घनीभूत होने की पीड़ा: ग्लेशियर-गाथा

चंद्र मोहन भण्डारी

इंसान की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी भाषा है जिसकी वजह से वह वहाँ पहुँच सका जहाँ आज वह है। उपलब्धि संभवत: उसकी अपनी न होकर उन प्रक्रियाओं की है जिनके चलते जैविक विकास के तहत उसे एक विकसित मस्तिष्क मिल सका जिसमें प्रावधान था भाषाई ताना-बाना निर्माण करने का, और वह उसने बखूबी किया; प्रावधान और भी कई बातों का था: भाषा में अलंकारों का प्रयोग, अमूर्त चिंतन, गणित की सशक्त अमूर्त भाषा के विकास की संभावना - इन सबने मिलकर उसे बहुत कुछ दिया और कुछ उसने भी किसी हद तक खुद के प्रयासों से हासिल किया। यह भाषाई ताना-बाना उसकी जिंदगी के ताने-बाने में पूरी तरह घुल मिल गया जिसमें सभी कुछ था उसके कड़वे-मीठे अनुभव, आशा-निराशा, सुख-दु:ख; और उसका उत्कट अनुभव – जो कभी बह निकला आँसू बनकर [1]:

जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई
दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।

कवि ने जिस बिम्ब-विधान का प्रयोग किया वह अपने व्यापक संदर्भ में मन को एक उड़ान पर ले जाता है। कविता की यही खूबी है जो कवियों एवं पाठकों को तो रास आती ही है कभी वैज्ञानिक मन को भी अपनी ओर आकर्षित करती लगती है। तभी तो विश्व के धुरंधर विज्ञान-मनीषियों में एक नील्स बोर [Niels Bohr] कह उठे:

सूक्ष्म कण जैसे परमाणु के स्तर पर भाषा का प्रयोग केवल वैसे ही होना चाहिये जैसा कि कविता में।[2]

उन्होंने यह बात आधुनिक विज्ञान की सशक्त भाषा क्वांटम भौतिकी के लिये कही जो सूक्ष्म जगत की समझ के लिये निहायत जरूरी है और जहाँ अपने बिम्ब विधान हैं जो कई बार सामान्य समझ के परे प्रतीत होते हैं। दरअसल क्वाटम भौतिकी गणित का ही एक अति विशेष रूप है- सशक्त, सामान्य समझ के परे और अमूर्त।

हाँ पर दो बातें साफ नजर आती हैं पहली यह कि वैज्ञानिक बोह्र साहब उतने बोर किस्म के इंसान नहीं थे जितने वैज्ञानिक अक्सर हो जाया करते हैं। यही उनकी खूबी थी कि एक ओर वे कविता के साथ आधुनिक विज्ञान का रिश्ता जोड़ने की बात कर रहे थे दूसरी ओर उनमें वह ठोस तार्किक पकड़ थी जिसने आइंस्टाइन सरीखे विज्ञान-मनीषी से आधुनिक विज्ञान के कतिपय मूल बिंदुओं पर असहमति जताई। दोनों धुरंधरों के बीच करीब बीस सालों तक चली वह तीखी बहस जब अपने मूल निष्कर्ष तक पहुँची अंतत: बोर साहब की ही बात सही साबित हुईं और आइंस्टाइन को अपनी भूल स्वीकारनी पड़ी।

चर्चा घनीभूत पीड़ा की हो रही थी, और विज्ञान तक चली गई। बात भी कभी कहाँ से कहाँ पहुँच जाती है पता नहीं चल पाता और जब पता चलता है तब हमें अनेक इन्द्रधनुषी रंग दिखने लगते हैं कई रूपों, आकृतियों एवं आयामों में [3]:

नीचे जल था ऊपर हिम था एक तरल था एक सघन
एक तत्व की ही प्रधानता कहो उसे जड़ या चेतन।

बात शायद ग्लेशियर की हो रही है कवि को हिम व जल, जड़ व चेतन के पर्याय लगते हैं, जड़ इसलिये कि उसमें स्थिरता है गति नहीं, या है भी तो नहीं के बराबर, दूसरी ओर चेतन में गति है बहाव है। हिम जल का  घनीभूत रूप है जो द्रवीभूत होकर बह निकलता है कभी आँसू-रूप होकर, कभी अन्य रूप में। आप कवि से बहस नहीं कर सकते उसे जो लगा कह दिया आपको भी उसमें अपने मन-अभ्यंतर की गूंज सुनाई पड़े तब कवि महोदय का धन्यवाद करना न भूलिये। वैसे तर्कदृष्टि से देखें तो कुछ उलझन सी लगती है। हिम जल का घनीभूत रूप है लगता तो सच है लेकिन हिमखंड जल पर तैरता रहता है अगर घनीभूत होता तो डूब जाता। घनीभूत होने पर घनत्व बढ़ेगा। यानि जल हिम की तुलना में ज्यादा घनीभूत है। तब फिर क्या करें। इसीलिए मैंने शुरू में ही कहा कि कवि से बहस नहीं हो सकती।

घनीभूत विराट

उत्तराखंड में बिनसर और कौसानी से अद्भुत है हिमालय-दर्शन, कालिदास का देवतात्मा हिमालय; इस भूमि की आशा, आकांक्षा का प्रतीक, भारतीय संस्कृति को पहचान देता, अपने ग्लेशियरों से प्रवाहित नदियों से अभिसिंचित भूखंड को समृद्धि प्रदान करता। मन की आंखों से मुझे सामने ग्लेशियर नजर आता है जिससे द्रवीभूत होकर सरिता प्रवाहमान होती है। कितना गहन एवं सार्थक प्रतीक है यह ग्लेशियर संचित घनीभूत जल का। यह संचित घनीभूत जल है जो दुर्दिन आने से रोकता है सरिता के प्रवाह की निरंतरता बनाये रख कर। इतना ही नहीं संचय-प्रक्रिया में हिमपात के समय उस विनाशकारी बाढ़ से भी निजात दिलाता है जो घनीभूत हिमरूप होने के कारण टल जाती है और तब द्रवित होकर जीवनदायी जल प्रदान करता है जब उसकी सबसे ज्यादा जरूरत हो।

ग्लेशियर में घनीभूत तरल का यह संचय किसी कंजूस के खजाने का का संचय नहीं जो देने के लिये कभी खुले ही नहीं।  यह तो मां का शिशु के लिये छुपाकर रखा धन है जो वक्त पर ही बाहर आता है वैसे ही जैसे हिम-सरिताओं का प्रवाह ग्रीष्म ऋतु में भी उपलब्ध रहता है।

बात घनीभूत जल की हुई है जो हिम स्वरूप है बात घनीभूत पीड़ा की भी हुई जिसने आँसू रूप बरसकर दु:ख का समंदर भर दिया और शायर महोदय को लगा [4]:

समंदर कह दिया नाहक सबने इसको कह कह कर

हुए थे कुछ जमा आँसू मेरी आंखों से बह बह कर।

 

एक ग्लेशियर  अंदर भी

एक ग्लेशियर मेरे सामने है हिमालय की गोद में; हिमालय मेरे मन में भी तो है स्मृति रूप ग्लेशियर को अपने सीने से लगाए। जो मेरे मन में है औरों के मन में भी होगा। इन्हीं में अवचेतन और अचेतन की गहन परतों में रिस-रिस कर आता रहता है द्रवीभूत तरल –कभी प्रेरणा रूप, कभी स्वप्निल भावावस्था में संकेत देता और कभी सृजन-क्षणो़ं में अनायास बहता हुवा तभी तो कवि मन कह उठता है [5]:

वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान

निकल कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।

लेकिन एकदम अनजान भी नहीं जरा गौर से देखो तो पता लगेगा कि घनीभूत भावों का द्रवीभूत प्रवाह होना स्वाभाविक ही था। ऐसा जब होता है रचनाकार को लगता है उसने बस लेखनी चलाई सारी बात खुद-ब-खुद सामने आ गई। सरिता को क्या मालूम कि इतनी गर्मी में भी खुद-ब-खुद यह जलराशि कैसे चली आ रही है। कभी बातचीत संभव हुई तो समझाने का प्रयास करूंगा। 

सिकुड़ते ग्लेशियर

आजकल चर्चा में है कि ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी हिमरेखा पीछे  खिसकती जाती है। गंगोत्री ग्लेशियर हो या कोई और, उत्तरी ध्रुव हो या दक्षिणी, हर कहीं हिम रेखा खिसक रही है औेर घनीभूत अब द्रवीभूत होता जा रहा है। वैश्विक ताप का बढ़ना जारी है और यही हाल रहा तब मौसम में बदलाव, सागरीय जल स्तर बढ़ जाने से तटीय भागों का जलमग्न होना यह सब तो है ही पर उन सरिताओं का क्या होगा जो ग्लेशियरों से अवतरित होती आई हैं। जब भारी बारिश होगी तब बाढ़ की तबाही और जब नहीं होगी तब सूखे की मार। वह धीरे-धीरे बारहों मास जल आपूर्ति की बात इतिहास बन चुकेगी और बच्चे किताबों में पढ़ेंगे कि कभी ऐसी सरिताऐं भी होती थीं जिनमें जल-प्रवाह निरंतर बना रहता था।

बात अंदरूनी ग्लेशियर की 

ग्लेशियर हमारे मन-अभ्यंतर में भी विद्यमान हैं अवचेतन व अचेतन की गहन परतों में, जहाँ घनीभूत अवस्था में संचित हैं स्मृतियां। वह जो अंदर का घनीभूत स्मृति रूप ग्लेशियर है कठिन पलों में साथ देता आया है कभी प्रेरणा-स्रोत रहता आया है और जो सृजन पलों को भी जब-तब अस्तित्ववान करता आया है वह भी तो मुश्किल दौर से गुजर रहा है। हमारे चारों ओर से हमें घेरे एक भौतिक पर्यावरण है जिसके प्रदूषण और उससे होने वाली संभावित हानि के बारे में अक्सर चिंता होती है। जरा सोचें हमारा मन भी तो चारों ओर से एक सूचना-मंडल से घिरा है जिसमें शामिल हैं समाज, देश, विश्व और अपने पूरे वैविध्य में फैला मीडिया-तंत्र। यह मन का पर्यावरण भी तेजी से प्रदूषित होता आ रहा है और जिसके दुष्प्रभावों से अधिकतर लोग अनजान हैं।

मन के पर्यावरण की बात हुई है जिसे प्रदूषित करने से रोकना उतना ही मुश्किल लगता है जितना सामान्य पारम्परिक पर्यावरण को, और इस दिशा में  मीडिया की अपनी भूमिका प्रभावी हो जाती है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर अपरिपक्व मानव मन घिरा हुवा है ऐसे ही अन्य मनों के सैलाब से और आज संचार के आधुनिक साधनों की वजह से एक दूसरे के बीच संप्रेषण की रफ्तार कितनी तेज हो सकती है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। तरह तरह के खेमों मे बंटे इंसान, वाट्सऐप, यूट्यूब या सामान्य इंटरनैट के जरिये मिनटों में चित्र, वीडियो प्रसारित करने में सक्षम है  जो  सही या ‘फेक’ या  उनके मिश्रण हो सकते हैं और एक उन्माद के हालात पैदा कर सकते हैं और करते आ रहे हैं। एक उदाहरण लेंगे: कुछ लोग महाराष्ट्र के ग्रामीण अंचल में भटक गये थे वे सही मार्ग की जानकारी हेतु कुछ लोगों से पूछताछ करते देखे गये और इसी दौरान गुमशुदा बच्चों की खबर के साथ मिलकर उनकी उपस्थिति शक के घेरे में आ गई। कुछ ही समय में वाट्सऐप संदेश प्रसारित होने लगे जो उन लोगों पर बच्चों के अपहरण करने का शक प्रस्तुत करते थे। सौभाग्यवश कुछ समझदार लोगों ने हालात को भांप लिया और उनको खतरे से बचा लिया अन्यथा उन्मादी भीड़ से बचना मुश्किल हो जाता। कई स्थानों पर ऐसा घटनाऐं हो भी चुकी हैं जब इस तरह के हालात में निरपराध लोगों को भीड के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ा। प्रौद्योगिकी का प्रयोग दुधारू तलवार की तरह है जो  वांछित एवं अवांछित दोनों दिशाओं में वार कर सकती है।

आधुनिक प्रौद्योगिकी एवं मीडिया का अनियंत्रित प्रयोग अप्रत्यक्ष रूप से भी जनमानस को प्रभावित करने लगा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का कोई विरोध नहीं करेगा पर स्वतंत्रता के नाम पर अवांछित, अनर्गल चीजें नहीं परोसी जा सकती। जिनके पास जीवन की मूल जरूरतें पूरी करने के भी साधन नहीं वे भी टी वी के कार्यक्रमों में अमीरी जीवन की तड़क-भड़क का असर झेल रहे होते हैं और अजाने में मानसिक तनावों, उलझनों के शिकार हो जाते हैं।

 

विकृतियों का फैलता संसार

अभावों में पला युवा मीडिया द्वारा प्रस्तुत स्वप्निल भावलोक में अक्सर पहुँच जाता है जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। वह भावलोक कुछ समय के लिये एक मनोरंजन प्रस्तुत कर सकता है पर दीर्घ अवधि में नहीं। व्यक्ति की मनोदशा और रुझान के अनुसार दीर्घ परिसर में कोई अवसाद के गर्त में चला जाता है जबकि दूसरा येन-केन-प्रकारेण उस भावलोक को हकीकत में बदलने के प्रयास में अपराधी मानसिकता को पोषित करने लगता है। पहले के समय में भी अपराधी प्रवृत्ति के लोग होते थे पर अब उसमें काफी इजाफा हुवा है। सब मिलाकर हमारे चारों ओर सूचनाओं का एक पर्यावरण है जो तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है। आज हमें दोनों स्तरों पर पर्यावरण प्रदूषण से लड़ने की जरूरत है भौतिक स्तर पर और मानसिक स्तर पर भी।   

 

सरकते अंदरूनी ग्लेशियर

यह हम जानते आये हैं कि ग्लेशियर यानि हिमनद किस तरह जल-आपूर्ति में एक आवश्यक संतुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं। शीत ऋतु में हिम संचित होता है और धीरे-धीरे जैसे गर्मी बढ़ती है हिम द्रवित होकर जल आपूर्ति में सहायक होता है। कुछ वैसी ही बात अवचेतन एवं अचेतन मन में संचित स्मृतियों के लिये भी कही जा सकती है जो अद्दश्य और अप्रत्यक्ष  होते भी जीवन के मुश्किल दौरों में सहायक हो सकते हैं बशर्ते स्मृतियों के वे हिमनद स्वस्थ एवं सुखद यादों को संजोये हों। हिमनद से पोषित सरिता कभी सूखेगी नहीं कुछ वैसे ही पहले की विशेषकर बचपन की संचित सुखद यादें कठिन समय में भी हताश नहीं होने नहीं देतीं। वे जो इस विषय में  भाग्यशाली नहीं रहे उनके पास मुश्किल दौर में यह सुरक्षा-कवच लगभग अनुपस्थित होता है और मनोवैज्ञानिक स्तर पर वे कमजोर पड़ सकते हैं।

इस संदर्भ में ग्लेशियर प्रतीक बन जाता है संरक्षण का, संतुलन का, स्वयं जड़ीभूत एव़ं घनीभूत बनकर जीवन-प्रवाह की निरंतरता का। आने वाला समय इन ग्लेशियरों के लिये मु्श्किल होगा इसमें संदेह नहीं। संरक्षण व संतुलन के प्रतीक ग्लेशियर मानवी विकास की भेंट चढ़ जायेंगे ऐसा प्रतीत होने लगा है। जिस तेजी से आर्कटिक एवं अंटार्कटिक का हिम विलुप्त हो रहा है उससे विश्व के सभी ग्लेशियरों के अस्तित्व के बारे में इस तरह की चिंता स्वाभाविक है।

आज मन का पर्यावरण भी प्रदूषित हुवा है और स्मृतियों के हिमनद अब सरक रहे हैं। यह आने वाले समय की पीढ़ियों के लिये मनोवैज्ञानिक स्तर पर कठिनाई का संकेत है और इसलिये यह जरूरी है कि हम भौतिक पर्यावरण के साथ-साथ मन के पर्यावरण के बारे में भी आवश्यक कदम उठाना आरम्भ करें। आसान नहीं होगा यह काम, इंसान को कुदरत के संतुलन को समझना ही होगा और साथ ही अपने मन-अभ्यंतर की प्रक्रियाओं को भी।

कुछ विचारकों का यह मानना है कि मानव सभ्यता संभवत: अपने उत्कर्ष पर आ चुकी है और अब उसके पतन की शुरूवात हो चुकी है [6]। पृथ्वी लगभग 4.5 अरब वर्ष से अस्तित्व में है और जीवन की संभावना को प्रस्तुत करता जैव-मंडल भी करीब 3,5 अरब साल पुराना; पर अरबों सालों से अस्तित्ववान यह जैव-मंडल मात्र तीन सौ सालों में विघटन के कगार पर पहुँच रहा है इंसान की करनी से। आज जीवों व वनस्पतियों की हजारों प्रजातियां लुप्तप्राय हैं और अथाह लगने वाला सागर भी प्रभावित होने लगा है। सभ्यता दूर की बात है मानव का  अस्तित्व भी खतरे में है  b विकल्प संभवत: एक ही है दोनों प्रकार के पर्यावरणों की रक्षा और संरक्षण। और संरक्षण की भावना का प्रतीक ग्लेशियर संरक्षित रहना ही चाहिये यह इंसान के हित में है यह उसे समझना होगा। 

 

संदर्भ:

(1)  जयशंकर प्रसाद कृत आँसू से।

(2)  Niels Bohr: At the level of atoms, language must be used only as in poetry.

(3)  जयशंकर प्रसाद, कामायनी से।

(4)  मिर्जा मोहम्मद रफी सौदा

(5)  सुमित्रा नंदन पंत 

(6)  Jared Diamond, The Rise and fall of the Third Chimpanzee, Vintage Publications, 2002. (लेखक के अनुसार Third Chimpanzee स्वयं इंसान के लिये ही कहा गया है। अफ्रीका में पाया जाने वाला बोनोबो चिंपांजी इंसान का सबसे करीबी रिश्तेदार माना जाता है।)


सेतु, अक्टूबर 2021

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