साहित्यिक पत्रिकाएँ बंद होने के कगार पर हैं, यह चिंतनीय है। - डॉ विनोद टीबड़ेवाला

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच के द्वारा आयोजित हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की स्थिति को रेखांकित करने एवं विचार विमर्श करने के लिए हिंदी में कार्यरत विभिन्न क्षेत्रों शिक्षा, पत्रकारिता, संपादन, प्रकाशन से जुड़े विद्वानों ने चर्चा की।

15 सितंबर गूगल मीट पर आयोजित इस संगोष्ठी में सरस्वती वंदना वंदना रानी दयाल ने सुमधुर स्वरों में गाई।

मंचासीन अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्था की अध्यक्ष श्रीमती संतोष श्रीवास्तव ने कहा, "हिंदी दिवस हमें यह याद दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है कि हिंदी भाषा दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है, और प्रत्येक भारतीय को अपनी मातृभाषा में बोलने में गर्व महसूस करना चाहिए।

पिट्सबर्ग अमेरिका से प्रकाशित सेतु साहित्यिक पत्रिका के संपादक विशिष्ट अतिथि अनुराग शर्मा जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी भाषा को लेकर हम भारतीयों के बीच में एक हीन भावना घर कर गई है। हिंदी संस्थानों द्वारा हिंदी में लिखे गए शब्दों को मिटा दिया जाता है, तथा स्थानीय भाषा में अथवा अंग्रेजी में लिखा जाता है। सरकारी कार्यों में हिंदी को पूर्णता मान्यता प्राप्त नहीं है‌ विश्व हिंदी सम्मेलन का जो उद्देश्य भाषा को विश्व स्तर का बनाने का वो अभी तक पूरा नहीं हुआ है। हिंदी का प्रयोग केवल हिंदी से जुड़े हुए लोग ही करते हैं जबकि अन्य विषयों से जुड़े लोगों को भी हिंदी से जोड़ना आवश्यक है। हिंदी भाषा में भी एक अनुशासन की आवश्यकता है।हिंदी के शब्दकोष को समृद्ध करने तथा भाषा और संस्कृति को जानने, समझने की आवश्यकता पर आपने जोर दिया।

भोपाल से पधारे समावर्तन पत्रिका के प्रबंध संपादक विशिष्ट अतिथि मुकेश वर्मा जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि संसाधनों के अभाव के बावजूद संतोष श्रीवास्तव जी पैतालीस वर्षों से निरंतर साहित्य और भाषा के लिए  सेवा कार्य कर रही हैं जो कि सराहनीय है ।हिंदी भाषा पर उन्होंने कहा कि जिन संस्थानों में हिंदी की स्वीकार्यता नहीं है, मान्यता नहीं है वहां हिंदी आवश्यक है। कार्यकारिणी भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता प्राप्त होनी चाहिए ।जबकि हिंदी विश्व में बोली जाने वाली चौथे स्थान पर है ।उन्होंने कहा कि सिनेमा ,व्यापार ,पर्यटन हिंदी में बहुत अच्छा कार्य किया है और जनसंपर्क की भाषा में इसके अन्य भाषाओं के शब्दों को स्थान देकर भाषा समृद्ध हुई है।
इस विचार कुंभ के अध्यक्ष हिंदुस्तानी ज़बान पत्रिका मुंबई के संपादक आदरणीय संजीव निगम जी ने बहुत ही सरलता से विषय पर चर्चा की तथा कहा कि जहां गंभीर व स्तरीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय चर्चाएं होती हैं वहां हिंदी नदारद होती है। हिंदी की बात केवल हिंदी वालों के बीच में ही हम बैठकर करते हैं। मुख्य अतिथि के रूप में अन्य भाषा भाषियों को बुलाकर उन्हें हिंदी बोलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। विश्व स्तर पर हिंदी समृद्ध हो इसके लिए हमें न केवल साहित्यिक रूप से वरन् कार्यकारिणी प्रणाली के रूप से भी विचार करना चाहिए।

जेजेटी ,विश्वविद्यालय के संस्थापक,चांसलर डॉ विनोद टिबडेवाला जी ने भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए एक जुट हो कर संस्थागत प्रयासों का उल्लेख किया साथ ही चिंता व्यक्त की  हिंदी की प्रसिद्ध पत्रिकाएं बंद होने की कगार पर हैं उनके लिए भी कुछ कार्य करना चाहिए। अनुवाद के क्षेत्र में भी उन्होंने हिंदी भाषियों को प्रोत्साहित करने की बात कही। साहित्य के साथ-साथ उन्होंने हिंदी को कार्यकारिणी भाषा बनाने पर भी सरकार पर जोर देने की बात की।

सारस्वत अतिथि सुषमा मुनींद्र जी ने अपने वक्तव्य में कहा संभ्रांत परिवार हिंदी बोलने में झिझक अथवा शर्म  अनुभव करते हैं ,और अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना अपनी अनिवार्यता समझते हैं ।जबकि हिंदी में भी अब वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली समृद्ध हो चुकी है। शैक्षणिक सामाग्री के अनुवाद  कार्यों की ओर इन्होंने ध्यान दिलाने की बात कही और साथ ही कहा कि भाषा अवरोध नहीं है केवल स्वीकार्यता आवश्यक है कि हर कार्य अपनी ही भाषा में किया जाए।

कार्यक्रम का संचालन समकालीन कवयित्री, मुंबई से रीता दास राम ने किया एवं आभार रायपुर से कवि रूपेंद्र राज तिवारी ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में भोपाल सहित भारत के विभिन्न शहरों एवं विदेशों से भी लोग शामिल हुए। विशेष उपस्थिति रही श्री राजस्थानी सेवा संघ के मीडिया निदेशक श्री दीनदयाल मुरारका जी की। चांसलर डॉ सी वी रमन विश्व विद्यालय, अध्यक्ष आइसेक्ट विश्वविद्यालयों के संयुक्त शोध ग्रुप के विजय कान्त वर्मा जी की।

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