालिटी चीन जैसी मिले तो सुपर कचरे में अलग। बड़ी दयनीय स्थिति है। नवकुबेर अपना काला धन स्वयं घोषित कर देते हैं तो हे लेखक श्रेष्ठ! आप अपना कूड़ा-कचरा स्वयं घोषित क्यों नहीं कर देते। आप लोग बेचारे आलोचक को उपेक्षा पूर्वक कूड़ा-कचरा छाँटने की मशीन समझते हो। आप जानते हो कि लाखों लेखकों द्वारा कूड़ा-कचरा फैलाए जाने के कारण हजारों लेखक बिना उचित मूल्यांकन के टप्पे खा रहे हैं। मूल्यांकन करने के लिए आलोचक कम हैं और इनमें से भी पढ़ कर आलोचना करने वाले लगभग नगण्य हैं। ऐसे में लेखक के काम का मित्रोचित मूल्यांकन होना बहुत कठिन काम है। रचनाकार का जीते-जी विधिवत मूल्यांकन हो सके इसके लिए मैं एक विकल्प सुझा रहा हूँ, लेखकों अपनी बैलेंस शीट बनाओ।

आपने अखबारों में बड़ी-बड़ी कंपनियों की बैलेंस शीटें देखी होंगी। इनमें जितना बताया जाता है उससे ज्यादा छुपाया जाता है। जो आकर्षक है उसे बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं। इनके सहारे कंपनियाँ अपनी साख स्थापित कर लेती हैं और बैंकों को सफलता से चूना लगा देती हैं। कोई माई का लाल इन्हें चुनौती नहीं देता। इनमें इतने आँकड़े होते हैं कि इन्हें पढ़ने की कोई हिम्मत नहीं करता। ये पढ़ने के लिए होती भी नहीं हैं, ये भी आधुनिक साहित्य की तरह सिर्फ देखने के लिए होती हैं। कभी कंपनियों की बैलेंस शीटें परचूरण की दुकानों पर पुड़िया बाँधने के काम आती थीं, अब मंदी के दिन हैं, ये इस काम की भी नहीं रहीं। फिर भी, हर साल अखबार वाले पूरे-पूरे पेज पर इन्हें खुश होकर छापते हैं। लेखकों के लिए बनी अखबार की जगह को बड़ी धनराशि के बदले मल्टीनेशनल कंपनियों को बेच देते हैं। इसलिए मैं आप सब  प्रसिद्ध लेखकों से कह रहा हूँ नई रचनायें रचने की बजाय अपनी तगड़ी बैलेंस शीट बना लो। कालांतर में रचनाओं पर कोई घमासान मचे तो कहा जा सके कि फलाँ लेखक ने खुद ही घोषित किया है, उसके लिखे में नब्बे प्रतिशत कूड़ा-कचरा है। उतना छोड़ दो, शेष तो पढ़ो। इससे लेखकीय ईमानदारी की नई मिसाल कायम होगी।  

कुछ लाभ और हैं। लेखक को कार्पोरेट जैसा विराट दिखना हो तो उसे बैलेंस शीट चाहिए। बैलेंस शीट में कौन हर आइटम सौ टंच सोना होता है। बहुत सारा घोषित डूबत होता है। उससे भी ज्यादा एनपीए होता है। एनपीए होता तो डूबत ही है पर सांत्वना देता रहता है कि कभी लंगोटी दिला जाए। अपनी तगड़ी बैलेंस शीट बनाकर भी लेखक महान न बन सके तो भी महान दिख सकता है। मुझे एक ही बात का दुःख रहेगा कि हिंदी के अधिकांश लेखक तुलन-पत्र (बैलेंस शीट) के बारे में नहीं जानते। उन्हें शुद्ध हिंदी में जब बताया कि इसे कच्चा चिट्ठा कहते हैं तो भी उनके चेहरे पर रुपये-पैसे देख कर आने वाली लालिमा नहीं उभरी। ढीले-ढाले, मुरझाए चेहरे वाले लेखकों से तुलन-पत्र के बारे में बात करना अयोग्य के आगे बीन बजाने जैसा है। मैं उन्हें उन लेखकों के उदाहरण देता हूँ जो ऐसी बीन बजाते-बजाते अपने तुलना-पत्र बनवा कर बैंड मास्टर बन गए। तदन्तर प्रसिद्ध संस्थानों में विराजित हो गए। जिस बैंड मास्टर के पास भोंपू-बाजा और ढोल बजाने वाले नहीं हों उस बैंड मास्टर का बैंड अधूरा माना जाता है। सयाने कह गए हैं - अधजल गगरी छलकत जाए। ऐसे लेखक के आँसू छलक-छलक कर बहते रहते हैं। इसलिए बैलेंस शीट बनाने के पहले अपने बैंड में समुचित भोंपू लेखकों को मित्रवत भर्ती करना जरूरी है। लेखक बैंड मास्टर बन जाए तो दस-बीस छोटे लेखक भोंपू-बाजा लेकर साथ चलते हैं। इन्हीं समर्थ बैंड मास्टरों के समूह चार्ट देखकर मैं आपको लेखकीय बैलेंस शीट बनाने का विचार दे रहा हूँ। 

लेखक की बैलेंस शीट में आस्तियों (असेट्स) वाला बायाँ कॉलम सबसे सरल होता है, इसमें वित्त कम होता है, चित्त ज्यादा होता है। कुछ लेखकों में वरिष्ठता का पित्त भी हो सकता है। वरिष्ठता का पित्त घातक विष है। वरिष्ठ होकर भी जो वरिष्ठता का मुगालता पालते हैं वे चरण पादुका भी नहीं बन पाते। इस विषय पर अपना दिमाग फोड़ें इसके पहले हम लेखक की बुनियादी संपत्ति के बारे में कुछ जान लें। लेखक की संपत्ति उसकी रचनाएं होती हैं जो उसके लिए हमेशा अमूल्य होती हैं। मूर्ख ऑडिटर (आलोचक) लोग अमूल्य का अर्थ शून्य आँकते हैं, अपनी-अपनी बुद्धि। लेखक की लेनदारियां होती हैं – पारिश्रमिक, मानदेय, रॉयल्टी आदि। इनका बड़ा हिस्सा डूबत किस्म का होता है। संपादक को जिस दिन पारिश्रमिक का स्मरण कराओ उस दिन से रचनाएँ छपना बंद हो जाती हैं, स्वीकृत रचनाएँ भाड़ में झोंक दी जाती हैं। प्रकाशक से रॉयल्टी के बारे में पूछो तो वह लेखक का मोबाइल नंबर ब्लॉक कर देता है। भले ही वैज्ञानिक न्यूटन ने लाख समझाया हो कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, बेचारा लेखक भावुक जीव है दिमागी कीड़ा काटे तो बोल ही देता है।  लेखक को लेनदारियाँ सिर्फ बैलेंस शीट में ही घोषित करनी चाहिए। लेनदारियाँ माँगने का अनुरोध करना आत्मघाती कदम है। इससे भविष्य में लेखकीय कारोबार चौपट हो सकता है। ‘जो दे उसका भला, जो न दे उसका भी भला,’ सिद्धांत एक लेखक ने सभी लेखकों के लिए सोच-समझकर लिखा है।  पुराने जमाने के लेखक तो और भी गरीब-जात थे। उनकी संपत्ति में टूटी-फूटी चंद किताबें और शब्दकोश होते थे। आधुनिक लेखकों की संपत्ति में माइक्रोसॉफ्ट द्वारा अपने शैशव काल में जारी किया गया धीरे-धीरे बूटअप (चालू) होने वाला कंप्यूटर होता है। जो लेखक खुद को स्थापित और प्रतिष्ठित करवाना चाहते हैं उन्हें अपनी बैलेंस शीट में कम्प्यूटर जरूर दिखाना चाहिए। भले उन्हें एक ऊंगली से ही कीबोर्ड को ठोकना आता हो। लेखक के पास कंप्यूटर हो तो उसका शब्दकोश और पुस्तकालय से पिंड छूट जाता है। ये सब सामग्री इंटरनेट पर मुफ़्त में मिलती है। बस एक टेबल-कुर्सी और मोबाइल नसीब हो जाए तो उसे खुद को स्थापित लेखक मान लेना चाहिये। अपनी एक-दो दर्जन किताबों के अमूल्य कॉपीराइट जरूर उसके पास होते हैं। इनसे उसकी साहित्यिक साख बनती है। इस काल्पनिक साख का हर जगह उल्लेख जरूरी है। बैलेंस शीट में साख को गुडविल कहा जाता है। यह आप और मैं ही जानते हैं कि लेखक की साख का बाजारू मूल्य शून्य से भी कम हो सकता है। 

बैलेंस शीट में दायीं तरफ लेखक के दायित्व या कि उसकी देनदारियों आदि का लेखा होता है। कभी भी इसे सही-सही नहीं बतायें। दुर्भाग्य से लेखक की सारी देनदारियाँ वास्तविक होती हैं, उसे चुकानी पड़ती हैं। स्व-प्रकाशन योजना में प्रकाशक को तयशुदा नकद पहुँचाने के बाद ही उसकी किताब प्रकाशित हो सकती है। मुख्य विमोचक को श्रद्धा सामग्री पहुँच जाए तब किताब का घूंघट उठता है। अपनी किताबी प्रतिष्ठा का भार ढोते हुए लेखक दिवालिया भी नहीं हो सकता और न ही उऋण हो सकता है। बस इस दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए वह ज़िंदगी भर कलम घिसता रहता है। अखबार या पत्रिका समूह के इतर नौकरी कर रहा हो तो उसकी माली हालत कुछ ठीक हो सकती है अन्यथा उसकी स्थिति अपनी अन्नदाता हिंदी की स्थिति जैसी ही होती है (हिंदी के सरकारी जमाई राजाओं को छोड़कर)।  देनदारियों को चुपचाप देते रहना हिंदी के लेखक को पर्याप्त संत्रास देता है ताकि वह सार्थक रच सके। लेखक को अपनी लंबी अवधि की बीमारियों और पारिवारिक दायित्वों का जिक्र बैलेंस शीट में नहीं करना चाहिए। एक तो इससे उसका ही पक्ष कमजोर होता है, दूसरा अपना रोना-गाना कविता लिखने से भी अधिक मूर्खतापूर्ण है। इसलिए समर्थ लेखक अपने परिवार के बारे में बहुत कम बात करते हैं। रहीमदास जी ने बैलेंस शीट नहीं बनाई पर लेखकों को सचेत किया है - रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखो गोय, सुनी अठीलैहें लोग सब बाँटि न लैहें कोय।

अंततः आती है लेखक की धरोहर, उसकी पूंजी। लेखक की पूंजी मौद्रिक नहीं होती, कागजी होती है। आठ-दस किलो पूंजी गरीब से गरीब लेखक के पास भी निकल आती है। रचनाओं की प्रति वह अंधविश्वासी हो यह लेखक की सामान्य प्रवृत्ति है। वह अपनी दो-चार अधूरी लाइनों को भी इतने जतन से इस आशा में संभाल कर रखता है कि ये रचनायें स्वतः ही रातों-रात लंबी हो सकती हैं। यद्यपि, ऐसा अभी तक हुआ नहीं पर वैज्ञानिक युग है ऐसा हो भी सकता है। अस्वीकृत रचनाओं से उसका मोह दैविक होता है। तेरह जगहों से अस्वीकृत रचना जब अंततः भंडाफोड़ साप्ताहिक में छप जाती है तो वह लेखक को सोशल मीडिया के हर प्लेटफार्म पर फैला देती है। वह इतनी ऊर्जा देती है कि लेखक उन सभी लोगों को अपनी पोस्ट टैग कर अपना भंडाफोड़ बता सके जो उसे नकार चुके थे। लेखक को अपनी अस्वीकृत रचनाओं को कभी खारिज नहीं मानना चाहिए। इसलिए मैं सुझाव दूँगा कि आप इन्हें भी अपनी बैलेंस शीट में उचित स्थान दें। जो लेखक अस्वीकृत किए जाते हैं अंततः वे ही स्वीकृति पाते हैं। 

प्रेमचंद और सुमित्रानंदन पंत अपनी बैलेंस शीट जारी कर जाते तो उनका कूड़ा-कचरा वे ही छाँट जाते। अब मुझे भी अपनी बैलेंस शीट बनाने की प्रबल इच्छा हो रही है। मुझे पक्का विश्वास है कि हिंदी साहित्य जगत में मैं पहला लेखक होऊँगा जो अपनी बैलेंस शीट सार्वजनिक कर रहा होगा। बैलेंस शीट के लिये मेरे रचनाकर्म से संबंधित कुछ प्रारंभिक आँकड़े जुटाये हैं, ये अति गोपनीय हैं, आपके मुआयने के लिए इनका संक्षिप्त हिस्सा यहाँ दे रहा हूँ, इसे अपने तक ही सीमित रखें। इसे आपका स्नेह मिला तो पूरी बैलेंस शीट यथाशीघ्र प्रकट होगी। इस बीच हे लेखक आप अपनी भी तगड़ी बैलेंस शीट बनाना शुरू करें।

बैलेंस शीट के लिए प्राथमिक आँकड़े

नोबेल योग्य

0

 

 

साहित्य अकादमी योग्य

0

सर्वमान्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित

10

मानदेय योग्य

260

प्रतिष्ठित होने योग्य पत्रिकाओं में प्रकाशित

22

मुफ़्त में पत्रिका पाने योग्य

294

उधेड़बुन से ले घमासान मीडिया में प्रकाशित

515

अशिष्ट संपादकों ने बुरा-बुरा लिखा

53

प्रकाशन की प्रतीक्षा में

13

समझदार संपादक जो मौन रहे

2116

विचाराधीन रखने का आश्वासन

47

आक्रामक संपादकों ने फाड़ दीं

173

साम-दाम-दंड-भेद उपरांत भी अस्वीकृत (सोशल मीडिया पर स्वप्रकाशित)

2289

समग्र रचनाकर्म

2896

समग्र रचनाकर्म

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