पुस्तक समीक्षा- नगर ढिंढोरा (कहानी संग्रह)

समीक्षक: दिनेश पाठक ‘शशि’

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पुस्तक: नगर ढिंढोरा (कहानी संग्रह)
लेखिका: वंदना जोशी
पृष्ठ: 124
मूल्य: ₹ 225.00 रुपये
प्रकाशन वर्ष: 2021
ISBN: 978.93.90500.53.6
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन, मुम्बई


गहन अनुभव और अनुभूतियों के फलस्वरूप रचित मार्मिक कहानियों का संग्रह: नगर ढिंढोरा

                          अनुवांशिक रूप से मिली लेखन प्रतिभा वाली श्रीमती वंदना जोशी का लेखन अपने पत्रकार/संपादक पिता की छत्रछाया में फला-फूला है। यद्यपि किसी को सायास लेखक नहीं बनाया जा सकता किन्तु यह भी सच है कि लेखन के गुण प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान होने हैं जिनका प्रस्फुटन और उन्नयन निर्भर करता है उस व्यक्ति की संवेदना और भावुकता पर।
                      हिन्दी साहित्य की कहानी और कविता विधाओं, मेंं साधिकार लेखनी चलाने वाली, विदुषी, साहित्यकार श्रीमती वंदना  जोशी   का सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह ‘‘नगर ढिंढोरा’ को आद्योपान्त पढ़ा। मुबई के प्रलेक  प्रकाशन   से  प्रकाशित   124 पृष्ठीय इस कहानी संग्रह में  वंदना  जोशी   की 11 कहानियाँँ समाहित की गई हैं।
दिनेश पाठक ‘शशि’
                आदि काल से ही नारी अपने घर-परिवार और पति की मौन अनुगामिनी बनकर रही है। उनके उचित -अनुचित दबावों तले दबी नारी का यह ह्रास उसके आत्मनिर्भर न होने के कारण हुआ। नारी के रूप में वर्तमान चमत्कारी परिवर्तन, इलास्टिक के अति खिंचाव के कारण इलास्टीसिटी के गुण का खो जाने जैसा ही है।  कहानी संग्रह नगर ढिंढोरा की पहली कहानी- ‘बदलता शब्दकोश’ की पात्र उषा भी  पति के दबावों तले दबी ऐसी ही नारी है जो अपनी इलास्टीसिटी खो चुकी है तभी तो एक दुर्घटना में अपने पति सुहास की मृत्यु के बाद वह मुक्ति का अहसास करती है-
              ‘‘उषा माँ की गोद में सिर रखकर बस शून्य में निहारे जा रही थी। वह सन्न थी। अपने बारे में और बच्चों के भविष्य के बारे में सोचते हुए। लेकिन कहीं ज्यादा सन्नाटे में अपने भीतर उतर कर देखते हुए थी- यह कौन है जिसके भीतर मुक्ति का, राहत भरा एहसास है?’ आज बहुत सारे शब्दों ने एक साथ अपना मानी, अपना प्रभाव खो दिया था जैसे बारिश, लैंप पोस्ट, ठुमरी, चुंबन या फिर....निकल जाओ मेरे घर से...लीव! जस्ट लीव!’’ (पृष्ठ-24) 

वर्तमान आपाधापी के युग में अपने बुजुर्ग माता-पिता का सम्मान भी अब दिखावे की चीज बन गया है। उनके मान-सम्मान से अधिक उस मान-सम्मान के दिखावे का ढिंढोरा पीटना अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। कहानी संग्रह की दूसरी और शीर्षक कहानी-‘नगर ढिंढोरा’ का छोटा भाई अपने 80 वर्षीय पिता के जन्मदिन पर बुजुर्ग पिता की बढ़ती उम्र की तकलीफों को नकारते हुए उन्हें रात के 12 बजे सोते से जगाकर भाई द्वारा दिए कुरते को उतार कर उसके द्वारा दिए कुरते को पहनकर केक काटने के लिए बाध्य करता है-
‘अभी केक नहीं काटा तो क्या मैसेज जायेगा, बताइये तो?कि हम आपका ख्याल नहीं रखते।’(पृष्ठ-26) 
पिता के सम्मान से अधिक इस बात का भी ख्याल महत्वपूर्ण है कि केक का डेकोरेशन भी खराब न हो जाय-
‘पापा क्या कर रहे हो यार! बीचो-बीच काट रहे हो, सारा डेकोरेशन खराब हो जायेगा, कोने से काटो, थोड़ा सा।’ (पृष्ठ27)                                                                                                                                                           
वंदना जोशी

       और फिर उस केक काटने के चित्रों को फेसबुक के पटल पर डालकर लाइक को बटोरने की तैयारी। लेखिका वंदना जोशी जी ने कहानी के माध्यम से बुजुर्गों की अन्तर्व्यथा  और नई पीढ़ी के दिखावे को बहुत ही सूक्ष्मता से वर्णन किया है।
कहानी संग्रह की 23 पृष्ठीय तीसरी कहानी का नाम है -‘अर्जियाँँ’ जिसमें लेखिका ने मंदिरों में लगाई जाने वाली अर्जियों को केन्द्र में रखकर  घर-परिवार, नई पीढ़ी की आदतों, समस्याओं, अपेक्षाओं  और तकनीकी के माध्यमों आदि को समाहित करते हुए पूर्ण विस्तार प्रदान किया है। 
‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’ नाम है संग्रह की चौथी कहानी का। नारी को घर की लक्ष्मी और पुरुष की अर्द्धागिनी कहा गया है क्योंकि एक माँँ ही होती है जो अपनी संतति को सही राह दिखाने और उनके स्वस्थ जीवन की राह सरल-सहज बनाने के लिए अपने जीवन को होम कर देती है। ईंटों की दीवारों को घर में बदलने वाली भी पत्नी ही होती है किन्तु जब उसके इन महत्वपूर्ण कार्यों को नकारा जाता है तो उसका मन आहत तो होता ही है-
‘झाड़ू और बरतन सिर्फ यही दो काम तो नहीं होते ना घर में, फिर भी मेरे घर के रख रखाव का श्रेय मेरी बाई ले जाती है। बच्चों के चमचमाते रिपोर्ट कार्ड, माउस को राइट क्लिक करके तो नहीं आते, स्वस्थ और प्रसन्न बच्चे सुस्वादु और पौष्टिक भोजन से बनते है। और स्वाद एवं पौष्टिकता का मेल करना आसान नहीं होता, इन सबके बाद भी मुझे ‘‘कुछ’’ करने की सलाह दी जाती है।’(पृष्ठ-53) 
किन्तु समय के परिवर्तन के साथ साथ कुछ धनाड्य महिलाओं को यह सब बेमानी लगता है। बड़ी-बड़ी समाजसेवी संस्थाओं के नाम पर वे घर की अपनी जिम्मेदारियों को ठेंगा दिखाकर और ढकोसलों को अपनाकर, अखबारों में अपने फोटो छपवाकर गौरवान्वित महसूस करती हैं। उन्हीं को आइना दिखाती कहानी है-‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’
बुजुर्गों का कहना है कि रिश्ता और मित्रता बराबर वालों के साथ ही ठीक रहते हैं अन्यथा कभी न कभी ऐसा अवसर आ ही जाता है जब हीनभावना का शिकार होना पड़ता है।
अकूत धन की मालकिन सुमन के साथ मध्यम परिवार की रेणु की मित्रता हो तो गई किन्तु अन्ततः वही हुआ जो अक्सर होता है। दीपावली के त्यौहार पर रेणु अपनी सहेली सुमन से मिलने के लिए उसकी हवेली पर गई तो अपनी हैसियत से अधिक मंहगी एक किलो मिठाई लेकर गई किन्तु सुमन ने रेणु की हैसियत के अनुरूप उस मिठाई को सस्ती जानकर चुपके से अपने ड्र्रइवर को दीपावली गिफ्ट के रूप में दे दी।
‘दरवाजे के बाहर अपना नाम सुनकर रेणु ठिठक गई।
यह दे दो, यह रेणु लाई है।़- सुमन पति से कह रही थी। रेणु मोतीचूर या बेसन के लड्डू ही लाई होगी, ये दे दो।
चोट जब जोर की लगे तो दर्द एकाएक नहीं होता। कुछ समय तक जख्म भी सुन्न रहता है। रेणु धीरे से बिना किसी की नजर में आये वहाँँसे हट जाना चाहती थी।
जो असहजता सालों साल रेणु से आँँख मिचौली खेलती रही वह धप्प से मुंह बाए खड़ी हो गई निर्वस्त्र और भद्दी।’(पृष्ठ-64) 
रेणु ने भी सुमन द्वारा दिए ड्र्राई फ्रूट्स के डिब्बे को रेड सिग्नल पर रुकी कार के पास आये दो भिखारी बच्चों को देकर अपने अन्तर्द्वन्द्व से मुक्ति पा ली हो जैसे।
‘ऑचल की ओट से’ संग्रह की छठवीं कहानी है जिसमें माँँ का ममत्व, बच्चे के कोमल हृदय पर बड़ों के व्यवहार का असर और अघोषित प्रेम सम्बन्ध, सौतिया डाह का दंश अनेक तथ्य हैं जिन्हें लेखिका ने बड़ी ही कुशलता के साथ इस कहानी में बुना है-
‘पति का झुकाव और लगाव भाँँप जाने का गुण हर महिला में नैसर्गिक होता है। अतः भीरू जया भी ताई जी का कद अपने घर में खूब पहचानती थी।’ ’(पृष्ठ-69) 
जीवन भी एक विचित्र पहेली है। कौन गलत और कौन सही, पहचानना इतना आसान नहीं होता। नेहा वी.पी.ओ. की नौकरी में सायं 7 बजे से रात 2 बजे तक ड्यूटी करती। दफ्तर के सामने के दुकानदार की शक्ल सूरत से ही वह बहुत चिढ़ती। एक रात दफ्तर से घर के लिए ले जाने वाला कैब ड्र्राइवर नहीं आया तो नेहा के सहकर्मी अजय, जिस पर नेहा को अटूट विश्वास था ने नेहा को अपनी कार से ड्रा्रप करने का पुरजोर प्रयास किया तो उस दुकानदार ने डंडे से अजय को पीट-पीटकर भगा दिया। दुकानदार ने अजय के बारे में जो बताया तो नेहा आश्चर्य चकित रह गई-यह अजय कोई अच्छा आदमी नहीं है। दोस्तों के बीच आपके बारे में गलत बातें बोलता है। आपके कैब वाले को भी अजय ने ही पैसे देकर भगाया है। यह आपको अपनी कार में ले जाने की फिराक में था। ’(पृष्ठ-80) 
पापा के साथ घर लौटते हुए नेहा सोच रही थी-‘मैं अपने सुन्न पड़े दिमाग को एक नया दृष्टिकोण देने का प्रयास कर रही थी। अपनी जिन्दगी में खतरा भांपने के सूत्र बदलने थे मुझे और सही-गलत नजर पहचानने वाला चश्मा भी लेना था। पृष्ठ-80
उच्च शिक्षित और नौकरीपेशा लड़कियों के दाम्पत्य जीवन के बारे में बदलते विचारों का लम्बा फलसफा प्रस्तुत करती कहानी है ‘जो मैं जानती’। पुरुष और प्रकृति दोनों के मिलन से ही जीवन की सार्थकता के रहस्य को आखिर स्वीकारना ही होता है। पारुल भी विवाह न करने की अपनी जिद के कारण जब अवसर खो देती है तब उसे अपनी भूल का अहसास होता है-
‘घर पहुँँकर उसने देखा, माँँ मामा जी को शिल्पी की शादी पक्की होने की बधाई दे रही हैं। फोन पर बोलते हुए उनकी आँख्ाँं की उदासी उससे छुप न सकी।
त्किया में सिर टिकाते ही पारुल की आँँखों से दो आँसू बरबस ही लुढ़क गये।(पृष्ठ-100)
खग की भाषा एक बाल मनोविज्ञान पर आधारित कहानी है जिसमें अमीरों के अहंवादिता और वर्तमान परिवेश की गंध का समावेश सहज ही पता चलता है। 
अन्नोन नम्बर नारी ईर्ष्या, दूसरों को उपहास का केन्द्र बनाना बहुत आसान लगता है किन्तु जब स्वयं उस परिस्थिति में आ जाये तो कैसा लगता है यही इस कहानी का मूल तत्व है। जिया दूसरों का उपहास उडाने और पति-पत्नी के बीच संदेह का बीज बोकर उनमें झगड़ा कराके तमाशा देखने में बहुत आनन्द लेती लेकिन जब स्वयं के दाम्पत्य पर आंच आई तो ...
‘देखो जिया मुझे गलत मत समझना, मैं जानती हूँँ कैसा लगता है जब घर टूटते हैं। कोई भी दूसरे के पचड़ों में नहीं पड़ता इसलिए तुम तक कभी बात नहीं पहुँँची। 
जिया के दिमाग में भूचाल आया हुआ था।....पृष्ठ-119
‘परिचय’ कहानी इस संग्रह की अंतिम और बहुत ही मार्मिक कहानी है। शालू जो कभी अपने बनाव-श्रृंगार पर  ध्यान ही नहीं देती थी, रमा भाभी के यहाँँ आये मेहमान को देखकर अपने बनाव-श्रृंगार की ओर ध्यान देने लगी। उसे लगता कि छत पर रैलिंग से सटकर पढ़ने वाला वह लड़का उसे ही घुर रहा है और वह उसके लिए अपने को संवारने लगी। लेकिन जब रमा भाभी से उसे ज्ञात हुआ कि अमत उसके भाई का लड़का है और देख नहीं सकता तो उसे झटका लगा-
‘अचानक सारी आवाजें किसी खोह से आती हुई सी लगीं, मेरी आँँखों से टप टप आँँसू गिर रहे थे। आभास होते ही शालू घर की ओर दौड़ पड़ी। रमा भाभी अवाक् मुझे जाती हुई देख रही थीं। सोच रही होंगी कितनी बदल गई है शालू। दूसरों का दर्द भी समझने लगी है। 
ल्ेकिन क्या यह दर्द पराया था?
जिसकी नजरों से मैंने खुद को देखा, उसने तो मुझे कभी देखा ही नहीं। पृष्ठ-123
कुल मिलाकर वंदना जोशी जी का कहानी संग्रह-‘ नगर ढिंढोरा’’ सामाजिक बिसंगतियों, विकृतियों और वृद्धों की पारिवारिक उपेक्षाओं, बाल मनोविज्ञान और युवामन की उद्वेलित करती भावनाओं के प्रवाह आदि बहुत से जनमानस को झकझोरने वाले बिषयों को लेकर  रची गई मार्मिक कहानियों का संग्रह है जो सिद्ध करता है कि सुश्री वंदना जोशी में उत्कृष्ट कहानीकार के सभी गुण विद्यमान हैं।
प्रत्येक कहानी की शैली बहुत ही आकर्षक एवं कसावपूर्ण है। कहानियों की प्रवाहमयता ऐसी है कि पढ़ने वाला निरन्तर उत्सुकता के साथ पुस्तक को पढ़ता जाता है। कुछ कहानियाँँ पूर्ण विस्तार के साथ लिखी गई हैं किन्तु बड़ी होने के बावजूद कहीं भी शिथिलता या उबाऊपन नजर नहीं आता।
पूरी पुस्तक में अगर कुछ निराशाजनक है तो वह यह कि 124 पृष्ठीय पेपर बैक संस्करण में कुछ कहानियों में मुद्रण की अत्यधिक त्रुटियाँँ प्रकाशक की प्रकाशन के प्रति लापरवाही को सिद्ध करती नजर आती हैंं। 
हिन्दी साहित्य जगत में पुस्तक-‘नगर ढिंढोरा’ का हार्दिक स्वागत होगा, ऐसी आशा है। --

1 comment :

  1. मैं कहूँ!आपकी समीक्षा पढ़कर लगा कि मैंने वास्तव में पुस्तक ही पढ़ी है। सारगर्भित।

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