व्यंग्य: सफेदपोशों का शास्त्र

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन


आदमी ने तमाम तरह के शस्त्र बनाए। जब वे नाकाफी हो गए तो शास्त्र बनाए। शस्त्र एक वार में कुछ आदमियों को मारता है, शास्त्र हजारों लोगों को लील जाता है। शस्त्र से भी खतरनाक हैं शास्त्र, जैसे अर्थशास्त्र। यह ऐसा शास्त्र है जो हर चीज को पैसों में बदल देता है। विधायक हो तो पैसे ले लो, और पैसे हो तो विधायक ले लो। देह हो तो धन ले लो और धन हो तो वांछित देह ले लो। आत्मा बेचना हो, ईमान बेचना हो, अंग बेचना हो, सबके पैसे मिलेंगे।  अर्थशास्त्र ने हर चीज को मूल्य दिया है। पूर्ति घटा कर मांग बढ़ाना और लाभ कमाना इसका मूलमंत्र है। इसके चलते भौतिक चीजों के मूल्य निरंतर बढ़े हैं और नैतिक चीजें अपना मूल्य खोने लगी हैं। अर्थशास्त्र निचोड़ने से पैसा टपकता है। कुछ लोग अर्थशास्त्र निचोड़ने वाले खानदानों में पैदा होते हैं और कुछ लोग ये तकनीक उनसे सीख लेते हैं। जो रेत में से तेल निकालना सिखा दे ऐसा शास्त्र है यह। यह है जो मानवीय श्रम को दोयम और कागजी पूंजी को उत्तम मानता है। ब्याज, लगान, प्रबंधन जैसे शोषण के तरीके सिखाता है। जो इसे समझ ले वह सरकारें खरीद कर अरबपतियों की सूची में बैठ सकता है और जो इसे नहीं समझे वह सरकारी सहायता की उम्मीद में जिंदगी निकाल देता है। वैश्वीकरण के बहाने गरीबों को निर्धन और धनवानों को अमीर बनाने वाला यह जादुई शास्त्र है। अपने कुछ लोगों को यह करोड़ों-करोड़ से लाद देता है, और करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी में उलझे रहते हैं। इसके गोरखधंधों की बदौलत दुनिया की बड़ी आबादी हक की बजाय कल्याणकारी कार्यक्रमों पर जीती है।

जहाँ अर्थशास्त्र काम नहीं करे वहाँ धर्मशास्त्र तैयार हैं। निरंतर प्रयोग से शस्त्र बूठे हो जाते हैं और धर्मशास्त्र धारदार। शस्त्र देह घायल करता है और धर्मशास्त्र आत्मा। शस्त्र छल रच कर वार करते हैं तो शास्त्र सीधे मन पर। शस्त्र एक जन्म में सारा किस्सा खत्म कर देता है और ये शास्त्र जन्म-जन्मांतर के लिए स्वर्ग और मोक्ष के जाल में फाँस लेते हैं। धर्म कोई-सा भी हो, कर्मकांड का भ्रमजाल बुनने और उसे फैलाए रखने में निपुण होता है। हर धर्म खुद को सर्वश्रेष्ठ और शेष धर्मों को पिछड़ा, पोंगापंथी और जाहिल मानता है। इसलिए जहाँ अर्थशास्त्र ढीला पड़ जाए वहाँ धर्मशास्त्र उफान मारने लगते हैं। एक फतवा जारी करके एक आदमी पूरी कौम को नापाक बता सकता है। एक प्यासा बच्चा मंदिर में पानी पी ले तो पूरे देश के मंदिर अपवित्र हो सकते हैं। ऐसे धर्मशास्त्र नहीं होते तो नफरत नहीं होती। शस्त्र मानव मार सकता है मानवता नहीं; पर शास्त्र मानवता भी मार सकते हैं। महिलाओं के प्रति कितने सहिष्णु हैं धर्मशास्त्र, वे उन्हें देवी की मान्यता देते हैं और फिर उनके साथ हो रहे कुकर्म और शोषण की पैरवी करने लग जाते हैं। ये शास्त्र आदमी को अंधधर्म के गहरे नशे में डूबो देते हैं। जब नशा चढ़ता है तो वह बुद्धि और तर्क हर लेता है। आस्था लोगों को अंधविश्वास के जाल में जकड़ जाती है। ईशनिंदा करो तो मरो। इस तरह अनैतिक लोगों को नैतिक सिद्ध करने का यह ऐसा कुटिल षड्यंत्र है जो मानव अधिकारों को बौना साबित करता है। यह ऐसे कट्टरपंथी बनाता है जो अपने भीतर आतंकवादी और हिंसक होते हैं। ‘मेरा धर्म श्रेष्ठ’ का विचार दिमाग में निरंतर घुसाते हुए शास्त्रों ने मनुष्य को जिंदगी भर के लिए नशेड़ी बना दिया है। इस नशे में लोग पिछले जन्मों के कर्मों पर विश्वास करते हैं। देवभूमि पर जन्मे हैं तो मोक्ष मिले न मिले, सम्मान निधि तो मिलेगी ही। शून्य बैलेंस के साथ खाते खोलकर इंतजार करते हैं कि सरकार पैसा डालेगी, केंद्र की नहीं डालेगी तो राज्य की डालेगी।

मेरे चश्मे का नंबर माइनस है। व्यंग्य लिखता हूँ तो विद्रूपताएँ दिखती हैं जो सचेत करना चाहती हैं। आपको अच्छाइयाँ भी दिखेंगी, उन्हें जरूर अपना लेना। पर याद रखना, अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र जब गुपचुप हाथ मिला लेते हैं तो बहुत विषैले हो जाते हैं। धर्म और अर्थ के अनुचित संयोग से सफेदपोश बनते हैं। मुंबईया भाषा में आप उन्हें गुंडे कह सकते हैं, जो एक घिनौना और मारक शास्त्र बनाते हैं। आपने ठीक पहचाना, राजनीति शास्त्र। यह अचूक है, इसका वार खाली नहीं जाता। यह अपने लाभ के लिए निरंतर अर्थ बदलता है। यह सिर्फ ऐसी नीतियाँ बनाता है जो राजा और उसका राज परिवार बचाता रहे। प्रजातंत्र हो, राजशाही हो या जो भी हो, उनकी ही जय-विजय हो; देश और जनता जाए भाड़ में।
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