कहानी: कठघरा

कृष्णलता सिंह
दरवाजे पर उमा को सामान के साथ देखकर पीयूष थोड़ा घबरा गया, "मॉम! आपअकेली? अचानक? फोन तो कर दिया होता।" दीवान पर आराम से पैर फैलाकर बैठते हुए उमा ने कहा, "पहले नीरा को बोल, अच्छी सी कॉफी पिलाये, बाकी बातें बाद में। बहुत थक गई हूँ।" 

सिर झुकाए पीयूष ने कहा, "मैं अभी बना लाता हूँ।" 

"क्यों नीरा अभी आफिस से आई नहीं?"

"एक महीने से वह घर छोड़कर जंगपुरा अपनी दोस्त के यहाँ शिफ्ट हो गई है।" यह सुनकर उमा स्तब्ध रह गई। बच्चों के जीवन में क्या क्या घटित हो रहा है? उसे खबर ही नहीं। नीरा ने भी उसे कुछ नहीं बताया। जबकि हर बात वह उससे शेयर करती रही है। यह सब क्यों नहीं बताया? फिर सोचा शायद नई जॉब में काम का दबाव होगा, ऐसे में दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गई होगी। गुस्से में दोस्त के यहाँ शिफ्ट हो गई होगी। पर गुस्सा शान्त होने के लिये एक महीना काफी होता है। बात कुछ ज्यादा गम्भीर नजर आई। इससे वह चिन्तित हो उठी।

इतनी देर में पीयूष दो मगों में कॉफी ले आया। कॉफी का मग पकड़ते हुए उमा ने पूछा- "इस बात को एक महीना हो गया और तुम ने बताया नहीं?" पीयूष मौन रहा। उमा ने फिर प्रश्न किया, "ऐसा क्या हुआ कि घर छोड़ने की नौबत आ गई उसे?"पीयूष ने सिर झुकाए हुए कहा, "व्हाटस्एप चैटिंग की बात पर कुछ कहा सुनी ज्यादा तीखी हो गई और तैश में  ...। " उसके अधूरे वाक्य को पूरा उमा ने किया, "और तुम्हारा हाथ उठ गया। यही ना?" 

लज्जित पीयूष ने मौन हामी भरी। 

"एक पढ़ा लिखा सभ्य व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ ऐसा पाशविक व्यवहार करे, क्या यह शोभा देता है? तुमने यह मर्दानगी का सबक कहाँ से सीखा?" कहकर वह गुस्से से थरथर काँपने लगी।

अचम्भित पीयूष ने पूछा, "यह आप पूछ रही हैं?" 

"हाँँ मैं पूछ रही हूँ, तुझ जैसे नालायक बेटे की माँ होने कै नाते।" 

कुछ तुर्श स्वर में पीयूष ने कहा, "माँ! आप स्मृतिलोप का शिकार हैं या जान बूझकर अनजान बन रही हैं। औरत पर हाथ उठाने का पहला सबक तो मैंने घर में ही सीख था। औरत पर उठने वाला पहला हाथ मेरे डैड का था और वह औरत आप थीं। आप शायद भूल गयी है।" 

उमा का सारा शरीर सुन्न हो गया, जैसे लकवा मार गया हो। विस्फारित नेत्रों से उसे ताकती रहीं। दिल में आया, "जड़़ दूँ दो चार थप्पड़ इस बेहया लड़के के मुँह पर" लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई।

पीयूष ने उसके घावों के वे टाँके बड़ी बेरहमी से खोल दिये थे, जिन्हें सिलने में उसे तीस बरस से ज्यादा का समय लगा था। वह भूली कुछ भी नहीं थी, बस उस कटु सत्य को भुलाने का छलावा करती रही अपने आप से। जब भी लहू-लुहान आत्मा ने चीत्कार किया, उसने उसे ममता की बेडियाँ पहना दी। उसे याद आ गई वह काली रात। इतवार का दिन था। सपरिवार हँसी-खुशी पिक्चर देखकर वापस लौटते समय वह अपनी गीली आँखों को चश्मा उतार कर पोंछ रही थी। बच्चे हँस रहे थे, "देखो-देखो मॉम रो रही है।" श्रीकांत ने उस पर व्यंग्य कसा, "तुम औरतों को समझना बड़ा मुश्किल है। इधर तुम टेसुआँ बहा रही हो, उधर शबाना आजमी एक बच्चे को अपनाने के लिये पूरी पिक्चर में गंगा-जमुना बहाती रही। बाद में खुद ही बच्चे को अपनाया। पहले ही अपना लेती तो क्या घिस जाता उसका? बोलो भाई?" 

उमा ने संजीदगी से जवाब दिया था, "श्री! इतना आसान नहीं होता है, अपने जीवन साथी की बेवफाई को माफ करना।"

"अरे! वे दोनों कालेज के जमाने के दोस्त थे। इतने सालों बाद मिले, तो भावनाओ में बहक गये। फिर वह बेचारी तो मर भी गयी, फिर इतना बड़ा इशू बनाने का मतलब? मुझे तो ऐसी औरतें सिरफिरी लगती हैं।" 

उमा ने प्रतिरोध किया, "वह सिरफिरी नहीं होती हैं, विवाहित जीवन की बुनियाद विश्वास के टूटने और बिखरने का दर्द होता है। बेवफाई को रफ्रू करने में कुछ वक्त तो लगता है ना श्री।" 

श्रीकांत ने कुछ अहम् के साथ कहा, "मैं इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता हूँ।" 

उमा ने मन ही मन सोचा कि कैसे रखोगे? आखिर पुरुष हो। पता नहीं कैसे बातें पिक्चर से हटकर निजी हो गई। वह अचानक पूछ बैठी, "श्री ! तुम सच्ची सच्ची बताना अगर मैं तुमसे कहूँ कि मैं अपने पूर्व मित्र के साथ भावनाओं में बह गयी और उससे एक बेटी भी है। कैंसरग्रस्त मित्र बेटी की जिम्मेदारी अब मुझे सौंपना चाहता है। क्या तुम मुझे माफ कर सकोगे? बेटी की जिम्मेदारी आगे बढ़कर लेने दोगे?" 

श्रीकांत एक दम से भड़क उठे, "यह कैसा वाहियात सवाल है?" उमा ने थोड़ी चुस्की लेते हुए कहा, "मैं तो सिर्फ यूँ ही पूछ रही हूँ। हाँ या न?" 

श्रीकांत ने दाँत पीसते हुए कहा , "तुम अपनी हद लाँघ रही हो।" 

शान्त उमा का प्रत्युत्तर था, "इसमें हद लाँघने वाली बात कहाँ से आ गयी। मैं तो एक प्रश्न का उत्तर माँग रही हूँ। मेरे ख्याल से एक सा गुनाह करने पर माफी और सजा एक जैसी मिलनी चाहिये। न्याय तो यही कहता है?" 

"हैल विथ योर न्याय" कहकर श्रीकांत ने जमीन पर अपना पैर जोर से पटका था। 

उमा मन ही मन हँसी उसकी दोहरी मानसिकता पर। घर आ चुका था। श्रीकांत ने झटके से गेट खोला और अपने कमरे की तरफ बढ़ गये। उमा ने जल्दी से खाना गरम करके सबको खाने के लिये आवाज़ लगाई। पीयूष, मेधा और श्रुति फटाफट मेज पर आ गये, लेकिन श्रीकांत नही आये। वे कमरे में टीवी के सामने बैठे ड्रिंक ले रहे थे। उमा ने कहा, "श्री! खाना ठण्डा हो रहा है। सुबह स्कूल है, जल्दी उठना है। " श्रीकांत का दबा गुस्सा मौके की तलाश में था, "भाड़ में जाये तुम्हारा स्कूल। दो टके की नौकरी का सुबह शाम रोज ताना। कमबख़्त चैन से ड्रिंक भी इंज्वाय नही करने देती। " फिर "बेबकूफ औरत" कहकर ग्लास उसकी तरफ उछाल दिया। उमा के कपड़े गीले हो गये। काँच के टुकड़े पूरे कमरे में बिखर गये। उमा श्रीकांत का ऐसा व्यवहार देखकर पहले तो हतप्रभ रह गई। फिर साहस करके कहा, "यह कौन सा तरीका है श्री?"

श्रीकान्त के सिर पर जैसे कोई शैतान सवार था। लपककर उसके खुले बाल पकड़कर, "आओ! तरीका मैं समझाता हूँ"-कहकर तड़ातड़ मुँह पर थप्पड़ मारने लगे। उमा ऐसे व्यवहार के लिये तैयार नहीं थी। वह हथेलियों से मुँह छिपाकर जमीन पर बैठ गयी। उसकी पीठ पर दो लातें जमा कर श्रीकांत कमरे से बाहर निकल गये।

उसे नहीं मालूम कि उस रात बच्चों ने खाना खाया था या नहीं। उस घिनौने कृत्य को देखा था या नहीं। रात भर फर्श पर पड़ी काँच की किरचें उसके मन में चुभती रहीं। वह दर्द से कराहती और सिसकती रही। सुबह आईना रात की हैवानियत की गवाही दे रहा था। बच्चे खुद तैयार होकर स्कूल जा चुके थे। शायद उसका दर्द समझ गये थे। उसने फोन द्वारा अपनी बीमारी की सूचना स्कूल भेज दी थी। पूरा दिन अकेली बिस्तर पर पड़ी दर्द से छटपटाती और अपने आप से लड़ती रही, "क्या मुझे श्री का यह अपमानजनक वहशीपन सह लेना चाहिए या घर छोड़ कर चले जाना चाहिए? बच्चों को साथ लेकर जाऊँ या छोड़ कर जाऊँ? मेरे अकेले का गुजारा तो शायद हो जाये पर तीन बच्चों की जिम्मेदारी किस पर थोपूँगी? उनकी पढ़ाई का क्या होगा? पूरा एक साल बरबाद हो जायेगा। छोड़ कर जाने पर पीछे बच्चे अनाथ हो जायेगे। मैं माँ हूँ, मेरे ऊपर उनके भविष्य की जिम्मेदारी है। उनका भविष्य बिगाड़ने का मुझे कोई हक नहीं है। फिर चार लोग क्या कहेंगे, 'छोटे बच्चों को छोड़कर माँ न जाने कहाँ और किसके साथ भाग गई?' रात की यह हैवानियत किसे पता होगी? उधर स्कूल में कोर्स पूरा कराना है। प्रीबोर्ड का पेपर सेट करना है। एक्जाम इंचार्ज हूँ। प्री बोर्ड और बोर्ड की परीक्षाएँ सम्पन्न करानी है। ऐसे में अगर मैं सब छोड़ कर चली जाती हूँ, तो स्कूल के साथ धोखा होगा।" उमा इसी 'किम् कर्तव्यं' के द्वन्द्व में फँसी रही और कोई निर्णय नहीं ले पाई थी।

उमा के अन्दर अतीत घुमड़ रहा था। सारे घाव ताजे होकर रिसने लगे। चेहरा सफेद पड़ गया। पीयूष ने कहा, "मॉम आपकी कॉफी ठण्डी हो गई है, दूसरी बनाकर लाऊँ?" 

"नहीं रहने दो, ठीक है"-कहकर उमा ने ठण्डी कॉफी का घूँट भरा। पीयूष ने अपने को जस्टीफाई करते हुए कहा, "मॉम! अगर उस दिन आपने डैड का प्रतिरोध किया होता, तो मुझे लगता यह काम गलत है। गुनाह है। उल्टे आपने तो डैड को मना मना कर खाना खिलाया।"

उमा कैसे पीयूष को समझाती कि तीन दिन तक बिस्तर पर लेटे लेटे उसने कितने नरक भोगे थे? कितनी मौते वह मरी थी। श्री बिना खाना खाये आफिस जा रहे थे। शाम को आफिस से लौटकर बोतल और ग्लास लेकर बैठ जाते थे। फिर बिना खाये बिस्तर पर लुढ़क जाते थे। पूरा घर तनाव और भय के साये में सांसें ले रहा था। उमा श्रीकांत के अहम् को जानती थी कि वह कभी भी अपनी गलती की क्षमा प्रकट में नहीं माँगेंगे। बस अन्दर ही अन्दर घुटेंगे। बच्चे भी सहमे सहमे घूम रहे थे। बच्चों को खुशनुमा माहौल देना भी अभिभावकों की जिम्मेदारी होती है। बस इसी लिये उसने वह जहर का घूँट पिया था। परिवार को सामान्य माहौल देने के लिये वह सामान्य बनने की कोशिश करती रही। पर क्या वह सब कुछ भूल पाई? रातों की टूटी नींदों ने बगावत के तूफानों को झेला था। आँसुओं के सैलाब ने तूफानों को दबाया था, लेकिन वह मरा कभी नहीं। उसने अपना स्त्री धर्म जरूर निभाया लेकिन श्री को मन के सिहांसन पर कान्त का सम्मान कभी नहीं दे पाई। स्कूल में अध्यापक संघ की महासचिव होने के नाते न जाने कितनी बार विद्यालय प्रबन्धक समिति से टक्कर लेने का दमखम दिखाया। लेकिन एक आदमी द्वारा बेवजह अपने अहम् को रौंदना उसने स्वीकार किया था, तो सिर्फ़ बच्चों के लिये। बच्चे बड़े होकर उसे कठघरा में ना खड़ा करे, "मॉम आपकी वजह से मेरा भविष्य खराब हो गया है। आप ने मुझे मेरे डैड से अलग कर दिया।" 

उसे क्या पता था कि उसे इस तरह से कठघरे में फिर भी खड़ा होना पड़ेगा? हालाँकि पीयूष के कथन में सच्चाई का दम था। बचपन की छोटी-छोटी घटनाएँ उसके कोमल मस्तिष्क पर संस्कार बन कर बैठ गई थी। उसने देखा -पिता नाराज होता है, गुस्से में शराब पीता है, खाना न खाने का स्वाँग रचता है। गलती हो या ना हो पत्नी हाथ जोड़कर माफी माँगती है, खाना खाने के लिये खुशामद करती है। कभी पति के हाथ उठा देने पर रोती है, सिसकती है। फिर अपने काम में डूब जाती है। यही बीमार संस्कार उसके विवाहित जीवन ने पीयूष को दिये है। उसका ऐसा दुष्परिणाम होगा उसने कभी सोचा नही था।

खैर जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता था। किन्तु पीयूष के फण्डे क्लीयर करने होंगे। उसने अपने आप को अतीत से बाहर लाकर थोड़ी हिम्मत बटोरी और कहा, "वाह बेटा! तू अपने बाप का असली सपूत निकला। तूने पति के अधिकार बहुत अच्छे से समझ लिये 'अगर पत्नी पति की बातों से असहमति जताये तो उस पर हाथ उठाकर बलपूर्वक अपनी बात मनवा लेनी चाहिए। ' बरखुरदार! अब वे जमाने लद गये है, जब लड़कियाँ हमारी तरह कमजोर और डरपोक  होती थी। चार लोग क्या कहेंगे? इसकी परवाह करना अब उन्होंने छोड़ दिया है। न ही हमारी तरह ममता की बेड़ियाँ पहनी है। शुक्र करो उसने तुम्हारी शिकायत पुलिस में दर्ज नहीं कराई" इतना कहकर उमा ने ओला बुक की। पीयूष ने पूछा, "मॉम! आप कहाँ जा रही हैं?"

सामान उठाते हुए उसने कहा, "अब और किसी कठघरे में खड़ी होने की हिम्मत नही है। मैं जा रही हूँ, नीरा के पास, उसे शाबाशी देने। मैं जिस ग्लानि के साथ जी रही थी, मेरी बहू ने उससे मुक्ति पा ली है।"

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