महामारी और नारी उत्पीड़न के संदर्भ में नकारात्मकता से सकारात्मकता की यात्रा

समीक्षक: मधु संधु

दृश्य से अदृश्य का सफ़र (उपन्यास)
लेखक: सुधा ओम ढींगरा
मूल्य: ₹ 150 रुपये
प्रकाशन वर्ष – 2021, पृष्ठ - 152
प्रकाशक: शिवना प्रकाशन, सीहोर, मध्य प्रदेश 466001


‘दृश्य से अदृश्य का सफ़र’ प्रवासी महिला कथाकार सुधा ओम ढींगरा का इक्कीसवीं शती के तीसरे दशक की शुरुआत में प्रकाशित उपन्यास है। उपन्यास एक ओर कोरोना महामारी से संबद्ध है, तो दूसरी ओर अमेरिका में बसी प्रवासी भारतीय स्त्री से। प्रौद्योगिकी और औद्योगिकी के इस अत्याधुनिक समय में विश्व कोरोना के बायोलोजिकल आक्रमण से त्रस्त और भयभीत है। हवाओं में समाई एक नेगेटिव अदृश्य शक्ति अजेय बनकर मानव जाति के पूरे अस्तित्व को निगल रही है। लेकिन  गहरी उदासी, वीरानगी, मंदी, भुखमरी, असुरक्षा, अपनों को खोने के दर्द के बावजूद डॉक्टर, नर्सें, सभी स्वास्थ्य कर्मचारी/अधिकारी, शोधार्थी इस युद्ध को जीतने में जुटे  हैं। दूसरी ओर विषमतम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानने वाली, घुटने नहीं टेकने वाली सुधा की स्त्री है। पीड़ा से वह आत्मबल सँजोती है। उसे बार-बार ओंधे मुंह गिराया जाता है और वह हर बार जूझने की नई ऊर्जा ले उठ खड़ी होती है।    
‘दृश्य से अदृश्य का सफ़र’ प्रवासी महिला कथाकार सुधा ओम ढींगरा का इक्कीसवीं शती के तीसरे दशक के पहले वर्ष में प्रकाशित उपन्यास है। अनेक कहानी संग्रहों की रचयिता सुधा का एक उपन्यास ‘नक्काशीदार केबिनेट’ 2016 में आ चुका है। ‘दृश्य से अदृश्य का सफ़र’ की बिषय वस्तु के दो छोर हैं। उपन्यास एक ओर कोरोना महामारी से संबद्ध है, तो दूसरी ओर अमेरिका में बसी प्रवासी भारतीय स्त्री से। उनके पहले उपन्यास ‘नक्काशीदार कैबिनेट’ की तरह यहाँ भी सुधा ओम ढींगरा की नायिका को ( वहाँ प्राकृतिक आपदा) महामारी और अकेलापन डायरी की ओर मोड़ अतीत की यात्रा पर ले जाता है। यहाँ भी नायिका चालीस साल की नौकरी से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद अपने संपर्क में आई प्रवासी भारतीय उत्पीड़ित महिलाओं के कठिन/ बदतर जीवन को उकेर रही हैं। उपन्यास में समय- समय पर उनके संपर्क में आई भारतीय युवतियों के त्रासद जीवन की तीन झाँकियाँ हैं। 
एक डॉक्टर परिवार है। पति रवि भार्गव संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ है। पत्नी लता भार्गव मनोविद है। बेटा रविश और बहू अंकिता पल्मनेरी के तथा बेटी लतिका और दामाद भारत भूषण इंटरनल मेडिसिन के डॉक्टर हैं। 
उपन्यास की समय सीमा 8 मार्च 2020 की शाम से कोरोना की वैक्सीन अप्रूव होने से पहले तक की- यानी कोई एक वर्ष की है, जबकि डायरी के पृष्ठ पाठक को पंद्रह वर्ष पीछे तक ले जाते हैं। पूरे विश्व को चीन की देन कोविड-19/ कोरोना तहस-नहस कर रहा है। प्रौद्योगिकी और औद्योगिकी के युग में बायोलोजिकल जंग के संक्रमण से उपन्यास शुरू होता है। हर ओर अदृश्य वायरस से फैल रही इस बीमारी की अनहोनी का भय है। गहरी उदासी है, वीरानगी है, मंदी और भुखमरी है, असुरक्षा, अपनों को खोने का दर्द और आशंकाएं हैं। हवाओं में समाई एक नेगेटिव अदृश्य शक्ति अजेय बनकर मानव जाति के पूरे अस्तित्व को निगल रही है। अस्पतालों में बिस्तर के लिए प्रतीक्षा कर रहे मरीज और रेफ्रीजरेटिड ट्रकों में अंतिम संस्कार का इंतज़ार करते शव हैं। मास्क, सेनेटाइजर, डिसपोजेबल दस्ताने, ग्रोसरी स्टोर के बाहर की लंबी- लंबी लाइनें, क्वारिंटीन, दूरियों से उपजा अजनबीपन है। सब कुछ बंद है या ऑन लाइन है। दस मार्च, 2020 को ही उनकी स्टेट में आपातकाल की घोषणा कर दी गई थी। एक वीभत्स अकेलापन है। बीमारों और शवों से अपनों की अनिवार्य दूरी बनी हुई है। जीवन की भाग दौड़ में बहुत कुछ छूटता जा रहा है। ऑन लाइन उपस्थिति, विडियो मुलाकातों की सुरक्षित व्यवस्था है। लता का सेवानिवृत पति भी कोरोना के इस आपातकाल में मरीजों के लिए न्यूयार्क अस्पताल में बुला लिया जाता है। परिवार के बाकी डॉक्टर सदस्य भी अस्पतालों में इस महामारी के लिए वैसे ही तैनात हैं, जैसे युद्ध के समय सैनिक सीमाओं पर तैनात होते हैं। लता बेघर, नौकरी खो चुके लोगों के सूप किचन और फूड बैंक से जुड़ समाज को पूरा योगदान दे रही है। डॉक्टरों को तो इस संक्रमण का शिकार होना ही है। उसका पति और बेटा- बहू भी कोरोना संक्रमित होते हैं। 
उपन्यासकार ने महामारी के कारण पूरे विश्व में फैली बेचैनी, परेशानी, असुरक्षा और अराजकता के अनेक चित्र दिये हैं। यह बेरोजगारी, वर्क फ्राम होम और नेट स्कूलिंग का त्रासद और अवसाद से भरा समय है।   
मनोविद डॉ लता अवसादग्रस्त रोगियों का उपचार करती हैं। उनके पास अंतर्दृष्टि है, परकाया प्रवेश की शक्ति है, पूर्वाभास हैं। मानती हैं कि सौरमंडल के गृह भी मनुष्य के मस्तिष्क पर प्रभाव डालते हैं। पुरानी डायरियों में मन: रोगी एमरली और प्रतिभा सिंह को खोजते खोजते डॉ लता तीन स्त्रियों के त्रासद, उलझे जीवन में डूबने उतराने लगती है- डॉली, सायरा और दक्षिण  भारतीय रानी सी सुंदर, पर दासियों सा जीवन जी रही स्त्री।  
उपन्यास उत्पीड़ित स्त्री के जख्मों को अनावृत करता है। हर स्त्री प्राणघाती वेदना से गुजर रही है। इस इक्कीसवीं शती में भी स्त्री के पास आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं है। डॉली  को नशीला पानी पिला कर उसके दो देवरों और जेठ द्वारा बलात्कार किया जाता है । सास ससुर भी इस षड्यंत्र में, कुकृत्य में, साजिश में पूरी तरह शामिल हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है कि उसने कभी उस आदमी से शादी से इंकार किया था, जो आज उसका जेठ है। सायरा एसिड अटैक का शिकार इसलिए बनती है कि उसने राजनेता के उस बेटे के प्रेम आमंत्रण को अस्वीकार किया था। दक्षिण भारतीय लड़की का पति उसका रोज़ बलात्कार करता है, क्योंकि पति जानता है कि वह युवती विवाह से पहले किसी ओर युवक से प्रेम करती थी। उसे पहले दिन ही बता दिया जाता है कि वह लव की नही लस्ट की चीज़ है। बच्चों के सामने माँ की गंवार, मानसिक रोगी सी तस्वीर प्रस्तुत की जाती है। सोचती है- “भारतीय माँ- बाप अपनी लड़कियों को खुद न मार कर मरने के लिए शादी के नाम पर खूंखार जानवरों के हवाले कर देते हैं।“  लेकिन क्रूर पतियों और क्रूरतम ससुराल वालों के हाथों अपनी बलि देने को विवश युवतियाँ आज अपने लिए शक्ति/ जीवट बटोर रही हैं।   
सुधा की स्त्री विषमतम परिस्थितियों में भी हार नहीं मानती, घुटने नहीं टेकती। पीड़ा से ही आत्मबल सँजोती है। उसे बार-बार ओंधे मुंह गिराया जाता है और वह हर बार जूझने की नई ऊर्जा ले उठ खड़ी होती है। यह वारियार स्त्रियों की कथा है। शारीरिक और मानसिक आघात उनके गुस्से को आग पर घी की तरह प्रज्वलित कर रहे है। डॉली का जीवट बहुत सशक्त है। वह हॉकी की खिलाड़ी रही है, टायक्वोंदों जानती है, हॉस्पिटल में नर्स थी । जेठ देवरों का सामूहिक बलात्कार उसे अंदर बाहर से क्षत- विक्षत  कर देता है, लेकिन वह पराये देश में, पराये लोगों के बीच होकर भी अपने लिए लड़ती हैं। उसी ज़मीन पर जरूरी पढ़ाई कर अस्पताल में नर्स लगती है। गुरदीप हुड्डा से तलाक लेती है। पुनर्विवाह करती है। तीन बच्चों को जन्म देती है। सायरा पर राजनेता के पुत्र का प्रेम आमंत्रण अस्वीकारने पर भयंकर एसिड अटैक होता है। उसे मातापिता के साथ राजनैतिक शक्ति से इस देश में निष्कासित कर दिया जाता है। उपचार के साथ- साथ वह पीएच. डी. पूरी करती है।  ठीक होने पर वह फार्मेसियूटीकल कंपनी में वैज्ञानिक और फिर डॉक्टर बनती है। दक्षिण भारतीय, हैदराबाद की यह युवती, पुलिस, तेलगू भारतीय महिला और मनोविद डॉक्टर लता की मदद और पिता का विश्वास जीत धीरे धीरे अपने आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक अधिकार पाने और बच्चों का स्नेह- सम्मान जीतने में सफल हो ही जाती है। 
यह तीन स्त्रियों की त्रासद व्यथा- कथा न होकर समूचे नारी जगत के दमन, शोषण, संकट की कहानी है। मध्यवर्गीय नर्स, उच्च मध्यवर्गीय सायरा और उच्चवर्गीय तेलगू  युवती- सभी एक सी भयंकर विसंगति से जूझ रही हैं। लेकिन उपन्यास स्वप्न भंग की कथा नहीं है। पुरुष सत्ताक के लिए चुनौती उभर रही है- मनुष्य बनो। अन्यथा तुम्हारा भी वही हाल होगा, जो गुरदीप हुड्डा का, नेता जी के बेटे या राजा जी का हुआ।    
           राजनेता और राजनीति दोनों के कुचित्र उपन्यास में बिखरे पड़े हैं। कोरोना से उत्पन्न आपातकाल में भी राजनीति सक्रिय है। सत्ता देश और देशवासियों से ऊपर हो गई है। न्यूयार्क का मेयर ऑपोज़िट दल का है वह मदद के लिए बार-बार दुहाई देता है जबकि रूलिंग दल न्यूयार्क की उपेक्षा कर अपने राज्यों को मदद पहुंचाने में व्यस्त रहता है। डॉली का बलात्कार करने और करवाने वाला उसका जेठ करनाल का एक गुंडा है और किसी राजनेता के साथ जुड़ा है। सायरा पर एसिड अटैक करने वाला छात्र यूनियन का नेता था और चुनाव का समय करीब आता देख उसके राजनेता पिता ने डरा- धमका कर देश से ही निकाल दिया। उनका घर तीन करोड़ में खरीद उन्हें दस साल का अमेरिका का वीज़ा दिलवा दिया। राजनीति उपन्यास में खलपात्रों का हथियार बनकर आई है। राजनेता बेपनाह दौलत में खेलते हैं। दक्षिण भारतीय युवती का उत्तर भारतीय युवक से प्रेम उपन्यास के राजनेता पिता को इतना नागवार लगता है कि इस प्रेम को गुनाह मान उस परिवार को ही वहाँ से अपना व्यापार समेट भागने के लिए विवश कर दिया जाता है और बेटी की शादी कर उसे विदेश भेज दिया जाता है। 
महामारियों का इतिहास, चिकित्सा और मनोविश्लेषण जगत की बारीकियों का चित्रण उपन्यासकार के गहन शोधपरक अध्ययन का परिचय देता है तो कोरोना के सविस्तार प्रभाव, समाचार, हलचलें आसन्न समसामयिक जीवन के प्रति उनकी जागरूकता और सक्रियता  को उकेरते हैं। जैसे लेखिका वैश्विक स्तर पर महामारियों का इतिहास प्रस्तुत करती है:-      
चौहदवीं शताब्दी में इंग्लैंड में ‘ब्लैक डैथ’ फैली- जिसमें एक तिहाई आबादी मारी गई।
1647 में ‘पीला बुखार’ का प्रकोप अफ्रीका के बाराबाडोस द्वीप और अन्य देशों में फैला। 
1817 में एशियाई महामारी हैजा फैली ।
1878 में अमेरिका की मिसिससिपी नदी की घाटी में फैली बीमारी में बीस हज़ार लोग मारे गए।
1918 में मुंबई में फैले इंफ्लुएंजा से 2 करोड़ लोगों की मौत हो गई। 
1918 में ही, प्रथम विश्व युद्ध के समय स्पैनिश फ्लू से सौ मिलियन से भी अधिक लोगों की मृत्यु हुई। 
1980 से 2018 तक एड्स से 32 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई।
2013- 14 में अफ्रीका में फैलाने वाले इबोला वायरस से ग्यारह हज़ार से भी ज्यादा लोगों की मृत्यु हुई। 
प्रकृति के चित्र, उसका मानवीकरण यहाँ- वहाँ मिल जाता है। लता के चार मंज़िला घर में ऊँचे ऊँचे ओक, पाइन, पाम, डगलस फर के वृक्ष गरम शामों को सुहावना बनाया करते हैं। गिलहरियां, मोर, नीलकंठ, कोयल, हिरण, अनेक प्रकार की चिड़ियाँ- सभी से उसे प्यार है। एक रिटायर्ड स्त्री- बच्चे कैलिफोर्निया में, पति न्यूयार्क में- प्रकृति ही उसकी सहचरी है।  
“हल्की- हल्की हवा चलने लगी और पेड़ों की लंबी टहनियाँ हवा के साथ लहराने लगी। --- जैसे टहनियाँ हवा की बाहों में झूल- झूल कर नाच रही हैं, कभी वे बाल रूम, तो कभी सालसा डांस करती ।“     
पहले मनुष्य ने प्रकृति को रुलाया और आज वह मनुष्य को रुला रही है। विकास के नाम पर वृक्ष और जंगल काटने, पृथ्वी का संतुलन बिगाड़ने, पर्यावरण प्रदूषण का मनुष्य को मुआवजा तो देना ही था। कोरोना, शरीर में आक्सीजन की कमी- मानो प्रकृति का रोष ही है। 
सूत्रात्मकता उपन्यास के चिन्तन पक्ष को, बौद्धिक स्वर को धारदार बना रही है:-        
सूत्र:-
1. युद्ध कैसा भी हो नेगेटिव एनर्जी जनरेट करता है। - - नकारात्मकता सकारात्मकता से अधिक तेजी से फैलती है।  
2. चेहरा सबसे अच्छा पासवर्ड है, वह फ़ाइल खोलकर एकदम सामने रख देता है।   
3. साइकोलोजिस्ट की मेमोरी कम्प्युटर मेमोरी होती है।  
4. औरतों की यादाश्त मर्दों से ज्यादा तेज और अच्छी होती है।  
5. अगर तुम अपने लिए खड़ी नहीं हो सकती तो कोई तुम्हारी मदद नहीं कर सकता।  
6. जहां मृत्यु का तांडव हो रहा हो, वहाँ खुद को स्वस्थ और सकारात्मक रखना भी एक चुनौती है।  
7. जीने के लिए एक अच्छा मित्र और एक पड़ोसी ही काफी होता है।  
8. नेगेटिवे और पॉज़िटिव सोच और भावनाएं ही दृष्टिकोण बनाती हैं; क्योंकि उन्हीं के अनुसार मानव दृश्य देखता है और अदृश्य के बारे में सोचता है।  
9. कुछ भी मुश्किल नहीं होता। उसके लिए आत्मविश्वास व इच्छा शक्ति चाहिए।  
10. परेशानी में दिमाग कभी खाली मत छोड़ो। हमेशा नकारात्मक सोचता है।   
11. एक अदृश्य सत्य को पाने की चाह में  हम उम्र भर भटकते रहते हैं, जबकि हर तरह की अदृश्य शक्तियाँ हमारे अंदर ही विद्यमान हैं। 
12. हर मानव का अंतिम सत्य अदृश्य ही बना रहता है। 
‘रब राखा, ऐवाई’ जैसे शब्दों के प्रयोग उनके पात्रों को पंजाब की मिट्टी से और अँग्रेजी बोलचाल के शब्द भाषा को आज के जीवन से जोड़ते हैं।   
समर्पण ही स्पष्ट करता है कि रचना का सृजन सौद्देश्यता से जुड़ा है- “सकारात्मक ऊर्जाओं को, जिन्होंने हर युग के अशांत समय में मानवता को बचाए रखा।“  दार्शनिक पंक्तियाँ भी यहाँ- वहाँ उपन्यास में बिखरी पड़ी हैं-  “ एक अदृश्य सत्य पाने की चाह में हम उम्र भर भटकते रहते हैं, जबकि हर तरह की अदृश्य शक्तियाँ हमारे अंदर विद्यमान हैं।“  (148)- - -  “पूरा विश्व दो ही शक्तियों पर टिका है, सकारात्मक और नकारात्मक। दोनों ही मनुष्य के अंदर समाई हैं। सकारात्मक ऊर्जा ही उस अंतिम सत्य की ओर लेकर जाती है, जिसे कुछ लोग बाहर से भीतर खोजते हैं और कुछ उसे भीतर से बाहर तलाशते हैं।- - -  हर मानव का अंतिम सत्य अदृश्य ही बना रहता है।“ उपन्यास दो धरातलों पर एक साथ चल रहा है। दो युद्ध और दो प्रकार के योद्धा हैं। एक युद्ध अदृश्य शत्रु कोरोना के साथ है और दूसरा युद्ध उस आधी दुनिया का है, जिस पर उत्पीड़न, अत्याचारों के जानलेवा हमले निरंतर चल रहे हैं। एक तरफ डॉक्टर वारियर बन युद्ध लड़ रहे हैं और दूसरी ओर अपनो की दानवी वृतियों से लड़ रही युवतियाँ हैं। 
संदर्भ:
  सुधा ओम ढींगरा, दृश्य से अदृश्य तक, शिवना प्रकाशन, सीहोर, एम. पी॰,प्रथम, 2021, पृष्ठ 125  
  वही, पृष्ठ 11  
  वही, पृष्ठ 15
  वही, पृष्ठ 31
  वही, पृष्ठ 31
  वही, पृष्ठ 32
  वही, पृष्ठ 52
  वही, पृष्ठ 73
  वही, पृष्ठ 106
  वही, पृष्ठ 115
  वही, पृष्ठ 121
  वही, पृष्ठ 138
  वही, पृष्ठ 149
  वही, पृष्ठ 150
  वही, पृष्ठ 5
  वही, पृष्ठ 148 
  वही, पृष्ठ 150
***

डॉ. मधु संधु, पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 
हिन्दी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर, पंजाब ।


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