नवगीत: शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'
1. कपड़े पड़े हुए हैं गीले

धूप न निकली,
पछुआ सर सर,
जो धोए हैं,
ऊनी कपड़े,
कल से पड़े हुए हैं गीले।

सूरज कुहरे की चादर में,
दुबका अब भी दोपहरी तक,
गाँव अलावों का डेरा है,
हीटर पर है हर शहरी तक,
हिलती डालें,
छिप नीड़ों में,
खग सोए हैं,
तुलसी झुलसी,
पत्ते पड़े हुए हैं पीले।

निकियाये हैं, छीमी-दाने
सीझ न पाते घिकुरे हैं वे,
नल के जल इतने ठंडे हैं,
जमे हुए हैं, ठिठुरे हैं वे,
बारिश से है
गेहूँ हँसते,
जो बोए हैं,
आलू के तन,
कुछ कुछ पड़े हुए हैं ढीले।

आम आदमी की अँगुरी में
पड़ी हुई है सर्द अँगूठी,
नदियों की छाती पर लेटी
बर्फीली यह सदी अनूठी,
श्वेत श्वेत हर
दिशा, क्षितिज, घर,
जो मोए हैं,
शीत कणों से,
सिकुड़े पड़े हुए हैं टीले।


2. कच्ची दारू के नालों में  

कच्ची दारू के नालों में
नहा रहे हैं लोग।

सावन के बादल तो आए,
बरसे नहीं, गए,
मुसकानों के गीत सामयिक,
रच-रच नए-नए,
शुचिता मधुर सुनाती रसिया,
पाई यह संयोग,
किंतु कमाई पानी में नित    
बहा रहे हैं लोग।

आँधी आती है, जाती है,
यह तो होता है,
बीज वसीयत के सपनों का,
अक्षर बोता है,
शब्दों को बुननेवालों को   
लगा नया यह रोग,
बिना किए कविताई कविवर
कहा रहे हैं लोग।

झोंपड़ियों के छप्पर नीचे
पेट मचलता है,
पता नहीं किन बुरी लतों का
पित्त उछलता है,
खेल रहा है खेल अलौकिक
साधन का विनियोग,
अपशकुनों की साड़ी को ही  
तहा रहे हैं लोग।

अन्तस् की पीड़ाओं की भी
होती अपनी लय,
साँसों  को प्यारी लगती है
जीवनियों की वय,
करते हैं अपने ही धन का
बिना समझ उपभोग,
श्रम की उठती दीवारों को
ढहा रहे हैं लोग।


3. धुंध सी छाई हुई है

जी रही है मानसिकता,
अब तनावों में।

हैं कहाँ खुशियाँ, बहारें,
गाँव में, घर में,
धुंध सी छाई हुई है,
भूमि, अंबर में,
काटता निर्वाह दिन है,
कटु अभावों में।

उम्र घातक हो गई है,
रोगमय है तन,
घूँट अमृत सा, जहर का,
पी रहा है मन,
स्नेह बाकी ही नहीं है,
अब लगावों में।

किस्त की अट्टालिकाओं
में, बसा है सुख
बदल पाता ही नहीं है,
आँधियों का रुख,
मनुज का दम घुट रहा है,
चिर दबावों में।

आँसुओं की धार में है,
धुन न कोई लय,
शब्द की संवेदना का,   
हो रहा है क्षय,
जल रहे हैं, है न लेकिन,
लौ अलावों में।


4. यह नैराश्यजनक घटना है

गाँव मरे हैं    
इन शहरों में,
यह नैराश्यजनक घटना है।

बरसा छमछम नाच रही है,
बरफीले ओले निकले हैं,
धुआँ निकलने की चिमनी से,
लपटों के गोले निकले हैं,
पानी तड़प रहा  
नहरों में,
यह नैराश्यजनक घटना है।

परिवर्तन की परिभाषा का,
विज्ञापन का बहुत असर है,
आसमान की छत के नीचे,
बुरे समय का गुजर-बसर है,
जीवन का जीना
जहरों में,
यह नैराश्यजनक घटना है।

फूलसुँघी, गौरैयों का अब,
ग्रंथों में ही नाम लिखा है,
नई दिखावट की दुनिया में,
आज खड़ा इनसान दिखा है,
दीये का जलना  
पहरों में,
यह नैराश्यजनक घटना है।

कविताओं में पीड़ाओं की,
आह दबी है अक्षर-अक्षर,
भाषाओं की जंजीरों में,
शिक्षा बंदी पड़ी निरक्षर,
भिक्षा व्याकुल है  
डहरों में,
यह नैराश्यजनक घटना है।


5. वर्णों के इस वृंदावन में

आओ! बंधु! गले मिलते हैं,
अब तक बहुत लड़े।

बातों में रस घोल मेल का,
एक प्रयास करें,
सब अच्छा, अच्छा ही होगा,
मन-विश्वास भरें,
करें समापन! बने हुए जो
अनगिन नए धड़े।

वर्णों के इस वृंदावन में,
कुछ नवगीत गढ़ें,
हर यथार्थ की मृदु ध्वनियों के,
नव संगीत पढ़ें,
शब्दों के नय संविधान के,
हों अधिनियम बड़े।

सुधियों का मूर्धाभिषेक हो,
मूलोद्देश्य मिले,
रचनाओं पर हरसिंगार के,
आनत फूल खिले,
नहीं उखाड़ें, मुरदे जो हैं
कब से पड़े गड़े।

सुविधा और असुविधा का हो,
मिलना पीपल तर,
आश्वासन का, समाधान का,
मिला हुआ हो स्वर,
अपने पैरों पर अभाव हों,
निधड़क स्वत: खड़े।

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