सामाजिक संचेतना के वैश्विक कवि अभिमन्यु अनत की कविताएँ

मनोहर अभय
वैश्विक क्षितिज पर ज्वाजल्यमान नक्षत्र की तरह दीप्त अभिमन्यु अनत मारीशस के उपन्यास सम्राट माने जाते हैं। उन्हें मारीशस का प्रेमचंद भी कहा जाता है। दोनों महान लेखकों की संवेदना शोषित वर्ग से जुडी है। दोनों सामंती व्यवस्था के घोर विरोधी। लेकिन, जहाँ मुंशी प्रेमचंद प्रगतिशील कथा-उपन्यासकार हैं, अनत ठेठ प्रगतिकामी। साम्यवादी दल के "कार्ड होल्डर"।

मुंशी प्रेमचंद ने प्रगतिशील लेखक सम्मेलनों में भाग अवश्य लिया किन्तु दलीय राजनीति से तटस्थ रहे। एक बात और - मुंशी प्रेमचंद का लेखन कथा-उपन्यासों और तत्सबंधी आलेखों तक सीमित रहा। लेकिन जितना सम्मान मारीशस में मिला, उससे कहीं अधिक भारत में। साहित्य अकादमी ने उन्हें "महत्तर सदस्यता" के सर्वोच्च सम्मान से अलंकृत किया तो उत्तरप्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें "साहित्य भूषण" की मानद उपाधि से विभूषित किया। वर्ष 2020 में आयोजित ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मलेन के अवसर पर भारत सरकार के केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने अपनी ‘भाषा’ नामक पत्रिका का विशिष्टांक प्रकाशित किया। इसके लोकार्पण से पूर्व अनत की कविता "गुलमोहर खौल उठा" की कुछ पंक्तियों का वाचन करते हुए, उन्हें श्रद्धा -सुमन अर्पित किए गए। अनत के अन्तरपट में एक हठी, गर्वीला, आक्रोशी किन्तु भावप्रवण कवि रहता था। उन्होंने जितनी धारदार कहानियाँ या उपन्यास लिखे, उससे भी अधिक तेज-तर्रार कविताएँ। शब्द क्या अँगारे थे। अँगारे जिन पर राख की परतें नहीं, विद्रोह की चिंगारियाँ लिपटी थीं। शोषण, दमन और अत्याचार के जंगलों को फूँक देने वाली चिंगारियाँ। अंतःकरण के ज्वालामुखी से फूटी चिंगारियाँ। उनकी कविता को विद्रोही या एक वागी का हलफनामा कहा जा सकता है। वे न केवल अमानुषी सत्ता के विरोधी थे, बल्कि सामाजिक विद्रूपताओं, विगलित परम्पराओं, रीति-रिवाजों के भी। उनका विद्रोही स्वर उन परिस्थितयों को परत-दर-परत उधेड़ कर रख देता है जिनकी वजह से तत्कालीन साम्राज्यवादी ब्रिटिश सत्ता ने लाखों भारतवासियों को जर-जमीन और जन्मस्थली छोड़ कर बाँसों के जंगलों में भटकना पड़ा। पीड़ा घर छोड़ने की ही नहीं, उन बहशी और अमानुषी अत्याचारों की है जो इन अप्रवासी भारतियों को झेलनी पड़ी। देखिए उनकी प्रसिद्ध कविता 'अधगले पंजरों पर'-- "धरती के फटने पर \जब दफनाई हुई सारी चीजें ऊपर आएँगी \जब इतिहास के ऊपर से \मिट्टी की परतें धुल जाएँगी \मारीशस के लिखा नहीं जाता, लिखवाया जाता है। ऊँची गद्दी पर बैठा वाचक बोलता जाता है और लेखक अपना जमीर बेच कर जस का तस लिखता जाता है। किस की हिम्मत जो अत्याचारी वाचक के अत्याचारों पर कलम चलाए। यह तो कवि है जो समय की वास्तविकता को उकेरता है।

अभिमन्यु अनत तथा अनुराग शर्मा
अनत ने शब्द दिए इस "गूँगे इतिहास" को ध्यतव्य हैं ये पंक्तियाँ:" फिर याद आ गया अचानक \वह अनलिखा इतिहास मुझे \इतिहास की राख में छुपी\गन्ने के खेतों की वे आहें \याद आ गयीं \जिन्हें सुना बार-बार द्वीप का \प्रहरी मुड़िया पहाड़ दहल कर काँपा\ बार-बार डरता था \ वह भीगे कोड़ों की बौछारों से\इसलिए मौन साधे रहा \आज जहाँ खामोशी चीत्कारती है \हरियालियों के बीच की तपती दोपहरी में\आज अचानक फिर याद आ गये\मज़दूरों के माथे के माटी के वे टीके\नंगी छाती पर चमकती बूँदें\और धधकते सूरज के ताप से\गुलमोहर की पंखुड़ियाँ ही जैसे\उनके कोमल सपने भी हुए थे राख \आज अचानक\हिन्द महासागर की लहरों से तैर कर आयी\गंगा की स्वर-लहरी को सुन \.......अन्धे इतिहास ने न तो उसे देखा था\न तो गूँगे इतिहास ने कभी सुनाई उसकी पूरी कहानी हमें \न ही बहरे इतिहास ने सुना था\उसके चीत्कारों को \जिसकी इस माटी पर बही थी\पहली बूँद पसीने की \जिसने चट्टानों के बीच हरियाली उगायी थी \नंगी पीठों पर सह कर बाँसों की बौछार\ बहा-बहाकर लाल पसीना"।


उक्त कविता में प्रयुक्त बिम्ब लोमहर्षक अत्याचारों की जीवंत तस्वीर खींच कर रख देते हैं। अनत के मन में सदा करवट लेती रहीं अप्रवासी भारतीयों की मर्मान्तक वेदना जो उनकी अनेक कविताओं में समायी है। वेदना, जो पहले अप्रवासी 'गिरमिटियों ' से लेकर अगली पीढ़ियों ने झेली। 'गिरमिटिया' अपमान जनक शब्द नहीं है। लेकिन’ जिस तरह अनत ने इसका प्रयोग किया है उसमें तिरस्कार ध्वनित होता है।

गुलमोहर और उसके फूलों में नैसर्गिक सौंदर्य के साथ रूमानियत की हल्की सी छुअन है। बच्चन का रूमानी गीत है: "सुधि में संचित वह साँझ कि जब \रतनार प्यारी साड़ी में \तुम प्राण मिलीं \नत लाज भरी \खुल कर फूले \ गुलमोहर तले"। किंतु अभिमन्यु अनत को लगता है कि गुलमोहर खौल उठा (है)। द्रष्टव्य है इसी नाम के संकलन की प्रसिद्ध कविता -- "छुईमुई से लजीले उन फूलों को\जब तुम आँखें झुकाए तोड़ रही थीं\तो आँखें मेरी टिकी हुई थीं ऊपर को \जहाँ मेरी धमनियों के खून-सी \अकुलाहट लिये उफन आए थे\मेरे खून से भी लाल गुलमोहर के फूल। तुम जितनी शांत बैठी रहीं\पूजा पर \मैं अपने में उतनी ही खलबली लिये रहा\तुम्हारे सामने थाली में\तुम्हारे ही बटोरे हुए\कई रंगों के फूल थे\मेरी छाती पर कौंध रहे थे\उष्णता, अकुलाहट\और विद्रोह के गुलमोहर। तुम आज भी सोचती हो\भगवान को रिझा लोगी\और मैं फाँसी की सजा से बच जाऊँगा\तुम कभी नहीं समझोगी मेरी बात\अपने इन हाथों को मैंने\बकरे की बलि से लाल नहीं किया है\ये तो रंगे थे उस भेड़िये के खून से\जिसे मैंने और तुमने\भेड़ समझकर\दिखा दिया था बस्ती का रास्ता। मेरे अपने भीतर\आज फिर खौल उठा है गुलमोहर \ और मैं अपने हाथों को एक बार फिर\लाल करना चाह रहा हूँ \उस मूर्तिकार और उस कवि के खून से\जो शाही खजाने से\बना रहे हैं\उस भेड़िये की मूर्ति और लिख रहे हैं उस पर एक दूसरा पृथ्वी रासो"।

यहाँ फूलों की मृदुलता की बात यकायक अत्याचार-जनित बौखलाहट बन जाती है। दूसरी ओर प्रहार करती है व्यवस्था पर जो सत्कार करती है अपराधियों का। देती है दण्ड, सत्य को उजागर करने वालों को। एक बात यह भी कि मन्नत-मनौतियों तथा आस्थावादी सोच बचा नहीं सकती सत्ता के शिकार निर्दोषियों को। कवि मारीशस में है, और 'पृथ्वी रासो' भारत की ऐतिहासिक घटना को मिथक रूप में प्रयुक्त करता है।

ब्रिटिश सत्ता से मुक्त तो हो गया मारीशस। लेकिन, स्वाधीनता के कवच के बाद भी कवि के लिए --" हम निस्सहाय हैं - \ बरगद के पेड़ की तरह \ जमीन को दूर तक\ अपने शिकंजों में लिये हुए \तूफानों के इस देश में\बरगद का विस्तृत और संपन्न वृक्ष\धराशायी हो जाता है\अन्यवृक्षों से पहले ही\सभी सुविधाओं के बावजूद कि\ लिजलिजेपन की हमारी स्थिति\हमें निहत्थेपन को ढकेले जा रही\और हम\अपने रंग-बिरंगे कपड़ों के भीतर भी\नंगे हैं। और\अपनी विस्तृत फैली जड़ों के बावजूद\हम उखड़ते चले जाते रहे हैं\हमारे ऊपर से गुजर रहा है\दीमकों का लंबा जलूस" (देखें कविता "दीमकों का जलूस)। " कवि के लिए जिस स्वतंत्रता की चाहत थी, वह नहीं मिली। जिस सुबह की आशा थी उसका उदय हुआ ही नहीं। याद आ गए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़:"ये वो सहर तो नहीं कि जिसकी आरज़ू लेकर\चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं\ चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई"। असली मंजिल तो समता – समरसता की है। हाँ, रस्मी तौर पर स्वतन्त्रता की सालगिरह तो मनाई जा सकती है। ध्वजारोहण होगा। राज नेता करे, या कोई और। जब कोई राष्ट्रीय संकट नहीं तब --"क्या हुई राष्ट्रीयता की परिभाषा \झुक गये, जमीन पर लुढ़क गये झंडे को\कोई निर्भिक और फौलादी हाथ बढ़ कर आगे\उसे ऊपर उठा सके फिर से \हवाओं से बातें करवा सके उसे\पर तब तो खेल-कुद प्रतियोगिता और\स्वतन्त्रता की सालगिरह वाले हाथ\झंडे की रस्सी के बदले थामे होते हैं\एक हाथ में जाम और दूसरे हाथ में ब्लाउज के फीते"।

हिन्द महासागर का मोती कहे जाने वाले मारीशस की नैसर्गिक सुषमा अनन्त है। सैलानियों के लिए यह इंद्रधनुष का देश। लेकिन, इस इंद्रधनुषी देश को किस तरह रौंद कर लौटते ये भारी पॉकिट वाले सैलानी। अजीब सी जुगुप्सा उभार देता इनका आचरण, इनकी दौलत का नशा। द्रष्टव्य है कविता' "इंद्रधनुष का देश" : नीले समुद्र का दूधिया किनारा\अमरीकी सैलानी के साथ साँवली वेश्या\मुँह बाए जापानी कैमरा\जींस की जेब में अकुला रहे\हरे-भरे डालर\आगे फैला पीला हाथ भिखारी का\खाली का खाली \चमचमाती सफेद रेत पर पसरे\गेहुँए उरोज/गुलाबी जाँघें \टहल रहे मनचलों की पिपासित आँखें \मछुओं के बच्चों की काली मुसकानें\वाटर-स्की से चिरी छाती लहरों की \उन्हें कराहते छोड़ झागों में\नारंगी क्षितिज से\भाग गया सूरज"।

देखा क्या करते हैं, इस इंद्रधनुष के देश में आकर वासना के अंधे रईसजादे। इन्हें रमणीक झीलें नहीं, नीले समुद्र का दूधिया तट नहीं, कुछ ऐसा चाहिए जिसे देख कर लज्जित होकर भगवान भास्कर मुँह छुपा लें। ऐसी ही एक अन्य कविता है "समानता"जिसमें खुशहाली के वायदे की बात पूरी गर्माहट के साथ कही गई : "मों-स्वाजी के समंदर से\चार कदम आगे\देख आया मैं\चुनाव के दौरान\दिए गए वायदे पूरे होते\गरीब धनी के भेद को मिटते\गरीब तो नहीं मिला वहाँ\पर धनी सैलानियों को बालू पर पसरे\धूप में नंगे देख आया\अपने ही गाँव के\जमनी चाची के बच्चों जैसे\जमनी चाची के बच्चे अब नंगे नहीं रहते\ सैलानियों की मेहबानी को\ वे दिन-रात पहने होते हैं"। कैसी है ये मेहबानी। बच्चोँ पर या अपनी अस्मिता बेचती 'जमनी चाची के उपकारों पर'?

कवि को लगता है आजादी के आलोक में नहाते इस देश में भरी दुपहरी रात घिर आई है:" यहाँ दोपहर में रात हो गयी\गुलर का फुल खिल कर काफुर हो गया\गिद्ध के डैनों के नीचे\गोरैया की जिन्दगी कानून बन गयी\कैक्ट्स के दाँतों पर खून का दाग आ गया। पंखुड़ी से फिसल कर\चाँदनी अटक गयी है काँटोँ की नोक पर\ओस की लाल बूँदों पर\काली रात तैरती रह गयी। उजाले के गल गये तन पर\काला कुत्ता जीभ लपलपाता रहा\गंधलाती रही सूरज की लाश\काली चादर के भीतर\अंधे दुल्हे ने काजल से भर दी मांग दुल्हन की\यहाँ दोपहर में रात हो गयी\सुहाग-रात बन्द रह गयी\सिदरौटै के भीतर"। (देखें--दोपहर की रात ) एक और कविता है 'इश्तहारों के वायदे'। जो ऐसी ही स्थिति को व्याख्यायित करती है :"उस सरगर्मी की याद दिलाते\कई परचे कई इश्तहार आज भी गलियों की दीवारों पर घाम-पानी सहते\चिपके है अपनी अस्तित्व-रक्षा के लिए\उन पर छपे लंबे-चौड़े वायदों पर\परतें काई की जमीं जा रही है। जिन्हें देखते-देखते\आँखें लाल हो जाती है। तुम्हारे पास पुलिस है \हथकड़ियाँ हैं\लोहे की सलाखें वाली चार दिवारी है\मुझे गिरफ्तार करके चढ़ा दो सूली पर \उसी माला को रस्सी बनाकर\जो कभी तुम्हें पहनायी थी \क्योंकि मैंने तुम्हारे ऊपर के विश्वास की\बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी है\इस जुर्म की सजा मुझे दे दो। मैं इन इश्तहारों को\अब सह नहीं पा रहा हूँ"। देश में जगह-जगह चमचमाते संगमरमरी अस्पताल हैं। लेकिन समय पर न डॉक्टर आते हैं, न परिचारिकाएँ। रोग की विभीषिका से पीड़ित बूढ़े -बेदम रोगी घंटों प्रतीक्षा करते है या खाली हाथ लौट जाते है। कुछ ऐसा ही शब्दांकित करती है अनत की कविता 'वह अनजान आदमी"। अनत किसी भी कीमत पर आदमी की अस्मिता से खेलना नहीं चाहते। उसकी गरिमा को समृद्ध करती है उनकी हर कविता। उनका आदमी असहाय भी नहीं। वह जीवन समर का अजेय सेनानी है। सब कुछ खो कर भी उत्फुल्ल है। उल्लसित है—" जिस मजदूर के हाथ से\ तुमने मोती छीन लिया था \ पगडंडी से लौटते \ उसने कच्चू के पत्ते से \ओस की बूँद को \मुट्ठी में बाँध लिया है \उल्लसित वह उतना ही है\जितना तुम हो। (कैक्टस के दाँत)। छीन कर ले जाने वाला तो "उल्लसित" होगा ही। लेकिन, अनत का लुटा-पिटा आदमी छटपटाता नहीं है। इसलिए कि वह श्रमधर्मी है। उसने पसीना बहा कर अर्जित किया है मोती (मोती जैसी कीमती वस्तु)। वह सिद्धहस्त है ऐसी कीमती वस्तु अर्जित करने में जबकि लुटेरा अक्षम है। ऐसा नहीं कि अनत की दृष्टि मारीशस की व्यवस्था की कुरूपता पर ही टिकी हो। वह उसी विद्रोही अंदाज में वैश्विक क्षतिज को भी टटोलती है। आज अमन-चैन के नाम पर विश्व की महाशक्तियाँ के करतबों को बड़ी बेवाकी से व्यंजित करती है अनत की कविता"विश्व शांति" --" हर सीमा पर गोलियाँ चल रहीं\धमाके हो रहे जब शहर-शहर में\उपज रहीं परमाणु शक्तियाँ \बड़े देशों में\खून के प्यासे जब हो रहे हम मजहबी\तब महाशक्तियाँ हाथों में सूई-धागा लिये \भाईचारे के फट चुके चीथड़ों को जोड़ने\शांति स्थापना के नाम, खालीपन में\हवा के टुकड़ों को सीने में लगी हुई हैं।"

अपनी कविता '‘कुहासे में" अनत कहते हैं-" कुहासे को गले में लपेटे\ झूल रहा आदमी\सहम गई है हवा संकुचित अँधियारे में\सूरज को ओढ़ा आया है आदमी\एक काली चादर\ सेंहुड़ पर रख आया है नवजात शिशु को \ तान रहा आदमी\ समय को प्रलय-रेखा के उस पार\आपाधापी में समय जा गिरा\ कड़ाह के खौलते पानी में \रेत के पहाड़ पर ध्वजा गाड़ आया \ दहाड़ते ज्वारभाटे के मुँह में \चिराग जला आया आदमी \ दम तोड़ते परिंदे के डैनों को अपने में जोड़कर \ऊपर जा पहुँचा उड़कर आदमी \विस्फोट के बाद\ ताकि देख सके वह नीचे के प्रज्वलित दृश्यों को \अपनी साँसों के कुहासे में!”

यह कविता आज के उस आदमी की तस्वीर है जो है तो दुर्दांत, किन्तु दिखता है शांति पुरुष (गले में शीतल कुहासा लपेटना) यही शांति पुरुष झूठा, निर्मम और निरंकुश है (सूर्य पर काला पर्दा अर्थात सत्य को दबाना, नवजात शिशु को सेंहुड़ (कांटेदार झाड़ी की बाड़ पर रखना हैअर्थात नई पीढ़ी के लिए काँटे बोना, ज्वार-भाटों पर दीप जलाना, शान्ति का नाटक; आपाधापी में समय का खौलते पानी में गिरना, विध्वंस की तैयारी जबकि दम तोड़ते परिंदे के डैनों में अपने को जोड़ना अर्थात असहाय व्यक्तियों के कंधों पर चढ़ कर ऊँचाई पाना, जहाँ से वह अपनी रची विनाश लीला देख सके। बात चाहे विनाश लीला की हो या गिरमिटियों के शोषण की अनत की कवितायेँ पाठक के मन में कभी आक्रोश-असंतोष पैदा करती हैं तो कभी प्रतिरोध और सत्ता के विरुद्ध विद्रोह। विचार प्रधान होते हुए भी ये ऐसा भावोद्रेक पैदा करती हैं कि पाठक प्रतिरोधी शक्तियों से सीधी मुठभेड़ करने को उतारू हो जाता है। उनके शिल्प विधान में प्रतीक हैं, बिम्ब हैं और है शब्दशक्ति। एक जागरूक और जूझारू व्यक्ति का उद्बोधन है उनकी कविता। मुंशी प्रेमचन्द अपने प्रसिद्ध उपन्यास गोदान में कहते हैं- "लिखते तो वे लोग हैं, जिनके अंदर कुछ दर्द है, अनुराग है, लगन है और हैं विचार"। इस निकष पर अनत की कविताएँ खरी उतरती है। ऋषभ देव शर्मा कहते हैं अनत के साहित्य में सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक प्रश्नों की गहरी समझ परिलक्षित होती है। वे एक ओर जहाँ उन तमाम त्रासद स्थितियों की गवाही देते हैं जिनसे मॉरिशस के खेतों में सचमुच सोना उपजाने वाले भारत वंशियों को गुजरना पड़ा है; वहीं दूसरी ओर उस जिजीविषा का भी पता देते हैं जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति में गहरे पैठी हुई हैं। (देखें 'प्रवासी जगत', 1982 अ: 2 केन्द्रीय हिंदी संस्थान) उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के समग्र साहित्यिक अवदान के प्रसिद्ध मीमांसक डॉ. कमल किशोर गोयनका ने कवि अनत की कविता को "मारिशस के गूंगे इतिहास की आवाज" की संज्ञा दी। वर्ष 2020 में आयोजित ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मलेन के अवसर पर एक साक्षात्कार में डॉ. गोयनका ने कहा -- "अभिमन्यु अनत सत्ता से प्रश्न करने का साहस रखते हैं। वह मारिशस के गूंगे इतिहास की आवाज हैं । वह अपने साहित्य से अज्ञात दरवाजों को खोलकर उसमें दबी-ढँकी–बँधी-बाँसों और कोड़ों की अनुगूँजों और प्रतिध्वनियों को साहित्य का रूप देते है"।

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