स्वाधीनता संग्राम में पूर्वी भारत का योगदान

प्रेरणा चतुर्वेदी

वाराणसी (उत्तर प्रदेश)

भारत के पूर्वी क्षेत्र यानी पूर्वोत्तर भाग सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक और साँस्कृतिक रूप से शेष भारत से कुछ भिन्न हैं। यहाँ की जनजातियों में प्रचलित परंपराएँ, भाषा, प्राकृतिक सुंदरता सदा सर्वदा से शेष भारतवासियों को आकर्षित करती रही है। इस भाग में वह दृढ़ जातीय संस्कृति है, जो संस्कृतीकरण के प्रभाव से बची रह गई थी। 
पूर्वोत्तर राज्यों में अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम,और त्रिपुरा राज्य आते हैं। यह आठों राज्यों का समूह पूर्वोत्तर के भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 7.9% भाग पूर्वोत्तर क्षेत्र के आठों राज्यों में समाविष्ट है। 400 समुदायों के लोगों और 220 प्रकार की बोलियाँ तथा विविधतापूर्ण संस्कृति, भाषा, रहन- सहन से यह क्षेत्र परिपूर्ण है। सुंदर पर्वतमालाओं, औषधीय वनस्पतियों, पुष्पों तथा नैसर्गिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। इस क्षेत्र का भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपना विशिष्ट स्थान रहा है। 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को खड़ा करने में पूर्वी, तथा पूर्वोत्तर राज्यों के आदिवासियों के स्वतंत्रता आंदोलन की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। आदिवासियों द्वारा चलाई गई सामाजिक स्वतंत्रता की लड़ाई ने गुलाम भारत में राजनीतिक स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया। पूर्वोत्तर के आदिवासियों के लिए आर्थिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी कि सामाजिक और राजनीतिक स्वतंत्रता। 

भारत में सबसे पहले आदिवासियों ने स्वतंत्रता आंदोलन सन 1780 में संथाल परगना में प्रारंभ किया। दो आदिवासी वीरों तिलका और मांझी ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। यह आंदोलन सन 1790 तक चला। इसे दामिनी विद्रोह कहते हैं। आदिवासियों का आंदोलन स्वायत्तता की लड़ाई से आजादी की लड़ाई में तब्दील हुआ और भारी संख्या में पूर्वोत्तर राज्य के आदिवासी भी आंदोलन में शहीद हो गए। 

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन 1857 से ही पूर्वोत्तर राज्य असम और त्रिपुरा के सिपाहियों ने भी विद्रोह किया था। किंतु उत्तर भारत के वीरों सामान इन सिपाहियों की भूमिका स्वर्णाक्षरों में अंकित ना होने से इतिहास की धूल भरे पन्नों तक ही सीमित रह गई। जबकि पूर्वोत्तर क्षेत्र के सैनिकों ने भी अंग्रेजी सेना से संघर्ष किया तथा इन सिपाहियों को रणनीति बनाने में पैसा और सहयोग देने में पूर्वोत्तर क्षेत्र के कई लोगों तथा परिवारों का विशेष योगदान रहा। जिसका उल्लेख पूर्वोत्तर की बराक घाटी के लोकगीतों जिसे 'जंगिया गीत' कहते हैं में मिलता है। पूर्वोत्तर के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर सिपाहियों में मनीराम बरुआ, मधु मलिक, चारु गुहाइन, हवलदार राजबली, गौचंदी खान, मजूमदार परिवार आदि रहे हैं।

ज्ञात इतिहास के अनुसार 18 नवंबर सन 1857 को 34वीं नेटिव इन्फेंट्री रेजीमेंट में पहली बार सिपाहियों ने अंग्रेजी सेना के खिलाफ विद्रोह किया। इस दौरान चटगाँव में सरकारी खजाना एवं हथियार लूटने के साथ ही यहाँ की जेलों में बंद कैदियों को मुक्त कराया गया। 

नागा जनजाति की शूरवीरता लोक प्रसिद्ध है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नागा वीरों ने भी अपना बलिदान किया था। उस समय के महान स्वतंत्रता सेनानी थे -जादोनांग। उस कालखंड में अंग्रेजों द्वारा लोगों को पकड़ कर सेना में नौकरी के लिए विदेशों में भेजा जाता था। प्रथम विश्व युद्ध के समय अंग्रेजों ने युवकों को  मेसोपोटामिया तथा फ्रांस भेजा जिसमें जादोनांग भी शामिल थे। वहाँ से लौटने के बाद ही उनके मन में स्वतंत्रता की आकांक्षा ने जन्म लिया। इस लक्ष्य हेतु ही उन्होंने गाँव-गाँव जाकर युवकों को संगठित करना प्रारंभ किया तथा अंग्रेजों के विरुद्ध समझाने का प्रयत्न किया। जादोनांग के प्रयास से पूर्वोत्तर राज्य के अधिकांश युवक अंग्रेजी सेना के खिलाफ हो गए। इस कारण ब्रिटिश सेना ने जादोनांग को इंफाल के कारागृह में बंद  किया तथा असीमित कष्ट देकर झूठे मुकदमे में फंसा कर 29 अगस्त 1931 को उन्हें फाँसी पर लटका दिया।

जादोनांग के बाद उनके अधूरे सपने को पूरा करने का कार्य 'रानी माँ' के नाम से लोकप्रिय 'नागालैंड की लक्ष्मीबाई ' रानी गाइदिन्ल्यू ने किया।

इनका जन्म 26 जनवरी सन 1915 को मणिपुर के लंग्काओ में हुआ था। संपूर्ण भारतवर्ष में अनेक वीरांगनाएँ हैं। जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान किया तथा समाज को संगठित कर धार्मिक, साँस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था को सुधारने में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया। 

रानी गाइदिन्ल्यू शीर्षस्थ नारियों यों में से एक रही हैं। रानी माँ ने अपने समर्थकों के साथ मिलकर सरकार के खिलाफ खुला विद्रोह करने का आवाहन किया तथा इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने नगरों, ग्रामों तथा जंगलों में घूम-घूमकर स्वतंत्रता सेनानी के पथ पर चलते हुए विदेशी आक्रांताओं से देश को मुक्ति दिलाने तथा ईसाई मशीनरी से अपने धर्म की रक्षा हेतु लोnगों को जागरूक किया।

वर्तमान मोदी सरकार ने पूर्वोत्तर की इस प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी  रानी माँ गाइदिन्ल्यू के जन्म शताब्दी समारोह के उद्घाटन के अवसर पर नई दिल्ली में 24 अगस्त 2015 को सौ रुपए का स्मरणोत्सव सिक्का तथा ₹5 का सिक्का संचालन हेतु जारी किया। पूर्वोत्तर क्षेत्र की रानी माँ ने देश की स्वतंत्रता हेतु अंग्रेजों के खिलाफ लड़ा था। महात्मा गांधी के राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष में शामिल हुईं और संपूर्ण क्षेत्र में स्वाधीनता की अलख जगाए रखा। 

मेघालय के महान स्वतंत्रता सेनानी 'उ तिरोत सिंह 'थे। अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष के दौरान ब्रिटिश सरकार ने इस वीर सेनानी को 19वीं सदी में ढाका की जेल में मार दिया। पूर्वोत्तर ने ब्रिटिश शासन के लंबे शोषण एवं अन्याय को सहा है। किंतु तिरोत सिंह जैसे देशभक्तों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई  की मशाल को अपने प्राणों की चिंता ना करते हुए भी जलाए रखा। नाड। गख्ला  इलाके के खासी देशभक्त राजा वीर उ तिरोत सिंह अंग्रेजों की कुटिल बुद्धि के शिकार होकर मारे गए थे। किंतु अंत तक तिरोत सिंह ने अपने कमजोर हथियारों से कंपनी की फौज के आधुनिकतम हथियारों का मुकाबला किया। जिस तरह से उन्होंने तीर कमान लेकर छापामार पद्धति से अपने से कई गुना बलशाली अंग्रेजी फौज की लड़ाई लड़ी वह अद्वितीय थी। 

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा 'उ कियाँग नाड गबाहा' अपने देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित थे। उनके आह्वान पर सन 1861 में मेघालय के 'मदिहाकमाईब्ला' नामक स्थान पर हजारों आदिवासी जमा हुए थे। ब्रिटिश सरकार की आँखों की किरकिरी बने उ कियाँग नाड गबाहा को 30 दिसंबर सन 1862 में जोवाई के मध्य बाजार में पेड़ से लटका कर एक अंग्रेज अफसर द्वारा फाँसी दे दी गई। इस वीर सेनानी ने हँसते हुए फाँसी के फंदे को गले में डालकर धीर-गंभीर आवाज में कहा- 'मेरे देशवासियों रोओ नहीं! विश्वास, आशा और धैर्य से काम लो।'

उन्होंने आगे कहा -;'मेरे प्रियजनों मुझे धोखे से गिरफ्तार किया गया है। परंतु विश्वास रखना, यदि आप देखो कि फाँसी लगने पर मेरा सिर पूरब की ओर लुढ़के तो निश्चित समझना कि, अगले सौ वर्ष के अंदर हमारा देश आजाद होगा। । और तुम फिर स्वतंत्र हो जाओगे परंतु यदि पश्चिम की ओर मेरा सिर लुढ़का तो यह हमारा दुर्भाग्य होगा ।'

सचमुच उनकी भविष्यवाणी सत्य हुई और 15 अगस्त सन 1947 को हमारा देश आजाद हो गया। हर वर्ष 30 दिसंबर को आज भी मेघालय में उनकी पुण्यतिथि मनाई जाती है तथा मदिहाकमाईब्ला के मैदान में नांड। गबाहा की याद में एक कीर्ति स्तंभ बना है। नांड। गबाहा एक श्रेष्ठ बांसुरी वादक भी थे। वह बंसी की धुन के साथ लोकगीत गाते थे। इस प्रकार वह अपने समाज के लोगों से तीर और तलवार उठाने का आह्वाहन करते थे। 

असम के स्वतंत्रता सेनानी गोपीनाथ बारदोली का जन्म 10 जून 1890 को असम के नौगाँव में हुआ था। इन्हें 'आधुनिक असम का निर्माता' भी कहा जाता है। इनके प्रयत्नों से ही असम, चीन और पूर्व पाकिस्तान से बचकर भारत का हिस्सा बन सका। गांधी जी के आह्वान पर सन 1922 में 'असम कांग्रेस 'की स्थापना होने पर गोपीनाथ बोरदोलोई स्वयंसेवक के रूप में इसमें शामिल हुए और गांधी जी द्वारा 'असहयोग आंदोलन' प्रारंभ करने पर उन्होंने अपनी वकालत त्याग कर एक मात्र राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया। विदेशी माल का बहिष्कार, अंग्रेजों के साथ  असहयोग, खादी वस्त्रों का प्रयोग तथा जन -जन में राष्ट्रसेवा की कर्तव्य भाव बोध जगाने का कार्य गोपीनाथ ने किया। इसके अलावा असम राज्य के नवीन चंद्र बोरदोलोई, चन्द्रनाथ शर्मा, कुलाधार चलिहा, तरुणराम फूकन ने भी भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान दिया। गोपीनाथ बोरदोलोई 19 सितंबर 1929 से 17 नवंबर 1939 तक असम राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव, लोकतंत्र और स्थिरता सुनिश्चित करने के आधार बनाए। असम के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों में हरेश्वर गोस्वामी, फखरुद्दीन अली अहमद आदि का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

1930 के 'कानून तोड़ो',और 'भारत छोड़ो' आंदोलन में असम की जनता में स्वतंत्रता प्राप्ति की लहर दौड़ पड़ी। तिरंगा झंडा फहराते जाते हुए असम के अनेक सत्याग्रहियों ने अपने प्राण गँवाए। इनमें हेमराज बारदलै, गुणाभि पाटर, कलाई कोछ, हेमराज बरा, तिलक डेका, भोगेश्वरी फुकननी, लक्ष्मी हाजरिका, बलोसूथ, राउतराम कछारी, मदन बर्मन, मुकुंद काकति तथा तिलेश्वरी बरुआ आदि प्रमुख थे। 

पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों के समान ही अरुणाचल प्रदेश में भी राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांति की चिंगारी फैली हुई थी। इस प्रदेश के लोहित जिले के किसान ताजी मिदेरिन ने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए 'मिशमी संगठन' खड़ा किया। सन 1917 में ने धोखे से पकड़कर पूर्वोत्तर के स्वतंत्रता संग्राम की क्रांति की मशाल को बुझाने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने तेजपुर जेल में 11 जनवरी 1918 को इन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया। 

इसी प्रदेश में 'बापू' नाम से प्रसिद्ध मीजेरीबा संत ने लोगों को स्वाधीनता संग्राम के लिए प्रेरित कर राष्ट्रीय आंदोलन को गति प्रदान की। 

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में त्रिपुरा की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। इनमें जितेन पाल, शचिंद्र पाल सिंह, वीरेंद्र दत्त, वंशी ठाकुर, प्रभात राय, देव प्रसाद, सेनगुप्त, अब्दुल गफूर, यतींद्रनाथ आदि राष्ट्रभक्तों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन', 'कानून तोड़ो', 'भारत छोड़ो आंदोलन', पूरी तरह जन -जन तक पहुंचाकर एवं स्वतंत्रता प्राप्ति की अलख जगाई थी। त्रिपुरा के स्वतंत्रता संग्राम के वीर  राष्ट्रभक्तों में जितेंद्र पाल का नाम सर्वोच्च है । सन 1932 से सन 1935 तक उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कई बार कारावास की सजा दी थी। 

मिजोरम में अंग्रेजों के शासन का मिजो वीरों ने डटकर विरोध किया था। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के करीब 5-6 दशक पूर्व ही मिजोरम में ब्रिटिश शासन को जड़ से उखाड़ने का प्रयास वहाँ की राजशाही व्यवस्था ने प्रारंभ किया था। इनमें सर्वप्रथम नाम राजा ललसथुलहा का आता है। राजा ललसुथलहा ने अपने राज्य की रक्षा एवं प्रशासन को उखाड़ने के प्रयास बड़े जोर-शोर से प्रारंभ किए थे। उन्हें अंग्रेजों ने धोखे से बुलाकर, जेल में यातना देकर मार डाला।

सेनलांग राज्य के राजा कलखमा थे। इन्होंने अंग्रेजों द्वारा मिजोरम निवासियों को बंधुआ मजदूर तथा कुली बनाने के खिलाफ विद्रोह किया। अंत तक अपनी सीमित शक्ति के साथ वह अंग्रेजों से लड़ते रहे। अंत में सरकार ने बंदी बनाकर अनेक यातनाएँ देते हुए राजा कलखमा को फाँसी की सजा दे दी। भारतीय स्वतंत्र स्वाधीनता संग्राम में देश भर में अनेक वीर और वीरांगनाओं ने अपने जीवन की आहुति देकर स्वाधीनता की अलग को जगाया था। इन्हीं में एक नाम है मिजोरम की रानी रौपुइलिआनी का। इनका जन्म राजघराने में हुआ था। विवाह पश्चात जब ब्रिटिश सरकार ने सभी मिजो राजाओं को बुलाकर ₹2 टैक्स देने का फरमान जारी किया, तो रानी रौपुइलिआनी और उनके पति राजा वान्दुला ने इसका विरोध किया। इस समय ब्रिटिश सरकार तथा अधिकारी कैप्टन जेम्स शेक्सपियर के लिए यह दोनों एक चुनौती प्रतीत होने लगे। तभी अकस्मात नाग के डसने से मरणासन्न हुए राजा वान्दुला ने अपनी पत्नी तथा उत्तराधिकारी रानी को बुलाकर कहा कि --'यदि मैं दुनिया से विदा हो जाऊँ, तो तुम राजकाज को आखिरी साँस तक संभालना और इन विदेशी अंग्रेजों से कभी समझौता मत करना, क्योंकि हम अपने देश को इनके हवाले कभी, किसी कीमत पर नहीं करना चाहते।'

रानी ने जीवन भर अपने पति की बातों का अक्षरश: पालन किया। ब्रिटिश सरकार द्वारा अनेक प्रकार की यातनाएँ और प्रलोभन देने के बावजूद भी अंग्रेजों के अनुकूल वह कभी नहीं हुईं। अंत में उन्हें ढाका जेल में उनके छोटे पुत्र समेत डाल दिया गया। रानी ने ब्रिटिश अधिकारियों से कहा कि, -'हम तुम्हारा दासत्व स्वीकार नहीं करेंगे। हम अपना आत्म सम्मान नहीं  गवाएंगे ; चाहे मुझे इस जेल में सड़कर मरना भी पड़े। '

बाद में कई दिनों तक अनशन करते हुए रानी की तबीयत खराब हो गई और 3 जनवरी सन 1895 को स्वाधीन देश का स्वप्न लिए रानी अपने पुत्र की गोद में सदा के लिए सो गईं।

इस प्रकार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पूर्व से ही पूर्वोत्तर राज्यों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध विद्रोह की चिंगारी भड़कने लगी थी। जो बाद में महात्मा गांधी द्वारा राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के समय और भी तेज हो गई। इसमें राजशाही परिवारों के लोगों के साथ ही आम लोगों की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। महात्मा गांधी के द्वारा प्रारंभ किए गए असहयोग आंदोलन, नमक कानून, कानून तोड़ो, भारत छोड़ो आंदोलन, खादी वस्तुओं का प्रयोग, का पूर्वोत्तर राज्यों में प्रचार -प्रसार होता रहा। जिससे इस प्रांत-क्षेत्र के लोग भी अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के स्वप्न देखते रहे और उसे चरितार्थ करने के लिए भी प्रयत्न करते रहे, किंतु अफसोस कि इन वीर सेनानियों का जिक्र शेष भारत में कम ही है। अतः इन्हें प्रकाश में लाने की आवश्यकता है।

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