काश हम रिटायर ना हुए होते

जीतेन्द्र भटनागर

- जीतेन्द्र भटनागर

खुशकिस्मत थे हम कि जवानी के दिनों में हमें शौकत थानवी और शफ़ीकुर्रहमान जैसे हास्य लेखकों को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लिखते तो दोनों उर्दू में थे लेकिन उनकी रचनाओं का हिन्दी अनुवाद उन दिनों ‘माया’ व ‘मनोहर कहानियाँ’ नामक मासिक पत्रिकाओं में छपता था। वैसे अनुवाद कहना ठीक नहीं है क्योंकि उर्दू को फ़ारसी लिपि में ना लिख कर देवनागरी में लिखा जाए तो वो हिन्दुस्तानी हो जाती है जो उत्तर भारत की बोलचाल की भाषा है। गर्ज़ ये कि उत्तर भारत के बाशिंदे बोलते तो हिन्दुस्तानी हैं पर लिखते हिन्दी हैं। यानि लिखते वक़्त उर्दू का साथ छोड़ संस्कृत से हाथ मिला लेते हैं और उसे हिन्दी कहते हैं।

आज के युवावर्ग ने शायद ही इन दोनों महान हास्य लेखकों का नाम सुना हो। उर्दू का ज्ञान अब एक वर्ग विशेष तक सीमित होकर रह गया है। वैसे भी आजकल के नौजवान पढ़ते कहाँ हैं।

शौकत साहब की एक कहानी है ‘हृदय रोग’ जिसमें वो फरमाते हैं कि उन्हें दिल का दौरा पड़ने से उनकी ज़िंदगी में सकून आ गया। बीवी ने उन्हें काम की जिम्मेदारी से फारिग कर दिया। घर-बाहर के सभी काम खुद करने लगी कि शौहर के दिल पर कोई दबाव ना पड़े। हद तो तब हो गई जब उनका सात-आठ साल का बेटा छत से गिर गया, उसका सिर खुल गया जिसे बन्द करने की कोशिश में चार टाँके लगाने पड़े। इतने बड़े हादसे को बीवी ने ‘चबूतरे से गिर गया था, मामूली सी खरोंच आई है’ कह कर टाल दिया कि कहीं मियाँ जी को फिर से दिल का दौरा ना पड़ जाए। शुक्र है उस जमाने में आजकल की तरह हर छोटी से छोटी बीमारी के लिए दर्जनों टेस्ट करवाने का रिवाज़ नहीं था। अगर होता तो मियाँ जी का पर्दा तभी फ़ाश हो जाता। फिर उनकी कितनी फजीहत होती इसका सिर्फ अन्दाज़ लगाया जा सकता है।

शौकत साहब को गुजरे, अल्लाह उन्हें जन्नत बख्शे, ज़माना बीत गया। नए ज़माने की नई बीमारियों ने पुरानी बीमारियों को बूढ़े हुए वालदैनों की तरह किनारे कर दिया। दिल की बीमारी को ज़्यादह तवज्जोह देना अब फैशन में नहीं रहा। अब तो ब्लड प्रेशर, डायबेटीस और, वो क्या नाम है उसका, हाँ, हाइपरटेंशन, और इसी तरह की दूसरी बीमारियाँ चर्चा में हैं। ये वो बीमारियाँ हैं जो आज के नौजवानों में अक्सर पाई जाती हैं। हमारी पीढ़ी की बात ही कुछ और थी। हमें देखिए। रिटायर हो चुके हैं पर बीमारी हमसे कोसों दूर है। हमारे एक जानने वाले हैं जो सुबह से शाम तक गोलियाँ खाते रहते हैं। ना जाने खाना खाने के लिए पेट में जगह बचती है या नहीं। एक बार उन्होंने हमसे जानना चाहा कि हम कितनी गोलियाँ खाते हैं। हमने बताया कि हम कोई दवाई नहीं खाते तो वो हैरान हो गए। बोले, “फिर आप जिंदा कैसे हैं?”

आम हिन्दुस्तानी की तरह हम भी ‘आराम बड़ी चीज़ है मुँह ढक के सोईए’ में यक़ीन रखते हैं, लेकिन इस उसूल पे अमल कभी नहीं कर पाए। बचपन में माँ-बाप ने मेहनत के फल मीठे होने की नसीहत दे कर हमें आराम नहीं करने दिया। नौकरी लगी तो मालिक ने नसीहत देने की ज़रूरत ही नहीं समझी। मुँह ढक के सोने के सपने देखते हुए रिटायर भी हो गए। रिटायरमेंट के पहले ही दिन श्रीमती जी ने इन सपनों पर पानी फेर दिया। दोपहर को खाने के बाद कमर सीधी करने के लिए पैर फैलाए ही थे कि कान के पास एक ज़ोरदार विस्फोट हुआ, “लेटे क्यों हो? ये कोई सोने का वख्त है? उठो।” लगा फौज का हवलदार फाल-इन का हुक्म दे रहा है। हड़बड़ा कर मुँह से चादर हटाई। सामने श्रीमती जी का खूबसूरत चेहरा था।

“सोयें नहीं तो क्या करें? कुछ है ही नहीं करने को।” लम्बी जम्हाई के साथ हमारे मुँह से निकला। 
“अच्छा! दिखाई नहीं देता घर कितना गन्दा पड़ा है?” ज्वालामुखी की तरह फट पड़ीं श्रीमती जी। “झाड़ू लगाने को नहीं कह रही हूँ। उसके लिए महरी है। दसियों साल से जो गंद भर रखा है पूरे घर की अलमारियों में उसे साफ करो, वर्जिश ही हो जाएगी। वैसे तो करते नहीं।” गर्म लावे में फँस कर सब कुछ राख हो जाता है। इससे पहले कि हम उसकी चपेट में आयें सीढ़ी चढ़ गए। श्रीमती जी के घुटनों में दर्द रहता है इसलिए वो सीढ़ी नहीं चढ़ती हैं। 
पहले गर्मियों में छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का रिवाज़ था। छत पर एक कमरा होता था जिसे बरसाती कहते थे। बरसाती चारपाई, बिस्तर वगैरह रखने के काम आती थी। अब प्रदूषण की वजह से बन्द कमरे में एयर कन्डीशनर की ठण्डी हवा में सोना पसन्द किया जाने लगा है। बरसातियाँ वीरान हो गईं। श्रीमती जी की नज़र बचा कर धीरे-धीरे हम अपना खजाना बरसाती में छुपाते रहे थे। हमारे बचपन के कपड़े के सफेद जूते जिन्हें पहन कर हमने मंत्री अली ज़हीर के सामने पीटी करी थी, बेडमिन्टन का टूटा हुआ बल्ला जिसने हमें कॉलेज टूर्नामेंट के क्वार्टर फाइनल तक पहुँचाया था, स्थानीय अखबार की तीन प्रतियाँ जिसमें पाँच साल की उम्र में एक रेस जीतने पर कलेक्टर के हाथों इनाम पाते हुए हमारी फोटो छपी थी, शतरंज की गोटियाँ जिसकी सफेद रानी चार काले प्यादों के साथ फरार थी, व्हिस्की की अनेक खूबसूरत खाली बोतलें और इसी किस्म की बहुत सारी बेशकीमती चीज़ें जो पैदा होने से लेकर रिटायर होने तक जमा हो गई थीं, इस कमरे में मुँह छुपाए हुए थीं। धूल की पर्त हटा कर प्यार से हम ताश की उस गड्डी को सहला रहे थे जिसने इक्के की ट्रेल दिलवा कर हमें दो हज़ार की बाज़ी जितवाई थी कि पीठ के पीछे से गहरी साँसों की आवाज़ आई। श्रीमती जी? छत पे? कैसे? पलट कर देखा। श्रीमती जी ही थीं। 
“यहाँ छुपाते हो अपना कबाड़। फिर नीचे की सारी अलमारियों में क्या भरा हुआ है? इतना गंद कैसे इकट्ठा कर सकता है कोई इन्सान? ज़रूर कबाड़ी रहे होंगे तुम पिछले जनम में।” हाँफते हुए बोलीं वो। 
“अरे, ऊपर क्यों आ गईं? तुम्हारे घुटने . . . ।”

“मेरे घुटनों की छोड़ो। ये सारा कबाड़ आज ही निकल जाना चाहिए यहाँ से।” हाँफते हुए भी श्रीमती जी के मुखारविंद से लावा बह रहा था। गरमाई कम हो गई थी पर था तो गर्म ही। ऊपर नीचे सिर हिला के हामी भर ली हमने। इसके बाद श्रीमती जी को, जैसे ऊपर चढ़ी थीं, वैसे ही नीचे उतर जाना चाहिए था। ऐसा हुआ नहीं। वो पेंदी टिकाने के लिए इधर-उधर जगह ढूँढने लगीं। हमने जल्दी से एक पीठ-टूटी कुर्सी से माया और मनोहर कहानियों के पुराने अंकों को बेदखल करके झाड़ा और इस तरह पेश किया मानो उन्हें तख्ते-ताऊस पर बैठने का निमन्त्रण दे रहे हों। 

उनकी निगरानी में हम बिना रुके घण्टों काम करते रहे। ये सिलसिला तीन दिन तक चला। तीसरे दिन कबाड़ी का टेम्पो आया। डूबते दिल से हमने अपने खजाने को अलविदा कहा। हमारा पूरा शरीर दर्द से चरमरा रहा था। रात को बिना खाना खाए कराहते हुए लेट गए। श्रीमती जी ने माथे पर हाथ रखा। बोलीं, “माथा तो ठण्डा पड़ा है। बात क्या है? बताया तो वो लापरवाही से बोलीं, “कुछ नहीं हुआ है तुम्हें? पहली बार काम किया है। दर्द तो होगा ही। रात को अच्छे से सो लोगे तो सुबह ताज़े उठोगे। मुन्नी के कमरे में जो गन्द फैलाया है कल से उसे साफ करना है। ऐसे ही धीरे-धीरे सारे कमरे करने हैं।”

शौकत साहब की बीवी शौहर के दिल की बीमारी की वजह से ताड़ का तिल बनाती थीं। एक हमारी श्रीमती जी हैं जिनको हमारी फिक्र ही नहीं है। बेड़ा गर्क हो ईसीजी, हॉल्टर टेस्ट वगैरह ईजाद करने वालों का। दिल की बीमारी का इरादा खारिज करना पड़ा। इंटरनेट पर ढूँढने पे एक नायाब बीमारी मिली। सोडियम, यानि नमक, की कमी। नमक की कमी से इन्सान कमज़ोरी महसूस करता है, शरीर शिथिल रहता है, सिर दर्द करता है और दिमाग़ काम नहीं करता। बस लेटे रहने का मन करता है। ‘वाह! क्या उम्दा बीमारी है!’ हमने सोचा। ये सब लक्षण तो हम में पहले से मौजूद हैं।

पैदायशी आलसी होने की वजह से दिक्कत नहीं हुई हमें बीमारी की ऐक्टिंग करने में। श्रीमती जी पे सिर्फ इतना असर हुआ कि उन्होंने हमें एक दिन लेटे रहने की इजाज़त दे दी। अगले दिन भी जब हम नहीं उठे तो थोड़ी घबराईं और तीसरे दिन वो वाक़ई फिक्रमन्द हो गईं। अपने भाई को फोन किया। नतीज़तन श्रीमती जी ज्वालामुखी से फ्लोरेंस नाइटिंगेल में तब्दील हो गईं। हम खुश थे कि तरकीब काम कर गई। चौथे दिन साले बाबू तशरीफ़ ले आए। शुक्रिया कहना चाहते थे उन्हें पर मौका नहीं दिया उन्होंने। आते ही बोले, “भाई साहब, आपको डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा। ये सिम्प्टम ठीक नहीं लग रहे। ऐसा ना हो कि कुछ सीरियस बात हो और लेने के देने पड़ जाएँ। उम्र भी हो गई है अब आपकी। चलिए, कल चलते हैं अस्पताल।“ हमारी लाख कोशिशों के बावजूद साले बाबू टस से मस नहीं हुए। बहुत से टेस्ट हुए जिनमें ना कुछ मिलने वाला था ना मिला। ग़नीमत थी कि सोडियम कम निकला। पर मिनीमम से सिर्फ दो पॉइंट नीचे। डॉक्टर हँसा।

“अरे, बिल्कुल ठीक हैं आप। पलंग पर पड़े रहने की वजह से मसल्स स्टिफ हो गए हैं, बस। थोड़ा ऐक्टिव हो जाईए। पैंतालीस मिनट वॉक करिए हर दिन। घर में भी हर पन्द्रह मिनट के बाद पाँच-सात मिनट चहलकदमी करिए। दवाई की ज़रूरत नहीं है।”

बड़ी मुश्किल से डॉक्टर को कन्विन्स कर पाए कि दो पॉइन्ट ही सही, हमारी परेशानी का सबब सिर्फ सोडियम की कमी है। आखिरकार थोड़ा ज़्यादह नमक खाने की सलाह दे कर डॉक्टर साहब अगले मरीज़ से मुखातिब हो गए। 
घर आते हुए रास्ते भर श्रीमती जी मुँह से कुछ नहीं बोलीं पर उनकी आँखों से निकलते लावा ने हमें झुलस तो दिया ही। 

साले बाबू वापस चले गए हैं। हम कबाड़ छाँटने में लगे हुए हैं और श्रीमती जी हमारी निगरानी करने में। 
काश हम रिटायर ना हुए होते। 

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