कहानी: घरौंदा

मनोज कृष्णन   


मनु बड़े ही ध्यान से मिट्टी को गूँथ रही थी। पास ही उसकी सहेली आशफा भी बैठी हुई थी। उसका छोटा भाई रवि उनके बाजू में ईंटें लाकर रख रहा था। 
 
हर साल दिवाली के त्यौहार से कुछ दिन पहले ही श्रीवास्तव परिवार में घरौंदा बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाया करती थी। जब मनु बहुत छोटी थी तब उसकी माँ ही घरौंदा बना दिया करती थी। पर अब मनु आठ साल की हो चुकी थी। अतः ये जिम्मेदारी उसे ही उठानी थी और वह काफी खुश भी थी।आख़िरकार खुद घरौंदे बनाने की बात ही कुछ और होती है।

छत पर काम भर की ईंटें आ चुकी थी, साथ ही मिट्टी भी गूँथ कर तैयार हो चुकी थी। सो तीनों बच्चे अब घरौंदे को बनाने के बारे में सोचने लगे। मनु की इच्छा थी कि दो मंज़िलों वाला घरौंदा बनाया जाए जिसके नीचे के दो कमरे वह अपने पास रखे और ऊपर वाला एक कमरा आशफा को दे। पर यह विचार रवि को कुछ जँचा नहीं।

"वाह! दीदी, ईँटें ढोकर मैं लाऊँ और कमरे मिले सिर्फ तुम दोनों को? मुझे भी एक कमरा दो, नहीं तो मैं ईंटें वापस नीचे रख आऊंगा," रवि ने तुनक कर बोला।

"अरे! भाई, लड़के थोड़े ही ना घरौंदों से खेलते हैं, तुम ऐसा करना कि जब तुम्हारा मन करे, अपने खिलौने मेरे वाले कमरे में रख देना," मनु ने रवि को समझाते हुए कहा।

"मैं तो अब ईंटे लेकर वापस जा रहा हूँ," रवि भला उसकी बातों में कहाँ आने वाला था! रवि को ईंटे उठाता देख परेशान मनु ने आशफा की तरफ देखा। आशफा ने झट से रवि के हाथ से ईट छीन कर फर्श पर रख दिया।

आख़िरकार सबने मिलकर यह तय किया कि घरौंदा तीन मंज़िलों का होगा, जिसके नीचे के दो कमरे मनु को, बीच के दो कमरे आशफा को और ऊपर का इकलौता कमरा रवि को मिलेगा। रवि तो इस बात से फूले नहीं समा रहा था कि उसका कमरा सबसे ऊपर होगा। अब तीनों बच्चे ख़ुशी-ख़ुशी घरौंदा बनाए में जुट गए।

आशफा मुस्लिम परिवार से आती थी। उसके घर दिवाली का त्यौहार नहीं मनाया जाता था, पर उसे पटाखे, फुलझड़ियां और घरौंदे बेहद पसंद थे। आशफा का घर मनु के घर से सटा हुआ था। वे दोनों जब चाहे अपने छत की चारदीवारी को फांदकर एक दूसरे के घर आ जाया करते थे। मनु और आशफा में गहरी दोस्ती थी, इसी कारण मनु ने आशफा को भी अपने घरौंदे का हिस्सेदार बनाया था।

कुछ घंटों की मेहनत के पश्चात घरौंदा बनकर तैयार हो गया। आशफा ने अपने घर के चौखट के तर्ज़ पर घरौंदे के चौखट को अर्धगोलाकार रूप दिया तो मनु ने सीढ़ियों पर प्लास्टिक के फूलों को चिपकाया। रवि भी कम शौक़ीन नहीं था। उसने घरोंदे की चारदीवारी को कागज़ के सितारों से सजाया। अब बच्चों को घरौंदे को रंगने की चिंता हुई। मनु को ध्यान ही नहीं रहा कि सुबह अपने पापा को बाज़ार से रंग लाने को कह दे।

 "उफ़! शाम होने वाली है। अभी पापा को फ़ोन करुँगी तो पता नहीं वो ऑफिस से लौटते वक़्त रंगों के डब्बे लेकर आएंगे कि भी नहीं। आज शाम में तो चौराहे की दुकानों में बहुत भीड़ होगी। अब क्या करें! देखो! हमारे घरौंदे पर लगी मिट्टी भी सुख चुकी है," मनु ने परेशान होकर बोला।

तभी अचानक आशफा को याद आया कि उसकी मम्मी के पास पेंटिंग क्लास के कुछ रंग बचे थे। पहले वो खूब चित्रकारी करती थी पर पिछले साल जब उसके छोटे भाई का जन्म हुआ, तब से समय के अभाव के कारण उन्होंने चित्रकारी करना छोड़ दिया था।

"हाँ! एक उपाय है। मेरी अम्मी के पास रंगों के डब्बे हैं, मैं अभी उन्हें लेकर आती हूँ," कहकर आशफा दौड़ती ही चारदीवारी को फांदकर अपने घर की छत पर पहुंची और फिर तेज़ी से सीढ़ियों से उतरकर सीधे अपनी अम्मी के सामने जाकर खड़ी हो गयी।

"अम्मी! तुम मुझे अपने रंगों के डब्बे दे दो न! हमारा घरौंदा बनकर तैयार हो गया है पर हमारे पास रंग ही नहीं है। देखो ना शाम होने वाली है और हमें जल्दी से घरौंदे को रंगना है," आशफा ने अम्मी को समझाया।

"अरे! बेवकूफ लड़की, मैं इतने महंगे रंगों के डब्बे तुम्हें ईंटों पर पोतने के लिए दे दूँ?" अम्मी चौंककर कहा। पर आशफा भला कहाँ माने वाली थी।
"ऐसा करो न आँगन में थोड़ा चूना रखा है, उसे पानी में घोल कर घरौंदे को रंग दो, दिवाली की रात घरौंदा संगमरमर की तरह दमकेगा," अम्मी ने सलाह दिया। यह बात शायद आशफा को पसंद नहीं आयी।

"अम्मी, तुम उस चूने को अपनी पेटिंग्स में इस्तेमाल करना, मुझे तो तुम्हारे रंगों वाला डब्बा ही चाहिए। मनु क्या सोचेगी, मिट्टी भी उनकी, ईंटें भी उनके, मैं क्या सिर्फ लेने के लिए हूँ? उसने तो मुझे दो कमरे भी दिए," आशफा  ने गुस्से में कहा।  
अरे! बाप रे! इतना बड़ा अहसान, उन्होंने अपने घरौंदे के दो कमरे दे दिए तुम्हें?" कहकर अम्मी हँस पड़ी। फिर अम्मी ने अलमारी से दो रंगों के डब्बे  ढूंढ कर निकाला और आशफा की ओर बढ़ाया।

"पानी थोड़ा ज्यादा मिलाना, काफी गाढ़ा है, इन दोनों रंगों से ही काम चलाना, और नहीं हैं मेरे पास," अम्मी ने आशफा से कहा। आशफा ने झट से अम्मी के हाथ से रंगों का डिब्बा छिना और सीढ़ियों को तरफ भागी।

"अरे! सम्भल के जाओ, वरना गिर पड़ोगी," अम्मी ने चीखते हुआ कहा, पर आशफा भला कहाँ मानने वाली थी। वह! दौड़ती हुई छत की  चारदीवारी फांदकर मनु और रवि के पास जा पहुंची।

"आशफा! तुमने इतनी देर क्यों लगा दी ? अम्मी घर पर नहीं थी क्या?" मनु ने पूछा।
"जरूर रंगों का डब्बा गुम हो गया होगा, है ना! आशफा दीदी," मुस्कुराते हुए रवि ने कहा।
"अरे! नहीं, अम्मी ने काफी महीनों से पेंटिंग्स नहीं बनाया था, सो रंगों के डब्बे रखे-रखे सुख गए थे। बस, उनमें से ही काम के रंग ढूंढने में समय लग गया," आशफा ने देरी की वजह बताई।

बच्चों ने जल्दी से घरौंदे को रंगना शुरू किया, पर उन रंगों से वे नीचे की दो मंज़िलें ही रंग पाए। रवि के कमरे को रंगने के लिए रंग बचा ही नहीं।अब तीनों फिर गहरी सोच में पड़ गए। अब क्या किया जाए! तभी मनु को याद आया कि उसके जन्मदिन पर उसके छोटे चाचा ने एक उपहार दिया था,वह बड़े ही सुन्दर एक चमकीले कागज़ में लिपटा था, और जिसे उसने बड़ी सावधानी से संजोकर रखा था। शायद वह चमकीला कागज़ काम आ जाए। यह सोचते हुए वह दौड़कर सीढ़ियों से होते हुए अपने कमरे में गई और वह चमकीला कागज़ संदूक से निकाल कर ले आयी। 

उस चमकीले कागज़ को देख आशफा और रवि बड़े खुश हो गए। फिर आशफा और मनु ने सावधानी से उसे घरौंदे के सबसे ऊपर वाले कमरे की दीवारों पर चिपकाया। अब घरौंदा पूरी तरह तैयार हो चुका था और रवि वाला कमरा तो मानो घरौंदे की सुंदरता पर चार चाँद लगा रहा था।
इस तरह घरौंदा बनाने में उनका पूरा दिन निकल गया था, और बच्चे थक चुके थे। उन्होंने घरौंदे के आस पास सफाई की और फिर अपने-अपने घर चले गए।

अगले रोज़ दिवाली का त्यौहार था जिस दिन घरौंदे की पूजा की जाती। बिहार के कई शहरों में दिवाली में मिट्टी के घरौंदे बनाने का रिवाज़ है जिसमें घर की बेटियां मिट्टी की कुल्हड़ों में लाई, बताशे और लड्डू  भरकर घरौंदे की पूजा करतीं।

आज छोटी दिवाली थी। मनु की माँ ने एक दीया जलाकर घरौंदे में रवि के कमरे के पास और एक टिमटिमाती मोमबत्ती उसके छत पर रख दिया।

मनु और रवि जल्दी ही गहरी नींद में सो गए पर आज रात ना जाने क्यों आशफा को नींद नहीं आ रही थी। आशफा अपने घर कि छत  पर अकेली बैठी चारदीवारी के दूसरी ओर बने घरौंदे को निहार रही थी।

" कितना सुन्दर लग रहा है ना, हमारा घरौंदा! बिलकुल महलों जैसा आलिशान," आशफा ने मन ही मन सोचते हुए सपनों की दुनिया में खो गयी।

तभी हवा का एक तेज़ झोंका आया और किनारे रखा दीया लुढ़क गया, उसका तेल घरौंदे के ऊपरी कमरे में फैल गया, साथ ही मोमबत्ती गिर पड़ी। बस फिर क्या था कुछ ही पलों में घरौंदों के दीवारों पर चिपके कागज़, फूल और सितारे सभी जलने लगें।

इतने में अचानक आशफा का ध्यान टूटा। वह चारदीवारी को फांदते हुए जल्दी से घरौंदे के पास दौड़ी। उसने हाथ से हवा कर आग बुझाने की कोशिश की पर आग तो बुझने का नाम ही नहीं ले रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आया। फिर, झट से उसने अपने दुपट्टे से आग को बुझाने की  प्रयास किया। खैर! आग तो बुझ गई पर उसका दुपट्टा कई जगह जल गया।

आशफा वापस अपने घर के छत पर लौट आई। अपने सपनों को घरौंदे की यह हालत देखकर उसकी आँखें भर आयी थी। बच्चों की मेहनत बर्बाद हो चुकी थी। वह मुँह लटकाये चुपचाप सीढ़ियों से उतरकर अपने कमरे की ओर जाने लगी। तभी अचानक अम्मी उधर से गुज़री। इससे पहले आशफा कुछ कहती, अम्मी की नज़र उसके दुपट्टे पर पड़ी। अम्मी का पारा तो सातवें आसमान पर पहुँच गया।

"तुम मुझे एक दिन भी चैन से नहीं रहने दोगी। तुम्हारी शैतानियां रोज़ बढ़ती जा रही हैं। बताओ, कैसे जला गया तुम्हारा दुपट्टा?" अम्मी चीख  कर बोली, पर आशफा मुँह लटकाये बूत बनी खड़ी रही।
"अरी! बोलती क्यूँ नहीं हो ?" अम्मी ने उसे झकझोरते हुए गुस्से में  बोला।

"अम्मी,"आशफा ने डबडबाई आँखों से अम्मी के ओर देखते हुए कहा- "मैं छत बैठी, मनु के घरौंदे को देख रही थी, तभी अचानक उसमें आग लग गयी। उसे बुझाने की जल्दी में मेरा दुपट्टा भी जल गया।  अगर सुबह मनु और रवि घरौंदे को जला देखते तो उन्हें कितना दुःख होता
हम सबने उसे  बड़ी मेहनत से सजाया था "
आशफा कि बाते सुनकर अम्मी सन्न रह गयीं। उन्होंने आशफा को गले लगा लिया। बेटी की मासूमियत और दोस्तों के प्रति निश्छल प्रेम देखकर उनकी भी आँखें भर आयी।

थोड़ी देर बाद अम्मी ने आशफा के साथ मनु के घर के छत पर जाकर घरौंदे का मुआयना किया।

रवि वाले कमरे की दीवार पर चिपका कागज़ कई जगह जल चुका था। साथ ही सीढ़ियों पर चिपके फूल और सितारे भी जल गए थे। अम्मी ने उन्हें साफ़ करके मखमल के कपड़े चिपका दिए और फिर जले हुए फूल और सितारे हटाकर नए फूलों और सितारों से उसे फिर सजा दिया। घरौंदा अब पहले से भी ज्यादा ख़ूबसूरत लग रहा था। आशफा ने अम्मी को गले लगा लिया। 

अगली सुबह रवि और मनु छत पर गए तो घरौंदे को एक नए रूप में देख चकित हो गए। आशफा ने रवि और मनु को इतनी ही बताया कि जब रात में अम्मी ने घरौंदे को देखा तो मैंने उनसे कहा कि हमारे घरौंदे को मोहल्ले का सबसे सुन्दर घरौंदा बना दो। फिर अम्मी ने उसे और सजा दिया। रात की घरौंदा जलने वाली बात उसने किसी को नहीं बताई।

बच्चों ने जाकर अम्मी को धन्यवाद कहा, फिर तीनों बच्चे घरौंदे की आँगन को चमेली और गुलाब के फूलों से सजाने में जुट गए। आज दिवाली का शुभ दिन था और यह घरौंदा बच्चों के लिए किसी बेशकीमती उपहार से कम न था, एक ऐसा उपहार जिसकी सर्जना उन्होंने ही की थी।
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लेखक परिचय:
मनोज कृष्णन पेशे से एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। उन्होंने आईटीएम ग्वालियर से इंजीनियरिंग में स्नातक किया तथा स्नातकोतर की पढ़ाई बीट्स पिलानी एवं सिम्बायोसिस से पूरी की। मनोज कृष्णन एशियन लिटरेरी सोसाइटी के संस्थापक हैं, जो कि संसार भर के हज़ारों पाठकों, लेखकों एवं कवियों का समुदाय है। कनिष्का (उपन्यास) समेत वह अब तक सोलह पुस्तकें लिख एवं सम्पादित कर चुके हैं । इनकी कविताओं और लघु कथाओं को कई संकलनों में शामिल किया गया है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय उपन्यास लेखन चैम्पियनशिप नैनोरिमो 2017 एवं 2018 जीता है। वह इंडियन आवाज़ ऑथर ऑफ़ दी ईयर  एवं पोएसिस अवार्ड अवार्ड फॉर एक्सीलेंस इन लिटरेचर पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। मनोज कृष्णन क्रिमसन बुक नामक एक ब्लॉग लिखते हैं। लेखन के अलावा, वह एक मशहूर समीक्षक भी हैं।


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