काव्य: प्रतिभा चौहान

प्रतिभा चौहान
ताकि बचा  रहे सुख 

अपने जीवन से भागती हुई 
अधूरी औरतें 
भागती हैं जीवन भर 
अपने आप से 

डरती हैं 
परंपराओं की दहलीज को लांघते हुए 
सुनाती हैं किस्से  अनगिनत 
अपनी अगली पीढ़ी की बहु बेटियों को 
ताकि वे भी रहें 
अपनी दहलीजों के भीतर 
डरें उन्हें लांघने से पहले 

भागती हुई औरतें
नहीं पहुँच पातीं 
अपने ही घर की देहरी तक
एक तेल का दिया 
जलता है मनों में 

एक गहरी कालिख छोड़ता हुआ 
जिसमें जला  देतीं हैं 
अपने सब दुख दर्द 
व्यस्तताएँ और दिलों के बोझ 

फिर हो जाती हैं मगन 
अपनी उसी दुनिया में 
गुनगुनाती हुई 
मुसकुराती हुई 
ताकि बचा रहे ढेर सारा सुख 
घरों के भीतर ..  
***


एक सच्ची आस्था

ये रिश्ते 
किताबें नहीं 
जो पढ़ कर 
कर दिए जाएँ खत्म 

न ही मौसमों की तरह 
बदल जाने का कोई जरूरी साक्ष्य 
न ही टूटते हैं 
शाख से टूटे हुए पत्तों की तरह 
न ही बारिश की बूँदों से 
हो जाते  हैं जज़्ब 
गरम  तपती जमीन पर ... 

एक सच्ची आस्था 
विश्वास , प्रेम 
और 
ढेर सारा त्याग 
किसी भी दीवार को ढहा सकते हैं 
जो उठ चुकी 
पुश्तैनी 
जर्जर रिश्तों के बीच 
बिल्कुल पुख्ता ... 

ये  रिश्ते 
रहते हैं दिलों के आसपास 
घूमते हैं साँसों में 
हवाओं की तरह 
जीते हैं अपनी ही धुरी पर 
जिस तरह से जीता है एक आकाश 
अपने मौन से 
करता हुआ संवाद ... 
***


बैर

बैर 
किरकिरी है 
आत्माओं की 
जिसमें 
विश्वास  की नींव
दरकती जाती है  
***


समुद्र सा गहरा 

व्यर्थ हैं सारी बातें 
दो सुकूं के पल के आगे... 

भावनाएँ है बहती नदी 
उनका एक अर्थ है 
गर  भावनाओं को न दे सको एक घर
तो विशाल होना व्यर्थ है... 
***


किरदार

मेरे किरदार को देखोगे 
तो मैं रागों में मिलूंगा ...

इस तिलिस्म की धुन को
धड़कते हुए दिल में सुनना
असंख्य कथाओं के मसविदे कैद हैं तारीख़ों में 

जब-जब भी पढ़ता हूँ किसी तूफान की इच्छा शक्ति
और आंधियों का व्याकरण
किसी मिट्टी के दिये सा जल उठता हूँ

मुझे न समझो सिर्फ वृक्ष 
मैं तूफानों से लड़ सकता हूँ

मुझे मेरे विस्तार से न समझना 

जब मैं एक दरिया था... 
तब भी छुपाये समुंदर था...
***


आजादी

अब आजादी   
कोई नई चीज नहीं है
सब जानते हैं...  
मौसम का मिजाज कुछ यूं है कि 
वे जंगलों की कहानी कहते हैं 
पढ़ाते हैं भारत का भूगोल 
नदियों और समुद्र के बारे में समझाते हैं कुछ ज्यादा 
कहते हैं -
ताजमहल यमुना नदी के किनारे है 
नदी क्या है ?
कल बच्चों को चित्रों और नक्शों में दिखाएंगे... 
***


मौन

मौन 
पाँचवीं दिशा का दरवाजा है 
खोजती फिरी सारी उम्र 
फिर भी अबूझे रहे उसके रास्ते 
काश कोई सांप आकर 
डस लेता मुझे 
मैं हो जाना चाहती थी चेतना विहीन 
पर मस्तिष्क दौड़ता ही रहा 
एक खालीपन लिए हुए गोद में 
मैं आकाश में खोदे गए गड्ढों में 
आकाश भरती रही  
एक-एक उँजली भर 
मौन की तलाश में 
जिसे बुद्ध ने तलाश लिया था अंतिम दिनों में 
जिसे महावीर ने ढूंढा तेइसवें पाले में 
बड़े बड़े संतों ने लगा दी जीवन की तमाम सांसें 
मैं वरदान नहीं मांगती 
मैं उस मौन से तादात्म्य बिठाना चाहती हूँ बस 
सारे ब्रह्मांड का कोलाहल है इसमें 
मेरा मौन बहुत जोर से चीखता है ... 
***


बुद्धं शरणं गच्छामि

साधक का परम लक्ष्य 
व्यक्तिगत निर्वाण 
मैंने एक बार पढ़ा था...  

तुम फंसे रहे पहले उपदेश में ही 
वह धर्म की सारी परिभाषाएँ 
पढ़ता गया 

उसके माथे पर 
गोल गोल आयतें थी 
वह चमकती हुई आँखों का देवता था 
गीता रामायण का सबसे तेज़ वाचक 
वह श्लोकों की ढेहरी पर 
सारे ब्रह्मांड की व्याख्या करता था 

तुम खालीपन की किताब मेँ डूबे हुए 
उलझे रहे सारी उम्र 
वह दूसरों के तालों की चाभी रखता था 

वह पृथ्वी को 
अपनी उंगली पर घुमाता रहा 
एक तुम थे 
तुमसे खुद को भी संभाला नहीं गया... 
***


आँकलन

उसे गलत तरीकों से आँका गया 
वह शांत व्यक्तित्व था 
मिट्टी में जन्मा 
दुनिया के किसी छोर का निवासी था 
चेहरे को 
भावों को 
क्षमताओं और कौशल को  
उसकी समस्त मानसिक शक्तियों को 
किया गया दरकिनार 

सिर्फ डिग्रियों से पहचाना गया। 

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