कविता: प्रेम

रीता सिंह
रीता सिंह

पीएच. डी. (हिंदी), साहित्यकार, पटना, बिहार

मुझे हमेशा अच्छा लगता है
एक दिन, एक सुबह पहले
तुम्हारा जन्मदिन मनाना
भीड़ में, भीड़ से अलग,
तुम्हारे लिए शब्दों को गढ़ना

पिछले कई सालों से
चल रहा यह सिलसिला
एक बार छूटा था जब
कठिन हुआ शब्दों की चाशनी में
जन्मदिन को ढालना

तुम्हारे शब्दों की वह कड़वाहट
गुड़ की ढल्ली के घुलने से
मुँह के भीतर बन आई
मिठास सी मीठी थी,
प्यारी थी, न्यारी थी

तुमसे तुम्हारी ही बातें कहना
हमेशा अच्छा लगता है
तुम आत्मा की सुनहरी किरण
सीपियों पर पड़ी ओस की बूंदों की
ठंडा सा प्यारा अहसास हो

देखती हूँ प्रायः प्रेम शनैः शनैः
नमक की डली की तरह
गलता जाता है जिंदगी से
पर कभी समाप्त नहीं होता

रह जाता है हमेशा
ह्रदय की अटल गहराई में
नमक के स्वाद की तरह
गुड़ के अहसास की तरह
पुष्पों की सुगन्ध की तरह

ठहरता तो कुछ नहीं जिंदगी में
न शरीर, न जीवन, न जिंदगानी
देखो जरा अपनी हथेलियों में
ठहरा तो है हमारी हथेलियों के
मिलने का खूबसूरत अहसास

यह अहसान कभी नहीं मरता
ठहरा रहता है हमेशा हमेशा
हमारे यादों के पन्नों में
हमारे प्रेम में,
प्रेम के सिहरन में

तुमसे मैं करती हूँ
ढेर सारा प्रेम
प्रेम
और
सिर्फ प्रेम  
***

संक्षिप्त साहित्यिक परिचय
सहयोगी संपादक - तापमान पत्रिका, श्यामा संदेश पत्रिका, सिटीफ्रंट दैनिक 

प्रकाशित पुस्तकें
1. बिहार के मुसहर - शोधग्रन्थ
2. कहानी संग्रह - किस विधि मिलना होय
3. आत्मकथात्मक रचना - रामकृष्ण परमहंस और मैं
4. योग (कोर्स बुक) - 7 

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