हरिकृष्ण देवसरे की कहानियों में वैज्ञानिक फेंटेसी

- चौहान अनुराधा


 वैज्ञानिक चेतना से सम्पन्न साहित्य की रचना करने वाले साहित्यकार डॉ हरिकृष्ण देवसरे का जन्म 9 मार्च 1940 को मध्यप्रदेश के नागोद में हुआ था। देवसरे जी ने जबलपुर विश्वविद्यालय से 'हिंदी बाल साहित्य एक अध्ययन' विषय पर शोध प्रबंध लिखकर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी। उसके साथ ही हिंदी बाल साहित्य के क्षेत्र में प्रथम पी0एच0डी0 कर्ता के रूप में अपना नाम दर्ज करवाया। 

डॉ हरिकृष्ण देवसरे जी ने हिंदी बाल साहित्य को उत्कृष्ट कोटि की रचनाएँ प्रदान कि जो वैज्ञानिक फेंटेसी पर आधारित है। उन्होंने बाल साहित्य में भरी अनेक राजा-रानी, जादू-टोने, भूत-पिशाच तथा अंधविश्वास भरी कहानियों को दूर करने के लिए जो आंदोलन चलाया था,वह आंदोलन इतिहास के पन्नों में दर्ज है। परंतु वर्तमान पीढ़ी इससे अनभिज्ञ है, वर्तमान पीढ़ी को इन रचनाओं से परिचित करवाना हमारा कर्तव्य है।

 डॉ हरिकृष्ण देवसरे ने बाल कहानियों को समृद्ध बनाने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बच्चों के लिए विज्ञान लेखन को बढ़ावा देने के लिए, उसे रोचक बनाने के लिए फेंटेसी का प्रयोग किया है। डॉ देवसरे की वैज्ञानिक फेंटेसी पर आधारित रचनाएँ "गिरना डिस्कवरी यान", "धूएँ की घाटी", "आओ चंदा के देश चले", "मंगल ग्रह पर राजू", "चंदू के कारनामे", "स्वान यात्रा", "लावेनी" आदि है।

 डॉ० देवसरे को कई संस्थाओ द्वारा सम्मानित और पुरस्कृत भी किया गया हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने 'बाल साहित्य भारतीय पुरस्कार' और हिंदी अकादमी दिल्ली ने 'साहित्य सम्मान' से देवसरे जी को पुरस्कृत किया है । साथ ही देवसरे जी को प्रथम वात्सल्य पुरस्कार की प्राप्ति पद्माबिनानी फाउंडेशन के द्वारा हुईं है।

साहित्य समाज का दर्पण होता है, समाज को साहित्य से ज्ञान की प्राप्ति होती है। हर युग में साहित्यकारों के द्वारा साहित्य लिखा जाता है, साहित्य ने मानव जीवन को सुखमय और सरल बनाया है।
 
चार्ल्स नाडिया ने कहा है कि "साहित्य समाज की अभिव्यक्ति है।"1 
रॉबर्ट लार्ड लायटन के विचार से "किसी भी राष्ट्र का साहित्य सदैव उसके मानव- समाज का जीवन-चरित्र हैं।"2

 ऐसे उद्धरण बताते हैं कि किसी विशेष कालखंड में लिखे गए साहित्य से हमें उस काल के समाज के बारे में पता लगता है। इसलिए विज्ञान साहित्य में आज के वैज्ञानिक युग की छाप दिखाई देनी चाहिए। डॉ हरिकृष्ण देवसरे की बाल कहानियों और उपन्यासों में विज्ञान की झलक जगह - जगह पर फेंटेसी के माध्यम से देखी गई है।

 " 'फेंटेसी' शब्द, एक ग्रीक यानी यूनानी भाषा का शब्द है । इसका अर्थ है- किसी वस्तु को, जो अदृश्य है, दृष्टव्य बना दिया जाए। 'यानी जिस वस्तु के रूप- रंग, आकार, गुणों आदि की हम केवल कल्पना मात्र ही कर रहे हैं, वह हमारे सामने साकार होकर आ जाए और हम कुछ देर के लिए उसे सत्य मानकर उसके प्रभाव में डूबे रहे।"3

 इस शोध-पत्र में डॉ हरिकृष्ण देवसरे की कहानी "शनीलोक की सैर" और "विश्वासघात" में स्थित वैज्ञानिक फेंटेसी का अध्ययन किया गया है।


 शनीलोक की सैर


 प्रस्तुत विज्ञान कथा मे बालक की नींद अचानक 2:00 बजे रात को टूट जाती है। खिड़की के बाहर बहुत तेज रोशनी देखकर वह मैदान की तरफ दौड़ने लगता हैं। उसे कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं……

 "अमावस्या की घनघोर काली रात इस तरह सफेद चमक उठे यह बड़े आश्चर्य की बात थी। उस खिड़की में जब आदी तो लगी थी,में उत्सुकता बस बाहर कूद आया । मैंने देखा कि सामने की ओर जो छोटा सा मैदान है,वहां कोई तश्तरीनुमा चीज यों चमक रही है, जैसे किसी बड़े सर्प की मणि हो। उस समय सारा मोहल्ला गहरी नींद में सोया हुआ था । और मुझे न जाने क्या सूझी कि मैं उस चमकदार वस्तु की और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।"4

 जब वह बालक उस चमकदार चीज के पास पहुंचने ही वाला होता है,कि तब तक उसके सर पर कोई घुसा मार देता है, जिससे वह बेहोश होकर गिर जाता है। और आंखें खुलने पर बालक खुद को शनीलोक पर पाता है। वहां के डॉक्टर उसकी तबीयत के बारे में पूछते हैं ।जिसे हम लेखक के शब्दों में इस प्रकार देख सकते हैं…….

"अब आपको कैसा लग रहा है?"
" ठीक हूं, लेकिन मैं कहां हूं ? तुम कौन हो ? तुम मेरी भाषा कैसे बोल रहे हो ?"

 " वह डॉक्टर बड़े शांत भाव से बोला, आप शनि लोक में हैं, हम लोग यहां के निवासी हैं,यह जो यंत्र तुमने गले में पहन लिया है, उसी के सहारे तुम हमारी भाषा को अपनी भाषा में बदल कर सुनते हो और तुम्हारी भाषा को हम बदल कर समझ लेते हैं।"5

 तत्पश्चात वहां के अधिकारियों से उस बालक की मुलाकात करवाई जाती हैं। उसका मेहमान की तरह वहां स्वागत किया जाता है। शनीलोक के लोगों का रंग नीला होता है, जिसे देखकर बालक को आश्चर्य होता है।जिसे हम नीचे दिए गए संवाद के द्वारा समझ सकते हैं…...

"तो मैं कैसे आ गया।"
"आप हमारे बंद यान में आए हैं न ? हमारे यान पर अब इस ग्रह की किसी गैस का असर नहीं होता।"
" आप लोगों का रंग नीला क्यों है?"
" यह यहां की जलवायु का प्रभाव है।"6


 विश्वासघात


 प्रस्तुत विज्ञान कथा में विमान कुमार बनर्जी नामक वैज्ञानिक के आविष्कार की चर्चा की गई है।जिन्होंने मनुष्य को हल्का करने के लिए विशेष प्रकार का घोल बनाया है। जिसे पीने वाला इंसान अदृश्य हो सकता है, कहीं भी आ जा सकता है,अंतरिक्ष की लंबी -लंबी यात्राएँ आसानी से कर सकेगा । इस घोल का प्रभाव डा बनर्जी अपने सहयोगी प्रेम को दिखाते हैं।जिसे लेखक के शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया गया हैं……..

 "घबराओ मत। मुझे तो कुछ नहीं हुआ। मैं तुम्हारे पास हूं । हा मुझे बहुत हल्कापन लग रहा है। मैं अपने प्रयोग में सफल हो गया, प्रेम•••!"7

 डॉ बनर्जी जी हर समय अपनी प्रयोगशाला में रहते हैं, नित्य नए नए प्रयोग करते हैं। विमान कुमार इस प्रकार की आदतों से तंग आकर उनकी पत्नी ने तलाक दे दिया और दूसरी शादी कर ली है।

 प्रयोगशाला में उन्हें एक सहयोगी की तलाश थी। एक दिन प्रेम काला नामक व्यक्ति उनके पास काम की तलाश में आता है, तो बनर्जी साहब बिना किसी पूछताछ के उसे काम पर रख लेते हैं। और काम करते हुए वह उनका दिल भी जीत लेता है। जिससे बनर्जी साहब को उस पर पूरा विश्वास हो जाता है।

 परंतु एक दिन कालरा उनको धोखा देकर, उस घोल को चुरा ले जाता है। कालरा इस घोल को पी कर शहर में बड़ी-बड़ी चोरी और लूटपाट करने लगता है। पुरे शहर में उसका आतंक फैल जाता है, पुलिस भी कालरा के इस षड्यंत्र का पता नहीं लगा पाती । जिसे लेखक के शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया गया है…...

 "यह कैसे हो सकता है कि खूनी खून करें और कहीं कोई निशान न छोड़ जाए? बैंक के ताले बंद है और रुपए गायब हो जाए ? किसी मकान की आठवीं मंजिल पर चोर बिना किसी सहारे चढ जाए ? उसके पैरों के निशान तक । ना रहे ?"आखिर इन हत्याओं और चोरियों का पता क्यों नहीं लगता है ?"8

 डॉक्टर बनर्जी कालरा के काले कारनामों को सुनकर बहुत परेशान होते हैं। और घंटों प्रयोगशाला में बैठकर अपने प्रयोग के इस दुष्परिणाम को रोकने का उपाय सोचते रहते हैं। आखिर उन्होंने हिसाब लगाया कि कुछ दिनो बाद वह घोल लेने वापस आएगा। और डॉ बनर्जी ने वैसे ही दोनों घोल बनाकर उसे शीशी में बंद करके प्रयोगशाला में रख दिया । तीसरे दिन जब शीशी गायब हो जाती है, डॉक्टर बनर्जी कमिश्नर के पास पहुंच जाते है,और उन्हें सारी बात बता देते हैं।

 फिर पुलिस कमिश्नर की मदद से हीरो की नीलामी का ढोंग रचा गया। अगले दिन अखबारों में एक विज्ञापन छपा - 'एक पुराने नवाब के यहां से प्राप्त करोड़ों रुपए की हीरो की नीलामी।'डॉ बनर्जी ने इस बार घोल कम असरदार बनाया था। उन्होंने पुलिस कमिश्नर को बताया कि, घर से निकलते वक्त उसने घोल पीया होगा, कुछ घंटों के बाद उस घोल का असर भी खत्म हो जाएगा। 

 उन्होंने यह भी बताया कि बैंगनी काँच के चश्मे की मदद से कालरा को आसानी से देखा जा सकता है। जैसे ही कालरा हीरो की तरफ बढ़ा, पुलिस ने उसे झपट कर पकड़ लिया, और लोगों को पुनः अपने घर लौट जाने का अनुरोध किया। जिसे लेखक के शब्दों में इस प्रकार व्यक्त किया गया है…….

 " हीरो की नीलामी सिर्फ एक नाटक था इस खतरनाक आदमी को पकड़ने के लिए । हीरे तो सब नकली है, आप लोग जा सकते हैं, कष्ट के लिए क्षमा करें।"9

 कालरा के गिरफ्तार हो जाने के बाद लोगों ने चैन की सांस ली। डॉ बनर्जी ने अब कोई नया आविष्कार न करने की घोषणा की । वे विज्ञान के इस विश्वासघाती प्रयोग को सहन नहीं कर सके, उनके अनुसार विज्ञान मानव के कल्याण के लिए है, विनाश के लिए नहीं।



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संदर्भ:-
 1. 'संपूर्ण बाल विज्ञान कथाएँ ' डाक्टर
 हरिकृष् देवसरे अमर सत्य प्रकाशन 
 2019 पृ.5
 2. वही, पृष्ठ संख्या: 5
 3. वहीं, पृ. 9
 4. वहीं, पृ. 55
 5. वही, पृष्ठ संख्या:  55
 6. वही, पृष्ठ संख्या:  56
 7. वही, पृष्ठ संख्या:  59
 8. वही, पृष्ठ संख्या:  58

 9. वही, पृष्ठ संख्या:  62


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चौहान अनुराधा
शोधार्थी, हिंदी विभाग, भाषा साहित्य भवन, गुजरात यूनिवर्सिटी, अहमदाबाद 56
Ramnagar,Ajay Tenament-5 Near New RTO, Vastral, Ahmedabad, Gujarat - 382418
ईमेल: annulovesmom@gmail.com


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