कहानी: स्ट्राइक

डॉ. हंसा दीप

हंसा दीप

टीडीएसबी, टोरंटो डिस्ट्रिक्ट स्कूल बोर्ड की प्राथमिक शालाओं में स्ट्राइक की घोषणा हुई तो नन्हे छात्रों के माता-पिता ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। आमतौर पर बगैर स्ट्राइक के ही सरकार के साथ समझौता हो जाता था। बरसों से ऐसा ही होता आ रहा था लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग थी। पहली से लेकर पाँचवीं तक पढ़ रहे बच्चों के घरों में हलचल होने लगी जब वाकई में शिक्षकों की स्ट्राइक की वजह से शहर के कोने-कोने में, बारी-बारी से स्कूल बंद होने लगे।  
एनिका बनाम एनी और उसके भाई रीड के स्कूल का इलाका बीच में था, शहर के सेंटर में। यहाँ सप्ताह में दो बार स्ट्राइक होना तय हुई थी क्योंकि इस क्षेत्र के स्कूल बड़े थे व अध्यापक गण भी ज्यादा थे। एक सप्ताह का समय जैसे-तैसे निकल गया। एनी और रीड के लिए स्कूल से छुट्टी मिलने का यह बिन माँगा तोहफा था। एक बार मम्मी ने, एक बार पापा ने सिक लीव ली। अगले सप्ताह दोनों की खास मीटिंग थी, एक से जुड़ी दूसरी। समय का तालमेल बैठाना मुश्किल हो रहा था। गुस्सा और मजबूरी दोनों थे। शायद हर बच्चे के घर में यही हालत थी। सारे माता-पिता सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे। 
बच्चों को घर पर संभालने के लिये कौन-कैसे-कब घर रहे, यह समस्या छोटी नहीं थी। एनी तीसरी कक्षा में थी और रीड पहली कक्षा में। दोनों की पढ़ाई की चिंता बिल्कुल नहीं थी, चिंता थी तो घर पर रुकने की। लंबी बहस के बाद मम्मी-पापा में तय हुआ कि आधे-आधे दिन का बँटवारा किया जाए- “आधे दिन से पहले तुम अपनी मीटिंग खत्म करो और आधे दिन के बाद मैं अपनी।” पहले सप्ताह तो बच्चे खुश थे, अनायास छुट्टी जो मिल रही थी। लेकिन दूसरे सप्ताह से फिर उसी घर पर रुकने वाली बात को वे पचा नहीं पा रहे थे। अपने दोस्तों के साथ की धमा-चौकड़ी याद आती, नाश्ते और लंच का ब्रेक याद आता, जब बर्फ से भरे मैदान में वे भरपूर मस्ती करते थे। 
उनके सवालों की बौछारें शुरू हुईं। खासतौर से तब, जब आज की ताजा हालत जानने के लिये पापा ने टीवी पर न्यूज़ चैनल लगाया। शहर की खास खबर थी यह! समाचार चैनल इसे मुख्य समाचार के साथ बार-बार प्रसारित कर रहे थे। सारे शिक्षक लाइन से हाथ में बड़ी-बड़ी डंडियों से लगे पोस्टर लेकर चल रहे थे। उस मार्च-पास्ट में रीड को उसकी क्लास टीचर दिखीं मिस कट्ट, जो अपने सुनहरे लहराते बालों को हैट से ढँककर, जैकेट पहने एक गोलाकार में चल रही थीं। उनके फर वाले बूट को अच्छी तरह पहचानता था वह। 
“मिस कट्ट! एनी, देखो मेरी टीचर!” टीवी स्क्रीन पर मिस कट्ट को देखकर रीड बहुत खुश हो गया। और इतने में वहाँ पहुँचे टीवी कैमरे ने इंटरव्यू लेना शुरू किया तो सामने एनी की टीचर थीं। वह दोगुने जोश से चिल्लायी – “मिस मिशैल, मेरी टीचर!” 
कैमरे के सामने खड़ी मिस मिशैल एंकर को बता रही थीं – “जॉब कट की वजह से हमारी कक्षाओं में अधिक बच्चे हो रहे हैं। सरकार को हमारी माँगों पर ध्यान देना चाहिए। छोटे बच्चों के विकास का सवाल जुड़ा हुआ है।”  
दोनों बच्चे बहुत ध्यान से उनकी बात सुन रहे थे। वे बहुत अच्छी टीचर हैं, सब जानते थे। सब बच्चे उनसे बहुत प्यार करते थे। फॉल व विंटर कांसर्ट में वे ही सब बच्चों से परफॉर्म करवाती थीं। वे जो भी कहतीं बच्चों से, वह पत्थर की लकीर होता था। रीड और एनी के लिये सामने टीवी पर हो रहा यह प्रदर्शन एक नई चीज था। दोनों के मन में यह समझने के लिये हलचल थी कि यह सब आखिर हो क्या रहा है? टीचर कक्षा में न आकर बाहर ऐसे पोस्टर लेकर क्यों घूम रहे हैं!
पापा-मम्मी के सामने सबसे बड़ा सवाल मुँह बाए खड़ा था- “बच्चों को कहाँ छोड़ें?” 
और बच्चों के सामने सवाल था- “क्या मतलब है स्ट्राइक का?” 
पापा अपने आधे दिन की ड्यूटी घर पर पूरी करने के लिये आराम से सोफे पर बैठकर उसके बाद की मीटिंग की तैयारी कर रहे थे। बोले – “इसका मतलब है वे काम पर नहीं जाएँगे, यानि आपको नहीं पढ़ाएँगे, स्कूल नहीं आएँगे।” 
“क्यों” एनी हतप्रभ थी।
“क्योंकि उनकी कुछ माँगें हैं।”
“माँगें मतलब” रीड का छोटा दिमाग दौड़ रहा था। 
“माँगें मतलब डिमांड।” 
“क्या है उनकी डिमांड पापा?” 
“उनकी बहुत सारी डिमांड हैं बेटा। उनकी सैलेरी बढ़ायी जाए यानि और पैसे दिए जाएँ। कक्षा में बच्चे कम हों। जॉब कट न हो।”  
पैसों की बात पर दोनों का ध्यान अधिक था – “लेकिन और पैसे देगा कौन?” 
“किसको दिखा रहे हैं ये पोस्टर?” रीड ने अपनी माथे पर लकीरें लाकर पूछा तो पापा को उस पर प्यार आ गया।
“ये सरकार को दिखा रहे हैं पोस्टर। सरकार बढ़ाए इनकी सैलेरी, यानि ये जो काम करते हैं न  आपको पढ़ाने का, उसके पैसे बढ़ाए जाएँ।” 
“सरकार क्या होती है, पापा?”
“सरकार में वे लोग होते हैं जो नियम-कानून बनाते हैं। इन्हें पैसे देते हैं, पूरे शहर का ध्यान रखते हैं।” 
बच्चे ध्यान से टीवी देख रहे थे। उनकी अपनी-अपनी टीचर बार-बार स्क्रीन पर दिखाई दे रही थीं। वे पोस्टर लेकर अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ गोल-गोल घूम रही थीं। पोस्टर पर कैमरा टिकता तो दोनों पढ़ने लगते – “जॉब कटौती नहीं, आपके बच्चों पर असर, कक्षा का साइज़ छोटा हो।” 
और भी कई टीचर थे। मिस भी और मिस्टर भी, जिन्हें रीड और एनी नहीं जानते थे। तभी मिस्टर रॉड्रिक्स दिखे जो जिम में उन्हें बहुत अच्छी तरह बास्केटबॉल खेलना सिखाते थे। “हाहा देखो मिस्टर रॉड्रिक्स को” दोनों चिल्लाए। समाचार पढ़ने वाली न्यूज़ एंकर बता रही थी कि इस बार टीचर्स यूनियन ने कठोर फैसला लिया है। जब तक माँगें पूरी नहीं होंगी वे सप्ताह में दो दिन कक्षा में नहीं जाएँगे। शायद पहली बार दोनों बच्चे बहुत ध्यान से समाचार सुन रहे थे। इस बात का अहसास उन्हें भी था कि उनकी कक्षा में भीड़ बहुत है। एक हेल्पर टीचर होने के बावजूद शोरगुल होता रहता था। 
बार-बार यूनियन शब्द आने पर एनी ने पूछा – “पापा यूनियन क्या होती है?” 
पापा के पास अभी आधे दिन का समय था। बच्चों को अच्छी तरह समझाने लगे– “यूनियन का मतलब होता है जब सब काम करने वाले मिलकर, एक साथ अपनी माँगों के लिये सरकार के पास जाते हैं। इतने लोगों के दबाव के सामने सरकार झुक जाती है और फिर उनकी माँगें माननी पड़ती हैं। यह एक हो जाने की ताकत है।” पापा और भी बहुत कुछ बोल रहे थे। बच्चे कुछ समझ पा रहे थे, कुछ नहीं। कुछ पलों तक दोनों चुप रहे। फिर एनी का अगला सवाल उछल कर आया – “तो अगर हमारी टीचर की सरकार है तो आपकी भी सरकार है क्या, जिनसे आप डिमांड कर सकते हैं।” 
“हाँ हमारी सरकार हमारे बॉस हैं। वे जैसा बोलते हैं हमें वैसा करना पड़ता है। कभी-कभी हम सब मिलकर उनसे कुछ डिमांड करते हैं तो उन्हें देना ही पड़ता है।” 
एनी चुप हो गयी। रीड बहुत ध्यान से कुछ सोच रहा था, बोला - “तो पापा, क्या मेरी और एनी की भी कोई सरकार है?”
“हाँ बिल्कुल है।” पापा के चेहरे पर सरकारी अफसर का रोब झलक आया। मम्मी आधे दिन के लिये काम पर जा चुकी थीं सो पापा को पूरी आजादी थी अपनी धौंस जमाने की – “आपके पापा आपकी सरकार हैं।” रोब से कह तो गए पर अगले ही पल मम्मी का प्रश्नवाचक चेहरा सामने था। उन्होंने जल्दी ही यह कहकर अपनी गलती सुधारी– “मम्मी-पापा आपकी सरकार हैं। आपके लिये नियम कानून बनाते हैं।” 
“सरकार तो एक ही होती है न पापा, तो कौन है हमारी सरकार, आप या ममा।” एनी पक्का कर लेना चाहती थी कि उनकी असली सरकार आखिर है कौन, ममा या पापा!
“दोनों के पास अलग-अलग विभाग हैं, फिफ्टी-फिफ्टी।” पापा ने एक सधे हुए राजनीतिज्ञ की भांति सधा हुआ कूटनीतिक जवाब दिया। 
“ओके।” 
अब दोनों बच्चे चुप हो गए थे। उनके दिमाग में क्या चल रहा था, वे क्या सोच रहे थे, इस पर पापा का ध्यान बिल्कुल नहीं था। एनी अपने से दो साल छोटे रीड को देख रही थी और रीड किसी सोच में डूबा था। बीच-बीच में दोनों एक दूसरे को देख लेते थे। पापा ने टीवी बंद किया तो दोनों इधर-उधर चीजें उठाते-पटकते समय काटने लगे। आधे घंटे बाद रीड का मन मचलने लगा। उसे वीडियो गेम खेलना था। एनी भी बेचैन थी आईपैड पर अपना प्रोग्राम देखने के लिये। पापा पहले ही मना कर चुके थे कि या तो लायब्रेरी से लायी किताब पढ़ो, या फिर मैथ के कुछ सवाल करो। किताब लेकर दोनों बैठे तो थे पर पढ़ नहीं रहे थे। 
यूनियन का कीड़ा कुलबुला रहा था शायद। तुरुप का पत्ता बच्चों के आमने-सामने खड़क रहा था। कुछ असामान्य-सा था, पिछले एक घंटे से दोनों में कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं हुआ था। कुछ खुसुर-पुसुर जरूर चल रही थी। 
मम्मी अपने आधे दिन की छुट्टी पर घर आ गयीं तो पापा का समय खत्म हुआ। वे चले गए ऑफिस अपनी मीटिंग निपटाने। रीड और एनी दोनों ने एक बार फिर से अपनी वीडियो गेम और आईपैड की माँग को दोहराया मम्मी के सामने। मम्मी ने डाँट दिया – “छुट्टी है इसका मतलब यह नहीं कि दिन भर खेलोगे! और एनी पता है न, स्पेलिंग टेस्ट में कितने कम नंबर आए थे! जाओ नोटबुक लेकर आओ, स्पेलिंग देती हूँ। रीड चलो, आप भी अपनी नोटबुक लाओ।” 
रीड-एनी दोनों के चेहरों पर गुस्सा था। इनकार में सिर हिलाते, पैर पटकते दोनों ऊपर चले गए। मम्मी ऑफिस का काम निपटाने में उलझ गयी थीं। साथ ही, डिनर भी तैयार हो रहा था। थोड़ी देर बाद एनी आर्ट वर्क करने के लिये मार्कर, कैंची और कुछ सामान इधर-उधर से बटोर कर वापस ऊपर चली गयी। 
शाम हो चली थी, पापा आ चुके थे। मम्मी ने अपना ऑफिस का काम खत्म करके डिनर मेज पर लगा दिया। मम्मी काम में ऐसी लगी थीं कि उन्हें ध्यान ही नहीं रहा कि पिछले दो घंटों से बच्चों ने कुछ खाया नहीं है और दोनों को बहुत भूख लगी होगी। हालाँकि बच्चों की ओर से शांति थी। अब सहसा मम्मी के मन में कुछ खटका- “आखिर बच्चे कर क्या रहे हैं ऊपर, काफी देर से कोई फरमाइश नहीं आयी।” 
खाना खाने के लिये दो बार आवाज लगायी मम्मी ने लेकिन कोई बच्चा नहीं आया। हैरान-सी मम्मी गुस्से में ऊपर पहुँचीं, दन-दना-दन। ऊपर जाकर देखा तो वहाँ एक अलग ही नज़ारा था। दोनों बच्चे हाथों में दो-दो पोस्टर लिये घूम रहे थे। आकार-प्रकार में छोटे-छोटे वे पोस्टर आर्ट वर्क की स्टिक पर गोंद से कागज को चिपका कर लगाए गए थे। कागज पर काटा-पीटी थी, पर पढ़ना आसान था। स्पेलिंग की गलतियाँ भी थीं, पर वाक्य पूरे थे। एनी के हाथ में एक पोस्टर पर लिखा था– “डेज़र्ट में आइसक्रीम और चाकलेट दो।” दूसरे पोस्टर पर लिखा था- “बेबी की तरह ट्रीट मत करो।”
रीड के हाथों में उसकी सदा की माँगें थीं “वीडियो गेम का समय बढ़ाओ”, “जन्मदिन का तोहफा हम पसंद करेंगे।”
चलते-चलते वे रुक जाते और फिर दूसरा पोस्टर उठा लेते, जिसमें लिखा था – “हमारी सरकार, हमारी माँगें पूरी करो।”
एक और पोस्टर जमीन पर लावारिस-सा पड़ा था जो शायद रीड ने एनी से पूछकर लिखा होगा मगर बाद में एनी ने उसे रिजेक्ट कर दिया होगा। उस पर रीड के बड़े-छोटे बेतरतीब अक्षर थे। बावजूद इसके पढ़ना मुश्किल नहीं था - “प्लेडेट हर सप्ताह”। 
मम्मी हँसने लगीं, कुछ इस तरह कि थामे नहीं थम रही थी हँसी। तब तक नीचे पापा भी आ चुके थे। शोर सुनकर वे भी ऊपर आए और फिर जो दृश्य देखा तो दंग रह गए। गहरी मुस्कान के साथ अपने बच्चों की होशियारी पर सीना चौड़ा हो गया। मम्मी से कहने लगे- “सुबह तो मैंने सब कुछ बताया था इन्हें। वाह बच्चों, नकल में जबरदस्त अकल लगायी तुमने।” और फिर पापा ने मम्मी को बताया कि सवेरे टीवी पर टीचर को देखकर कितने सवाल पूछे थे बच्चों ने, और कितनी अच्छी तरह हर सवाल का जवाब देकर समझाया था। अब वैसे ही नकल कर रहे थे बच्चे। 
“नकल नहीं है मिस्टर पापा, ये तो हमारी माँगें हैं, हमारी सरकार से।” लीडर बनी एनी ने घोषणा कर दी – “अगर हमारी ये माँगें पूरी नहीं हुईं तो कल स्कूल नहीं जाएँगे और खाना तो बिल्कुल नहीं खाएँगे” बच्चों के मुँह पर मुस्कान तो थी मगर साथ-साथ निश्चय भी नजर आ रहा था।
“यस, नो फूड।” रीड ने फूड शब्द पर जोर देकर कहा। भूख तो लग रही थी उसे पर एनी की चेतावनी याद थी- “स्ट्रांग रहना, फूड के नाम से पिघलना मत।”  
“नो फूड! यानी हंगर स्ट्राइक!” मम्मी की दुखती रग पर हाथ रखा था बच्चों ने। जानते थे कि मम्मी को चैन नहीं पड़ता जब तक वे दोनों खाना न खा लें। मम्मी मुस्कुराते हुए लालच देने लगीं – “पता है, आज मैंने रीड का फेवरिट पास्ता बनाया है।” रीड, जो यह सुनते ही टेबल पर आ जाता था खाने के लिये, उसने देखा तक नहीं मम्मी की ओर। बच्चों का मुँह देखकर लग रहा था कि बच्चे सिर्फ खेल नहीं रहे हैं, गंभीर हैं अपनी माँगों को लेकर। मम्मी हैरान थीं, पापा भी। उनकी सरकार यूनियन के घेरे में आ गयी थी। कितने चालाक हैं बच्चे, जानते हैं कि इस समय सब कुछ मान लिया जाएगा। मम्मी उन्हें भूखा नहीं देख सकतीं। बहरहाल, सरकार तो सरकार है, चाहे देश की हो या घर की। यूनियन के दाँव-पेंचों से निपटना हर सरकार को आता है। 
मम्मी-पापा सीधे-सीधे नहीं मान सकते थे सारी माँगें। सरकार वाला तेवर उनके चेहरों पर था। निगोशिएट करना जरूरी था। जो बच्चों को सिखाया था उससे पलट भी नहीं सकते थे। स्ट्राइक के बारे में, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बारे में जो कुछ समझाया गया था, अब वही हकीकत बनकर सामने था। मम्मी कह रही थीं पापा से – “इतना भी समझाने की क्या जरूरत थी। हर चीज का अच्छा खासा लेक्चर दे दिया होगा तुमने।”
“मैं तो बच्चों को सिखा रहा था।” 
“तुम्हें मालूम होना चाहिए कि ये हमारे बच्चे हैं। बहुत स्मार्ट! अब भुगतो और चलाओ अपनी सरकार।” 
“देखो, अब चिड़चिड़ाने से कुछ नहीं होगा। शांति से बच्चों की बात को समझना होगा वरना अगली बार कुछ समझाएँगे तो वे समझना ही नहीं चाहेंगे।” 
आपसी सहमति से मम्मी-पापा तैयार हुए बातचीत के लिये। किचन की टेबल पर बच्चों की सरकार यानि मम्मी-पापा थे। ऑफिस की टेबल पर जनता यानि रीड और एनी थे, फैसले की घड़ियों का इंतजार कर रहे थे। हैरानी तो इस बात की थी कि जो बच्चे लड़े बगैर थोड़ा समय भी नहीं निकाल पाते थे, वे दोपहर से संगठित होकर ऐसी खिचड़ी पका रहे थे कि कुछ पता ही नहीं चला कि वे दरअसल क्या करने वाले हैं। मम्मी-पापा की हालत उस सरकार जैसी कर दी थी जो माँगें मानने के लिये मजबूर हो जाए। 
आखिरकार फैसला हुआ, हर माँग का जवाब तैयार किया गया – “डेज़र्ट में, सप्ताह में दो दिन आइसक्रीम और दो दिन चाकलेट होगी, बाकी के दिन कुकीज़ और क्रेकर्स ही मिलेंगे।” 
“बेबी की तरह ट्रीट नहीं करेंगे पर दोनों को अपने काम खुद करने होंगे।” 
“आईपैड का समय एनी के लिये अब पच्चीस मिनट होगा टोटल, और रीड के लिये बीस मिनट।” 
“जन्मदिन की गिफ्ट के बारे में जो बच्चे कहेंगे वही खरीदा जाएगा।” 
यूनियन बाजी में पड़कर मम्मी-पापा अपने विशेषाधिकारों को तिलांजलि नहीं दे सकते थे। प्लेडेट बढ़ाने की माँग तो सामने आयी नहीं थी, पोस्टर जमीन पर ही पड़ा था। फिर भी रीड को चेतावनी दे दी गयी कि प्लेडेट नहीं बढ़ायी जाएगी। कुछ माँगें मान ली थीं, कुछ नहीं। सारी मान लेने से गलत संदेश जाता सो निगोशिएट करके सख्ती से कहा गया– “बस, इससे ज्यादा कुछ नहीं।”
रीड-एनी दोनों ने आँखें मिलायीं, मानो कह रहे हों – “अब अगली बार, जितना मिला है अभी मान जाओ।” 
एक और बात पापा ने समझायी थी उन्हें कि सारे समझौते लिखित होते हैं ताकि दोनों पक्ष अपने-अपने नियमों का ध्यान रखें। इसी के मद्देनजर एनी नोट्स लेती जा रही थी। बीच-बीच में कई शब्दों की स्पेलिंग भी पूछ रही थी। जो-जो मम्मी-पापा ने माना, उस पर हस्ताक्षर लिये गए उनके। दोनों बच्चों ने भी शान से हस्ताक्षर किए। पहली बार अपने नाम लिखने में उन्हें समय लगा। मम्मी की आँखों में उस समय प्यार ही प्यार झलक रहा था जब वह बहुत सलीके से, जमा-जमा कर अपना नाम लिख रहा था “रीड”। समझौता लागू हो गया। 
बच्चों ने एक दूसरे से हाइ-फाइव किया। जो बात-बात पर तू-तू-मैं-मैं करते रहते थे, वही आज एक होकर यूनियन के नेताओं की तरह अपने अधिकारों के लिये सजग हो गए थे। मम्मी-पापा सिर हिलाते, आँखों-आँखों में एक दूसरे से कह रहे थे कि उनकी जनता सतर्क हो गयी है, अब उनका प्रशासन यूनियनबाजी के घेरे में आ गया है। हालाँकि, बच्चों की तत्काल ग्राह्य क्षमता व होशियारी से खुश थे दोनों। 
बच्चों के चेहरे जीत की आभा से दमक रहे थे। अपने आईपैड और वीडियो गेम्स का समय बढ़ने की खुशी झलक रही थी दोनों के चेहरों पर। खाने की मेज पर स्वादिष्ट पास्ता मुँह में था। डेज़र्ट में आइसक्रीम मिलना तय था। आँखें एक-दूसरे से कह रही थीं - “आहा, यमी पास्ता! यमी हंगर स्ट्राइक!”
अगले दिन शहर के हर स्कूल को बंद रखने के आह्वान के साथ शहर भर के सारे शिक्षक मैदान में थे। सरकारी अधिकारियों से हुई मीटिंग किसी नतीजे पर न पहुँच पायी थी। अपनी माँगें न माने जाने का गुस्सा था उनके चेहरों पर। बच्चे घर में थे। आज पापा ने पूरे दिन की छुट्टी ले ली थी। टीवी चल रहा था और ब्रेकफास्ट भी। टीचर अपना मार्च-पास्ट कर रहे थे। कल की तरह आज सब कुछ शांत नहीं था। बहुत भीड़ थी। बातचीत की विफलता से प्रदर्शन के उग्र होने का अंदेशा स्वाभाविक था। शायद इसीलिए पुलिस वाले भी अधिक थे। प्रदर्शनकारियों ने विरोध की पिकेट लाइन बना ली थी। वे उसी सीमा में चक्कर लगा रहे थे। 
अचानक इक्का-दुक्का शिक्षकों ने पिकेट लाइन पार करके अंदर जाने की कोशिश की। उन्हें रोकने के प्रयास में कुछ लोगों ने हल्ला मचाया। आवेश में संयम का बांध टूट गया। सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि भगदड़ मच गयी। पुलिसवाले चारों ओर फैल गए। रीड और एनी हतप्रभ से यह सब टीवी पर देख रहे थे। रीड की टीचर मिस कट्ट को घबराते हुए भीड़ में दबते देखा। शायद गिर गयी थीं। एनी की टीचर मिस मिशैल पुलिस को दोनों हाथों से आगे बढ़ने से रोक रही थीं। बच्चे अब डर रहे थे कि उनकी टीचर के साथ यह क्या हो रहा है!
टीवी की स्क्रीन का हडकंप बच्चों की आँखों में नजर आने लगा था। पापा समझ रहे थे, दिलासा दिया- “देखो बेटा, जब भी कोई सीमा लाइन होती है तो उसका ध्यान रखना पड़ता है। पिकेट लाइन वह सीमा थी जिसे किसी ने तोड़ा, इसलिए यह सब हुआ।” 
“किसने तोड़ा, मिस कट्ट ठीक तो हैं?”
“जो सुन नहीं रहे होंगे उन्होंने ही तोड़ा होगा।” एनी ने अपनी समझ से कहा।
पापा ने दोनों की घबराहट दूर करते कहा – “हाँ बिल्कुल। मिस कट्ट ठीक हैं। डरने की कोई बात नहीं बेटा। आपस में एकता होना चाहिए। एक होकर ही कुछ पा सकते हैं। दोनों ओर से समझौता न हो सके तो धीरज रखना पड़ता है।” 
पापा को ठीक से समझ नहीं पाने का साफ संकेत दोनों के हावभाव से नजर आ रहा था।  
पापा ने उदाहरण देकर समझाना चाहा- “कल आपने स्ट्राइक की थी। अगर रीड पास्ता के लालच में चुपचाप खाने की मेज पर आ जाता तो आपकी स्ट्राइक वहीं खत्म हो जाती। रीड ने एनी का साथ दिया। यह यूनिटी थी न आपकी। किसी ने नियम नहीं तोड़ा।” 
एनी ने सिर हिलाया। रीड सहम गया था- “एनी, हम अब स्ट्राइक नहीं करेंगे।” 
बच्चों ने जो देखा उससे पापा का मन खिन्न था। बच्चे अपने शिक्षकों को देखकर हैरान थे। शिक्षक अपने साथियों को देखकर हैरान थे। पुलिस इन सुशिक्षित लोगों के व्यवहार को देखकर हैरान थी। जमाना जरूर बदला था मगर प्रवृत्ति नहीं। सत्ता का वर्चस्व था, बगावत की बू भी थी। अनुशासन का पाठ था, नियमों का उल्लंघन करने का परिणाम भी था। टीवी के बंद होते ही पापा और बच्चे अपने तई सहज होने की कोशिश करने लगे। 
जाने-अनजाने ही दोनों ओर से पिकेट लाइन खींच दी गयी थी, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक।       
***

संक्षिप्त परिचय: यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार। तीन उपन्यास, चार कहानी संग्रह प्रकाशित। पंजाबी में कहानी संकलन व गुजराती में उपन्यास अनूदित। कई प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन। 


2 comments :

  1. बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ

    ReplyDelete
  2. बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएँ

    ReplyDelete

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।