लाखनसिंह भदौरिया जिन्हें हिंदी का मुक्तक सम्राट कहा जाता है

प्रकाश मनु

प्रकाश मनु


लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’ मेरे गुरु हैं। मेरे ही नहीं, मेरी पीढ़ी के बहुत सारे कवियों के गुरु। और यह सिलसिला मेरे बाद वाली पीढ़ियों तक भी चलता गया है। कविता का ककहरा हमने उन्हीं से सीखा। उनकी उँगली पकड़कर लिखना शुरू किया। वे ऐसे सरल और निरभिमानी गुरु हैं कि कितना भी हमारा अज्ञान देखें, कभी निरुत्साहित नहीं किया। हमेशा कहते, “बहुत अच्छा लिखा है, और लिखो। तुम एक दिन जरूर चमकोगे। ...पर हाँ, कुछ भी हो जाए, लिखना न छोड़ना।”

वे तरुणाई के दिन थे। हम हमेशा जोश और उत्साह से उमगते हुए संवाद के लिए व्याकुल रहते। अकसर अपनी नई लिखी हुई कविताएँ उन्हें दिखाते। वे देखते तो हमारी बचकानी सी कविताओं की कभी निंदा न करते। बस, धीरे से अपना सुझाव देते, “यह शब्द यहाँ से हटाकर यहाँ रख दो। अब देखो, कैसा लग रहा है...!” यों उन्होंने हमें खेल-खेल में सिखाया। छोटी-छोटी बातों पर हमारी पीठ थपथपाते, जैसे हमने बड़ा कोई कमाल कर दिया हो। कहते, “तुममें प्रतिभा है। आगे बहुत कुछ करोगे। मेरी बात भूलना नहीं।” और सचमुच हमें अहसास होने लगता कि हम चाहें तो बहुत-कुछ कर सकते हैं।

लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
भदौरिया जी को ‘मुक्तक-सम्राट’ कहा जाता है। जैसे सधे हुए, भावपूर्ण और प्रभावी मुक्तक वे लिखते, एकदम टकसाली, वैसे शायद ही कोई लिख पाया हो। सीप में बंद मोती सरीखे उनके द्युतिमान मुक्तक हमारे मन में हैरानी पैदा करते। कभी-कभी लगता, जैसे मुक्तक न हों, किसी कुशल कारीगर द्वारा झलमल-झलमल करते, तराशे हुए हीरे हों। ऐसी उस्तादी, ऐसी सिद्धता। एक-एक मुक्तक ऐसा सधा हुआ कि उन पर दूसरों का पूरा का पूरा काव्य न्योछावर किया जा सके। बहुत से कवियों और गीतकारों को पढ़ा, सुना, पर भदौरिया जी जैसे बात ही बात में एक से एक सुंदर मुक्तकों की झड़ी सी लगा देते थे, वैसा कहीं और नहीं देखा। भदौरिया जी मैनपुरी के हैं, मैं शिकोहाबाद का, गो कि हमारा जिला उन दिनों मैनपुरी ही था। पर इससे भी बड़ी बात थी भदौरिया जी का अपरिमित स्नेह और आत्मीयता। इससे मैनपुरी और शिकोहाबाद बिल्कुल पास-पास आ गए। सारी दूरियाँ खत्म हो गईं।

उन दिनों कवि-सम्मेलनों का चाव था। बड़े से बड़े कवि-साहित्यकारों से मुलाकात होती। पर भदौरिया जी के मुक्तकों की बात चलती, तो सभी मानो नतमस्तक होकर एक स्वर में कहते, “जैसे मुक्तक भदौरिया जी ने लिखे हैं, वैसे मुक्तक तो कोई नहीं लिख सकता। लिख सब रहे हैं, पर भदौरिया जी के मुक्तकों की तो बात ही कुछ और है।” सुनकर हमारी छाती फूल जाती।

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हालाँकि खुद भदौरिया जी जैसे इस सब से अनजान। एकदम खुद में डूबे हुए से। वे कवि-सम्मेलनों में बड़े मान-सम्मान से बुलाए जाते। पर कविता-पाठ के लिए पुकारा जाता तो ऐसे बेसुधी से उठते, जैसे यहाँ नहीं, कहीं और उपस्थित हों! फिर वे सुनाना शुरू करते। अकसर मुक्तकों से ही शुरुआत होती। बारिश की झड़ी जैसी मुक्तकों की झड़ी लग जाती। एक के बाद एक। एक मुक्तक का पूरा प्रभाव बन नहीं पाता कि झट दूसरा शुरू कर देते, फिर तीसरा, फिर चौथा। जैसे यह भी कर्तव्य-पालन हो और जिसको समझना हो, समझ ले। उसके लिए कवि-सम्मेलनी लटकों-झटकों की भला क्या दरकार?

सुनाते हुए बीच-बीच में कभी कुछ भूल भी जाते। तब कुछ हकबका से जाते। सामने बैठे उनके प्रशंसक याद दिलाते और भदौरिया जी फिर अपनी उसी डूबी-डूबी सी स्वर-लहरी के साथ बहने लगते। कुछ खोए-खोए और बेसुध से। पढ़ने का ढंग इतना सीधा-सरल कि कुछ परवाह ही नहीं कि कोई सुन रहा है कि नहीं। जिसे सुनना हो तो सुने, नहीं तो न सही। मानो वे किसी और को नहीं, कुछ गुन-सुन करके खुद को ही सुना रहे हों। जिसे कवि-सम्मेलनी भाषा में ‘जमना-जमाना’ कहा जाता है, वैसा कुछ नहीं। उनसे ज्यादा हम जैसे नौसिखिए रंग जमा लेते थे, हालाँकि दो कौड़ी का लिखते थे...पर भदौरिया जी ने कभी कवि-सम्मेलनी मंच पर अपना रंग जमाने की कोशिश नहीं की।

लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
आज लगता है, बड़े लोगों का बड़प्पन तो इसी सरलता में प्रकट होता है और इसी से वे कांत मणियों सरीखे मुक्तक सिरजे जा सकते हैं, जो हमारी पहुँच से दूर, बहुत दूर थे। जब भी वे उतरते, भदौरिया जी की सरल वाणी में ही उतरते। भला उनका मुकाबला कौन कर सकता था? इसलिए कि वे मन से कवि थे। सच्चे कवि। और जो परफॉर्मर होते हैं, वे जीवन भर परफॉर्म ही करते रह जाते हैं, पर कभी लिख नहीं पाते। अच्छा लिखने के लिए नाटकीयता नहीं, बड़ा दिल और सरलता चाहिए। बिना शुद्ध मन के सरलता नहीं आती।

भदौरिया जी उन कवियों में से हैं, जिन्हें सिद्ध या पहुँचे हुए कवि कहा जाता है। उर्दू में कहें तो उस्ताद। उनकी कविताओं के बारे में हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि कुँवर हरिश्चंद्र देव ‘चातक’ जी ने जो पंक्तियाँ लिखी हैं, वे बार-बार पढ़ने और सिर-माथे पर लगाने लायक हैं। चातक जी मानो अपने भीतर का पूरा वात्सल्य उड़ेलते हुए लिखते हैं—
“ऐसा ही मेरा लाखन लाखन में एक है, जिसने अपनी अनचाही साधों की भाँवरें कभी भी सत्ता-सुंदरी के साथ नहीं डाली हैं। जो घर पर खुरपी और फावड़ा चलाता है, रहन-सहन में बिल्कुल ग्रामीण, पर काव्य में ग्राम्यत्व दोष कहीं भी नहीं है। हमें अनेक बार कवि कुटीर पर रहने का प्राप्त हुआ है। कवि के छप्पर का चेहरा कभी भी उतरा या उदास नहीं देखा, हरी बैठक की देहरी पर सदैव स्नेहमय ज्योति के फूल ही खिले मिले हैं—जैसे विश्व भर का सारल्य अपने में बटोरे किसी संत तुकाराम कवि का स्थान है।”

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और ये पंक्तियाँ लाखों में एक लाखन सिंह भदौरिया ‘सौमित्र’ के बारे में ही कही जा सकती हैं। ऐसे ‘सौमित्र’ जो देखने पर संकोच की प्रतिमूर्ति लगते, पर लिखते तो कविताओं में ऐसा तेज प्रकट होता कि सहारना मुश्किल था।

इसी तरह हिंदी के रसखान कहे जाने वाले डा. दीन मुहम्मद दीन ने भदौरिया जी के सीधे-सरल स्वभाव और कविता की अदम्य ऊँचाई की ओर इंगित करते हुए, उन्हें उचित ही, हिंदी कविता का आधुनिक कबीर कहा है— 
“एक संत सरीखा जीवन जीने वाला, समदर्शिता का भाव सँजोकर चलने वाला, सबको प्यार लुटाने वाला, प्राणि मात्र के दुख से दवित होने वाला कवि कबीर ही हो सकता है। अतः मैं भाई सौमित्र जी को वास्तव में ‘आधुनिक कबीर’ ही कहूँगा। जिसने कभी किसी से कुछ नहीं चाहा—सहज, सरल रहकर एक त्यागी तपस्वी की भाँति ही अपना जीवन जिया है। जो कुछ भी कवि वाणी से फूटा, उसे अपने जीवन में उतारकर दिखा दिया। आज कोई ऐसा विरला कवि है? इसमें कोई अतिरेक नहीं है, उनकी कुटिया को आकर कोई देखे तो! मैं तीन दशक से उनके पीछे-पीछे, दाएँ-बाएँ चल रहा हूँ, उन्हें मैंने बहुत गहराई से झाँका है। मुझे अपना अनुज मानकर, सहोदर की भाँति अपनाया है। वे मेरे जीवन के उत्प्रेरक बने और मुझे सजाया-सँवारा है।”

हालाँकि स्वयं लाखनसिंह भदौरिया जब अपनी कविताई की चर्चा करते हैं, तो उनकी विनम्रता देखने लायक है। ‘मुक्तक सौमित्र के’ पुस्तक की भूमिका में कुछ भावुक होकर अपनी सुदीर्घ कविता-यात्रा की चर्चा करते हुए वे कहते हैं—
“अपनी अनगढ़ कला-शिल्प विहीन शैली में, जो 1950 ई. से चार-चार पंक्तियों में व्यक्त हुआ है, उसे ही सहदय जन संवेदन को परोस रहा हूँ। इनमें यदि कुछ है तो माँ हिंदी का क्रंदन, मानव संवेदन की चीख और भक्तिभाव समन्विता भारतीय संस्कृति का यत्किंचित चीत्कार ही है। अपना रोना-गाना सभी को प्यारा लगता है, सो मैं भी अपनी जीवन-यात्रा की चीख-पुकार को आप साधु और साधारण जनों तक पहुँचा रहा हूँ।”

गौर करने की बात यह है कि यह वह कवि कह रहा है, जिसे अपनी कवि-प्रतिभा के प्रारंभिक चरण में ही सुप्रसिद्ध कवि बलवीर सिंह रंग, शिशुपाल सिंह शिशु, कुँवर हरिश्चंद्र देव वर्मा चातक, पद्मसिंह शर्मा कमलेश सरीखे साहित्यकारों की स्नेह-छाया और आशीर्वाद मिला, और ‘कल्पना’, ‘वीणा’, ‘सुकवि विनोद’ जैसी हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में जिसकी कविताएँ बड़े सम्मान के साथ छपती रही हैं।

इसी तरह हिंदी की गरिमा और उत्थान के लिए जो तड़प मुझे भदौरिया जी में दिखाई दी, वह बहुत कम लोगों में नजर आती है। लेकिन हिंदी और हिंदी साहित्य के लिए अपना सारा जीवन अर्पित करने वाले लाखनसिंह भदौरिया का यह हिंदी-अऩुराग केवल शब्द-शूरता तक सीमित नहीं है, बल्कि वे हिंदी के लिए जेल जाने वाले अप्रतिम सेनानी भी हैं। सन् 1957 में पंजाब में बहुत बड़े स्तर पर हिंदी रक्षा आंदोलन चला था। उस समय भदौरिया जी उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के पहले जत्थे में शामिल थे। तब उन्हें 24 अगस्त से 19 दिसंबर तक, कोई पाँच महीने अंबाला सेंट्रल जेल में रहकर कारावास की तकलीफें झेलनी पड़ीं। पर भदौरिया जी ने इसे हिंदी का प्रसाद समझकर ग्रहण किया, और अपना पूरा जीवन ही हिंदी के नवोत्थान में समर्पित करने का संकल्प कर लिया।

इस लिहाज से युवा पीढ़ी के कितने साहित्यिकों को उन्होंने अपने निरंतर प्रोत्साहन से आगे बढ़ाया, और कहाँ-कहाँ अपने साहित्य के जरिए हिंदी की विजयिनी पताका लहराई, यह एक धुनी साधक के समर्पण की अनकही कहानी है, जिसके पन्ने खुलने अभी बाकी हैं।


2. ये गीत तुम्हारे चुभीले न होते...!

3 अगस्त 1928 को इटावा के बरौनी ग्राम (उत्तर प्रदेश) में जनमे लाखनसिंह भदौरिया जी को तरुणाई में बहुत जल्दी ही कवि के रूप में पहचान मिल गई।  उनकी प्रतिभा की तरल चाँदनी को पहचानने में उस कालखंड के स्वनामधन्य कवियों ने देर नहीं की। और जल्दी ही भदौरिया जी पूरे उत्तर भारत के कवि सम्मेलनों की शोभा बन गए। वे कवि सम्मेलनों की गरिमा बढ़ाने वाले कवियों में से थे, जो एकदम सीधे-सहज ढंग से कविताएँ पढ़ते थे और धीरे-धीरे बहती अपनी अमृतमयी काव्यधारा से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे। बाद में उनके सुमधुर गीत और मुक्तक सहृदय श्रोताओं के साथ-साथ उनके घरों तक जाते थे, और फिर खुद-ब-खुद हवाओं के साथ बहते हुए, एक सौम्य साहित्यिक वितान रचते थे, जो हर किसी को आत्मिक शांति और सुकून देता था। कहना न होगा कि भदौरिया जी की कविताई की सफलता और चरम सिद्धता भी इसी में है।

यह अकारण नहीं है कि भदौरिया जी ने कवियों और साधकों के बारे में शायद सबसे ज्यादा कविताएँ लिखी हैं। बहुत डूबी हुई कविताएँ। और उनमें बड़ी विनय के साथ याद किया है कि इन कवियों ने सिर्फ कविताएँ ही नहीं लिखीं, जग को अपनी तपस्या का वरदान दिया है। कविता उनके लिए कविता से बहुत ऊपर उठकर, अग-जग की राम कहानी बन जाती है। संत कबीर भी तो ऐसे ही थे। भदौरिया जी ‘संत कबीर के प्रति’ कविता में कबीर के दिल में अहर्निश जागती सी लोक साधना की लौ को देख पाते हैं। इसीलिए वे इस कदर तन्मय होकर कहते हैं—
ओ यती, जतन से तुम ही ओढ़ सके अपनी—
निर्दोष जिंदगी की अनमैली चादर को,
यह सिर्फ तुम्हारे ही मुख से घोषणा सुनी—
लो ज्यों की त्यों धर चले चदरिया हम घर को।

ऐसे ही निराला के लिए लिखी गई कविता में भदौरिया जी का स्वर ओज भरा है। साथ ही कुछ-कुछ व्यथित और मर्माहत कर देने वाला भी। मानो कवि के कठिन जीवन-समर की स्मृतियों ने उन्हें भीतर तक दग्ध कर दिया हो—
अंधकार में उदित सूर्य-सी, कविता क्रांति बिखेरी
अवरोधों की अनी पराजित, निज प्रतिभा से फेरी,
संघर्षों से झुका न जिसका पौरुष महाप्रबल था
अंतस में अमृत हिलोर थी, दृग में गंगाजल था।

इसी कविता में एक पंक्ति आती है, “मिला नागरी को ऊर्जस्वित अपराजेय निराला।” चंद गिने-चुने शब्दों में निराला का ऐसा तेजस्विता भरा चित्र आँख देना लाखनसिंह भदौरिया के ही बस की बात है।

भदौरिया जी का एक मुक्तक हिंदी के बेजोड़ गीतकार और गजलगो बलवीर सिंह रंग जी पर भी है। रंग जी के गाँव का नाम कटीला है। वे नगला कटीला में जनमे। भदौरिया जी ने इसी को लेकर कविता में ऐसा रूपक बाँधा कि देखते ही बनता है। कटीला उनकी कविता में आकर एक खास भाव की व्यंजना करने लगता है। आखिर कटीला गाँव में जनमे हैं, तभी तो रंग जी के गीत इतने चुभीले हैं—
मिलते अनुभूति के मोती नहीं, पथ जीवन का पथरीला न होता,
जग पीर के नीर में डूबे बिना, यह रंग कभी चटकीला न होता।
रस-आर्द्रता आती नहीं स्वर में, यदि प्रीत का आँचल गीला न होता
ये गीत तुम्हारे चुभीले न होते, जो गाँव का नाम कटीला न होता।

इसी तरह कवि सम्मेलनों की शोभा और कीर्तिस्तंभ कहे जाने वाले शिशुपाल सिंह ‘शिशु’ के निधन पर भदौरिया जी ने एक बड़ी मार्मिक कविता लिखी थी, जिसका रंग आज भी फीका नहीं हुआ। उसमें सूर, रसखान, कबीर और मीरा की परंपरा में ही बड़े प्रेम और आदर से कवि शिशुपाल सिंह ‘शिशु’ का भी स्मरण किया गया है—
राम की आन, कबीर की तान में गाते हुए रसखान गए,
अमृतपुत्र का तेज लिए वह बोध की बाँधे कृपाण गए।
स्वर बाँसुरी छूट गई कर से, फणि नाथने को कवि गान गए,
शब्द के तेज का शौर्य लिए ‘शिशु’ छंद की ताने कमान गए।

सच पूछिए तो हिंदी के बड़े साहित्यिकों पर गहरे प्रेम, समर्पण और भावनाशीलता से लिखी गई भदौरिया जी की कविताओं का अलग रंग है। और यही नहीं, उन्होंने हिंदी को लेकर भी बड़ी तीखी और आवेगपूर्ण कविता लिखी है—‘हिंदी का सरलीकरण’। इसमें भदौरिया जी मानो हिंदी के महारथी बनकर संकीर्ण सोच वाले उन राजनेताओं पर कसकर निशाना साधते हैं, जो बार-बार हिंदी को सरल बनाओ जैसे नारे उछालकर हिंदी को अपमानित करने की कोशिश करते हैं।

उनका सवाल है कि जो स्वयं सरलता से पैदा हुई है और जन-जन के गले का हार है, उसे भला तुम कैसी सरलता दोगे—
सूरा-मीरा के स्वर में जो गुनगुना रही
जिसका रस मिसरी घोल रहा मल्हारों में,
जिसमें कजली की तान छेड़ते चरवाहे
जिसके स्वर चिर परिचित हार-कछारों में।
जिसका संकल्प सहारा बना अभावों में
तुलसी गाते हैं घर-घर सबके भावों में,
जिसके तुतले स्वर में कबीर का दर्शन है
दुख बँटा रहे दोहे रहीम के गाँवों में।

हर किसी के सुख-दुख में हँसने-रोने, गाने वाली ऐसी सदाबहार हिंदी को भला नकली भाषा बनाने का घमंड और गरूर किसलिए? सरल हृदय भदौरिया जी के स्वर में यहाँ थोड़ा गुस्सा और तल्खी उभर आई है, “हिंदी हृदयों का नाद, राष्ट्र की भाषा है, तब उसे सरल करना तो एक तमाशा है...!”

हिंदी को लेकर ऐसी ओजस्विनी कविता मैंने कोई दूसरी नहीं पढ़ी। बिना हृदय को बड़ा और उदार बनाए, बिना स्वयं को संस्कृति के अजस्र प्रवाह से निमज्जित किए और बिना लाखों-करोड़ों भारतवासियों की भावना से एकाएक हुए, ऐसी कविता लिखी नहीं जा सकती।


3. मैं उसको इनसान कहूँगा

लाखनसिंह भदौरिया जी के गीतों का रंग भी कुछ अलग ही है। उनमें हलकी रोमानियत की जगह एक तरह की उदात्तता है और प्राण-शक्ति है। वे मन को ऊँचा उठाते हैं और ऊर्ध्व दिशा में ले जाते हैं। भदौरिया जी का बहुत छोटी बहर का एक ऐसा गीत है, जो बड़ा आशय ही नहीं, बड़ी आत्मिक शक्ति भी लिए है। एक ऐसा गीत, जिसमें कवि बड़े साहस और विश्वास से स्वयं को ‘अनादि का सहज नाद’ और मृत्यु को ‘अमरता का पड़ाव’ घोषित करता है—
हम मरते ही नहीं, अमर हैं।
मरण-भीति, भव का प्रभाव है,
मृत्यु अमरता का पड़ाव है,
साँसें चलती हुई डगर हैं।
हम अनादि के सहज नाद हैं,
अपनी भूली हुई याद हैं,
कोलाहल में मौन मुखर हैं।

भदौरिया जी का एक और गीत बगैर उपदेशात्मकता के, बड़े बेमालूम ढंग से हमें भीतर से जगाता है। और जागना जरूरी है, इसलिए कि—
अगर हम समय से नहीं जाग पाए,
किरन क्या कहेगी, गगन क्या कहेगा?
नए सूर्य की रोशनी रो उठेगी
अगर प्रात अँगड़ाइयों में बिताई,
सबेरा कहाँ फिर सबेरा रहेगा
अगर प्रात जमुहाइयों में बिताई।
धरा की उदासी नहीं तोड़ पाए,
कली क्या हँसेगी, सुमन क्या कहेगा?

भदौरिया जी के यहाँ बहुत से कोमल अहसास के गीत भी हैं, पर उनमें भी एक नैसर्गिक कांति और उदात्तता है। उषाकाल की स्वर्णाभा की तरह। उनके एक गीत में सौंदर्य का वर्णन है, पर सौंदर्य का आशय यहाँ गहरा है और वह किसी एक चीज में न होकर, पूरे जग को भीतर-बाहर से सुंदर बनाता है—
सौंदर्य से तुम्हारे सुंदर जहान सारा,
हर रूप में तुम्हारा सौंदर्य प्राण-प्यारा।

इसी तरह उनका उदात्त स्वर मौन के सौंदर्य को जानता है। जो चुप रहकर चेतना के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचा दे, बोलना तो वह है। अपने एक चर्चित गीत ‘मैं उसको व्याख्यान कहूँगा’ में कवि बहुत सी चीजों की बिल्कुल अलग सी व्याख्या करता है—
अनबोले चेतना जगाए मैं उसको व्याख्यान कहूँगा।
शत-शत उपदेशों में बोलें, मुख की शांतमना मुद्राएँ,
उपनिषदों का अर्थ बताएँ आनन पर छिटकी आभाएँ
जन-जन जिससे कदम मिलाए, मैं उसको अभियान कहूँगा।
इस गीत की एक यादगार पंक्ति है, “मुसकानें मधु बाँटें जिसकी, मैं उसको इनसान कहूँगा।”

‘जाह्नवी जल’ और ‘प्रीति-शाद्वल’ सरीखी इस सद्भावनापूर्ण जिंदगी को रचने में कवि और कविता की भी बड़ी भूमिका है। इसलिए कि कविता के पास ही तो वह करुणा की धारा है, जिससे जिंदगी को सही मानी मिलते हैं। ‘कवि के प्रति’ गीत में भदौरिया जी व्यक्ति और समाज-निर्माण में कवि की एक बड़ी भूमिका को रेखांकित करते हैं—
जितनी करुणा हो उड़ेल दे, तू स्वर की धारा में,
वाणी को चीत्कार बना दे, इस जलती कारा में।
युग शंकित है आज सभ्यता ऐसी फँसी भँवर में,
कालकूट का फेन तैरता है अब लहर-लहर में।
सृजन स्वयं स्वागत करता है महाप्रलय के स्वर में,
मानव की उपलब्धि खड़ी है, ले विनाश को कर में,
युद्धलिप्सु दानव प्रवृत्ति, घहराई भू-अंबर में,
राजनीति की कुटिल कामना छाई है कवि-स्वर में।

यहाँ भदौरिया जी दो चीजों की ओर इशारा करते हैं। एक तो युद्धलिप्सा की दानव प्रवृत्ति, और दूसरे राजनीति की कुटिल कामना, जिसने इस संसार को अशांत बना दिया है। इस महा उथल-पुथल के दौर में हर चीज जैसे विद्रूप हो गई हो। फिर धर्म के ढकोसलों ने इनसान के दुखों को और बढ़ा दिया है। जो पैसे वाले धन-कुबेर हैं, उन्हें पत्थर के भगवान तो नजर आते हैं, पर भूखे-नंगे इनसान नहीं।

‘पाषाण यहाँ पूजे जाते’ कविता में इसीलिए कवि का स्वर इतना तीखा है, और गुस्से से उबल रहा है—
पाषाण यहाँ पूजे जाते, पर यह भूखे भगवान नहीं।
भूखे मानव छटपटा रहे, दो-दो दाने को आज जहाँ
मंदिर में मौजें उड़ा रहे, पंडे, महंत, महाराज वहाँ,
फल-फूल, अन्न सड़ रहे किंतु भूखे बेबस रो रहे उधर
सतरंगी परियाँ नाच रहीं, हाला के प्याले पिए उधर।
प्रेयसि के गीत सुने जाते, क्रंदन सुनने को कान नहीं।

यह विद्रोह और विप्लव का गीत है, जो हमारे भीतर उथल-पुथल मचा देता है, और वर्तमान व्यवस्था को बदलने का तीखा आह्वान करता है। यों भदौरिया जी कुछ-कुछ शांत और अंतर्मुखी कवि के रूप में जाते हैं। पर जग की पीड़ा और असंतोष देखकर केवल वे ही नहीं, उनके शब्द भी मानो उबलने लगते हैं।

इन कविताओं को पढ़कर पता चलता है कि उनमें जीवन-यथार्थ की समझ और चेतना कितनी प्रबल है। हालाँकि वे विस्तार से उन स्थितियों का वर्णन करने के बजाय, इशारे से बहुत कुछ कह जाते हैं, इसीलिए उनके शब्द भीतर उतरते जाते हैं।


4. सादा, सहज और नैसर्गिक कविताई

भदौरिया जी का नाम होंठों पर आते ही, आज भी पुरानी यादों के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं। मुझे अच्छी तरह याद है, अपनी तरुणाई के दिनों में मैंने पहली बार भदौरिया जी को एक कवि-सम्मेलन में सुना था, जिसमें खुद मैंने भी शिरकत की थी। तभी उनकी सादा, सहज और नैसर्गिक कविताई ने मुझे मोह लिया था। सीधे-सरल भावों में लिपटी उनकी प्रांजल भाषा, गरिमापूर्ण अभिव्यक्ति और अद्भुत कल्पनाशीलता का मैं कायल हो गया था। और तब से वे मेरे हृदय में समा गए।

भौतिक दूरियों के बावजूद वे मुझसे कभी दूर नहीं हुए और न मैं उनसे। मैंने मन ही मन उन्हें गुरु मान लिया था और चुपचाप उनसे सीखने की कोशिश करता था। सोचता था, मैं अपनी कविता में ऐसी सीधी-सच्ची और बेधक बात क्या नहीं ला सकता, जैसी भदौरिया जी सहज ही ले आते हैं? तो मैं उन्हें बार-बार पढ़ता। उनके शब्द-शब्द में उतरता। 
उन दिनों मैं विज्ञान का विद्यार्थी था, पर मन तो साहित्य में ही रमता था। आगरा कॉलेज, आगरा से भौतिक विज्ञान में एम.एस-सी. करते हुए मानो इल्हाम सा हुआ कि मैं तो साहित्य के लिए ही बना हूँ। तब से जैसे पूरा जीवन ही बदल गया। लिहाजा एम.एस-सी. करने के बाद सन् 1975 में मैंने अपने शहर शिकोहाबाद से हिंदी में एम.ए. किया। तब तक भदौरिया जी से मिलना-जुलना खूब होता रहा। उसके बाद मैं शोध के लिए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय आ गया। फिर कुछ वर्ष प्राध्यापकी। इसके बाद कोई पच्चीस बरसों तक हिंदुस्तान टाइम्स में ‘नंदन’ पत्रिका के संपादन से जुड़ा रहा। रोज दिल्ली आने-जाने की आपाधापी और नौकरी की व्यस्तताएँ।

यह ऐसा समय था कि भदौरिया जी की आत्म-छवि तो मन में झलमलाती रही, पर उनसे मिलना नहीं हो सका। हिंदुस्तान टाइम्स से मुक्त होने के कुछ अरसे बाद बाद भाई प्रभात जी के आग्रह पर सन् 2013 में मैंने ‘साहित्य अमृत’ का संपादन सँभाला, तो बड़ी उत्कटता से भदौरिया जी की याद आई। मैंने शिकोहाबाद के मित्रों से भदौरिया जी का फोन नंबर पता करके उनसे बात की और रचनाएँ भेजने का आग्रह किया, तो उनका बड़ा ही भावनापूर्ण आशीर्वाद मिला। ऐसा आशीर्वाद जो मन को भिगो गया।

भोजपुरा (नजदीक दीवानी, मैनपुरी), पो. जनपद मैनपुरी-205001 (उत्तर प्रदेश) पते से 20.10.2013 को भदौरिया जी की कुछ लहरीले से आखरों वाली चिर परिचित हाथ की लिखाई में उनका पत्र मेरे पास आया। उस पत्र का एक अंश यहाँ दे रहा हूँ—
“परम शुभैषी स्नेही तपस्वी भाई प्रकाश मनु जी,
सादर सस्नेह नमन-प्रणाम स्वीकारें।

आपने मुझे उस आयु में याद रखा, जब प्रायः लोग भुला दिए जाते हैं या आसपास के सुपरिचित जन भी आँख बचाकर पास से निकल जाते हैं। दूरस्थ परिजनों की याद में आना तो और भी कठिन है। यह तो कुछ अधिक संवेदनशीलता या दैवी संस्कारशीलता का अपना चमत्कारी प्रभाव ही होता है, जो जीवन की पथरीली संघर्षमयी यात्रा में डूबते-उछरते हुए, खैर-खबर लेते हुए, उन्हें जीवित रखने की चाह लिए, उनके विगत संपर्क को संजीवनी पिलाने की इच्छा रखते हैं। मैं भी कलयुग का लखन हूँ, उसी का पर्याय। ‘सौमित्र’ उपनाम से जताने में थोड़-बहुत कलम की क्रीड़ा करता रहा हूँ।

आज तो प्रकाश और मनु की संतति उन्हें बिसराकर, उन्हें गाली देने में गौरव अनुभव करती है, परंतु यह आँधी भी उतार पर आएगी। अभी वह बाह्य प्रोत्थान नहीं हुआ है, सूक्ष्म में पूरा खेल हो चुका है। चर्मचक्षुओं के सामने आने में आप जैसे तेजस्वी शब्द-ऋषियों को श्रेय मिला और निमित्त बनना है, तभी आप चलते-चलते और सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते ‘साहित्य अमृत’ के संयुक्त संपादक के पद पर पहुँच रहे हैं। पं. विद्यानिवास मिश्र जैसे भारतीय मनीषा की विभूतियों का सपना साकार करने का दायित्व सँभालने की यात्रा में हैं।...

यह पत्र 86वें वर्ष में चलती आयु में भूलें करता हुआ लिख रहा हूँ। सो ध्यान से देखकर, पढ़कर उन्हें सुधारकर काम में लेना। पत्र के साथ प्रेषित सामग्री मेरे मँझले पुत्र चि. प्रबोधकुमार ने पुरानी जीर्ण-शीर्ण डायरियों, प्रकाशित संग्रहों से बीन-बटोरकर आप तक पहुँचाने की कोशिश की है।

मेरी अधिकांश रचनाएँ तो मेरे परम हितैषी जनों की रद्दी में चली गईं, जो कभी डा. रामविलास शर्मा की भूमिका लिखाने, और भारत के संविधान लिखने वाले हिंदी पुरुषों की लिपि में लिखकर छपने के आश्वासन देकर संपादन का गौरव पाने के प्रलोभन के साथ ली गई थीं, जिनकी पांडुलिपि आज तक नहीं लौटी। यह सब तो पुरानी डायरियों की रफ कापी है। सो मेरे साहित्यिक कूड़े-कबाड़े और मेरी जीर्ण-क्षीण काया की देख-भाल करने वाले मँझले बेटे चि. प्रबोध का तप-सहयोग आप तक पहुँचेगा।

बहुत अप्रकाशित बिखरा पड़ा और पुराने संदूक में बंद है। संभव हुआ तो आप सभी शुभचिंतकों तक पहुँचेगा। ‘कर्ता के कछु और है, अपने मन कछु और...’ की बात में अपनी कायरता छिपा रहा हूँ। शेष तुम अपनी समझ, इसे पढ़कर प्रयोग करना। मेरा ज्येष्ठ पुत्र आशुतोष और मेरी धर्मपत्नी 2005 में विदा हो गए। अब तो होने की रस्म निभा रहा हूँ। मरे को क्या मरना? 
                               आपका, लाखनसिंह भदौरिया”

भदौरिया जी के पत्र का शब्द-शब्द जैसे स्नेह और आत्मिक वेदना से भीगा हुआ है, जिसने मुझे मर्माहत कर दिया। उनकी चुनिंदा कविताएँ ‘साहित्य अमृत’ के अंकों में बड़े सम्मान के साथ छपीं। तब से मन था कि भदौरिया जी पर कुछ लिखना है। पर जो मन में सबसे गहरे पैठे होते हैं, उन पर लिखना शायद सबसे कठिन होता है। सो भदौरिया जी को एक बार फिर बड़ी शिद्दत से पढ़ा और लिखने बैठा। बहुत कुछ लिखा भी। पर जीवन जिन उत्ताल तरंगों पर चलता रहा, उनमें से किसी तरंग ने फिर दूर ला पटका। लेख अधूरा ही रह गया।

इधर एक अरसे से आत्मकथा लिखने में लीन हूँ। ऐसे में भदौरिया जी की याद भला कैसे न आती? एक-एक कर आँखों के आगे मानो सारे दृश्य आते गए। उन सबको शब्दों में बाँध सकूँ, यह सामर्थ्य तो मुझमें नहीं हैं। पर हाँ, उनके गीतों और कविताई की जो गहरी-गहरी सी छाप मन में है, उसे तो कुछ न कुछ बताना ही होगा।


5. कितना बड़ा स्वप्न देखा था...!

मैं समझता हूँ, भदौरिया जी की कविता की सबसे बड़ी शक्ति उनकी ऊर्ध्वगामी मेधा है। इसीलिए वह आत्मा को सबल करने वाली कविता है। इस लिहाज से स्वामी दयानंद के बारे में लिखी गई उनकी कविता का जिक्र किया जा सकता है, जिससे मन में उनकी एक उदात्त छवि सामने आती है। स्वामी दयानंद सिर्फ एक संन्यासी नहीं थी, वे देशभक्ति से सराबोर एक क्रांतिकारी चिंतक भी थे। भदौरिया जी बड़ी आवेगपूर्ण भाषा में उस इतिहास-पुरुष की उज्ज्वल छवि आँकते हैं—
कितना बड़ा स्वप्न देखा था, कितने बड़े सत्य के दृग से।
इस जग की संकीर्ण परिधि में, समा सका कब सत्य तुम्हारा
समाधिस्थ होकर शिवत्व में जो तुमने नव स्वप्न निहारा,
उसका ही प्रतिदान, गरल के प्याले पाए तुमने जग में,
कितना बड़ा स्वप्न देखा था, कितने बड़े सत्य के दृग से।

इसी तरह ऋषि दयानंद के बोध-पर्व को लेकर लिखी गई भदौरिया जी की कविता बार-बार पढ़ी जाने लायक है। ऋषि दयानंद रात भर जागे और फिर कभी सो नहीं सके। वे पूरी उम्र जागे ही रहे, ताकि संसार से अज्ञान और अंधकार को दूर किया जा सके, “तुम ऐसे जगे कि फिर सोए नहीं पल भर,/ प्रात लाया रात भर का जागरण ऋषिवर,/ प्रात जिसमें मंत्र ही हों, नव प्रभाती स्वर,/ प्रात जिसमें यज्ञ से महके अवनि-अंबर।”

स्वामी दयानंद के प्राणोत्सर्ग पर भी भदौरिया जी ने बड़ी मार्मिक कविता लिखी है, जिसका शब्द-शब्द वेदना कलित और भाव-विह्वल कर देने वाला है। जो सारे जग को प्रकाशित करने आया था, वह दीप बुझ गया तो चारों ओर दुख और उदासी की लहर छा गई। झंझानिल भी जिसकी दीपित ज्योति-शिखा को देख, मुग्ध रह गया था, उस दीप का अचानक बुझ जाना हमारे इतिहास की एक मर्मांतक घटना बन गया—
एक दीप बुझ गया इसी दिन अनगिन दीप जलाकर।
वह प्रकाश लेकर आया था, अंधकार कैसे रह पाता
ऐसा-वैसा दीप न था जो एक झकोरे में बुझ जाता,
झंझानिल भी मुग्ध रह गया, जिसकी दीपित ज्योति-शिखा पर,
एक दीप बुझ गया इसी दिन, अनगिन जीवन दीप जलाकर।

स्वामी दयानंद पर ऐसी भावमय कविता मैंने कोई और नहीं पढ़ी। इसलिए कि यह कविता केवल स्वामी दयानंद पर नहीं, बल्कि इस दुनिया की बेहतरी के लिए एक सच्चे ऋषि, सच्चे साधक और जन-जन से अपार प्रेम करने वाले एक कर्मयोगी के आत्मोत्सर्ग की कविता है।


6. हम रपटती सीढ़ियों पर चढ़ रहे हैं

भदौरिया जी की कविताई का शीर्ष उनके मुक्तक या चौपाइयाँ हैं। जैसे दूर से ही अपनी आभा से दीप्त करने वाली कटी-तराशी सुरम्य मणियाँ हों। उनमें एक शब्द भी आप इधर से उधर नहीं कर सकते। ये टकसाली भाषा में लिखे गए टकसाली मुक्तक हैं, जिन्हें बार-बार पढ़ने का मन होता है। हर बार पढ़ने पर उनमें से एक नई रोशनी, नया उजाला सा फूट पड़ता है, और किसी बारीक विचार-बिंदु को पूरी शक्ति से उद्भासित करते ये छोटे-छोटे मुक्तक जैसे हमारे लिए जीने का एक और ढंग बन जाते हैं।

चलिए, अब जरा भदौरिया के कुछ बेहद चर्चित हुए मुक्तकों पर थोड़ी बात की जाए। इनमें एक मुक्तक साधना करने वालों पर है, जो अपने अपार समर्पण से इस संसार को रचते हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देने की जरूरत है कि यह साधना कोई पहाड़ों पर जाकर किया जाने वाला तप नहीं, बल्कि इसी दुनिया में रहते हुए, उसकी बेहतरी के लिए तन-मन से समर्पित होकर काम करना है। फिर चाहे यह शिक्षा और समाज सुधार के लिए किया गया जतन हो, या फिर साहित्य और कला के लिए अपना जीवन निसार करना हो। जो भी एक बड़े लक्ष्य के लिए निरंतर कर्मलीन है, वही साधक है। और साधना के लिए कितना बड़ा तप और हौसला चाहिए, यह इस मुक्तक से पता चलता है—
साधना-शिल्पी स्वयं को गढ़ रहे हैं
पाँव धीमे हैं मगर हम बढ़ रहे हैं,
थरथराती पिंडलियाँ दुर्बल नहीं हैं
हम रपटती सीढ़ियों पर चढ़ रहे हैं।

मानो इस मुक्तक का एक-एक शब्द बता देता है कि अपार धुन के साथ की गई सच्ची और निश्छल साधना क्या होती है। यह किसी पहाड़ की कठिन और चुनौती भरी चढ़ाई चढ़ने जैसा है।

फिर अपनी राह खुद निर्मित करने और मन की पक्की धुन के साथ आगे चलने वाले शख्स की एक मुश्किल यह भी है, कि अकसर वह अकेला छूट जाता है। कोई उसका साथ देने के लिए आगे नहीं आता। बस, उसकी पदचाप ही उसके साथ रह जाती है। भदौरिया जी अपने एक मुक्तक में ऐसे ही अकेले छूट गए पथिक को अपनी तेजस्विनी वाणी और शब्दों का संबल देते हैं—
हर कदम अगला यहाँ बिल्कुल अकेला है
और हर पिछले कदम के साथ मेला है,
रह गया पीछे मिलाता युग कदम उनसे
हर कदम जिनका प्रगति के साथ खेला है।

इसी तरह किसी स्वाभिमानी कवि के जीवन में एक के बाद एक जो मुश्किलें आती हैं, जो विष उसे जीवन भर पीना पड़ता है, उसकी पीड़ा और खुद्दारी भी भदौरिया जी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। चार पंक्तियों के इस सधे हुए मुक्तक में वे मानो उसकी पूरी जयगाथा लिख देते हैं—
संघर्षों में पला हुआ कवि माँग रहा कब मान दान में,
परवर्तित कर रहा स्वयं ही संध्या को स्वर्णिम विहान में,
बढ़ने वाले बढ़ते ही हैं, रोक नहीं पाते जगबंधन—
रोड़े जो पथ के बनते, वे आगे चल बनते अभिनंदन।

इस मुक्तक की अंतिम पंक्ति कवि-जीवन की एक पूरी कहानी कह रही है। सच यही है कि वे तमाम लोग जो पग-पग पर उसके सामने बाधाएँ खड़ी करते हैं, बाद में सफल होने पर वे ही उसके आगे अभिनंदन का थाल लेकर आ खड़े होते हैं। पर मुश्किलें चाहे हजार आएँ, जिन्हें चलना होता है, उन्हें चलने से भला कौन रोक पाया है? एक सच्चे साधक का आत्मविश्वास क्या होता है, यह इस सादा, लेकिन पुरअसर मुक्तक को पढ़कर खूब अच्छी तरह समझ में आ जाता है।

इसी से मिलता-जुलता भदौरिया जी का एक और मुक्तक है, जिसमें अन्याय से सीधी मुठभेड़ का जोखिम है। साथ ही अनय का सामना करने का ऐसा बुलंद साहस भी कि देखकर छाती चौड़ी होती है—
अनय और हम आमने सामने हैं
समय और हम आमने सामने हैं,
सृजन-ध्वंस कुरुक्षेत्र में आ खड़े हैं—
प्रलय और हम आमने सामने हैं।

और अब रसखान सरीखा रस और प्रेम छलकाने की सीख देता यह मुक्तक भी पढ़ लीजिए, जिसमें प्रेम का अभिनंदन है, क्योंकि आखिर तो प्रेम ही इस दुनिया का बीज शब्द है। वही हमें रचता है, और हर क्षण पुनर्नवा करता है—
मन किसी का तोड़ मत, तू टूटकर रसखान बन
सिर्फ पाहन बन रहा, अब आदमी, इनसान बन,
भाव से छलके हृदय का प्यार दे यदि दे सके
मत अहं की ऐंठ में अकड़ा हुआ भगवान बन।

यानी अहं की ऐंठ में अकड़े हुए ‘भगवान’ से इनसान होना कहीं ज्यादा बड़ी बात है।

हासाँकि भदौरिया जी ने कुछ ऐसे कोमल मुक्तक भी लिखे हैं, जो अपनी सुरम्य कल्पना, अनूठे बिंब-विधान और मनोहारी भाषा के कारण हृदय को रसमग्न कर देते हैं। एक अछूते सौंदर्य और लावण्य की यह पावन छवि देखें—
प्रीति का दीपक जलाकर फिर नमन तुमने किया है,
फिर किसी एकांत में दृग-आचमन तुमने किया है,
झुक रहे हैं गीत के बादल बरसने को अधर से—
लग रहा फिर भावनाओं का हवन तुमने किया है।

इस मुक्तक के शब्द मानो वेद ऋचाओं सरीखे हैं। इसीलिए सौंदर्य का जो नैसर्गिक चित्र भदौरिया जी अपने शब्दों में उतारते हैं, वह दुर्लभ है, और किसी देवता की आरती सरीखा पवित्र भी। ऐसा ही सुकोमल एक और मुक्तक है, जिसका सम्मोहन स्वरों में कंपन और थरथराहट पैदा कर देता है—
हृदय तुम्हारा इतना पावन जैसे नव हंसों की पाँखें
इतनी सरल तुम्हारी चितवन सुबह खुलीं शतदल की आँखें,
दिव्य दृष्टि के सम्मोहन से, मेरे स्वर थरथरा रहे हैं
जैसे वंशी की गूँजों से हिलती हों कदंब की शाखें।

यह एक ऐसा मुक्तक है, जिसका एक-एक शब्द मन में उतर जाता है और हमारी आत्मा में उजास भर देता है। ऐसे ही अनबोले लावण्य की यह तसवीर भी देखें, जिसे एक बार देखने के बाद क्या कोई जिंदगी भर भूल सकता है—
नीलम के प्याले में जैसे, मादक दृष्टि किसी ने धोई,
एक याद को ही बिसूरती रही चेतना खोई-खोई,
लगा, जिस तरह मुसकानों से अनबोला लावण्य लजाए
अपनी छवि अपनी पलकों में करके बंद निहारे कोई।

सच पूछिए तो यह कोमलता को भी और कोमल तथा सुंदरता को भी और सुंदर बना देने वाला मुक्तक है, जिसके आगे हमारा हृदय झुकता है। इसी तरह आज के समय की निर्मम सच्चाई को बहुत सीधे-सादे लफ्जों में कहने वाला यह उस्तादाना मुक्तक भी पढ़ लीजिए—
अब नहीं अनजान से डर लग रहा है
आज की पहचान से डर लगा है,
प्रीति की भाषा अपावन हो चली है
आज की मुसकान से डर लगा है।

ऐसे ही बहुत सधे हुए शब्दों में लिखा गया भदौरिया जी का यह मुक्तक भी बहुत प्रसिद्ध है—
पीर की पूँजी जमा होती नहीं है
आत्मा के घर अमा होती नहीं है,
गलतियों की तब क्षमा तुम माँगते हो
गलतियों की जब क्षमा होती नहीं है।

इस मुक्तक की आखिरी दो पंक्तियाँ ऐसी कमाल की हैं कि आप एक बार पढ़ लें, तो कभी भूल ही नहीं सकते। गाहे-बगाहे वे आपके होंठों पर जरूर चली आएँगी। ऐसे ही ‘बादलों की छाँव से छाया नहीं होती’ कहकर आँखों से भ्रम का परदा हटा देने वाला भदौरिया जी का यह मुक्तक भी भुलाया नहीं जा सकता—
बिन तपे कुंदन कनक काया नहीं होती
आप से बाहर कहीं माया नहीं होती,
धूप में चलते चरण ही जानते हैं
बादलों की छाँव से छाया नहीं होती।

चार पंक्तियों के सादा से मुक्तक में खेल-खेल में ही ‘बादलों की छाँव से छाया नहीं होती’ जैसा नीति कथन पिरो देने वाली कवि सिद्धता यों ही नहीं आती। उसके लिए अपना सारा जीवन तपाना पड़ता है। और लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र सरीखा एक तपा हुआ कवि ही मौन की इस उच्च साधना तक पहुँच सकता है, जिसमें शब्दों से ज्यादा मौन बोलने लगता है, और उसमें जीवन की मार्मिक सच्चाइयाँ खुद-ब-खुद व्यक्त हो जाती हैं—
मैं तुम्हारे दर्द की आवाज हूँ
वह तुम्हारी देन है, जो आज हूँ,
बस तुम्हीं से बोलता है मौन मेरा
मौन का मतलब नहीं नाराज हूँ।

भदौरिया जी के ये ऐसे मुक्तक हैं, जिन्हें पढ़कर सीखा जा सकता है कि मुक्तक कैसे लिखे जाते हैं, या कि अच्छे मुक्तकों की कसौटी या मयार क्या है। कहना न होगा कि हिंदी में ऐसे मुक्तक ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलते, जिन्हें कविगुरु लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र के मुक्तकों के समकक्ष रखा जा सके।

सच तो यह है कि लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र उन विरल कवियों में से हैं, जिनका होना एक आश्वस्ति की तरह है कि अभी बहुत कुछ बचा हुआ है। यह अकारण नहीं है कि आज तिरानबे बरस की उम्र में भी उनके चेहरे पर एक निर्मल शिशु मुसकान नजर आती है। यह चिर प्रशांति भदौरिया जी का स्थायी गुण है, जो मैं उनमें शुरू से देखता आ रहा हूँ। यह शायद ऐसी चीज है जो किसी कवि में तब आ पाती है, जब वह केवल कवि न रहकर, कवि-साधक बन जाता है।

भदौरिया जी ने कई दशकों पहले ही इस सिद्धावस्था को हासिल कर लिया था, जो आज हिंदी के बहुत से नामी-गिरामी कवियों में भी कम ही नजर आती है। शायद उनका एक मुक्तक वह सब कह जाता है, जिसे शब्दों में कह पाने की सामर्थ्य मेरे पास नहीं है—
जिंदगी को मैं तपाए दे रहा हूँ
स्वर्ण को कुंदन बनाए दे ररहा हूँ,
आँधियों को रोशनी मिलती रहेगी
प्राण के दीपक जलाए दे रहा हूँ।

और अंत में सिर्फ इतना ही कहूँगा कि ‘आँधियों को रोशनी’ देने के लिए प्राण का दीपक जलाने वाले लाखनसिंह भदौरिया जी का होना हिंदी कविता की सदेह उपस्थिति सरीखा है। सच पूछिए तो भदौरिया जी ऋषि परंपरा के कवि हैं। काश, वे इसी तरह सचेतन भाव से जीते हुए अपनी उम्र के शतक तक पहुँचें, यह मेरी ही नहीं, देश भर में फैले उनके हजारों प्रशंसकों की भी कामना है!
*

प्रकाश मनु
545, सेक्टर-29, फरीदाबाद (हरियाणा), पिन-121008,
चलभाष: 9810602327,
ईमेल: prakashmanu333@gmail.com

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