काव्य: अशोक बाजपेयी 'सजल'

अधरों में ज्वाला जलती है

परिचय पूरा दिया न तुमने, यादें फिर क्यों आती हैं?
जब-जब यादें करवट लेती, घटा सावनी छाती है।
चक्रवात सी उमड़ी पीड़ा, ठहर नहीं अब पाती है।
कैसे बाँचू व्यथा कथा को, वाणी भी शरमाती है।
परिचय पूरा दिया ना तुमने, यादें फिर क्यों आती है?
नील गगन की इंदु - रश्मियाँ हृदय दग्ध  कर जाती हैं।
जाने कितने शलभ जलाकर दीपशिखा मुस्काती है।
स्वाति बूंद बिन चातक की! प्यास कहाँ बुझ पाती है?
परिचय पूरा दिया ना तुमने, यादें फिर क्यों आती हैं?
दैहिक दैविक भौतिक पीड़ा, तत्क्षण विराम पा जाती है।
हो यदि मिलन क्षणिक चाहे . जब अंतिम बेला आती है '।
'सजल' नयन हैं प्यासे,अधरों में ज्वाला जलती है।
***

प्रिये! न आना फिर यादों में।

घुट घुट कर चीखे जिजीविषा, जीने का अधिकार मुझे दो।
जीवन के तपते मरुस्थल में, प्यास समेटे रहा भटकता।
आतप पीड़ित होठों को, नहीं सुधा तो गरल पिला दो।
जीने का अधिकार मुझे दो!
नहीं किसी से कुछ भी चाहूं, अरि को भी मैं अपना मानूँ।
लक्ष्य भ्रांत, पथ पर आने दो, जीने का अधिकार मुझे दो।
गन गर्जन चपला चमके .साधें हवन कुंड में जलती।
अभिनव धूम जरा उठने दो, जीने का अधिकार मुझे दो।
खाली गागर उर दाहकता, संयम, शुचिता भाव उमड़ता।
प्रिये! न आना फिर यादों में, मुझे देशहित डट जाने दो।
जीने का अधिकार मुझे दो।
***

जगा दे जीवन दीप महान 

दीजिए चरणों में स्थान, हे! पवन पुत्र हनुमान।
मातु अंजनी तुझको जाया, बल में तुझको किसने पाया?
शिव का तुझ में अंश महान, दीजिए चरणों में स्थान।
रामकथा तुझसे रस पावे, योगी मुनि जन तुझको ध्यावे।
बल बुद्धि में तू अमित महान, दीजिए चरणों में स्थान।
भूतादिक, शनि,रावण हारे, कँपे विश्व जब तू हुंकारे।
तेरे वज्र अंग बलवान, दीजिए चरणों में स्थान।
नाम लेत निर्भयता आवे, रोग शत्रु क्षण में मिट जावे।
तू हर युग में मूरतमान, दीजिए चरणों में स्थान।
'सजल' हृदय में तेरा डेरा, क्यों ना भागे दूर अंधेरा?
जगा दे जीवन दीप महान, हे! पवन पुत्र हनुमान॥
***          


आप लीलाधार हैं

आप तो मनुज नहीं, प्रसिद्ध धर्मावतार हैं।
वेद और शास्त्र सब आप में साकार हैं।
कथन है महान पर आचरण कुछ और, 
इंद्रिया रसलीन किंतु विरक्त हैं, प्रचार है।
तिलक चंदन भाल पर, आंख रूपसि पर गड़ी।
'परदारेषु मातृवत', केवल मंच से उच्चार है।
कंठ से वैराग्य शिक्षा पर अर्थ चिंतन कर रहे।
'ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या 'वाणी का व्यापार है।
वेदांत 'दर्शन 'वेद, गीता, ब्रह्म शक्ति आप हैं।
बाजीगरी में सिद्धहस्त, महिमामंडित अपार हैं।
पंक मैं आकंठ डूबे, हर हर गंगे होठ से उवाच है।
'सजल' आँखें देखती हैं, सच आप लीलावतार हैं।
***

         
कैसे होली पर्व मनाये?

आज वेदना पूरित जन मन, उर उपवन पतझर मुस्काए।
उदित हुआ पश्चिमी सूरज .अर्थ खो रही आज प्रथाऍ।
राहु ग्रसित लगते सब रिश्ते, दुख में साथ न अपना भाई।
अंजुरी भर स्नेह मिले कैसे? कलयुग की छाई परछाई।
कोल्हू बैल बना है मानव, अर्थवाद का असुर रुलाए।
निर्लज्ज घूमते पापाचारी, नहीं सुरक्षित हैं बालाएं।
ईर्ष्या कटुता और स्वार्थ की, दिल में जलती है ज्वालाऍ।
उल्लास नहीं अंतर्मन में, कैसे होली पर्व मनाए?
***


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