हाईवे (स्लोवेनियन कहानी): लिली पोटपरा

लिली पोटपरा
अनुवादक : आफ़ताब अहमद

व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क

लिली पोटपरा स्लोवेनियन साहित्य की एक प्रसिद्ध व पुरस्कृत लेखिका व अनुवादिका हैं। उनका जन्म 1965 में मारीबोर, स्लोवेनिया में हुआ। उन्होंने लुबलाना विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी भाषाओं में 1992 में स्नातक किया। वे स्लॉवेनियन भाषा से अंग्रेज़ी में और अंग्रेज़ी, सर्बियन, और तुर्की भाषाओं से स्लोवेनियन भाषा में फ़िक्शन और नॉन-फ़िक्शन दोनों प्रकार की रचनाओं का अनुवाद करती हैं। उनके कहानी संग्रह (Bottoms up stories) को 2002 में “प्रोफ़ेशनल एसोसिएशन ऑफ़ पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स ऑफ़ स्लोवेनिया” की तरफ़ से “प्राइज़ फ़ॉर बेस्ट लिटरेरी डेब्यू” पुरस्कार से सम्मानित किया गया। क्रिस्टीना रेयरडन द्वारा किये गए उनकी कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवाद “वर्ल्ड लिटरेचर टुडे” और “फ़िक्शन साउथईस्ट” , “दि मोंट्रियल रिव्यु” में प्रकाशित हो चुके हैं।
वर्तमान में लिली पोटपारा स्लोवेनिया के विदेश मंत्रालय में अनुवादिका के रूप में कार्यरत हैं। साथ ही स्लॉवेनियन भाषा में अनुवाद और साहित्य रचना का काम भी जारी है।

***
हाईवे लिली पोटपारा द्वारा लिखित स्लोवेनियन भाषा की कहानी है। लिली पोटपरा स्लोवेनियन साहित्य की एक प्रसिद्ध व पुरस्कृत लेखिका व अनुवादिका हैं। उनके कहानी संग्रह (Bottoms up stories) को 2002 में प्रोफ़ेशनल एसोसिएशन ऑफ़ पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स ऑफ़ स्लोवेनिया की तरफ़ से प्राइज़ फ़ॉर बेस्ट लिटरेरी डेब्यू” सम्मान से सम्मानित किया गया। प्रस्तुत अनुवाद मातीव्ज़ कर्सनिक और क्रिस्टीना रेयरडन के अंग्रेज़ी अनुवाद का अनुवाद है, जो अगस्त 2011 में  ‘The Montreal Review’ में प्रकाशित हुआ था।  अनुवादक) 

I

मैं तेज़ रफ़्तार से कार चला रही हूँ। अपनी दो कारबोरेटर वाली एयरकंडिशन्ड कार में बैठी, मैं गाड़ी की रफ़्तार को अपने शरीर में दौड़ रहे ख़यालों और जज़्बात की रफ़्तार से भी ज़्यादा तेज़ कर देना चाहती हूँ। लेकिन मैं उन्हें जैविक रूप से  अपने पेट, अपने सिर और अपनी बाहों में दौड़ता महसूस कर रही हूँ। मन में ख़याल उठता है कि यह एहसास ज़्यादा देर तक क़ायम नहीं रहेगा। यह रोमांचक अंतर्बोध कि जीवन का वाक़ई कोई अर्थ है, या यह कि मेरे जीवन का कोई विशेष उद्देश्य है  (यह उद्देश्य क्या है? उपर्युक्त अंतर्बोध के फ़ौरन बाद यह सवाल मेरे सीने में एक तीखा दर्द बन जाता है।) यह एहसास देर तक क़ायम नहीं रहेगा। दुःख और आनंद का यह एहसास देर तक क़ायम नहीं रहेगा। इस दुनिया से संपर्क भी देर तक क़ायम नहीं रहेगा। 

मैं क़ब्रिस्तान में क़ब्रों के बीच टहल रही हूँ। उन लोगों के नाम पढ़ती हूँ जो बहुत पहले मर चुके हैं। उन सबके लिए मुझे अफ़सोस होता है। तुम लोग इतनी जल्दी क्यों चली गईं?  मैं एक क़ब्र के पास खड़े होकर ऊँची आवाज़ में मायूसी से पूछती हूँ। यह एक छोटी सी क़ब्र है जिसपर तीन बच्चियों के नाम लिखे हैं। उनके एक ही सर-नेम हैं। एक संगमरमर पर तीन छोटे-छोटे चेहरे बने हुए हैं। मौत की तारीख़ों में कुछ ही दिनों का अंतराल है। मैं क़ब्र के गिर्द पड़ी छोटी बजरी पर नंगे पाँव चल रही हूँ और पत्थर मेरे नर्म तलुवों में चुभ रहे हैं। क़रीब की एक क़ब्र के ऊपर जीसस की एक विशाल मूर्ति है। उनके हाथों और पैरों में ज़ंग लगी कीलें ठुंकी हुई हैं। क्या इन्हें कुछ मालूम था? क्या आपको कुछ मालूम है?  मैंने ऊपर देखा और ध्यान से सुनने की कोशिश की, जैसे कि मुझे जवाब का इंतज़ार हो।     

मैं सोचती हूँ कि यह एहसास ज़्यादा देर तक क़ायम नहीं रहेगा।  रेडियो पर स्कॉटिश गायक डोनोवान की आवाज़ और कार की हल्की घरघराहट मेरे मन को एक झूठी शान्ति से भर देती है। सामने आसमान पर काले घने बादल छाये हुए हैं। मैं कार सीधे एक तूफ़ान की दिशा में चला रही हूँ। हालाँकि मैं दो गैस स्टेशनों से होकर गुज़री लेकिन कार में पेट्रोल डालना भूल गई। पेट्रोल स्टेशन भी मुझे याद नहीं दिला सके कि पेट्रोल ख़त्म हो रहा है। अब पीली रौशनी मुझे चेतावनी दे रही है कि पेट्रोल किसी भी समय ख़त्म हो सकता है। मैं एक्सेलेटर पर पाँव का दवाब कम करती हूँ। मुझे पक्का यक़ीन है कि जल्दी ही कोई स्टेशन आ जाएगा। मैं इस रोड के चप्पे-चप्पे से परिचित हूँ। 

बेटे को माँ के पास छोड़कर आना मेरे लिए मुश्किल था। पहले भी मैं उसे माँ के पास छोड़कर बाहर जा चुकी हूँ। लेकिन आज उसे छोड़ना ख़ास तौर पर मुश्किल लगा। मेरा प्यारा बच्चा! अब वह बहुत कुछ समझने लगा है। यहाँ तक कि पीकी,  हमारा पूडल (कुत्ता), मुझपर उछलता रहा और मुझे आने से रोकता रहा। मैं ढेर सारे चुम्मों और वादों— हम एक-दूसरे को फ़ोन करेंगे, वह मुझे ख़त लिखेगा, जितनी जल्दी मुमकिन हो सका मैं वापस आऊँगी— के बाद घर से निकली। लेकिन मुझे फ़ौरन वापस जाना पड़ा क्योंकि मैं कार से कार-सीट निकालना भूल गई थी। वह ड्राइववे में खड़ा था जैसे कि उसे मालूम हो कि मैं वापस आऊँगी। “मम्मी, कल काम के बाद वापस आ जाइए न, प्लीज़!” उसकी विन्तियों का अंदाज़ जो आम तौर पर ज़िद्दी और शरारतपूर्ण हुआ करता था, इस बार सचमुच में उदास और चिरौरीपूर्ण था। या कहीं यह महज़ मेरी कल्पना तो नहीं कि दुनिया ज़्यादा निष्कपट हो गई है, और यह कि लोग स्वभावतः अच्छे होते  हैं, या यह कि मैं जो कुछ कर रही हूँ वह लोगों की नीरसता और बुराई को मिटाकर उन्हें अच्छा, प्रसन्नचित्त और ताज़ा बना रहा है?  और बेहद तकलीफ़देह भी? अगर प्रेम सर्व-नाशक है तो क्या यह वाक़ई कुछ बदल सकता है? सब लोग मुझसे हमदर्दी रखते हैं और मुझसे सहयोग करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ़ वे मुझपर कड़ी नज़र भी रखते हैं कि मैं क्या करने जा रही हूँ। मैं चली जाऊँगी? या ठहरूंगी? यहाँ सिर्फ़ मैं हूँ जो कुछ कर रही हूँ। दूसरे लोग बस उन तमाशाइयों की तरह हैं जो मानो किसी इमारत की रेलिंग पर बैठी उस औरत को देख रहे हों जो आत्महत्या करने के बारे में सोच रही है। वे उसे देखते हैं और इंतज़ार करते हैं। कुछ लोग एक चादर पकड़े खड़े हैं। क्या वह कूदेगी? या नहीं कूदेगी? शर्त लगाओगे? कितने की? 

मुझे घर से निकलते समय डर महसूस हो रहा था। मेरा गला रुंधा हुआ था और मैं एक बुरे पूर्वाभास से पीड़ित थी। हर चीज़ बहुत तीक्ष्ण महसूस हो रही थी। मैंने इतना कम खाया था और इतना कम सोई थी कि मैं एक ऐन्टीना हो गई थी जो सूक्ष्म से सूक्ष्म फ़र्क़ को पहचान रहा था— मेरे आसपास के लोगों की आँखों की हर चमक को, हर अनकही सोच को।  

यह एहसास ज़्यादा देर तक क़ायम नहीं रहगा। मैंने ख़ुद को क़ायल करने की कोशिश की। दिल-ही दिल में यह इच्छा भी करती रही कि यह एहसास देर तक क़ायम रहे। यह मुझे अन्दर से चाहे जितना भी चीड़ फाड़ डाले, चाहे जितनी तकलीफ़  दे ले, अंततः सारे फ़रेब और सारे नाटकीय दिखावे, तमाम झूठ और बर्बादी, और सारे नैतिक ध्वन्सावशेषों के बाद भी, जिनका सामना मुझे दर्पण में करना पड़ता है, मेरे जीवन में एक व्यवस्था होगी और मैं अपने लिए कुछ कर सकूँगी, और ऐसा करते समय दूसरों के लिए भी कुछ कर सकूँगी। सच्चे मन से। मैं अब ख़ुद को अच्छी लगने लगी हूँ, हालाँकि मुझे नहीं मालूम कि अगले दो मिनट में मैं क्या महसूस करूँगी।  

मैं उन दोनों को कनखियों से देखती हूँ। वे सड़क की पटरी पर एक डफ़ल बैग पर उस जगह बैठे हैं,  जहाँ स्थानीय सड़क हाईवे से मिलती है। उनमें से एक मुझे देखकर खड़ा हो जाता है, और अंगूठा हिलाकर लिफ़्ट माँगता है। मैं फ़र्राटे से आगे निकल जाती हूँ। दाहिना ब्लिंकर ऑन है। फिर मैं ब्रेक लगाती हूँ। ABS (एंटी-लॉक ब्रेकिंग सिस्टम) को चेक करने के लिए मैं तेज़ ब्रेक लगाने से डरती हूँ। मैं रिवर्स गियर में उनकी तरफ़ पीछे लौटती हूँ। वे मुस्कुराते हुए कार की तरफ़ दौड़ते हैं। 

“मैम, आप कहाँ जा रही हैं?” आदमी हाँफते हुए पूछता है। लड़की कुछ क़दम पीछे है।

“लुबलाना।”

“हम भी वहीं जा रहे हैं! हम आपके साथ चल सकते हैं?”

“ज़रूर। बैठ जाइए।”

मैं रियरव्यू मिरर में देखती हूँ। औरत पिछली सीट पर बैठ रही है। उसने डफ़ल बैग को मेरे सीट के पीछे ठूँस दिया है। अचानक मुझे कोई चीज़ परेशान करने लगती है। मेरे अन्दर कोई आवाज़ कहती है कि ये दोनों लुबलाना नहीं जा रहे हैं। 

मैं गाड़ी चलाती रहती हूँ और म्यूज़िक की आवाज़ धीमी कर देती हूँ। मैं अपने दाहिनी तरफ़ देखकर मुस्कुराती हूँ और शांतिपूर्ण आवाज़ में कहती हूँ: “आप मुझे लूटेंगे तो नहीं?  मेरी कार तो नहीं छीन लेंगे? मार तो नहीं डालेंगे न?”

दोनों हँसते हैं। मुझे लगता है कि वे कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से हँस रहे हैं।  

“नहीं, हम ईमानदार इंसान हैं। मैं ईमानदारी की कमाई खाता हूँ। मेरा धंधा साफ़-सुथरा है, इस दुनिया में बहुत ज़्यादा बेईमानी है। लेकिन आप यक़ीन कीजिये हम वाक़ई में ईमानदार हैं। हम मारीबोर में परिवार के साथ थे। क्या आप भी मारीबोर में थीं?”

मैं हर उस शब्द को गिनती हूँ जिसका मूल ‘ईमान’ है। मैं रियरव्यू मिरर में झाँकती हूँ: लड़की बैठी है और बाहर देख रही है। मैं सोचती हूँ कि शायद मेरा दिमाग़ ख़राब हो गया है। लेकिन कुछ गड़बड़ लगता है। कोई बात मुझे परेशान कर रही है। जब आदमी बोलता है तो कोई चीज़ मुझे बेचैन करती है: 

“आप ऐसे सवाल क्यों कर रही हैं? क्या हम आपको ईमानदार नहीं दिखते? क्या आपके साथ कुछ हुआ है?”

“नहीं, कुछ नहीं हुआ। मेरे साथ क्या हो सकता है? मैं सिर्फ़ अपनी तसल्ली के लिए पूछ रही थी,” मैं एक आश्वस्तपूर्ण मुस्कान के साथ कहती हूँ। वे हाँ में हाँ मिलाते हुए हँसते हैं। “बात यह है कि मैं आपको अपनी कार में बिठाकर एक जोखिम मोल ले रही हूँ। लेकिन यह मेरा फ़ैसला है। आपकी जो मर्ज़ी हो वह आप करें। मैं बहादुर हूँ।” थोड़ी देर तक हम ख़ामोश रहते हैं।

“ आपकी कार बढ़िया है, बहुत ही बढ़िया, आरामदेह,” वह पसंदीदगी से सिर हिला कर कहता है।

“हाँ, यह वाक़ई आरामदेह है। बहुत अच्छी है।

हम कुछ क्षण चुप रहते हैं। मैं पीली रौशनी को देख रही हूँ। “हमें पेट्रोल के लिए रुकना पड़ेगा,” मैं लगभग ख़ुद से कहती हूँ। मुझे लगता है हम तीनों में ज़्यादा बात नहीं होगी।  आख़िर मैंने इन्हें कार में बिठाया ही क्यों? मुझे शान्ति चाहिए, न कि राह चलते अजनबी। आख़िर मुझे इनकी क्या ज़रुरत है? मैं लड़की के झुके हुए शरीर को सावधानी से देखती हूँ। वह अब डफ़ल बैग को गोद में लिए हुए बैठी है। उसके दोनों पैर सटे हुए हैं। चेहरा काला है। मैंने देखा कि आदमी भी बहुत काला है। पहले मैंने ध्यान नहीं दिया था। मेरे ख़याल से हमें बात करनी चाहिए। 

“आप दोनों क्या काम करते हैं? और आप लुबलाना क्या करने जा रहे हैं?”

लड़के की आँखों के अंदाज़ से मुझे लगता है कि वह लड़की की आँखों में देखना चाहता है। लेकिन वह पीछे बैठी है। वह मुड़ता नहीं, और मेरी तरफ़ देखता है।

“कोई ख़ास काम नहीं। जो भी करने को मिल जाए। बस यह समझ लीजिए कि ईमानदारी का कोई काम। बस थोड़ा सैर-सपाटे के लिए हम लुबलाना जा रहे हैं। इसीलिए तो यह डफ़ल बैग लाए हैं। हल्का-फुल्का सैर-सपाटा करेंगे।” वह धीरे से हँसता है। मैं भी हंसती हूँ, हालाँकि मुझे हँसने की कोई वजह नहीं नज़र आती। मुझे लगता है कि यह घबराहट भरी हँसी है।  

“पेट्रोल पम्प! मैं गाड़ी रोक रही हूँ। पेट्रोल बिल्कुल नहीं बचा है,” मैं बड़बड़ाती हूँ।   

मैं हरे पम्प के सामने गाड़ी रोकती हूँ। कार से निकलने पर मुझे एहसास होता है कि मैंने गाड़ी ग़लत पम्प के सामने रोकी है। मुझे अब पेट्रोल डालने का पाइप कार के ऊपर से खींचकर लाना होगा। आख़िर मुझे क्यों कभी याद नहीं रहता कि टैंक किस तरफ़ है? मैं लगभग ग़ुस्से से सोचती हूँ। आदमी अभी भी धीमे-धीमे मुस्कुरा रहा है। वह मेरी मदद करना चाहता है। इधर कुछ दिनों से हर कोई मेरी कुछ न कुछ मदद करना चाहता है। “नहीं, शुक्रिया। मैं करलूँगी।” मैं कार से थैला बाहर निकालती हूँ। इग्निशन से चाबी निकालती हूँ, हालाँकि मैं इलेक्ट्रॉनिक बटन से कार के अन्दर से ही टैंक को खोलती  हूँ। गन्दा कोलतार मेरे पैरों में लग जाता है। लम्बी पोनीटेल और हिन्दुस्तानी लिबास में मैं ख़ुद को हिप्पी महसूस करती हूँ। नक़ली हिप्पी। मैं महसूस करती हूँ कि लोग मुझे अजीब नज़रों से देख रहे हैं। मैं आधा टैंक भरती हूँ। अन्दर झांकती हूँ। मुझे मालूम है कि इस कोण से वह आदमी मुझे नहीं देख सकता, लेकिन मैं उसे देख सकती हूँ। वह लड़की की तरफ़ मुड़ा हुआ है और वो दोनों उत्तेजनापूर्वक बात कर रहे हैं। वह अपनी सीटबेल्ट तक हाथ ले जाता है। वह बेल्ट खोलने वाला ही है कि हाथ हटा लेता है। मैं महसूस  कर रही हैं कि मेरे हाथ काँप रहे हैं। कोई गड़बड़ ज़रूर है। मैं घूमकर कार के दूसरी तरफ़ जाती हूँ और उसका दरवाज़ा खोलती हूँ। “सब ठीक तो है?” मैं पूछती हूँ।

वह दांत निकोसता है: “हाँ, सब ठीक है। कुछ भी ग़लत नहीं। मैम, आप चिंता न करें। हम ईमानदार हैं, सचमुच! लड़की धीमे से मुस्कुराती है। उसके हाथ उसकी गोद में हैं। 

मैं कुछ सोच नहीं रही हूँ, लेकिन तभी अचानक मैं अपने को यह कहते सुनती हूँ: “आप जाइए बिल पे करके आइये। और रसीद मुझे दीजिए।”

“ठीक है, बहुत अच्छा।” जल्दी से वह बेल्ट खोलकर कार से बाहर निकलता है। वह पैसे लेकर जाता है। मैं उसे जाते हुए देखती हूँ और पिछला दरवाज़ा खोलती हूँ। यह सिर्फ़ बाहर से खुल सकता है। सुरक्षा के कारण ताकि चलती हुई कार से बच्चा बाहर न गिर पड़े। क्या लड़की को यह बात मालूम है? 

दो काली आँखें मुझे घूरती हैं। “सब ठीक तो है?” मैं मुस्कुराते हुए सवाल दोहराती हूँ।

“सब ठीक है,” वह आश्वस्त करने वाली मुस्कान के साथ सर्बियन में कहती है। 

“तो फिर मेरे पेट में दर्द क्यों हो रहा है? और मेरे हाथ क्यों काँप रहे हैं? ऐसा क्यों है? आप मुझे  इसके बारे में कुछ बता सकती हैं?”

“शायद आपकी माहवारी शुरू हो गई हो,” वह सर्बियन मैं कहती है और विनम्रता से कंधा उचकाती है। वह मुझे कुछ अजीब नज़रों से देखती है। लगभग सहमी हुई।

“कुछ गड़बड़ है।” मैं दोहराती हूँ और उसे देखती हूँ। 

“शायद आपको सर्दी लग गई हो। लेकिन आपका कपड़ा सुन्दर है, बहुत सुन्दर।” उसकी नज़रें मेरे नंगे पैर पर पड़ती हैं।

“नहीं, मैं कुछ और कह रही हूँ,” मैं उस भाषा में कहती हूँ जो वह ज़्यादा बेहतर समझती है। “जबसे आप लोग मेरी कार में बैठे हैं, मेरे यहाँ दर्द हो रहा है,” मैं अपने पेट की तरफ़ इशारा करते हुए कहती हूँ। मेरे चेहरे पर अभी भी एक आश्वस्तपूर्ण मुस्कान है। क्या मुझे सचमुच में कुछ मालूम है या यह सब मेरी कल्पना में हो रहा है?  मेरे साथ क्या हो रहा है? ये सवाल मेरे मन में बार-बार उठ रहे हैं। तभी मुझे उसके चेहरे पर घबराहट नज़र आती है, जो दरअसल एक सुन्दर और सुखद रूप से शांत चेहरा है। वह मेरे कंधे के पीछे आदमी को आते हुए देखती है। मैं देखती हूँ कि आदमी की जीन्स बुरी तरह गन्दी है, और उसके होंठ बहुत सूखे हुए हैं। रसीद मेरी तरफ़ बढ़ाते समय उसके चेहरे पर एक ऐंठी हुई मुस्कान है। लड़की पहले ही उठने लगी है। 

“हनी, बैग पकड़ो, यह औरत ठीक नहीं है।” बैग तेज़ी से बाहर आता है। चेहरों के भाव पूरी तरह बदल चुके हैं । घबराहट और धमकी के मिश्रण भरा भाव। तभी काले बालों वाली लड़की रुककर ज़ोर से फुंफकारती हुई कुछ कहती है। पहले तो मैं नहीं समझ पाती। मैं उन्हें देखती हूँ और नहीं जानती कि क्या करना चाहिए। तभी अचानक मुझे एहसास होता है कि कौन सा शब्द बार-बार दोहराया गया है। “चुड़ैल!” वह चीख़ती है। “पागल चुड़ैल!” मैं देखती हूँ कि आदमी उसे बाहें पकड़कर खींच रहा है, लेकिन वह पीछे मुड़-मुड़कर मुझे गालियाँ दे रही है। वह गंदे कोलतार पर थूकती है। 

मैं व्हील के पीछे बैठ जाती हूँ। रेडियो पर डोनोवान का गाना लगाती हूँ और इग्निशन स्टार्ट करती हूँ। फिर काफ़ी दूर से उनके गर्द चक्कर लगाकर कार घुमाती हूँ। मैं कार पूरी रफ़्तार से भगाती हूँ। कुछ देर तक मेरा दिमाग़ बिल्कुल सुन्न है और मैं कुछ नहीं सोच पाती। 


II

मैं धीरे-धीरे कार चला रही हूँ।  एक के बाद दूसरे परिदृश्य पीछे छूटते जा रहे है। मैं पहाड़ियों के ऊपर के सारे गिरजाघरों को नहीं देख सकती।  एक के बाद एक हरियाली आती है और पीछे छूट जाती है। मैं सिर्फ़ सुस्त-रफ़्तार गाड़ी चालकों से आगे निकल पाती हूँ। मुझे कोई जल्दी नहीं। अगर कुछ करना चाहूंगी भी तो वह यह होगा कि कहीं रुकूँ, किसी पेड़ के नीचे सिग्रेट पियूँ और बस वहीं बेमक़सद बैठी रहूं। एक हफ़्ते बाद मैं अपने बच्चे को वापस लेने जा रही हूँ। वह हफ़्ता जिसके दौरान मुझे दुनिया बदलनी थी। मेरी दुनिया। छोटी सी दुनिया, जिसके बारे में सात दिन पहले मैं सोचती थी कि एक कीचड़ की दलदल से यह एक सुन्दर,  धूपीले हरे-भरे मैदान में बदल सकती है।   

अब मेरे अन्दर कोई उल्लासोन्माद नहीं रहा। अब मैं एक भी हिचहाइकर को गाड़ी में नहीं बिठाती। मुझे अब कोई दर्द नहीं है। कैनवस के जूते में, एक्सेलेटर पर, मेरे पैर का दवाब बहुत हल्का है, और मेरे मन में विचार कार की तरह सुस्त-रफ़्तार हैं।

मन में बार-बार एक विचार उठता है और आगे की ओर धक्का मारता है। सच्चाई का कोई फ़ायदा नहीं। मुखौटे उतार के फेंक दो और ख़ुद को ज़िन्दगी के हवाले कर दो। अपने आसपास की सारी चीज़ों में घुल-मिल जाओ और कल्पनाओं में खो जाओ। और जब तुम इतने नग्न और अनावृत्त हो जाओ कि नए युग के किसी ईसा मसीह की तरह नंगे पैर यहाँ-से वहाँ फिरने लगो,  तब तुम पूरी तरह असुरक्षित हो जाओगे—चोट खाने योग्य। फिर तुमको बिल्कुल वही लोग पीड़ा देंगे जिनके लिए तुम्हारा दिल दुखता  था, जिन्हें तुम हमेशा अपने से पहले रखते थे। क्या मुझे कुछ मालूम है? मैं धीरे-धीरे गाड़ी चलाती जाती हूँ और मीलों आगे निकल जाती हूँ। 

सच्चाई का कोई फ़ायदा नहीं। मुझे इसका क्या करना है? अभी सबको सब कुछ मालूम है, और सब बेहद चालाक हैं। सिर्फ़ मुझे अब कुछ भी नहीं मालूम। अब मुझे कोई आशंका या पूर्वाभास नहीं है। मैं रेडियो बंद कर देती हूँ।  डोनोवान का गाना अब मेरे लिए असहनीय हो रहा है। उसकी शानदार आवाज़, आवाज़ की थरथराहट, कंपन-प्रभाव,  हर चीज़ से मुझे उलझन हो रही है।    

मेरा बेटा ड्राइववे में मेरा इंतज़ार कर रहा है। अपने स्वाभाव के अनुसार, मुझसे मिलते ही वह कहता है कि उसे प्यास लगी है। “मम्मी, जूस!” मैं कार से बाहर निकलती हूँ और ऊपरी मंज़िल पर उसके लिए जूस लेने जाती हूँ। 

“मेरा डफ़ल बैग पहले से ही भरा है,” वह मुझे बताता है। “मैंने और नानी ने मिलकर घोंघे पकड़े। लाखों घोंघे!”

“अरे वाह! तुमने उनमें नमक लगाया?”

वह उत्साह के मारे काँप रहा है:

“हमने उनमें मसाला लगाया और अब हमारे पास घोंघे का सूप है!”

“वाह दोस्त, क्या बात है! क्या वे मर चुके हैं?”

“सब-के-सब मर चुके हैं! पानी पीला हो गया है। आप देखेंगी?”

“हाँ हाँ ज़रूर। हम हाथ पकड़े हुए घर के पीछे जाते हैं। घोंघे का सूप एक प्लास्टिक बैग में है। “लाखों” पिसे हुए और मरे हुए घोंघे। मुझे उलटी आ रही है, लेकिन मैं किसी तरह रोक लेती हूँ।

मैं अपनी माँ से विदा लेती हूँ। रोबोट की तरह उनकी सारी मदद के लिए उनका शुक्रिया अदा करती हूँ। वे मुझे देखती हैं। अभी हमारी बातचीत हुए  सिर्फ़ एक हफ़्ता गुज़रा है। फिर सब कुछ वैसे का वैसा है। वे कुछ नहीं पूछतीं, और मैं इसके लिए उनकी कृतज्ञ हूँ।  

मैं धीरे-धीरे गाड़ी चला रही हूँ। मुझे अपना ख़याल रखना है। इतने सारे लोगों को मेरी ज़रुरत है— मेरा बेटा, माँ, भाई, पिता, नानी। मुझे कुछ नहीं होना चाहिए। मेरा पति भी कहता है कि उसे मेरी ज़रुरत है। और यह कि वह मेरे बिना ज़िन्दा रह नहीं सकता। और यह कि उसे मुझसे प्यार है। हर कोई मुझे इतना पसंद करता है कि मुझे सुरक्षित, घुटन भरी दलदली कीचड़ में रोके रखने की भरपूर कोशिश कर रहा है।  लेकिन मैं अपनी ज़िन्दगी में वापस जा रही हूँ, और मैं एक या दो जगह और रुकूँगी। 

मैं उसे सड़क की पटरी पर उस जगह देखती हूँ, जहाँ स्थानीय सड़क हाईवे से मिलती है। “मेरे नन्हे दोस्त, क्या हमें एक हिचहाइकर को कार में बिठाना चाहिए?”  

“जी मम्मी, अगली सीट पर, आपकी बग़ल में काफ़ी जगह  है।” बिल्कुल सही, काफ़ी जगह है। एक ख़ाली सीट, जो मुझे दर्द देना चाहती है, जिससे मैं कुछ कहना चाहती हूँ। लेकिन कुछ कहने को है नहीं।   

“हेलो, मैम,” एक अस्त-व्यस्त छोटे सिर वाली लड़की कहती है। “क्या आप लुबलाना जा रही हैं?”

“हाँ, बैठो, बेल्ट बाँध लो।”

फिर हम बात करते हैं कि वह क्या पढ़ती है, कहाँ रहती है, वह स्टाइरिया के इलाक़े में क्या करती है?  वह मेरे बेटे से हँसी-मज़ाक़ करती है। वे दोनों गपशप करते हैं। वह उसे बताता है कि नानी के घर पर उसे कैसा लगा, कैसे उन्होंने घोंघे पकड़े (वे इतने धीरे-धीरे चलते हैं कि आपके पास से भाग नहीं सकते! हा, हा!)

मैं गाड़ी चलाती हूँ। अच्छी तरह, धीरे-धीरे और सुरक्षित। मैं टोल स्टेशन से गाड़ी को फ़ास्ट-लेन में डालती हूँ। ‘इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन यूज़र्स ओनली।’ घर क़रीब आ रहा है। कुछ नहीं बदला। कुछ भी नहीं।

***

अनुवादक: डॉ. आफ़ताब अहमद

वरिष्ठ व्याख्याता, हिंदी-उर्दू, कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क


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